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शनिवार, 15 अगस्त 2015

क्या है हन्त्या? रहस्य, अंधविश्वास, वास्तविकता या जागरियों का कमाल?

      सेरी के सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं। पिछले दिनों में मेरे पत्रकार मित्र महावीर सिंह ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी, जिसमें उन्होंने कई सवाल उठाये थे। उन्होंने लिखा था, ''उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है। क्या सचमुच में यह देवभूमि है? कहां हैं हमारे देवी देवता? गर्मियों में स्कूलों की छुटि्टयों के दौरान यहां हर क्षेत्र में हर गांव में होने वाले मेले, पूजा पाठ और ढोल दमाऊ की थाप पर नाचने वाले नर—नारी, क्या सचमुच उस देव अथवा देवी का प्रतिरूप होते हैं? क्या है सच्चाई? क्या आज भी हमारे देवी देवता मनुष्य शरीर में प्रवेश होकर प्रकट होते हैं?'' महावीर भाई ने सवालों की जो झड़ी लगायी है वह किसी को सोचने के लिये मजबूर कर सकती है। बचपन से मैंने इसे अंधविश्वास की श्रेणी में माना लेकिन यह आस्था है और इस शब्द के बहुत मायने होते हैं।

क्या है हन्त्या? रहस्य, अंधविश्वास, वास्तविकता या जागरियों का कमाल?
   
      आपने हन्त्या नचाणा भी सुना होगा यानि अपने मृत पूर्वजों का आह्वान। वह अपने किसी करीबी के शरीर में प्रवेश करते हैं और अपनी मुक्ति के लिये रास्ता भी दिखा देते हैं। देखा होगा कि देवी देवता के साथ साथ जागरी (देवी देवताओं का आह्वान करने वाला) हन्त्या भी नचाता है। कई बार देखा गया है कि जब वह आत्मा यानि रूह किसी के शरीर में प्रवेश करती है तो ऐसा लगता है कि उस व्यक्ति को मानो बहुत पीड़ा हो रही हो। क्या वास्तव में ऐसी रूह अपने करीबी के शरीर में प्रवेश करती है? यह सवाल भी अनुत्तरित है। मैं यहां पर दो घटनाओं का जिक्र कर रहा हूं जिनको लेकर आप अनुमान लगा सकते हैं कि सच्चाई वास्तव में क्या है?
     पहाड़ के अपने पंडित जी एक दिन बातों बातों में एक सच्चा किस्सा सुनाया। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि मैं पंडित जी के शब्दों में ही वह किस्सा आपके सामने पेश कर सकूं। बकौल पंडित जी ....
      ''काफी साल पहले मैं एक बार किदवई नगर में किन्हीं यजमान के यहां गया था। अक्सर जैसे हम पूछ लेते हैं कि आप गढ़वाल में कहां के रहने वाले हैं मैंने भी परिवार के बुजुर्ग से यह सवाल कर दिया। वह कुछ देर चुप रहे और फिर कहा, 'आपने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया है। मैं बता नहीं सकता।' मैंने उनसे कहा कि अब तो आपने बात को और रहस्यमयी बना दिया है। आपको बताना पड़ेगा। आखिर में वह मान गये। उन्होंने एक लंबी सांस ली और फिर अपनी कहानी कहने लगे। ''

     अब उन बुजुर्ग की वह कहानी जो उन्होंने पंडित जी को बतायी थी .....

     ''यह आजादी से पहले की बात है। मैं तब 18 या 19 साल का था। शादी हो चुकी थी और घरवालों ने परदेस की तरफ धकेल दिया कि अब तो मुझे कुछ काम करना होगा। टिहरी गढ़वाल के अपने गांव से किसी परिचित का पता लेकर दिल्ली आ गया। पहाड़ी लोग सरल और ईमानदार होते हैं और इसलिए यहां आकर किसी सेठ साहूकार के यहां घर या दुकान पर उन्हें काम मिल जाता है। मैं भी जिन महानुभाव का पता लेकर आया था वह भी ऐसे ही किसी सेठ के घर में काम करते थे। उन्होंने साफ इन्कार कर दिया कि मैं उनके साथ नहीं रह सकता था। अब न मैं घर वापस जाने की स्थिति में और दिल्ली में किसी अन्य व्यक्ति को भी नहीं जानता था। फुटपाथ मेरा आसरा बन गया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आजादी की लड़ाई अपने चरम पर थी। अंग्रेज सरकार लोगों को परेशान कर रही थी। मुझे भी एक दिन फुटपाथ से उठाकर जेल में ठूंस दिया गया। आजादी मिलने के बाद जब जेल से बाहर निकला तो स्थिति भयावह थी लेकिन घरवाले, गांव वाले, रिश्तेदारों को जब पता चलेगा कि मैं जेल में बंद था तो वे क्या सोचेंगे? बस इस वजह से गांव नहीं गया और फिर से मेहनत मजदूरी करने में लग गया। इसके एक डेढ़ साल बाद जब मुझे लगा कि अब मैं सक्षम बन गया हूं तो गांव जाने की तैयारी कर ली। ''
     ''बहुत खुश था कि गांव में मुझे देखकर मां पिताजी, भाई बहन और पत्नी सभी को बहुत खुशी होगी। बड़े उल्लास के साथ गांव में कदम रखा लेकिन गांव के जिस भी शख्स की नजर मुझ पर पड़ी उसके चेहरे पर मैंने कई सवाल तैरते हुए देखे। मैं समझ गया कि गांव में सब कुछ सही नहीं है। कुछ तो गड़बड़ है। घर में पहुंचा तो सब हक्के बक्के। खुशी के बजाय उनके चेहरे पर हवाईयां तैर रही थी। मां पिताजी जरूर खुश थे। गांववालों और घरवालों ने यह मान लिया था कि स्वतंत्रता मिलने के बाद जो दंगे हुए उनमें मेरी मौत हो गयी है। मेरी पत्नी का विवाह मेरे छोटे भाई से कर दिया गया और तब उनका एक बच्चा भी हो गया था। मैंने कभी इसके लिये अपने भाई, पत्नी या माता पिता को दोष नहीं दिया क्योंकि परिस्थितियां ही ऐसी थी। मैंने इन बदले हुए रिश्तों को स्वीकार कर लिया लेकिन तभी मुझे पता चला कि मेरी पत्नी जो अब मेरे छोटे भाई की पत्नी बन गयी है उस पर मेरी हन्त्या भी आयी थी और मेरी नारायणबलि भी कर दी गयी क्योंकि मेरे कारण होने वाले कष्टों से बचने के लिये यही उपाय मेरी रूह और जागरी ने बताया था। मैं सन्न रह गया। नारायणबलि की तो कोई बात नहीं लेकिन जब मैं जिंदा था तो मेरी रूह कहां से यहां आकर उसके शरीर में प्रवेश कर गयी थी। मुझे यह भी पता चला कि वह बहुत रोयी थी। उसने यह भी बताया था कि किस तरह से मौत हुई थी। मुझे मारा जा रहा था। उसके शरीर के जरिये मेरी रूह ने बताया था कि मुझे बहुत पीड़ा हो रही थी और मैं मां पिताजी को याद कर रहा था। उस हन्त्या की पीड़ा से तब मां पिताजी ही नहीं पूरा गांव रो पड़ा था। ''
     ''मैं इतना सुनकर धप्प से बैठ गया। बस यही सवाल मेरे मन में कौंध रहा था कि आखिर सब हुआ कैसे? मन कसैला हो गया। तुरंत मां पिताजी से विदा लेकर गांव से निकल गया और फिर कभी गांव का रूख नहीं गया। गढ़वाल में कई जगह गया लेकिन कभी गांव नहीं गया। लेकिन मेरा सवाल अब भी अनुत्तरित है कि उसके शरीर में मेरी रूह ने कैसे प्रवेश किया जबकि मैं जिंदा था? जब जवाब नहीं मिला तो मैंने यह मान लिया कि हन्त्या जैसा कुछ होता ही नहीं है। लेकिन क्या आप मेरे सवाल का जवाब दोगे?''
     न बुजुर्ग का पंडित जी के लिये किया गया सवाल उन्होंने मेरी तरफ दाग दिया। तब मुझे गांव की एक घटना याद आयी। मैं बचपन से ही जागरी, डौंर थाली, देवी देवता हन्त्या नचाने को पसंद नहीं करता था। मुझे लगता था कि किसी व्यक्ति के शरीर में देवता या रूह के प्रवेश में डौंर और थाली से निकलने वाली तरंगों का भी योगदान होता है। एक दिन मुझे पता चला कि गांव के फलां भाई साहब के शरीर में कभी उनकी मां की हन्त्या आयी थी। वह भाई हमेशा परदेस में रहे। हिन्दी में ही बोलते थे। बेहद पढ़ाकू और राजनीति से लेकर विज्ञान तक की अच्छी समझ रखने वाले। उनसे जब भी बातें हुई तो लगा कि वह अंधविश्वासी नहीं हैं। जब पता चला कि उन पर एक बार हन्त्या आयी थी तो उन्हीं से जवाब जानने के लिये चल पड़ा। उन्होंने जो मुझे बताया वह इस तरह से है, ''हां धर्मेन्द्र यह सही है कि मुझ पर मेरी मां की हन्त्या आयी थी। जागरी हन्त्या के जागर लगा रहा था। मैं भी सभी लोगों के साथ बैठा हुआ था। अचानक मुझे कुछ अजीब सा महसूस होने लगा। मुझे लगा कि मेरा शरीर जैसे हवा में तैर रहा है और धीरे धीरे मैंने खुद को काफी ऊपर हवा में तैरता हुआ पाया। इस बीच नीचे जागरी के सामने क्या हो रहा था मुझे पता नहीं। कुछ मिनट बाद जब मैं होश में आया तो पसीने से तरबतर था और काफी थका हुआ महूसस कर रहा था। मुझे बताया गया कि मेरे शरीर में मेरी मां की हन्त्या नाची थी। ऐसा क्यों हुआ इसका जवाब मैं भी आपको नहीं दे सकता। मैंने जो अनुभव किया था उसको मैंने आपको बता दिया है। ''
     अब ये दो​ किस्से आपके सामने हैं। क्या आपके पास कोई जवाब है कि क्या वास्तव में हन्त्या जैसा कुछ होता है या यह भी महज भ्रम है जिसकी सचाई और वास्तविकता से असल में जागरी भी अनभिज्ञ हैं? नीचे टिप्पणी वाले कालम में अपने अनुभव या जवाब जरूर प्रेषित करें। आपका धर्मेन्द्र पंत

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