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गुरुवार, 14 जून 2018

क्या शिलाजीत का जनक है सुरै?

            ह सुनकर थोड़ा अजीब लग सकता है कि हमारे गांवों में घर के आसपास, खेतों के किनारों और चट्टानों के करीब उगने वाला सुरै से शिलाजीत की उत्पत्ति हो सकती है जिसे कई रोगों की उत्तम दवा माना जाता है। लेकिन कुछ वनस्पति विज्ञानियों ने शिलाजीत की उत्पत्ति पर अध्ययन किया और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सुरै इस महत्वपूर्ण औषधि का जनक हो सकता है। आईये आज घसेरी में जानते हैं इस सुरै के बारे में। 
           सुरै पहाड़ों में उगने वाला एक शंक्वाकार पौधा है जिस पर बहुतायत में कांटे होते हैं। यह नागफनी प्रजाति का पौधा है जिसे सुरैं, सुरई, सरू, सुरू, श्योण, सेहुंड नाम से भी जाना जाता है। नेपाली में इसे काने सिउंडी कहते हैं। इसकी शाखाएं पतली होती है। इसकी लकड़ी पर घुन नहीं लगती है। सुरै का वानस्पतिक नाम यूफोर्बिया रॉयलियाना है। असल में उत्तराखंड में इसकी दो प्रजातियां 'यूफोर्बिया रायलियाना' और 'नेरिफोलिया' पायी जाती हैं। सुरै के पौधे की लंबाई पांच से छह फीट तक होती है। इसके तने कांटेदार और शाखाएं पंचकोणीय होती हैं। शीत ऋतु में इसकी पत्तियां झड़ जाती है तथा बसंत के मौसम में इसमें हरे व पीले फूल लगते हैं। मुख्य रूप से इसका उपयोग जलावन, बाड़ बनाने, भवन सामग्री, डिब्बे बनाने तथा ललित कला आदि में किया जाता है, लेकिन आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्वति में सुरै का काफी महत्व है। 
             कुछ वनस्पति विज्ञानियों का मानना है कि शिलाजीत के निर्माण में सुरै और इसकी प्रजाति के पौधों की भूमिका अहम होती है। कई अन्य तरह की औषधियों के निर्माण में सुरै का उपयोग किया जाता है जो पाचन, पेट और सांस संबंधी रोगों में प्रयोग की जाती है। त्वचा संबंधी रोगों के लिये इससे विशेष औषधि बनायी जाती है। इसकी जड़ों से सुगंधित तेल भी तैयार किया जाता है जो घावों और फोड़े फुंसियों पर लगाया जाता है। कान दर्द और दांत दर्द में इससे निकलने वाले सफेद दूध का उपयोग किया जाता है। बवासीर और भगंदर के लिये भी इसे उपयोगी माना जाता है। मस्से और तिल से निजात पाने के लिये भी इसका उपयोग किया जाता रहा है। सोराइसिस के रोग में भी इसका प्रयोग किया जाता है। लेकिन इन सब औषधियों का उपयोग किसी चिकित्सक की देखरेख में ही किया जाना चाहिए।


सुरै के बारे में यह वीडियो देखें और चैनल भी सब्सक्राइब करें। 




             ब बात करते हैं सुरै के शिलाजीत से संबंध के बारे में। वनस्पति विज्ञानी एच सी पांडे ने 1973 में अपने एक आलेख में जिक्र किया था कि सुरै में काफी दूध या लेटेक्स होता है और इसलिए इसकी शिलाजीत की उत्पत्ति में अहम भूमिका हो सकती है क्योंकि यह पौधा हिमालय की उन चट्टानों पर काफी पाया जाता है जहां शिलाजीत मिलती है। उनसे पहले दो अन्य वनस्पति विज्ञानियों राजनाथ और प्रसाद ने 1942 में इंडियन साइंस कांग्रेस में शिलाजीत के निर्माण के संबंध में सुरै या थुअर का जिक्र किया था। जिन चट्टानों पर शिलाजीत पायी जाती है उनका अध्ययन करने पर भी पता चला कि यह चट्टानों से पैदा नहीं होती बल्कि किसी बाहरी स्रोत से यह इन चट्टानों पर जमती है। यह माना गया कि लेटेक्स या गोंद वाले पौधों से इसकी उत्पत्ति होती है। एस घोषाल, जेपी रेड्डी और वीके लाल नाम के तीन वनस्पति विज्ञानियों ने 1976 में प्रकाशित अपने एक आलेख में बताया था कि शिलाजीत में बड़ी मात्रा में जो आर्गेनिक तत्व पाये जाते हैं वह सुरै के लेटेक्स में भी मिलते हैं। हिमालय में जिन चट्टानों पर शिलाजीत पायी जाती है उसके आसपास की सुरै के लेटेक्स यानि दूध को गर्मियों में एकत्रित करके वह इस नतीजे पर पहुंचे थे। इसके बाद कई विज्ञानियों के निर्माण में सुरै की भूमिका को अहम बताया था। उनका मानना था कि लंबे समय तक चट्टान पर एक जगह पर एकत्रित होने से यही दूध बाद में शिलाजीत में बदल जाता है।
          तो देखा आपने जिस सुरै को आप बड़ी हेय दृष्टि से देखते हैं वह असल में बेहद उपयोगी है लेकिन सावधान। इससे निकलने वाले दूध को भूल से भी पीने की गलती नहीं करें। यह दूध आंखों के लिये बेहद खतरनाक होता है। इससे आंख में काफी जलन होती है और यहां तक कि इससे आंख की रोशनी भी जा सकती है।
          प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार निम्न रोगों में सुरै और शिलाजीत का उपयोग किया जाता है। इनको देखकर आप समझ सकते हैं कि दोनों में काफी समानता है। 

सुरै का प्रयोग


तीव्रवीरेचका, मूत्रजनक, संदिग्धवात, श्वास, कुष्ठ, पांडु, अमावात, वातरिक्त, कास, अग्निमन्ध्या, उदर रोग, गुल्म, यकृत वृद्धि, उपदंश, चर्मरोग 

शिलाजीत का प्रयोग 


पांडु रोग, कुष्ठ, अमावात, संधिवात, वातरक्त, कास, प्रमेद, सरकारा, अशमारी, मूत्रकृच्छा, क्षय, अर्सा, अप्समारा, उन्माद, सोठा, उदर कृमि, सुला, गुल्मा, संधि सोठा, सलिपादा, गंदमाला, कमला, फिरंगा, श्वेतप्रदर, शुक्रदौर्बल्य, विषमज्वर, शोशा, मेदोरोजा, गड़दोष, दौर्बल्य, वेदन हारा।

        तो कैसी लगी आपको सुरै के बारे में यह जानकारी। जरूर बतायें। आप इस पर वीडियो भी देख सकते हैं जो पोस्ट के साथ दिया गया है। आप सभी से घसेरी चैनल और ब्लॉग सब्सक्राइब करने का भी अनुरोध है। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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मंगलवार, 22 मई 2018

उत्तराखंड के जंगलों में आग : कारण और बचाव


    गर्मियां शुरू होते ही उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने की खबरें भी आने लगी हैं। श्रीनगर के आसपास के जंगल पिछले कुछ दिनों से आग से धधक रहे हैं। ठोस सरकारी नीति के अभाव में यह लगभग हर साल का किस्सा बन गया है। उत्तराखंड के जंगलों में 1992, 1997, 2004, 2012 और 2016 में लगी आग को भला कौन भुला सकता है। वर्ष 2016 में लगी आग भीषण थी। तब आग ने इतना विकराल रूप ले लिया है कि पहली बार आग बुझाने के लिए वायु सेना, थल सेना और एनडीआरएफ़ तक को लगाना पड़ा था।
      जंगल में लगी आग से पूरा पारिस्थतिकीय तंत्र गड़बड़ा जाता है लेकिन फिर भी हर साल या तो आग लग जाती है या उसे लगा दिया जाता है। सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि उत्तराखंड के जंगलों में हर साल गर्मियों में आग क्यों लगती है। 
      उत्तराखंड में चीड़ के जंगल बहुतायत में हैं जो कि आग लगने का मुख्य कारण हैं। चीड़ की सूखी पत्तियां यानि पिरूळ न सिर्फ आग तेजी से पकड़ता है बल्कि उसे फैलाने में भी अहम भूमिका निभाता है। मार्च से जून तक चीड़ की ये नुकीली पत्तियां नीचे गिर जाती हैं। भारतीय वन संस्थान के अध्ययन के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्र में फैले चीड़ के जंगल से एक साल में लगभग छह टन पिरूळ ​गिरता है। सड़कों में गिरा पिरूळ और उससे बना बुरादा असल में बारूद के ढेर जैसा होता है। गलती से भी इसमें तीली या जली बीड़ी पड़ जाए तो फिर आग पकड़ने में देर नहीं लगती है। 




        त्तराखंड में कभी बांज, देवदार, काफळ, बुरांश आदि के अधिक पेड़ थे। बांज, बुरांश की पत्तियां पशुओं के चारे के काम भी आती हैं और इनकी जड़ों में पानी रोकने की भी क्षमता होती है जबकि चीड़ के पेड़ की प्रकृति इसके ठीक विपरीत है। देवदार, बांज, बुरांश ​आदि को इमारती लकड़ी के लिये काटा गया और अंग्रेजों ने लीसा के लोभ में चीड़ के पेड़ों को बढ़ावा दिया। अब आलम यह है कि उत्तराखंड में जहां भी नजर दौड़ाओ चीड़ के पेड़ नजर आते हैं जो न जंगल के लिये लाभकारी हैं और ना ही आम आदमी के लिये। चीड़ के पेड़ और सख्त वन्य कानूनों ने स्थानीय निवासियों की वनों से दूरी भी बढ़ा दी। जिन वनों को वे अपना समझते थे वे उनके लिये पराये हो गये। 
       पिरूळ अपने नीचे किसी अन्य वनस्पति को नहीं पनपने देता है इसलिए पशुओं के लिये भी जंगल बेमतलब के हो गये। स्थानीय निवासी भी पिरूळ को पसंद नहीं करते और कई बार वे इसमें आग लगा देते हैं। जंगलों में आग लगने की अधिकतर घटनाएं इंसानों की वजह से होती हैं जैसे आगजनी, कैम्पफ़ायर, बिना बुझी सिगरेट या बीड़ी फेंकना, जलता हुआ कचरा छोड़ना आदि। 
       इस आग से बचा जा सकता है कि लेकिन अब भी उत्तराखंड में इसके लिये कोई मास्टर प्लान नहीं है। सबसे पहले तो चीड़ के जंगलों को बढ़ने से रोकना होगा तथा स्थानीय निवासियों को बांज, बुरांश आदि के पेड़ लगाने के लिये उत्साहित करना होगा। जैसा हमने पहले आपको बताया कि पिरूळ आग लगने और उसे फैलाने का मुख्य कारक है। उत्तराखंड में अगर आग के आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2014 में 384.5 हेक्टेयर व 2015 में 930.55 हेक्टेयर क्षेत्र में आग लगी थी जो कि वर्ष 2016 में 4,423.35 हेक्टेयर तक पहुंच गयी। इस आग से करोड़ों रूपये का नुकसान हुआ। बेहतर यही है कि बाद में नुकसान उठाने के बजाय सरकार इस रूपये का पहले सदुपयोग करे। पिरूळ से खाद बनाने व्यवस्था की जा रही है लेकिन इसे व्यापक स्तर पर चलाया जाना चाहिए। पिरूळ इकट्ठा करके उससे खाद तैयार करने में स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेगा। आग बुझाने के लिये केवल दमकलकर्मियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। स्थानीय लोग अपनी तरफ से प्रयास करते हैं लेकिन सरकार को उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। इसको रोजगार का रूप दिया जा सकता है। यही नहीं लीसा माफिया के खिलाफ भी सरकार को सख्त कदम उठाने होंगे जो अपनी चोरी छिपाने के लिये जंगलों में आग लगा देते हैं।
धर्मेन्द्र पंत 

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

स्वास्थ्य के लिये सर्वोत्तम है पंदेरा का पानी

      
        पंदेरा....यानि का पानी का प्राकृतिक स्रोत। उत्तराखंड में हर गांव ऐसे स्थान पर बसा है जहां पर पानी का प्राकृतिक स्रोत यानि पंदेरा हो। यह अलग बात है कि समय के साथ कई स्थानों पर पानी के ये प्राकृतिक स्रोत सूख गये हैं या उनमें बहुत कम पानी आने लगा है। इसका एक कारण वनों का कटाव भी है। पंदेरा, पंद्यर, पनेरा, पंदेरू या पंद्यारू कभी गांव की महिलाओं का मिलन स्थल हुआ करता था। घर की घटनाओं और मन की बात का गवाह होता था पंदेरा। गर्मियों में ठंडा शीतल जल और सर्दियों में गुनगुना पानी देता है पंदेरा। आपने गढ़वाल की आवाज महान गायक नरेंद्र सिंह नेगी का गीत सुना होगा, ''छुयुं मा मिसे गिन पंदेरों में पंदेरी .....''। सरकारों ने पिछले कई वर्षों से गांव गांव में पानी पहुंचाने की भी कोशिश की।  घरों के आसपास नल लगे लेकिन पंदेरा की फिर भी बादशाहत बनी रही। पलायन ने जरूर उसे अपनी सखी सहेलियों से बहुत दूर कर दिया। जिस पंदेरा में कभी भीड़ लगी रहती थी, जहां लोग अपनी बारी का इंतजार करते थे आज वहां सन्नाटा छाया रहता है। 
      पंदेरा हमारे पहाड़ी गांवों को जीवनदायिनी जल ही नहीं देता है बल्कि जब स्वास्थ्यप्रद पेयजल की बात आती तो पहाड़ी पंदेरा या पहाड़ के प्राकृतिक स्रोतों का पानी सर्वश्रेष्ठ विकल्प माना जाता है। दुनिया के अधिकतर लोगों को यह पानी नसीब नहीं होता लेकिन कि हम पहाड़ी उसी पानी को दुत्कार रहे हैं। सामने झरना बह रहा है लेकिन हमें बोतलबंद पानी पीने का शौक चर्राया है। पहाड़ों में बोतलबंद पानी .... यह सुनकर ही अजीब लगता है। मेरी तो आपको यही राय है कि बोतलबंद पानी फेंकिये और पंदेरा का पानी पीजिए। यह आपके तन और मन में नयी ऊर्जा भरेगा जो बोतलबंद पानी कभी नहीं कर सकता।




    पंदेरा के पानी के कई प्राकृतिक लाभ हैं। इसे 'लिविंग वाटर' यानि 'क्रियाशील जल' कहा जाता है। क्रियाशील इसलिए क्योंकि यह मानव शरीर के लिये जरूरी महत्वपूर्ण ऊर्जा से भरा होता है। इसलिए जब आप पंदेरा का पानी पीते हो तो यह आपके शरीर में ऊर्जा भरता है। बहने वाला पानी क्रियाशील जल होता है लेकिन जो तुरंत स्रोत से निकला हो वह पानी गुणों से भरपूर माना जाता है जो कई  वर्षों से भूमिगत जल के रूप में जमा रहता है। इसमें खनिज लवण पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। यह बेहद स्वच्छ, स्वास्थ्यवर्धक और प्रदूषकों से मुक्त होता है। पंदेरा के पानी का स्वाद अद्भुत होता है जिसका किसी अन्य तरह के पानी से तुलना ही नहीं की जा सकती है। विश्व की अधिकतर नदियां पहाड़ों से निकलती हैं लेकिन आगे बढ़ने के साथ इनमें कई प्रदूषक तत्व मिल जाते हैं। प्राकृतिक जल स्रोत से निकला पानी बोतल में बंद मिनरल वाटर और नल के पानी से कई गुणा उपयोगी होता है। 
     पंदेरा में पानी में प्राकृतिक खनिजों का बहुत अच्छा संयोजन होता है जैसे मैग्निसियम, कैल्सियम, पोटेशियम और सोडियम जो आपके स्वास्थ्य के लिये बेहद जरूरी होते हैं। कई कंपनियां इसका फायदा उठाकर प्राकृतिक स्रोतों का पानी बेच रही हैं लेकिन कई दिनों तक बोतल में बंद रखने के लिये उसमें कुछ रसायन मिलाये जाते हैं जिससे इसके कई मूल गुण समाप्त हो जाते हैं। 
    पंदेरा का पानी पीने से आप तरोताजा महसूस करते हैं, लेकिन इसके कई अन्य फायदे भी हैं। कई अध्ययनों से पता चला है कि पहाड़ी प्राकृतिक जल स्रोतों का पानी किसी व्यक्ति के वजन को उसके शरीर के अनुसार बनाये रखने में अहम भूमिका निभाता है। अगर आपको अपना वजन बढ़ाना है या घटाना है तो फिर प्राकृतिक जल स्रोतों का शुद्ध पानी पीजिये और कुछ दिनों में आपको फर्क नजर आने लगेगा। पंदेरा का पानी पीने से आपकी त्वचा भी चमकदार बनती है। मैं जब पहाड़ में अपने गांव जाता हूं तो अद्भुत तरीके से मेरी पाचन शक्ति बढ़ जाती है और भूख लगती है। असल में यह वहां के पानी का कमाल है। अध्ययनों से पता चला है कि प्राकृतिक  स्रोतों का पानी आपकी पाचन शक्ति और मेटाबोलिज्म यानि उपापचय को बढ़ाता है। यह पोषक तत्वों को पचाने में मदद करता है। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि प्राकृतिक स्रोतों का पानी जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द को कम करने में मददगार होता है। यह रक्तसंचार को सुधारने में योगदान देता है। पंदेरा का पानी शरीर में मौजूद विषैले तत्वों बाहर निकालने यानि डिटॉक्सीफिकेशन में प्राकृतिक रूप से मदद करता है।
     अब आपको पता चल गया होगा कि गुणों की खान है पंदेरा का पानी। पहाड़ियों के स्वस्थ रहने का राज है पंदेरा का पानी। इसलिए पहाड़ में केवल पंदेरा या प्राकृतिक जल स्रोतों का ही पानी पीना। 
    तो कैसे लगी आपको पंदेरा के पानी की यह कहानी अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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बुधवार, 28 मार्च 2018

उत्तराखंड की शादियों का अहम अंग है 'बान'


     क्या आपने कभी सोचा है कि उत्तराखंड की शादियों में 'बान' क्यों दिये जाते हैं? यह हमारी परंपरा, हमारी संस्कृति ​का हिस्सा है जो वर्षों से उत्तराखंड की शादियों का अहम अंग बना हुआ। इसके बिना शादी की रस्म पूरी होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बान या बाना यानि हल्दी हाथ की रस्म लड़की के साथ लड़के को भी निभानी पड़ती है।  उत्तराखंड में परंपरागत ढोल दमौ और मसकबीन की धुन के बीच बान दिये जाते हैं और  स्नान कराया जाता है।
         बान क्यों दिये जाते हैं? इसका सामाजिक, सांस्कृतिक, पारंप​रिक पहलू हो सकता है लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिक सत्य भी छिपा हुआ है। इस पर हम आगे बात करेंगे। पहले आपका परिचय बान से करवा देता हूं। 'बान' बारात जाने से पहले की रस्म है जो दूल्हा और दुल्हन दोनों के घरों में लगभग एक समय में निभायी जाती है। इसमें हल्दी, सुमैया, कच्चुर, चंदन आदि को कूटकर मिश्रण बनाया जाता है। इसे फिर सात पुड़ियों में रखा जाता है जिनमें दूब को डुबाकर उसे दूल्हा या दुल्हन के पांव से लेकर सिर तक यानि पांव, घुटना, हाथ, कंधा और सिर को स्पर्श करके अपने सिर पर रखना होता है। ऐसा पांच या सात बार करना होता है। घर के सदस्य, रिश्तेदार आदि 'बान' देते हैं।


      आचार्य चंद्रप्रकाश थपलियाल ने बान के बारे में बताया, “ बाना (बान) में मुख्य रूप से कच्ची हल्दी, दही, सरसों का तेल, जिराळु, सुमैया, चंदन, दूब का उपयोग किया जाता है। जिस तरह से सात फेरे और सात बचन होते हैं उसी तरह से बाना भी सात ही दिये जाते हैं। यह अलग बात है कि आजकल केवल फोटो खिंचवाने के लिये बाना दिये जा रहे हैं और इसलिए एक, तीन या पांच बार ही बाना देने का रिवाज शुरू हो गया है।’’
       'बान' अमूमन ओखली के पास दिये जाते हैं। दूल्हा या दुल्हन को चौकी (चौक या चौकली) पर बिठाया जाता है। पांच कन्यायें ओखली में सभी चीजों को कूटती हैं। इसके बाद दूल्हा या दुल्हन उसे तांबे की थाली या परात में रखी पुड़ियों में रखते हैं। सबसे पहले पंडित जी बान देते हैं। उसके बाद पांचों कन्यायें तथा बाद में मां—पिताजी, घर के अन्य सदस्य, रिश्तेदार और गांव वाले।  बान देते समय गांव की कुछ महिलाएं मंगल गान भी करती हैं। गढ़वाल और कुमांऊ में अलग अलग मंगल गान का प्रचलन है। जैसे 'दे द्यावा ब्रह्मा जी हल्दी को बान' या 'उमटण दइए मइए मैल छूटाइय'। जब दुल्हन को बान दिये जाते हैं तो माहौल थोड़ा गमगीन होता है। स्वाभाविक है बेटी की बिदाई का गम सभी को सालता है। इस बीच हालांकि जीजा—साली, देवर—भाभी आदि के बीच खूब हंसी ठिठोली भी चलती है। एक दूसरे पर हल्दी लगाकर मजाक किया जाता है।
       अब वही सवाल कि आखिर बान क्यों दिये जाते हैं? माना जाता है कि बान नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने, ग्रह और नजर दोष के निवारण के लिये दिये जाते हैं। हल्दी शुभ होती है और हल्दी से शुभकार्य की शुरुआत करना अच्छा माना जाता है।
        हल्दी हाथ यानि बान का वैज्ञानिक पहलू भी है। आयुर्वेद में हल्दी को औषधि का दर्जा दिया गया है। इस कारण हल्दी हमारी त्वचा के लिए एक तरह से प्राकृतिक का वरदान के समान है। हल्दी के लगाने से त्वचा संबंधी अनेक बीमारियां से छुटकारा पाया जाता है।
       हल्दी का लेप शरीर की कोशिकीय संरचना को इस तरह से फैलाता है, कि इसके हर दरार और छिद्र में ऊर्जा भर सके। हल्दी इस काम में भौतिक रूप से मदद करती है। हल्दी प्राकृतिक एंटी-बायटिक होती है। हल्दी का स्नान दूल्हा और दुल्हन को तमाम रोगों से बचाने में सहायक होता है। इससे त्वचा में भी निखार आता है।
       शादी के समय घर में कई तरह के मेहमान आते हैं जिससे नकारात्मक ऊर्जा फैलने की आशंका रहती है। इसका दूल्हा या दुल्हन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हल्दी के बारे में कहा जाता है कि वह घर में और दूल्हे या दुल्हन के अंदर नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करने से रोकती है। हल्दी नकारात्मक ऊर्जा नष्ट करके सकारात्मक ऊर्जा का सृजन करने में सहायक होती है।
       यह थी बान की कहानी। आपको कैसी लगी जरूर बताईये और 'घसेरी' के वीडियो चैनल को भी जरूर सब्सक्राइब करिये। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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मंगलवार, 20 मार्च 2018

यह जन्मभूमि, यह मातृभूमि इसमें जल्दी आ

चित्र साभार : राजीव विश्वकर्मा 
       उत्तराखंड वर्तमान समय में पलायन की सबसे भीषण मार झेल रहा है लेकिन इसकी शुरुआत कई दशक पहले हो गयी थी जब पहाड़ के युवा ने आजीविका की खातिर मैदानों की तरफ कदम बढ़ाये थे। इसके बाद शहरों का आकर्षण बढ़ता गया तथा उत्तराखंड के युवा देहरादून, लखनऊ, दिल्ली, मुंबई आदि शहरों में नौकरी करने लगे। सेना में नौकरी तब भी और आज भी एक आकर्षण था। सेना से सेवानिवृत होने के बाद मैदानी भागों विशेषकर देहरादून, कोटद्वार, बरेली आदि शहरों में बसने की प्रवृति भी बढ़ी। पहले केवल युवा नौकरी के लिये पलायन करते थे लेकिन बाद में उनके साथ परिवार के अन्य सदस्य भी शहरों की तरफ कूच करने लग गये। परिणाम गांव खाली होने लगे और आज स्थिति​ यह बन चुकी है कि उत्तराखंड के कई गांव महज कागजों में सिमट गये हैं। 
         उत्तराखंड का गठन नौ नवंबर 2000 को हुआ। उम्मीद थी कि पहाड़ की जवानी और पानी थामने के जिस वादे के साथ उत्तराखंड बना था वह पूरा होगा लेकिन हुआ इसका उलटा। इसके बाद पलायन तेजी से बढ़ा। कहते हैं कि 'जहां न जाए रवि, वहां पहुंचे कवि'। गढ़वाली और हिन्दी के कवि श्री जितेंद्र मोहन पंत ने अपनी युवावस्था में ही उत्तराखंड से हो रहे पलायन को भांप लिया था। पलायन पर उन्होंने 1980 में यह कविता लिखी थी जो आज भी प्रासंगिक है। उम्मीद है कि 'घसेरी' के पाठक इसका मर्म समझेंगे। 

                 यह जन्मभूमि, यह मातृभूमि इसमें जल्दी आ 

            (उत्तराखंड से हो रहे पलायन पर अस्सी के दशक में लिखी गयी लंबी कविता)


                                             .... जितेंद्र मोहन पंत 

      (1)
रे पंछी तू किधर तड़पता इस उपवन के। 
तू तो तड़पाता है सबको, दरश न देके।।
अन्य सभी प्राणी उपवन में हैं तेरे संग के।
तू कहां भिन्न है सबसे, किस रंग में रंग के।। 
रे पंछी .......

आ जल्दी से दे दर्श इन्हें ना किसी से डर के। 
तू नहीं मिला तो ये भी रह जाएंगे मरके।। 
जगा मोह को मन में लाकर मोहक बनके। 
मन में बसे हैं तेरे तो आ मनवर मन के।। 
रे पंछी .......

ना विदेश को पग धर, आ घर को मुड़के।
बैठ घोंसले में आकर तीव्र गति से उड़ के।। 
मिल इन सबसे, सभी राह कंटक दमन के। 
हो हर्षित, ला खुशियों के दिन इस चमन के।। 
रे पंछी.........

कहां किनारे पड़ा हुआ है किस सिन्ध के। 
स्वच्छंद विचरण करता था अब कहां है बंधके।। 
किस पिंजड़ें में पड़ा हुआ है, स्वच्छंद वन के।
रे पंछी तू किधर तड़पता इस उपवन के।। 
   (2)
तेरा उपवन सूख गया है, इसे सींच दे। 
सूखे तरुओं में नीर बहा, नव—प्राण खींच दे।। 
बिन तेरे, ना रही तरू तृणों में हरियाली। 
इन्हें हरित कर आ दौड़कर वन के माली।। 
इन तरुओं को और जीर्ण हड्डी न बना दे।
गिने चुने ना बना इन्हें, तू बना घना दे।। 
सूखी तृणों को अब न बना, बना हरी घास दे।
दूर भगा पतझड़ को, अब ला मधुमास दे।। 
इनमें हरियाली कर निर्मित नव पत्रों को। 
कलियों को दे जन्म, बना इनसे कुसुमों को।। 

       (3)
ना अधिक सताओ अब ना सहन करूंगा पीरा।
दर्शन दो भगवान मुझे, मैं दासी मीरा।। 
बन कृष्ण इस घर में फिर से रास रचा दो।
ये त्यागत संसार, अमृत दे इन्हें बचा दो।। 
मुझे शरण दो, शरणज शिवि तुम बन जाओ। 
जगा मोह को मन में एक मोहक बन जाओ।। 
अब तो मैंने मन हृदय में रखा था धीरा। 
तुम बिन सभी भये हैं दुर्बल शरीरा।। 

   (4)
एक उपवन में हम सबका है एक बसेरा।
इस से हुआ शुरू है हम सबका ही सवेरा।। 
जननी, जन्मभूमि आदि से दूर क्यों भागा।
इन सबका मिलता था प्यार, क्यों इसको त्यागा।। 
यह जन्मभूमि, यह मातृभूमि, इसमें जल्दी आ।
मात—तात, भाई—बहन, सभी के संग आ।। 
मोह उत्पन्न कर फिर से, अब बन इन सबका।
दे इन्हें प्यार, ले इनसे प्यार जैसे पहले का।।



श्री जितेंद्र मोहन पंत की कविताओं के लिये कृपया इस लिंक कविता कोश पर क्लिक करें। 

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

उत्तराखंड में पार्टियों के एजेंडे से गायब रहे पलायन, विस्थापन और पर्यावरण

वरिष्ठ पत्रकार  फ़ज़ल इमाम मल्लिक ने यह लेख विशेष रूप से 'घसेरी' के लिये लिखा है। इसमें उन अनछुये पहलुओं को उजागर किया गया है जो उत्तराखंड के लिये आज बेहद महत्वपूर्ण हैं लेकिन पार्टियों ने उन पर गौर करना उचित नहीं समझा। उम्मीद है कि आपको यह लेख पसंद आएगा। 

पलायन के कारण गांव के गांव वीरान हो गये हैं। मकान खंडहर में बदल गये हैं तो कुछ घरों में वर्षों से लटके ताले खुलने का इंतजार कर रहे हैं। चित्र : धर्मेंद्र पंत 
      त्तराखंड विधानसभा के चुनाव निपट गए. सत्ता बचाने और वापसी के खेल में कांग्रेस और भाजपा उलझी रहीं। नए वादे भी किए गए और नए नारे भी गढ़े गए। दागियों की बातें हुईं, बागियों को लेकर एक-दूसरे पर वार किए गए। विकास के सुनहरे सपने दिखाने में न तो कांग्रेस पीछे रही और न ही भारतीय जनता पार्टी। भ्रष्टाचार के आरोप दोनों ने एक-दूसरे पर लगाए। एक-दूसरे की कमीज को ज्यादा स्याह-सफेद बताने को लेकर खूब-खूब तर्क दिए गए। लेकिन इस स्याह-सफेद के बीच बुनियादी मुद्दे पूरे चुनाव में गायब रहे। न तो कांग्रेस ने उन मुद्दों को छुआ और न ही भारतीय जनता पार्टी ने। 
    पर्यावरण, विस्थापन और पलायन जैसे बुनियादी सवालों पर बात करने से दोनों ही दल बचे, जबकि इस पहाड़ी राज्य में इन मुद्दों पर ही बात होनी चाहिए थी। अलग राज्य बनने के बाद भी सत्ता में बने रहने के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही राज्य के इन मूल सवालों को अनदेखा किया है जबकि उत्तराखंड राज्य के गठन के पीछे इन सवालों का भी बड़ा हाथ रहा है। लेकिन पर्यावरण असंतुलन को लेकर कई तरह के खतरों से जूझ रहे उत्तराखंड की चिंता किसी दल ने नहीं की। हद तो तब हो गई जब चुनाव प्रचार के दौरान उत्तराखंड में भूकम्प आया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभषण पर इसे लेकर जिस तरह की टिपण्णी की वह हैरान करने वाली रही। रोजगार नहीं मिलने की वजह से विस्थापन और पलायन भी उत्तराखंड के गांवों से हो रहे हैं लेकिन इस पर भी किसी दल ने न तो चिंता जताई और न ही बेरोजगारी दूर कर गांवों को स्मार्ट गांव बनाने का जिक्र तक किया। 
     उत्तराखंड में गांव के गांव खाली हो रहे हैं। लेकिन सियासी दलों के लिए यह न तो मुद्दा है और न ही इससे निबटने के लिए कोई ठोस उपाय। अलग राज्य बनने के बाद गांवों से पलायन रुकेगा और गांवों की तस्वीर बदलेगी, इसकी उम्मीद लोगों को थी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। हद तो यह है कि एक बार जो गांव से निकला फिर उसने गांव का रुख तक नहीं किया। अलग राज्य बनने के बाद विधानसभा का यह पांचवां चुनाव है और गांवों से पलायन सियासी दलों के एजंडे पर दिखाई तक नहीं दे रहा है। वह भी तब जब इन सोलह-सत्रह सालों में पलायन की रफ्तार लगातार बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों की बात करें तो राज्य में कुल गांवों की तादाद लगभग सत्रह हजार है और इनमें से लगभग तीन हजार गांवों में सन्नाटा पसरा है। न तो आदमी है और न आदमजाद। इन गांवों में करीब ढाई लाख घरों पर ताला लटका है। यहां तक कि वोटर सूची में लोगों के नाम तो हैं लेकिन इन गांवों में वोट डालने वाला कोई नहीं है। 
    लेकिन सिर्फ इसी एक वजह से सवाल नहीं उठ रहे हैं। सवाल तब और बड़ा हो जाता है जब इन गांवों की बसावट को देखते हैं। खास कर सामरिक दृष्टि जब डालते हैं तब गांव का वीरान पड़ा होना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। ज्यादातर वीरान गांव चीन और नेपाल की सीमा से सटे हैं। इस वजह से बाहरी और आंतरिक खतरा दरपेश हो सकता है। लेकिन इन खतरों पर न तो उन्हें चिंता है जो देशभक्ति का राग अलापते हैं और न ही उन दलों को जो छदम देशभक्ति की बात करते हुए सियासत करते हैं। लेकिन उत्तराखंड के करीब तीन हजार खाली और वीरान पड़े गांव सवाल तो खड़े कर ही रहे हैं और इन सवालों से हर दल बच रहा है। इससे ही इन सियासी दलों की नीयत का पता चलता है। अगर नीयत साफ होती तो राज्य निर्माण के सोलह साल बाद पलायन जैसे मुद्दे पर सरकार गंभीर होती और इसे रोकने के उपाय करती। लेकिन न तो कांग्रेस और न ही भाजपा सरकार ने इस गंभीर मुद्दे की गंभीरता को समझा। अगर समझा होता तो इन गावों में मूलभूत सुविधाएं पहुंच गई होतीं और रोजगार के साधन मुहैया करा दिए गए होते। अगर ऐसा होता तो गांव खाली और वीरान नहीं पड़े होते। लेकिन कांग्रेस और भाजपा की सरकारों ने संसाधनों का दोहन किया और उद्योग धंधों के नाम पर बाहरी कंपनियों के हाथों नदियों और पहाड़ों को बेच दिया गया। उन कंपनियों ने न तो पर्यावरण का ध्यान रखा और न ही स्थानीय समस्याओं का। इसका नुकसान उत्तराखंड को ही भुगतना पड़ा। 
         कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही चुनाव में एक-दूसरे पर लूट खसोट का आरोप लगाया। सच है यह कि इस खेल में दोनों ही दलों की सरकारों ने राज्य के हितों का ध्यान न रख कर अपने हितों का ध्यान ज्यादा रखा। नहीं तो सोलह साल कम नहीं होते हैं किसी भी इलाके के विकास के लिए लेकिन उत्तराखंड के पर्वतीय इलाके में बसे दूर-दराज के गांवों की हालत आज भी वैसी ही जैसे सोलह साल पहले थी। अलग उत्तराखंड बनाने की मांग करने वालों ने उत्तराखंड की अस्मिता और पहचान के साथ-साथ पहाड़ी क्षेत्र के विकास का सपना देखा था। इनमें ये गांव भी शामिल थे, जहां लखनऊ से विकास की रोशनी नहीं पहुंच पाई थी। लेकिन इन सोलह सालों में सियासी दलों को तो फायदा हुआ पहाड़ के लोगों को नहीं। सच तो यह है कि सियासतदानों ने विषम भूगोल वाले पहाड़ के गांवों की पीड़ा को समझने की कोशिश तक नहीं की। नतीजा यह निकला कि न तो गांवों तक तालीम की रोशनी पहुंची और न ही रोजगार के साधन मुहैया हुए। दूसरी बुनियादी सुविधाएं भी इन गांवों तक नहीं पहुंचीं। 
    त्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था पर नजर डालें तो राज्य में सरकारी अस्पताल तो खुले लेकिन इनमें चिकित्सकों के आधे से अधिक पद खाली हैं। दवा मिलने की बात तो छोड़ ही दें। तालीमी स्तर भी राज्य का भगवान भरोसे ही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक बुनियादी शिक्षा बदहाल है। सरकारी प्राथमिक स्कूलों में 40 फीसद से अधिक बच्चे गुणवत्ता के मामले में औसत से कम हैं। 71 फीसद वन भूभाग होने के कारण पहाड़ में तमाम सड़कें अधर में लटकी हुई हैं। रोजगार के अवसरों को लें तो 2008 में पर्वतीय औद्योगिक प्रोत्साहन नीति बनी, मगर उद्योग पहाड़ों तक नहीं पहुंच पाए। करीब चार हजार के करीब गांवों को बिजली का इंतजार है। जिन क्षेत्रों में पानी, बिजली की सुविधाएं हैं, वहां भी प्रशासन की उदासीनता की वजह से इनका लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है। इन वजहों से पलायन की रफ्तार में इजाफा हुआ है। गांव से पलायन कर लोग शहरों में डेरा जमा रहे हैं. शहरों पर आबादी का बोझ बढ़ रहा है। लेकिन इसकी फिक्र किसी को नहीं है। सत्ता चल रही है और अधिकारी चला रहे हैं।

कभी इन खेतों में लहलहाती थी फसलें। गांवों से दूर के खेत अब बंजर पड़ गये हैं। हर गांव का यही हाल है। चित्र : सुशील पंत  

     आंकड़ों पर नजर डालें तो पलायन के कारण अल्मोड़ा और पौड़ी जिलों में आबादी घटी है तो दूसरी तरफ देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल, ऊधमसिंहनगर में आबादी में इजाफा हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय एकीकृत विकास केंद्र (ईसीमोड) के अध्ययन के मुताबिक कांडा (बागेश्वर), देवाल (चमोली), प्रतापनगर (टिहरी) क्षेत्र के गांवों से पलायन दर काफी बढ़ी है और अब यह लगभग 50 फीसद तक पहुंच गई है। इनमें 42 फीसद ने रोजगार, 26 फीसद ने शिक्षा और 30 फीसद ने मूलभूत सुविधाओं के अभाव में गांव छोड़ने का फैसला किया। लेकिन ये आंकड़े भी सरकारों को विचलित नहीं कर पाती हैं। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों ने इस पर गंभीरता से कभी विचारा ही नहीं। सरकारें चाहे जिसकी भी रहीं हो पलायन को रोकने के लिए किसी ने कारगर कदम नहीं उठाए। न तो रोजगार के अवसर तलाशने की कोशिश की गई न ही कोई ठोस नीति बनाई गई। चुनाव के समय लुभावने और चमकदार नारे जरूर उछाले गए लेकिन सत्ता पाते ही सारे नारे अगले चुनाव तक के लिए संभाल कर रख दिए जाते रहे। 
      इस चुनाव में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला। इतना ही नहीं इस चुनाव में बांध व दूसरी बड़ी परियोजनाओं, खदान, शराब, बेरोजगारी, पर्यटन और इनकी वजह से हो रहा विस्थापन किसी भी दल के लिए मुद्दा नहीं था, जबकि उत्तराखंड के लिए ये जरूरी सवाल हैं। 2013 की त्रासदी से प्रभावित लोग अभी भी ठीक तरीके से न तो बसाए गए हैं और न ही उन्हें उचित मुआवजा मिला है। लेकिन ये मुद्दे गौण रहे। गंगा जहां से निकली है वहां भी गंगा का संरक्षण ठीक से नहीं हो रहा है। टिहरी बांध से जुड़े मसलों पर भी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। इस बांध के आसपास रहने वाले लोग रोजाना ही नहीं परेशानियों से दोचार होते रहते हैं लेकिन सियासी दलों को यह परेशानियां नजर नहीं आती हैं. गांवों के घरों में दरार, भूधंसान के साथ-साथ पुनर्वास जैसे मसले तो आम बात हैं। लेकिन इन पर सरकारों ने कोई ध्यान नहीं दिया। बांध बनाने वाली कंपनियां गाद और गंदगी नदियों में फेंक रही हैं जिससे पर्यावरण संतुलन पर भी असर पड़ा है लेकिन इसकी फिक्र किसी को नहीं है। चुनाव निपट गए, लेकिन मसले जस के तस हैं। इन पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाला समय पहाड़ के लोगों पर और भारी पड़ सकता है। 

शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

जौनसार के दो गांवों के बीच होता है अद्भुत 'गागली युद्ध'

       त्तराखंड के गढ़वाल मंडल का एक क्षेत्र है जौनसार जहां जौनसारी भाषा बोली जाती है। यह पूरा क्षेत्र भी उत्तराखंड के तमाम अन्य क्षेत्रों की तरह अपनी अनूठी परंपराओं के लिये विख्यात है। मसलन जब देश भर में दशहरा पूरे धूमधाम से मनाया जाता है तब यहां पाइंता पर्व मनाया जाता है और इस दौरान जौनसार बावर के दो गांवों उत्पाल्टा और कुरोली के बीच युद्ध होता है जिसे 'गागली युद्ध' कहा जाता है। अरबी के पत्तों और डंठलों से होने वाले इस अनोखे युद्ध को देखने के लिये दूरदराज के गांवों के लोग भी आते हैं तथा शुरूआत से लेकर अंत तक इसमें संघर्ष के साथ मनोरंजन का पुट भरा रहता है।

गागली युद्ध का यह वीडियो श्री जितेंद्र लखेड़ा ने उपलब्ध कराया है

        दशहरे के दिन पूरे भारत में रावण दहन किया जाता है लेकिन यहां ऐसी कोई परंपरा नहीं है। पिछले 200 से भी अधिक वर्षों से इस अवसर पर उत्पाल्टा व कुरोली गांवों के बीच दशहरे के दिन गागली युद्ध होता है। ढोल—नगाड़ों की थाप, रणसिंघा की रणभेरी समान ध्वनि के बीच दोनों गांवों के लोग देवधार के जंगल में पहुंचते हैं जहां उनके बीच अरबी के डंठलों और पत्तों से युद्ध होता है। जौनसारी भाषा में अरबी को गागली कहते हैं और इसलिए इसे 'गागली युद्ध' कहा जाता है। युद्ध के लिये एक महीने पहले से ही तैयारी कर ली जाती है। अरबी के डंठलों को काटकर सुखाया जाता है। युद्ध के दिन दोनों पक्ष अपने शौर्य का भरपूर प्रदर्शन करते हैं। हंसी ठिठोली भी चलती है। लगभग एक घंटे के युद्ध के बाद दोनों पक्ष आपस में गले मिलते हैं। एक दूसरे को पाइंता पर्व की बधाई देते हैं और फिर उत्पाल्टा गांव के सार्वजनिक स्थल पर तांदी, हारूल, रासो जैसे नृत्यों से समां बांधा जाता है। इन नृत्यों में दोनों गांव के बच्चों से लेकर महिलाएं और पुरूष सभी हिस्सा लेते हैं। इसके साथ ही लोग अपने स्थानीय देवताओं महासू, चालदा, शिलगुर, विजट, परशुराम आदि के मंदिरों में पूजा करते हैं। उत्पाल्टा और कुरोली के अलावा अन्य गांवों के लोग भी इस दिन पाइंता पर्व मनाते हैं और अपने इन इष्टदेवों के मंदिरों में जाकर परिवार की खुशहाली के लिये कामना करते हैं। 

पश्चाताप के लिये होता है 'गागली युद्ध'


      गागली युद्ध से एक कहानी जुड़ी है। स्थानीय किवदंतियों के अनुसार रानी और मुन्नी नाम की दो बहनें थी। दोनों ही एक साथ कुएं या तालाब में पानी भरने के लिये जाती थी। एक दिन रानी की पानी भरते समय कुएं में गिरने से मौत हो गयी। मुन्नी तुरंत ही घर पहुंची और उसने गांव वालों को सारी घटना विस्तार से बता दी। गांव वालों ने मुन्नी पर ही आरोप लगा दिया कि उसने रानी को धक्का देकर कुंए में फेंका। मुन्नी की किसी से नहीं सुनी। उसे दोषी मान लिया गया। वह पहले ही अपनी सहेली की मौत से सदमे में थी और गांव वालों के आरोपों से दुखी होकर उसने भी कुएं में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी। ग्रामीणों को बाद में अपनी गलती का अहसास हुआ। अब पछतावा करने के अलावा कुछ नहीं बचा था। उन्हें रानी और मुन्नी के श्राप का डर सताने लगा। ऐसे में वे महासू देवता की शरण में गये। देवता ने उन्हें दशहरे के दिन दोनों बहनों की मूर्तियां बनाकर कुएं में विसर्जित करने की सलाह दी। तब से ही पश्चाताप के रूप में गागली युद्ध होता है। इससे दो दिन पहले रानी और मुन्नी की मूर्तियां तैयार करके उनकी पूजा होती है और पाइंता यानि दशहरे के दिन उन्हें कुएं में विसर्जित कर दिया जाता है। 
       उत्तराखंड का हर क्षेत्र ऐसी ही दिलचस्प कहानियों और प​रपंराओं से समृद्ध है। 'घसेरी' के पाठकों से गुजारिश है कि ऐसी परंपराओं को आम लोगों तक पहुंचाने के लिये अपना सहयोग करें। आप घसेरी के लिये इन विषयों पर लिख सकते हैं। यदि गागली युद्ध के बारे में अधिक जानकारी या चित्र हों तो उन्हें भी भेज सकते हैं। पहाड़ से जुड़ा ऐसे किसी विषय पर लिखकर आप मुझे चित्र सहित dmpant@gmail.com पर मेल कर सकते हैं। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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गुरुवार, 22 सितंबर 2016

पौड़ी और अल्मोड़ा से हो रहा है सबसे अधिक पलायन

चार्ट एक ... पौड़ी गढ़वाल से पलायन की कहानी बयां कर रहे हैं आंकड़े

      पिछले दिनों में मन में यह सवाल उठा था कि आखिर उत्तराखंड से सबसे अधिक पलायन किस जिले से हो रहा है। इसका जवाब ढूंढने के लिये 2001 और 2011 की जनगणना के आंकड़ों का सहारा लिया तो कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आये। पता चला कि जहां भारत जनसंख्या विस्फोट की तरफ बढ़ रहा है वहीं उत्तराखंड के दो जिलों पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा की जनसंख्या इन दस वर्षों में घटी है। इन आंकड़ों पर खुश होने की जरूरत नहीं है। असल में यह पलायन के दुष्परिणाम हैं। इससे यह भी साबित होता है कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पलायन तेजी से हुआ है और इसमें पौड़ी गढ़वाल सबसे आगे हैं।
     जनगणना के आंकड़ों पर गौर करें तो पौड़ी जिले की जनसंख्या 2001 में 697,078 थी जो 2011 में घटकर 687,271 रह गयी। यानि 1.41 प्रतिशत कम हो गयी। (देखिये चार्ट एक) आंकड़े भले ही कुछ साल पुराने हैं लेकिन यह एक कड़वा सच बयां करते है। कमोबेश आज की स्थिति और खराब होगी। पलायन नहीं रूकेगा तो आगे स्थिति और भयावह हो सकती है। गढवाल में पलायन की शुरूआत नब्बे के दशक में हो गयी थी। यही वजह थी कि 1991 से 2001 के बीच भी पौड़ी जिले में केवल 3.87 प्रतिशत वृद्धि ही दर्ज की गयी जबकि बाकी जिलों में यह इससे अधिक थी। वर्ष 2001 से 2011 के बीच गढ़वाल मंडल के बाकी जिलों जैसे चमोली, उत्तरकाशी, रूद्रप्रयाण, टेहरी गढ़वाल आदि में जनसंख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गयी। टेहरी गढ़वाल में हालांकि 2.35 प्रतिशत, चमोली में 5.74 प्रतिशत, रूद्रप्रयाग में 6.53 प्रतिशत और उत्तरकाशी में 11.89 प्रतिशत वृद्धि हुई लेकिन इन दस वर्षों में देहरादून की जनसंख्या 32.33 और हरिद्वार की जनसंख्या में 30.63 प्रतिशत बढ़ी है। इन आंकड़ों की कहानी कुछ अलग तरह से श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी ने अपने एक गीत 'सब्बि धाणि देहरादूण हुणी खाणी देहरादूण' में भी बयां की है।

चार्ट दो ... उत्तराखंड की जनसंख्या तो बढ़ी है लेकिन पौड़ी गढ़वाल की घटी है। 

      गर कुमांऊ मंडल की बात करें तो अल्मोड़ा जिले की स्थिति दयनीय है। अल्मोड़ा की जनसंख्या 2001 में 630,567 थी जो 2011 में घटकर 622,506 रह गयी। मतलब इसमें 1.28 प्रतिशत की कमी आयी है। बागेश्वर और पिथौरागढ़ की जनसंख्या में भी खास बढ़ोतरी दर्ज नहीं की गयी। यह क्रमश: 4.18 और 4.58 प्रतिशत थी। चंपावत की जनसंख्या 15.63 प्रतिशत बढ़ी है लेकिन उधमसिंह नगर और नैनीताल ने कुमांऊ के दूसरे जिले को लोगों को भी आकर्षित किया। यही वजह है कि 2001 से लेकर 2011 तक नैनीताल की जनसंख्या में 25.13 प्रतिशत और उधमसिंह नगर की जनसंख्या में 33.45 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गयी।
     जब उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की मांग की जा रही थी तब 'पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी' रोकने के नारा खूब जोर शोर से चला था। राज्य गठन के बाद स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ती चली गयी। इसका परिणाम है कि आज गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं। राज्य सरकार पलायन को रोकने में पूरी तरह से नाकाम रही है। अब भी अगर सार्थक कदम उठाये जाते हैं तो सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। आपका धर्मेन्द्र पंत 


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शनिवार, 18 जून 2016

गढ़वाली लेखन में नयी क्रांति है 'धाद'


            ढ़वाली में पत्र—पत्रिकाओं के प्रकाशन की परंपरा 100 साल से भी पुरानी है। गढ़वाली में लेखन की शुरुआत अनुवाद से हुई थी और बाद में 1905 में देहरादून से 'गढ़वाली' नाम की पत्रिका के प्रकाशन से कविता और साहित्य लेखन भी होने लगा। बाद में गढ़वाली में कुछ अन्य पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ लेकिन इनमें से अधिकतर लंबे समय तक नहीं चल पायी। ऐसी ही एक पत्रिका थी 'धाद' जिसका प्रकाशन श्री लोकेश नवानी और श्री जगदीश बडोला के प्रयासों फरवरी 1987 में शुरू हुआ था। श्री नवानी और श्री बडोला दोनों ही सरकारी कर्मचारी थे। यही वजह थी कि 'धाद' का पंजीकरण श्री बडोला जी की धर्मपत्नी श्रीमती सुशीला बडोला के नाम से किया गया। वह इस पत्रिका की संस्थापक संपादक भी हैं। 'धाद' से तब कई गढ़वाली लोग जुड़े। बाद में पत्रिका तो बंद हो गयी लेकिन 1991 में 'धाद' ने एक सामाजिक संगठन का रूप ले लिया। 
           अब वरिष्ठ पत्रकार, कवि और लेखक श्री गणेश खुगशाल 'गणी' के प्रयासों से 'धाद' पत्रिका का अगस्त 2015 से फिर से प्रकाशन शुरू हुआ है। इसे नये कलेवर, नये स्वरूप और वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखकर प्रकाशित किया जा रहा है। यह पत्रिका पूरी तरह से गढ़वाली भाषा में है और इसमें गढ़वाली साहित्य के अलावा वहां की संस्कृति और परंपराओं का समावेश किया जा रहा है। ऐसे समय में जबकि यूनेस्को जैसी संस्था ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि गढ़वाली भाषा पर खतरा मंडरा रहा है तब श्री गणेश खुगशाल 'गणी' का प्रयास वास्तव में सराहनीय है क्योंकि किसी भी भाषा के प्रचार और प्रसार में उसकी पत्रिकाएं अहम भूमिकाएं निभाती हैं। गढ़वाली में पिछले कुछ समय से ऐसी पत्रिकाओं की कमी महसूस हो रही थी जिसे अब पूरे शान से 'धाद' पूरी कर रही है। गढ़वाली में 'धाद' किसी को आवाज देना, पुकारना या सार्वजनिक कार्यों के लिये आम आदमी का आहवान करना होता है और 'धाद' अब पूरे मनोयोग से धाद लगा रही है। 

गणेश खुगशाल 'गणी'
संपादक 'धाद'
       पत्रिका के संपादक श्री गणेश खुगशाल 'गणी' ने प्रवेशांक के संपादकीय में भी लिखा था, ''या धाद वीं भाषै धाद छ, जैं भाषा गीत गाणौं ग्वारा सात समोदर पार बिटि औंणा छन। य वीं भाषा बोलदरों की धाद छ जैं भाषा बोलदरा सात समोदर पार जैकि बि अपणी बोलि भाषै बात कना छन। य वीं भाषा धाद छ ज्व सिर्फ बोले नि जांदी, जैं भाषा मा खूब लिखेंदु बी छ, पढेन्दु बी छ अर सोचेन्दु बि छ। य धाद वीं भाषा मा छ जैं भाषा मा एक सब्द खुणि दर्जनों सब्द छन अर तौ सब्दु की सामर्थ्य अदभुत छ। यना लौकिक सब्द दुन्या कि कै भाषा मा नि मिलदा। जैं भाषा की अपणी संस्कृति अपणो संस्कार अपणी लोक विरासत छ वींई भाषा धाद छ य। य धाद गढ़वल़ि लोक संचेतना, संवाद अर सृजन को दस्तावेज छ। ''
            'धाद' का प्रत्येक अंक अपने आप में विशिष्ट बनाने का प्रयास किया गया है। पत्रिका के अब तक दस अंक आये हैं जिनमें से प्रत्येक को एक खास विषय वस्तु पर केंद्रित किया गया है। अगस्त 2015 में प्रवेशांक के बाद इसके अगले अंक लोक उत्सव व परंपरा, गढ़वाल मा रामलीला की परंपरा, 15 बरसौ उत्तराखंड, उत्तराखंड का लोक संसाधन, गढ़वाली कविता ब्याली, आज अर भोल, डांडों की माया अर माया का डांडा, मेरो पिया होरी को खेलइया, गढ़वाल म थौल कौथीग और पोस्टर मा गढ़वलि कविता पर आधारित हैं। गंगा दशहरा करीब है और इसलिए अगला अंक गंगा और उसके महत्व पर केंद्रित होगा। यह अंक जल्द ही आपके हाथों में होगा। पत्रिका में देश और विदेश में गढ़वाल और गढ़वाली से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों की संक्षिप्त रिपोर्ट भी पेश की जा रही है। कुल मिलाकर गढ़वाली भाषा की यह संपूर्ण पत्रिका बनकर उभर रही है जिसमें कई ऐसे लेखक जुड़ रहे हैं जो अब तक केवल हिन्दी और अंग्रेजी में ही लेखन कार्य करते थे। असल में धाद ने गढ़वाली लेखन में नयी क्रांति की शुरुआत कर दी है। 'धाद' पत्रिका गढ़वाल के पुराने और नये लेखकों के लिये मंच बन गयी है। लेखक, कवि और शिक्षक मनोहर मनु 'धाद' के प्रवेशांक से लेकर अब तक के प्रत्येक अंक की समीक्षा पूरे मनोयोग से अपने फेसबुक पेज पर करते रहे हैं। 

           धाद के बारे में अन्य संक्षिप्त जानकारी यहां दी जा रही है।    
              मूल्य: 20 रुपए
              वार्षिक सदस्यता : 220 रुपये 
        मुख्य संपर्क :
              गणेश खुगशाल ‘गणी’,
              126 विकास मार्ग,पौड़ी 246001
              मोबाइलः 09412079537
              मेल: dhad.garhwali@gmail.com 
       दिल्ली संपर्क : 
              ए—162/यूजी—4, दिलशाद कालोनी,
              दिल्ली —110 095
               मोबाइल : 09013285624
          किसी भी पत्रिका में विज्ञापनों की भूमिका अहम होती है। श्री गणेश खुगशाल 'गणी' धाद के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं लेकिन 'धाद' पूरे जोशोखरोश से लगती रहे इसके लिये पत्रिका में विज्ञापनों का होना भी जरूरी है। मेरी व्यक्तिगत राय है कि इसके लिये देश और विदेशों में बसे हर उत्तराखंडी से सहयोग की अपेक्षा की जा सकती है। आपके सहयोग से उत्तराखंड के विकास का दस्तावेज तैयार होगा वहीं लोकभाषा के संरक्षण और सवंर्धन अभियान को भी ताकत मिलेगी। इसलिए मैं यहां पर पत्रिका के विज्ञापन की दरें भी दे रहा हूूं। 

                      'धाद' की विज्ञापन दरें 


           अंतिम आवरण (रंगीन)          : 25,000 रुपये
           दूसरा/तीसरा आवरण (रंगीन) : 20,000 रुपये 
           पूरा पृष्ठ (ब्लैक एंड व्हाइट)    : 10,000 रुपये 
           आधा पृष्ठ (ब्लैक एंड व्हाइट) :  6,000 रुपये 
           चौथाई पृष्ठ (ब्लैक एंड व्हाइट):  3,000 रुपये 
           सेंटर स्प्रेड (ब्लैक एंड व्हाइट) : 18,000 रुपये 
           सेंटर स्प्रेड (आर्ट पेपर रंगीन) : 35,000 रुपये 

         भाषाओं को बचाना हमारा सांस्कृतिक दायित्व है और वर्तमान समय में 'धाद' उत्तराखंडी लोकभाषा का प्रतिनिधित्व करती है। उम्मीद है कि आप 'धाद' से जुड़ेंगे और उसे आगे बढ़ाने में अपना योगदान देंगे। आपका धर्मेन्द्र पंत।

शनिवार, 21 मई 2016

काफल खाओ, जवां बन जाओ

आयुर्वेद में कायफल और संस्कृत में कटफल कहा जाता है काफल को जो अच्छा एंटी-आक्सीडेंट भी है। 
       र पहाड़ी व्यक्ति ने काफल जरूर खाये होंगे और उनसे जुड़ी एक कहानी भी सुनी होगी। उत्तराखंड में हर जगह यह कहानी प्रचलित है। इसको प्रस्तुत करने का तरीका भले ही अलग हो लेकिन उसका सार एक है। वही 'काफल पाको, मिल नी चाखो' वाली कहानी। आपको याद तो आ गयी होगी। चलो एक बार मैं फिर से सुना देता हूं। 
     किसी गांव में एक गरीब विधवा महिला रहती थी जो खेती करके या खेतों में मेहनत मजदूरी करके अपना और अपनी छोटी बेटी का पेट पालती थी। एक बार वह जंगल गयी और वहां से टोकरी भर के काफल ले आयी। उसे खेतों में काम करने जाना था, इसलिए उसने अपनी बेटी से कहा कि वह काफल का ध्यान रखे लेकिन साथ ही सख्त हिदायत भी दे दी कि वह उन्हें खाये नहीं। जब वह खेतों से काम करके आ जाएगी तो दोनों मिलकर खाएंगे। लाल, काले रसीले काफल देखकर बेटी का मन बहुत ललचा रहा था लेकिन उसने खुद पर काबू रखा। मां थक हार कर आयी तो बेटी ने आते ही कहा मां भूख लगी क्या अब हम काफल खा लें। मां ने टोकरी की तरफ देखा तो पाया कि टोकरी पहले की तरह भरी हुई नहीं थी। वह थकी और भूखी थी और उसने तुरंत बेटी से कहा, ''तूने काफल खाये'। बेटी ने कहा, 'नहीं मां मैंने नहीं खाये। मैंने तो काफल चखे भी नहीं। ' मां को गुस्सा आ गया कि बेटी काफल भी खा गयी और झूठ भी बोल रही है। उसने आव देखा न ताव बेटी को जोर से थप्पड़ मारा। वह नीचे गिर गयी और उसका सिर पत्थर से लग गया। भूखी और प्यासी नन्हीं सी जान ने वहीं पर दम तोड़ दिया। महिला बदहवास हो गयी कि उसने सिर्फ काफल के लिये अपनी बेटी मार दी। उसने काफल बाहर रख दिये। रात को जब ओस पड़ी तो उसने देखा कि काफल की टोकरी तो भरी हुई है। तब उसे समझ में आया कि दिन में धूप से काफल भी सिकुड़ गये थे। बेटी ने सच में काफल नहीं खाये थे। बेटी के गम में उसने भी दम तोड़ दिया। कहते हैं कि ये दोनों मां बेटी पक्षी बन गये। आज भी चैत के महीने में पहाड़ों में एक चिड़िया कुछ इस तरह से बोलती है, 'काफल पाको, मिल नी चाखो' (काफल पके हैं, लेकिन मैंने नहीं चखे)। इसके जवाब में एक दूसरी चिड़ियां कुछ इस तरह से क्रंदन करती है, 'पुर पुतई पूर पूर' (पूरे हैं बेटी पूरे हैं)। 
   यह कहानी बेहद मार्मिक है जो हमें सीख देती है कि जल्दबाजी या ताव में कभी कोई काम नहीं करना चाहिए। यदि गुस्से को काबू कर लिया तो कई काम बिगड़ने से बच जाते हैं। आईए अब बात करते हैं कि इस कहानी केंद्र बिंदु काफल के बारे में ....

देवताओं का फल है काफल 


      काफल बेहद लोक​​प्रिय, औषधीय गुणों से भरपूर लेकिन बहुत जल्दी खराब होने वाला पहाड़ी फल है जो मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नेपाल में पाया जाता है। यह असल में एक जंगली फल है जिसकी खेती नहीं की जाती है। इसको आयुर्वेद में कायफल और संस्कृत में कटफल कहा जाता है। पहाड़ों में ऊंचाई वाले स्थानों पर पाये जाने वाले काफल का पेड़ का अमूमन 10-15 मीटर ऊंचा होता है। इसका फल छोटा बेर जैसा होता है जिसके अंदर गुठली भी होती है। काफल चैत्र और बैशाख के महीने में होता है। उत्तराखंड के एक मशहूर गीत के बोल भी हैं, ''बेडू पाको बारामासा, ओ नरैणी काफल पाको चैता, मेरी छैला।'' यानि बेडू हर महीने पकता है लेकिन काफल चैत के महीन में ही पकता है। अप्रैल से लेकर जून तक पहाड़ों में लोग जंगलों से काफल लेकर सड़कों के किनारे इसे बेचते हैं। पर्यटकों को खासा लुभाता है यह फल। हिमाचल प्रदेश में इसे काला भौरा और पूर्वोत्तर के राज्यों में सोहफी के नाम से भी जानाता जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम माइरिका इस्कुलाटा है। 
     काफल शुरू में हरा होता है जबकि बाद में लाल तो कुछ कुछ काल, मटमैले और बैंगनी से बन जाते हैं। जब यह हरा होता है तो इसका स्वाद खट्टा जबकि पकने पर मीठा होता है। कुमाऊँनी भाषा के पहले कवि गुमानी पंत ने इसे स्वर्ग से धरती पर आया फल बताया है। उन्होंने काफल की व्यथा का वर्णन इस तरह से किया है, ''खाणा लायक इंद्र का, हम छियां भूलोक आई पणां। पृथ्वी में लग यो पहाड़, हमारी थाती रची देव लै। एसो चित्त विचारी काफल सबै राता भया क्रोध लै। कोई बड़ा—खुड़ा शरम लै काला धुमैला भया। '' (हम स्वर्ग लोक में इंद्र देवता के खाने योग्य थे और अब धरती पर आ गए। पृथ्वी में ईश्वर ने पहाड़ों पर हमारा स्थान बनाया। इस पर विचार करते हुए काफल गुस्से से लाल तो कुछ बड़े बूढ़े शर्म से काले या मटमैले हो गये।) काफल गुच्छों में लगता है। कच्चे काफलों की चटनी बनायी जाती है जो बहुत स्वादिष्ट होती है। 
   काफल अभी उत्तराखंड में आय का अच्छा स्रोत बन गया है। गर्मियों में सड़कों के किनारे या बाजारों में ग्रामीण टोकरियों में लेकर यह फल बेचते हैं। कहते हैं कि मैदानों में रहने वाले पर्यटक ने एक बार किसी ग्रामीण से पूछा कि 'ये काफल है भइया?' तो उसे जवाब मिला, 'हां काफल है भैया'। पर्यटक गुस्से से तिलमिला गया। मेरा मजाक उड़ा रहा है। बाद में उसे समझाया गया कि असल में फल का नाम ही काफल है। पर्यटकों को यह वैसे काफी पसंद आता है। 

काफल खाओगे तो रहोगे जवान 


    काफल औषधीय गुणों से भरपूर है। कहा जाता है कि काफल खाने वाला व्यक्ति हमेशा जवान रहता है। इसका कारण इसमें एंटी-आक्सीडेंट गुणों का पाया जाना है। इसके इन गुणों से यह तनाव कम करने, स्ट्रोक और कैंसर से बचाने में सहायक होता है। यह पेट की कई बीमारियों का निदान करता है और लू लगने से बचाता है। यदि आपको भूख नहीं लगती है तो काफल खाईये। आयुर्वेद के अनुसार यह भूख की अचूक दवा है। मधुमेह के रोगियों के लिये भी यह उपयोगी है।  काफल में फायटोकेमिकल पोलीफेनोल पाया जाता है जो विषाणुरोधी होता है। यह सूजन कम करने में लाभकारी होता है। काफल रसीला फल है लेकिन इसमें रस की मात्रा 40 प्रतिशत ही होती है। इसमें विटामिन सी, खनिज लवण, प्रोटीन, फास्फोरस, पोटेशियम, कैल्शियम, आयरन और मैग्निशीयम होता है। 
    आयुर्वेद के अनुसार काफल के फल ही नहीं बल्कि छाल भी बेहद उपयोगी होती है। इसकी छाल में मायरीसीटीन, मायीसीट्रिन और ग्लाइकोसाईड पाया जाता है। इसकी छाल चबाने से दांतों के दर्द में राहत मिलती है। यही नहीं काफल की छाल को उबालकर तैयार द्रव्य में अदरक और दालचीनी मिलाकर उससे अस्थमा, डायरिया, टाइफाइड जैसी बीमारियों का इलाज भी किया जाता है। पेट गैस की समस्या दूर करने के लिये भी इसकी छाल का उपयोग किया जाता है। इसकी छाल का पेस्ट बनाकर घाव पर लगाने से वह जल्दी ठीक होता है। जोड़ों के दर्द में भी इसे उपयोगी माना जाता है। काफल की छाल को पीसकर उसका पाउडर तैयार किया जाता है जो जुकाम, गले की बीमारी और खांसी में उपयोगी होता है। काफल का फूल से भी कान दर्द, लकवा और डायरिया के लिये औ​षधि तैयार की जाती थी। 
   काफल खाना है तो पहाड़ जाना ही पड़ेगा क्योंकि मैंने पहले भी लिखा था कि इसे लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है। मेरे गांव के जंगल के शुरू में ही काफल का बड़ा सा पेड़ था। हमारे गांव स्योली का शायद ही कोई शख्स होगा जिसने उस पेड़ के काफल नहीं खाये होंगे। मैंने तो खूब खाये हैं। आपने भी पहाड़ में रहते हुए काफल खाये होंगे। तो बताईये काफल से जुड़ी अपनी कहानी। अभी मैं तो चला काफल खाने, बाद में किसी और विषय पर बात करते हैं। आपका पहाड़ी भाई धर्मेन्द्र पंत 

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रविवार, 3 अप्रैल 2016

मनमोहक ही नहीं औषधि भी है बुरांश

बसंत में पहाड़ों में बुरांश की निराली छटा बरबस ही आकर्षित कर देती है। 
     आज सुबह दीदी ने व्हाट्सएप पर फूलों से लद बुरांश के पेड़ की तस्वीर भेजी तो गांवों में बिताये दिनों की याद ताजा हो गयी। जब चौबट्टाखाल से स्नातक कर रहा था तो वहां से लगभग दस किमी दूर स्थित अपने गांव पैदल ही आता था। महाविद्यालय से निकलते ही भूख लगने लगती थी लेकिन बसंत ऋतु में चिंता नहीं होती थी। जंगल से गुजर रही सड़क के रास्ते आगे आने पर बायीं तरफ बुरांश का बड़ा सा पेड़ था। उसमें से एक अच्छा सा बुरांश का फूल तोड़ा और फिर उसकी एक एक पंखुड़ी को चबाते हुए नौगांवखाल तक का रास्ता कट जाता था। इससे आगे के लिये भी पर्याप्त ऊर्जा मिल जाती थी। तब मैं इतना ही जानता था कि बुरांश स्वास्थ्य के अच्छा होता है लेकिन यह पता नहीं था कि वास्तव में यह तो गुणों की खान है। फूल की सुंदरता पेड़ पर होती है लेकिन अपने औषधीय गुणों के कारण शायद बुरांश की किस्मत में खिलने के बाद चटनी, शरबत, जूस आदि के रूप में परिवर्तित होकर लोगों के जीवन में उमंग और उल्लास भरना है। 
       अगर आपको बुरांश की सुंदर छटा देखनी है तो आजकल पहाड़ों में चले जाईये। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, नेपाल से लेकर अरूणाचल प्रदेश तक आपको लाल चटख रंग का यह फूल स्वागत में पलक पांवड़े बिछाये हुए दिखेगा। उत्तराखंड की विभिन्न भाषाओं और बोलियों के कवियों गी​तकारों ही नहीं बल्कि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' से लेकर श्रीकांत वर्मा तक कई कवि इससे प्रभावित थे। सुमित्रानंदन पंत ने कुमांउनी में बुरांश के बारे में लिखा है। उनके शब्दों में ''जंगल में जो स्थान बुरांश का है वह किसी अन्य चीज का नहीं। '' गढ़वाली के सुप्रसिद्ध गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने बसंत को लेकर कई गीत रचे हैं और स्वाभाविक है कि बुरांश के बिना पहाड़ों में बसंत का गुणगान करना मुश्किल है। एक जगह पर वह लिखते हैं, 'डांडयूं खिलणा होला बुरांशी का फूल, पाख्युं हैंसणी होली फ्योंली मुलमुल'। इस तरह से अन्य गी​तकारों ने भी बुरांश को अपने गीतों में बहुत अधिक तवज्जो दी है। कवि महेशानंद गौड़ 'चंद्रा' का यह गीत काफी प्रसिद्ध है, ''चल रूपा बुरांश क, फूल ​बणि जौला, छमछम हीट छींछाड़ियूं को पाणी पेई औला।'' कुमांउनी में कई गीतों में बुरांश का वर्णन है। जैसे कि ''पारा भीडा बुरूंशी फूली छौ मैं ज कूंछू मेरी हीरू अरै छौ।'' या ''बुरांश दादू तू बड़ा उतालू रे औरू फूल तू फूलण नी देन्दो।''
        बुरांश बसंत ऋतु में जंगलों में खिलने वाला फूल है। यह 1500 से 3500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित स्थानों पर पाया जाता है। इसका पेड़ सामान्यत: 10 से 15 मीटर तक लंबा होता है। नगालैंड के कोहिमा के माउंट जाफू में 1993 में बुरांश का 108 फुट लंबा पेड़ पाया गया था जो गिनीज बुक आफ रिकार्ड में दर्ज है। बुरांश के अलावा इसे बुरूंश, लाली गुरांस (विशेषकर नेपाल में), बुरास, बराह, इरास आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम 'रोडोडेंड्रन आरबोरियम' है जो लाल, गुलाबी और सफेद रंग का होता है। इनमें लाल रंग का बुरांश औषधीय गुणों से भरपूर होता है। यह उत्तराखंड का राज्य वृक्ष, हिमाचल प्रदेश और नगालैंड का राज्य पुष्प और नेपाल का राष्ट्रीय पुष्प है। 

बुरांश के औषधीय गुण  


     रिष्ठ पत्रकार अरूण जैन ने एक किस्सा सुनाया। उन्हें पहाड़ों में घूमने का शौक है। उनके शब्दों में, ''एक बार पहाड़ों में काफी चलने के बाद मैं बहुत थकान महसूस कर रहा था। तब किसी ने मुझे बुरांश का शरबत पिलाया था। मैंने पहली बार यह शरबत पिया था। पीने में तो सामान्य सा लगा लेकिन इसके बाद मेरी थकान रफूचक्कर हो गयी। मेरी स्फूर्ति लौट आयी थी। मुझे लगा कि मैंने शरबत नहीं अमृत पिया। '' वास्तव में किसी अमृत से कम नहीं है बुरांश और उससे बना शरबत। उत्तराखंड में तो इसके शरबत से मेहमानों का स्वागत किया जाता है। यह शरीर में ताजगी लाता है और थकान दूर करने में सहायक होता है। इसकी चटनी भी बनायी जाती है। इसकी पत्तियों की खाद बनायी जाती है। इनको जलाने से कीड़े मकौड़े नहीं आते हैं। 
     बुरांश पोटेशियम, कैल्शियम, आयरन, विटामिन सी से भरपूर होता है। अध्ययनों के अनुसार में क्यूरेसिटिन, रियुटिन और कोमारिक अम्ल जैसे सक्रिय जैविक यौगिक भी बुरांश के फूल में पाये जाते हैं। ये तीनों सेब में भी पाये जाते हैं और इनकी मौजूदगी के कारण ही कहा जाता है कि 'रोज एक सेब खाने का मतलब बीमारियों से दूर रहना।' विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि फ्लैवोनोइड क्वेरसेटिन, फेनोलिक्स, सैपोनिन्स, टैनिन आदि औषधीय तत्वों से भरपूर फाइटोकेमिकल्स पाये जाते हैं। 
     आपने गांवों में देखा होगा कि कुछ बीमारियों में बुरांश की पत्तियों और उसके फूल का उपयोग किया जाता है। मसलन सिरदर्द या हाथ पांव में जलन होने पर इसकी पत्तियों का लेप लगाना, घावों पर पंखुड़ियों को पीस कर लगाना, पेट की जलन दूर करने के लिये बुरांश का शरबत पीना या इसकी पंखुड़ियों का चबा चबा कर खाना। गांवों में एलर्जी, अस्थमा और मौसम बदलने पर होने वाली बीमारियों से बचने के लिये लोग इसकी पंखुड़ियों का सेवन करते थे। नेपाल में लोग वर्षों से मधुमेह के रोग के लिये इसका उपयोग करते रहे हैं और जो नवीनतम शोध बुरांश पर किये गये हैं उनके अनुसार हृदय रोगियों और मधुमेह के रोगियों के लिये बेहद उपयोगी है। टाइप एक और टाइप दो के डायबिटीज के रोगी भी इसका उपयोग कर सकते हैं। उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में भी यह अपनी भूमिका निभाता है। कोलेस्ट्राल को नियंत्रित करने में इसकी भूमिका होती है। दिल के लिये इसका शरबत या जूस काफी उपयोगी होता है। इसका नियमित सेवन करने से दिल का दौरा पड़ने की संभावना कम हो जाती है। यह यकृत यानि लीवर के रोगों को भी दूर करने की क्षमता रखता है। बुरांश में लौहतत्व होते हैं और इसलिए हीमोग्लोबिन की कमी दूर करने में भी यह सहायक होता है। 
    बुरांश गुर्दा यानि किडनी और पेशाब की जलन को दूर करने में सहायक होता है। यहां तक कि यदि मुंह में छाले हैं तो इसकी पंखुड़ियों को चबाने से राहत मिलती है। इसकी पंखुड़ियों और पत्तियों से पाउडर बनाया जाता है जिनका सेवन करने से डायरिया में राहत मिलती है। पेचिस में इसका सेवन उपयोगी होता है क्योंकि इसमें फ्लैवोनोइड्स, टैनिस, स्टेरोल आदि फाइटोकैमिकल्स पाये जाते हैं। बुरांश के कुछ गुण कैंसर जैसी बीमारी नहीं होने देते हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट पाये जाते हैं जिससे यह शरीर के खराब तत्वों का नष्ट करता है। कहने का मतलब है कि यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण इसका जूस पीने से त्वचा में भी निखार आता है। बुरांश के फूल से चेहरे पर लगाने के लिये लेप (फेसपैक) भी तैयार किया जाता है। यह लेप फूलों के पाउडर और शहद को मिलाकर तैयार किया जाता है।
    कहने का मतलब है कि बुरांश का जूस बेफिक्र होकर ​पियें लेकिन बहुत अधिक मात्रा में नहीं क्योकि अति तो किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती है। बुरांश का पेड़ दिखे तो एक फूल लेकर उसकी पंखुड़ियों को चबाकर खाने से आपको लाभ ही मिलेगा। इसका महत्व समझें और फूलों को बर्बाद नहीं करें। यदि इसका उपयोग नहीं करना है तो उसे पेड़ पर ही रहने दें। उम्मीद है विभिन्न स्रोतों से  बुरांश के बारे में ली गयी यह जानकारी आपको उपयोगी लगी होगी। बुरांश को लेकर अपने अनुभव जरूर साझा करें। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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रविवार, 3 जनवरी 2016

देवताओं का प्रिय, उत्तराखंड का राज्य पुष्प ..ब्रह्म कमल

  अद्भुत, अद्धितीय, अनुपम, अनोखा, अप्रतिम, अनोखा, विलक्षण, देवताओं का ​प्रिय और उत्तराखंड का राज्य पुष्प। अगर आप 'ब्रह्म कमल' की तारीफ में कुछ लिखना चाहेंगे तो विशेषण कम पड़ जाएंगे। एक ऐसा पुष्प जो साल में केवल एक बार खिलता है। एक ऐसा पुष्प जो अपनी विरादरी के अन्य फूलों से विपरीत सूर्यास्त के बाद खिलकर अपने सौंदर्य और सुगंध से पूरे वातावरण को मदहोश कर देता है। एक बेहद दुर्लभ पुष्प जो देवताओं को भी प्रिय है। हिमालय में फूलों का राजा क्योंकि भारत में इसकी जो 61 प्रजातियां पायी जाती हैं उनमें से अकेली 58 हिमालय में मिलती हैं। हिमालय के अलावा यह फूल उत्तरी म्यांमा और दक्षिण पश्चिम चीन में भी पाया जाता है।  उत्तराखंड में यह फूल कई स्थानों पर पाया जाता है लेकिन फूलों की घाटी, केदारनाथ, हेमकुंड, रूपकुंड, पिंडारी, चिफला आदि जगहों पर आप आसानी से इस दिव्य फूल के दर्शन कर सकते हैं।
    एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि भले ही यह कमल की तरह दिखता है लेकिन पानी में नहीं ​बल्कि जमीन पर उगता है। अमूमन ब्रह्म कमल 3000 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर मिलता है। इसे कई अन्य नामों से भी जाना जाता है जैसे कि हिमालच प्रदेश में दूधाफूल, कश्मीर में गलगल, श्रीलंका में कदुफूल और जापान में गेक्का विजिन जिसका शाब्दिक अर्थ है चांदनी रात की खूबसूरत स्त्री।  चीन में इसे तानहुआयिझियान कहते हैं जिसका अर्थ है प्रभावशाली लेकिन कम समय तक ख्याति रखने वाला।  इसका वानस्पति नाम  साउसुरिया ओबुवालाटा है। वैसे कुछ लोग दावा करते हैं कि आर्किड कैक्टस प्रजाति का फूल जिसका वानस्पतिक नाम इपिफीलम ओक्सीपेटालम है, वह असल में ब्रह्म कमल है। ये सभी ब्रह्म कमल की ही प्रजातियां हैं जो रात में खिलती हैं और इस तरह के फूल को आप घरों में भी उगा सकते हैं लेकिन उत्तराखंड का जो ब्रह्म कमल है वह साउसुरिया ओबवालाटा है। यह फूल  बरसात के दिनों में जुलाई से लेकर सितंबर अक्तूबर तक ही खिलता है।

ब्रहमा का सृजन है ब्रह्म कमल

     ब्रह्म कमल से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं और गा​थाएं हैं। माना जाता है कि इसका सृजन स्वयं ब्रहमा ने किया था। इसके पीछे भी एक पौराणिक कहानी है। कहा जाता है कि माता पार्वती ने जब गणेश का सृजन किया तो तब भगवान शिव बाहर गये हुए थे। माता पार्वती स्नान कर रही थी और उन्होंने गणेश को घर के बाहर ​खड़ा करके आदेश दिया कि वह किसी को भी अंदर नहीं आने दें। तभी भगवान शिव पधार गये। गणेश ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया और क्रोध में शिव ने उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। माता पार्वती के आने के बाद उन्हें असलियत का पता चला। माता पार्वती के आग्रह पर ब्रहमा ने ब्रह्म कमल का सृजन किया जिसकी मदद से हाथी का सिर गणेश के धड़ पर जोड़ा गया। ब्रह्मा अपने चार हाथों में से एक हाथ में सफेद पुष्प लिये हुए हैं। यह ब्रहम कमल ही है। यह भी कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु हिमालय क्षेत्र में आये थे तो उन्होंने भगवान शिव को 1000 ब्रह्म कमल चढ़ाये थे।
     पृथ्वी पर ब्रह्म कमल के आगमन से भी एक कहानी जुड़ी है। भगवान राम और रावण की सेना के बीच युद्ध चल रहा था। इस युद्ध में एक बार लक्ष्मण मूर्छित हो गये थे। हनुमान हिमालय पर्वत से संजीवनी लेकर गये और लक्ष्मण को होश आ गया। इससे भगवान राम के साथ देवता भी खुश हो गये। उन्होंने आकाश से पुष्प वर्षा की। यह कोई और पुष्प नहीं बल्कि ब्रह्म कमल था। इस दौरान ये पुष्प फूलों की घाटी पर भी पड़ा जहां इसने अपनी जड़े जमा दी और फिर यह हिमालय में यत्र तत्र फैल गया।
     भीम और हनुमान के मिलन से भी ब्रह्म कमल का जोड़ा जाता है। महाभारत से पहले जब पांडव वनों में अपने दिन गुजार रहे थे तब हिमालय प्रवास के दौरान एक दिन  द्रौपदी इसकी सुंगध से मदहोश हो गयी और उन्होंने भीम को यह पुष्प लाने के लिये कहा। भीम पुष्प की खोज में निकल पड़े। रास्ते में उन्हें अपनी पूंछ फैलाये हनुमान मिले। भीम ने कड़े शब्दों में रास्ते से हट जाने को कहा। हनुमान ने भीम को अपनी शक्ति का परिचय दिया और जब भीम को अपनी गलती का अहसास हुआ तो उन्हें बताया कि ब्रह्म कमल बद्रीनाथ में मिलेगा।
     ब्रह्म कमल साल में एक बार और वह भी रात में चंद घंटों के लिये खिलता है। कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति इसे खिलता हुआ देखता है उसकी मनोकामना पूरी होती है। कहने का मतलब है कि ब्रह्म कमल को खिलता हुआ देखना बेहद पुण्य माना जाता है। बद्रीनाथ और केदारनाथ सहित उत्तराखंड के कई मंदिरों में इस फूल को चढ़ाने का बड़ा महत्व माना जाता है। इससे ब्रह्म कमल के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है क्योंकि चढ़ावे के लिये इसका बद्रीनाथ और केदारनाथ क्षेत्र में अंधाधुंध दोहन किया जाता है। हेमकुंड साहिब में इसका दोहन हो रहा है। पर्यावरण में आ रहे बदलावों का भी इस पुष्प पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। ब्रह्म कमल मां नंदादेवी का भी प्रिय पुष्प है। नंदाष्टमी के समय इसे तोड़ा जाता है लेकिन इसमें भी नियमों का पालन करना पड़ता है। पिथौरागढ़ में 35 किमी के दुर्गम रास्ते से होकर 17000 फीट की उंचाई पर स्थित हीरामणि कुंड से ब्रह्म कमल लाकर मां नंदा को अर्पित किया जाता है। यहां ब्रह्मकमल हर तीसरे साल नंदादेवी पर्वत शृंखला से लाया जाता है। नंदा अष्टमी के दिन देवताओं पर चढ़ाये गये ब्रह्म कमल के फूलों को प्रसाद के रूप में भी बांटा जाता है।

औषधीय गुण भी हैं ब्रह्म कमल में

    ब्रह्म कमल औषधीय गुणों से भी भरपूर है। इसके अंदर से निकलने वाले पानी को अमृत कहा जाता है क्योंकि इसके सेवन से व्यक्ति एकदम से स्पूर्त हो जाता है और उसकी थकान मिट जाती है। ब्रह्म कमल के फूलों की राख को शहद के साथ मिलाकर खाने से यकृत की वृद्धि रोकने में मदद मिलती है। इसे मिर्गी के दौरे रोकने में भी सहायक माना जाता है और घाव भरने में भी इससे मदद मिलती है। इसे जीवाणुरोधी माना जाता है और इसका इस्तेमाल सर्दी-ज़ुकाम, हड्डी के दर्द आदि में भी किया जाता है। लोग इसके कपड़ों के बीच डालकर रखते हैं। इसकी मदहोश करने वाली सुगंध से कपड़े महकते रहते हैं और उन पर कीड़े भी नहीं लगते। मूत्र संबंधी रोगों में भी इसका उपयोग किया जाता है। भोटिया जनजाति के लोग तो इसे अपने घरों में लटकाकर रखते हैं क्योंकि उनका मानना है कि यह बीमारियों को आने से रोकता है। वियतनामी लोग इसका सूप बनाकर टानिक के रूप में पीते हैं। तिब्बती लोग इसका उपयोग लकवा और दिमागी रोगों के लिये करते हैं। यह जलोदर (एक रोग जिसमें पेट में पानी जमा हो जाता है) को दूर करने में भी उपयोगी है।

घर में उगाईये ब्रह्म कमल

      ब्रह्म कमल की कुछ प्रजातियों को आप घर में भी उगा सकते हैं। इसकी पत्ती को तने सहित काटकर पानी में डुबोकर रखा जाता है। लगभग तीन सप्ताह में इसमें जड़ें आ जाती हैं जिसे किसी गमले में मिट्टी डालकर लगाया जा सकता है। इसका तना काटकर मिट्टी में रोपने पर भी नये पौधा तैयार हो जाता है। असल में इपिफीलम ओक्सीपेटालम श्रेणी के पौधे को उगाना आसान होता है जो हिमालय के अलावा देश के कई अन्य हिस्सों में भी पाया जाता है।
     ब्रह्म कमल का संरक्षण हालांकि जरूरी है। आप इसे देवताओं को अर्पित करिये लेकिन इसकी सीमा तय होनी चाहिए। अगर इसको बचाये रखने के प्रयास नहीं किये गये तो उत्तराखंड का राज्य पुष्प विलुप्त होने की कगार पर पहुंच सकता है। तब आप इसे देवकोप कहेंगे लेकिन उससे बचाव के उपाय अभी से शुरू कर देने चाहिए। आपका धर्मेन्द्र पंत


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गुरुवार, 9 जुलाई 2015

झंगोरा : बनाओ खीर या सपोड़ो छांछ्या

     सुबह लेकर अखबार में पढ़ा की उत्तराखंड की झंगोरा की खीर राष्ट्रपति भवन के मेन्यू में शामिल कर ली गयी है। खुशी मिली और साथ में मुंह पानी भी आ गया। कुछ लोगों के लिये यह शब्द नया हो सकता है लेकिन मुझे नहीं लगता कि जो व्यक्ति कुछ दिन भी पहाड़ में रहा हो वह झंगोरा से अपरिचित हो। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान भी यह नारा अक्सर सुनने को मिल जाता था, '' मंडुवा . झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे।'' 
पौष्टिकता से भरपूर होता है झंगोरा
     उत्तराखंड में झंगोरा की खेती सदियों से की जा रही है और एक समय इसका उपयोग चावल के स्थान पर भात की तरह पकाकर खाने के लिये किया जाता था। चावल की बढ़ती पैठ के कारण दशकों पहले ही पहाड़ों में इसे दूसरे दर्जे के भोजन की सूची में धकेल दिया था। यह अलग बात है कि चावल की तुलना में झंगोरा अधिक पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक है और इसकी खेती के लिये उतनी मेहनत भी नहीं करनी पड़ती है जितनी की धान उगाने के लिये। उत्तराखंड में जिन खेतों की मिट्टी मुलायम और उपजाऊ होती है वहां धान बोया जाता है और जो खेत थोड़ा पथरीला हो वहां झंगोरा की खेती की जाती है। इसके धान के खेत के किनारे भी रोपा जाता है। एक समय आया जबकि उत्तराखंड के किसानों का इससे मोहभंग हो गया था लेकिन अब वे धीरे धीरे इसके गुणों से परिचित हो रहे हैं। इसलिए पहाड़ी खेतों के फिर से झंगोरा की तरह लहलहाने की उम्मीद की जा सकती है। यदि आप इस लेख को पढ़ रहे हों तो लोगों को झंगोरा उत्पादन के लिये प्रेरित कर सकते हैं। कई खेतों में झंगोरा के साथ कौणी भी बो दी जाती है। कौणी का दाना पीला होता है और मरीजों के लिये इसकी खिचड़ी काफी उपयोगी होती है।
     झंगोरा खरीफ ऋतु की फसल है क्योंकि पानी के लिये यह बरसात पर निर्भर रहती है। पहाड़ों में झंगोरा की खेती करने के लिये खेत को हल से जोता जाता है और इसमें झंगोरा छिड़क दिया जाता है। बरसात में इसकी निराई, गुड़ाई, रोपाई की जाती है। इधर बारिश हुई और गांवों के लोग खेतों में झंगोरा को व्यवस्थित तरीके से लगाने के लिये चले जाते हैं। वैसे इसकी बुवाई मार्च से मई तक कर दी जाती है और बरसात इसको नया जीवन देती है। सितंबर . अक्तूबर में कटाई का काम चलता है। इसकी लंबी बालियां मनमोहक होती हैं, जिन्हें मांडकर या कूटकर झंगोरा का एक एक दाना अलग कर दिया जाता है। तब यह भूरे रंग का होता है। इसके भूरे रंग के छिलके को निकालने के लिये ओखली (उरख्यालु) में कूटा जाता था जिसके अंदर का दाना सफेद होता है। इसी दाने का उपयोग खीर, खिचड़ी या चावल की तरह पकाने के लिये किया जाता है। पहाड़ी घरों में आज भी झंगोरा से छंछ्या बनाया जाता है जो वहां के लोगों में काफी लोक​​प्रिय है। 
      पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब अपने ग्रीष्मकालीन प्रवास पर नैनीताल जाते थे तो झंगोरा की खीर उनका पसंदीदा व्यंजन होता था। ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स और उनकी पत्नी कैमिला पार्कर जब नवंबर 2013 में भारत दौरे पर आये तो वे उत्तराखंड भी गये थे। वहां उन्हें झंगोरा की खीर परोसी गयी थी जिसकी उन्होंने काफी तारीफ की थी। यहां तक उन्होंने इसे बनाने की विधि भी पूछी थी। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को इस साल मई में उत्तराखंड प्रवास के दौरान राजभवन में झंगोरा की खीर परोसी गयी थी। यहीं से इस पहाड़ी व्यंजन का राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने का रास्ता साफ हुआ था। गढ़वाल मंडल विकास निगम पहले ही इसे अपने मेन्यू में शामिल कर चुका है।
     माना जाता है कि झंगोरा मध्य एशिया से भारत में पहुंचा और उत्तराखंड की जलवायु अनुकूल होने के कारण वहां इसने अपनी जड़ें मजबूत कर ली। भारत के कुछ प्राचीन ग्रंथों में भी इसका वर्णन मिलता है। चीन, अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों में भी इसकी खेती की जाती है। झंगोरा का वैज्ञानिक नाम इक्निकलोवा फ्रूमेन्टेसी है। हिन्दी में इसे सावक या श्याम का चावल कहते हैं। राष्ट्रीय पोषण संस्थान केे अनुसार झंगोरा में कच्चे फाइबर की मात्रा 9.8 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 65.5 ग्राम, प्रोटीन 6.2 ग्राम, वसा 2.2 ग्राम, खनिज 4.4 ग्राम, कैल्शियम 20 मिलीग्राम, लौह तत्व पांच मिलीग्राम और फास्फोरस 280 ग्राम पाया जाता है। 
     यह सभी जानते हैं कि खनिज और फास्फोरस शरीर के लिये बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। झंगोरा में चावल की तुलना में वसा, खनिज और लौह तत्व अधिक पाये जाते हैं। इसमें मौजूद कैल्शियम दातों और हड्डियों को मजबूत बनाता है। झंगोरा में फाइबर की मात्रा अधिक होने से यह मधुमेह के रोगियों के लिये उपयोगी भोजन है। झंगोरा खाने से शरीर में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। यही वजह है कि इस साल के शुरू में उत्तराखंड सरकार ने अस्पतालों में मरीजों को मिलने वाले भोजन में झंगोरा की खीर को शामिल करने का सराहनीय प्रयास किया। उम्मीद है कि इससे लोग भी झंगोरा की पौष्टिकता को समझेंगे और चावल की जगह इसको खाने में नहीं हिचकिचाएंगे। असलियत तो यह है कि जो चावल की जगह झंगोरा खा रहा है वह तन और मन से अधिक समृद्ध है। 

झंगोरा से बनने वाले भोज्य पदार्थ

     त्तराखंड में नवरात्रों या व्रत आदि के समय में भी झंगोरा का उपयोग किया जाता है लेकिन आम दिनों में इसे चावल की तरह पकाया जाता है या फिर इसकी खीर, खिचड़ी, छंछ्या या छछिंडु बनाया जाता है। झंगोरा की खीर भी चावल की खीर की तरह की बनायी जाती है। यदि आप 300 ग्राम के करीब झंगोरा लेते हैं तो उसमें 150 ग्राम चीनी और लगभग डेढ़ लीटर दूध मिलाया जाता है। झंगोरा को पहले 15 से 20 मिनट तक पानी में भिगो कर रख दो और इस बीच दूध को उबाल दो। उबले हुए दूध में झंगोरा मिला दो और अच्छी तरह से पकने तक इसमें करछी चलाते रहो। इसके बाद चीनी मिलाओ। स्वाद बढ़ाना है तो काजू, किसमिस, बादाम, चिरौंजी जैसे ड्राई फ्रूट भी मिला सकते हो। अब इसे आप गरमागर्म परोसो या ठंडा होकर खाओ, स्वाद लाजवाब होता है।
    जिस तरह से चावल को पकाते हैं झंगोरा को उस तरह से इसका भात पकाकर दाल के साथ खाया जाता है। इसके अलावा इसकी खिंचड़ी भी पकायी जाती है। छंछ्या के लिये छांछ में झंगोरा मिलाकर उसे पकाया जाता है। इसे नमकीन और मीठा दोनों तरह से बना सकते हैं। इसके अलावा अब झंगोरा की रोटी और उपमा भी बनाया जाने लगा है। आपका धर्मेन्द्र पंत (इनपुट ... निर्मला घिल्डियाल)

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रविवार, 17 मई 2015

आओ चलें नीलांग घाटी

      हते हैं कि अगर आपने पहाड़ और पठार के मिलन का खूबसूरत नजारा देखना है तो नीलांग घाटी जाइये। यदि आपकी किस्मत अच्छी रही तो यहां आपको कस्तूरी ​मृग और हिमालयी नीली भेड़ यानि भराल भी दिख जाएगा। हिम तेंदुआ भी आपको अपने दर्शन देकर कृतार्थ कर सकता है। यहां से आपको तिब्बत के  पठार की झलक भी देखने को मिल जाएगी। पर्यावरण के लिहाज से तो यह उत्तम जगह है ही। कभी तिब्बतियों और उत्तराखंड की भोटिया जाति के लिये ऐतिहासिक व्यापारिक मार्ग रही नीलांग घाटी जाने के लिये अब तक सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि चीन की सीमा के करीब होने के कारण भारत सरकार ने यहां जाने पर रोक लगा रखी थी। भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था। केवल सेना और भारत तिब्बत सीमा पुलिस के जवान ही यहां दिखते थे लेकिन अब नीलांग घाटी को आम जनता के लिये भी खोल दिया गया है। यदि आप विदेशी हैं तो आपको सरकार के अगले आदेश तक इंतजार करना पड़ेगा। विदेशी पर्यटकों के लिये यह स्थान अब भी प्रतिबंधित है। 
नीलांग घाटी में लकड़ी से बना पुराना व्यापारिक मार्ग.... 
यह फोटो सर्वे आफ इंडिया से लिया गया था लेकिन एक मित्र ने 
लिखा है कि उनके बड़े भाई  तिलक सोनी ने इसे कैमरे में कैद किया था।
     नीलांग घाटी लगभग 11,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है और पर्यटन के लिहाज से यह बेहद अहम स्थान है। यही वजह है कि उत्तराखंड सरकार ने 53 साल बाद इसे खोलने का फैसला किया। उत्तराखंड के वन मंत्री दिनेश अग्रवाल के शब्दों में, '' नीलांग घाटी को खोल देने से राज्य को न सिर्फ अतिरिक्त राजस्व मिलेगा बल्कि इससे स्थानीय लोगों के लिये रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। साथ ही पर्यटकों को खूबसूरत जगह देखने को मिलेगी। ''  यह घाटी गंगोत्री राष्ट्रीय पार्क का ही हिस्सा है और यहां केवल दिन के समय जाया जा सकता है। अभी एक दिन में केवल छह जीप को ही नीलांग घाटी तक जाने की अनुमति मिली है। इस तरह से एक दिन में तीन दर्जन पर्यटक ही इस सुरम्य घाटी का आनंद उठा पाएंगे।

नीलांग घाटी का इतिहास

     भारत . चीन युद्ध से पहले नीलांग घाटी सीमा पार व्यापार के हिसाब से महत्वपूर्ण जगह थी। यह रेशम के व्यापारियों का मुख्य मार्ग हुआ करता था। हजारों साल पहले व्यापारी जिन मार्गों और पुलों का उपयोग किया करते थे, उनमें से कुछ भी यहां मौजूद हैं। इनमें जाह्नवी नदी के किनारे बना पुल भी शामिल है। इसी क्षेत्र में लाल देवता का मंदिर भी है। कहा जाता है कि भोटिया लोग तिब्बत जाने से पहले इस मंदिर में पूजा करते थे।
     माना जाता था कि एक समय नीलांग घाटी में तिब्बती घुसपैठियों का दबदबा था। यहां के स्थानों के नामों से भी इसकी पुष्टि होती है। नीलांग घाटी को भी तिब्बती लोग 'चोनशा' कहा करते थे। इसमें नीलांग और जादुंग नाम के दो गांव पड़ते थे। एक अंग्रेज ए गेर्राड ने 1820 में इसे 'चुनसाखागो' जबकि 1850 के दशक के आसपास इस क्षेत्र के चप्पे चप्पे से वाकिफ रहे एफ विल्सन ने 'चुंगसा खागा' नाम से उल्लखित किया है। नीले पहाड़ों के कारण स्थानीय लोग इसे नीलांग नाम से जानते थे। एक अन्य अग्रेंज जे बी फ्रेजर ने सबसे पहले इस क्षेत्र में जाने का प्रयास किया था। वह गंगोत्री तक गये थे लेकिन उन्होंने इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति से लोगों को परिचित कराया था। उन्होंने नीलांग यानि चोनशा और उस क्षेत्र के 'जाध भोटिया' निवासियों के बारे में लिखा था। रिकार्डों के अनुसार 'सर्वे आफ इंडिया' के कैप्टेन जान हडसन और लेफ्टिनेंट जेम्स हरबर्ट पहले यूरोपीय थे जो गोमुख तक गये थे। वे 31 मई 1817 को वहां पहुंचे थे। लेफ्टिनेंट हरबर्ट दो साल बाद फिर से इस क्षेत्र के बारे में पता करने के लिये निकले थे और आखिर में 13 सितंबर 1817 को नीलांग पहुंचने में सफल रहे थे। 
     विल्सन को 1850 के आसपास टेहरी के राजा ने इस क्षेत्र को बसाने की जिम्मेदारी भी सौंपी थी। कहते हैं कि अंग्रेजों को डर था कि रूसी सेना इस मार्ग से आक्रमण कर सकती है और इसलिए विल्सन वहां जासूसी का काम भी करते थे। वह किसी भी विदेशी के वहां पहुंचने पर उसकी पूरी जानकारी ब्रिटिश सरकार को देते थे। विल्सन ने इस क्षेत्र में कई पुल बनाये थे तथा हर्सिल और नीलांग के बीच मार्ग तैयार करवाया था। उन्होंने यहां के अनुभवों पर एक किताब 'माउंटेनियर' भी लिखी थी। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण से जुड़े सी एल ​ग्रीसबाक ने 1882 और 1883 में नीलांग घाटी का दौरा करके यहां के विस्तृत अध्ययन किया था। उन्होंने 'जियोलोजी आफ द सेंट्रल हिमालय' में लिखा है कि जब वह नीलांग गये तब वहां के स्थानीय निवासियों जाध और तिब्बती लोगों के बीच रिश्ते अच्छे नहीं थे। 1930 के दशक में इस पूरे क्षेत्र का मानचित्र तैयार कर दिया गया था।  ब्रिटिश खोजकर्ता जे बी औडेन (महान कवि विस्टन ह्यूज औडेन के छोटे भाई) 1939 में भागीरथी की सहायक नदियों की खोज करते हुए नीलांग घाटी तक पहुंच गये थे। उन्होंने बाद में यहां का मानचित्र तैयार करवाने में अहम भूमिका निभायी।
    नीलांग घाटी से जुड़ी एक दिलचस्प घटना भी है। आस्ट्रिया के दो पर्वतारोही हेनरिच हेरर और पीटर आफशेनेटर दुनिया की नौंवी सबसे ऊंची चोटी नांगा पर्वत पर चढ़ाई करने के लिये भारत आये थे लेकिन तभी 1939 में दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। ब्रिटिश सरकार ने इन दोनों पर्वतारोहियों को देहरादून में कैद रखा। परिजनों ने भी उनका साथ नहीं दिया और यहां तक कि हेरर की गर्भवती पत्नी इंग्रिड ने आस्ट्रिया से ही उनके लिये तलाक के कागज भेज दिये थे। हेरर और आफशेनेटर 1944 में जेल से भागने में कामयाब रहे। वे छिपते छुपाते नीलांग घाटी होकर तिब्बत पहुंच गये। हेरर वहां दलाई लामा के गुरू भी रहे। बाद में उन्होंने जेल से छूटने और फिर हिमालय के कठिन रास्तों, नीलांग घाटी आदि से होते हुए तिब्बत तक पहुंचने और वहां बिताये गये दिनों पर एक किताब लिखी जिसका नाम था, 'सेवन एयर्स इन तिब्बत'। बाद में 1997 में इसी नाम से एक फिल्म भी बनी थी।

कैसे जाएं नीलांग घाटी

   नीलांग घाटी के पर्यटकों के लिये खुल जाने के बाद यह सवाल सभी के मन में कुलबुलाएगा कि आखिर यहां कैसे पहुंचा जा सकता है। आपको दिल्ली से गंगोत्री तक जाने का ही मार्ग पकड़ना है। दिल्ली से इसके लिये दो रास्ते हैं। पहला हरिद्वार से नरेंद्रनगर, टेहरी, धरासू, उत्तरकाशी, भटवाड़ी, गंगनानी और हर्सिल से होकर जाता है। देहरादून से मंसूरी, चंबा और टेहरी होते हुए भी नीलांग घाटी तक पहुंचा जा सकता है। भैरवगढ़ी से नीलांग घाटी 25 किमी दूरी पर स्थित है। भैरवगढ़ी से वन विभाग से पंजीकृत सफारी जिप्सी पर्यटकों को घाटी तक पहुंचाएगी। एक जिप्सी में केवल छह व्यक्ति ही बैठ सकते हैं।
(नोट : मैं अभी तक नीलांग घाटी नहीं गया हूं। मैंने विभिन्न स्रोतों से यह जानकारी जुटायी है। आप इसे समृद्ध कर सकते हैं। कृपया नीलांग घाटी के बारे में किसी भी तरह की जानकारी नीचे टिप्पणी वाले कालम में जरूर साझा करें। आपकी टिप्पणियों का तहेदिल से स्वागत है।)
  
आपका धर्मेन्द्र पंत

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