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गुरुवार, 18 जून 2015

महाभारत से संबंध रखता है भारत का आखिरी गांव


माणा को आखिरी गांव इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके बाद चीन सीमा तक कोई रिहायशी इलाका नहीं है।

       भारत के आखिरी गांव 'माणा' के बारे में बचपन से सुनता आया हूं। उसकी एक काल्पनिक तस्वीर भी मन में बना ली थी लेकिन इस बार उस गांव को देखने और समझने का मौका मिल ही गया जिसका सीधा संबंध महाभारत से जोड़ा जाता है। 'भारत का आखिरी गांव' से ऐसा आभास होता है जैसे कि इस गांव के तुरंत बाद ही पड़ोसी देश यानि चीन की सीमा लग जाएगी लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। माणा से चीन या तिब्बत की सीमा लगभग 43 किमी दूर है लेकिन यह भी सचाई है कि यह भारत का इस क्षेत्र में आखिरी गांव है। इसके बाद चीन की सीमा तक कोई भी रिहायशी इलाका नहीं है, क्योंकि आगे पहाड़ बेहद दुर्गम हैं जहां के बारे में कहा जाता है कि केवल कुछ साधुओं को ही यहां धुनी रमाये हुए देखा गया।
         माणा गांव राष्ट्रीय राजमार्ग 58 पर हिन्दुओं के तीर्थस्थल बद्रीनाथ से केवल तीन किलोमीटर की दूरी और 3118 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।  बद्रीनाथ की यात्रा पर जाने वाले जिस भी तीर्थ यात्री को माणा का महत्व पता है वह इस गांव में जरूर जाता है। ऐसे में यह पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण स्थान बन गया है। बद्रीनाथ की तरह माणा भी छह महीने तक बर्फ से ढका रहता है। यह कह सकते हैं कि अक्तूबर . नवंबर से मार्च तक माणा गांव जनशून्य हो जाता है और यहां केवल सेना के जवान ही दिखायी देते हैं। इस दौरान माणा गांव के लोग पांडुकेश्वर, जोशीमठ, चमोली और गोपेश्वर आदि को अपना ठिकाना बना लेते हैं। अप्रैल से लेकर सितंबर तक हालांकि यहां अच्छी चहल पहल रहती है। विशेषकर मई और जून माणा गांव जाने के लिये आदर्श समय है क्योंकि बरसात में बद्रीनाथ मार्ग के टूटने या भूस्खलन के कारण उसके बंद होने की संभावना बनी रहती है।  मैंने एक स्थानीय निवासी से पूछा कि छह महीने माणा और छह महीने अन्य स्थानों पर बिताने से बच्चों की पढ़ाई पर असर नहीं पड़ता तो उनका जवाब था, 'बच्चे छह महीने यहां और छह महीने पांडुकेश्वर में पढ़ते हैं। ऐसा वर्षों से चला आ रहा है।' पांडुकेश्वर जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच में पड़ता है। 

गांव के मकान और रास्ते में दुकान सजाकर ऊनी वस्त्र बेचती महिलाएं
        माणा में मर्छिया या भोटिया जनजाति के लोग रहते हैं जो मंगोल प्रजाति से संबंध रखते हैं। गर्म कपड़े तैयार करना, तुलसी से बनी स्थानीय चाय और दाल में पड़ने वाला खासा मसाला 'फरण' बेचना इन लोगों का मुख्य व्यवसाय है। माणा गांव में प्रवेश करते ही आपको बुनाई करती हुई महिलाएं दिख जाएंगी। वे स्वेटर, टोपी, मफलर, स्कार्फ, कारपेट, आसन, पाखी, पंखी, पट्टू आदि बड़ी कुशलता से बना लेती हैं। इन कपड़ों और अन्य सामान को बेचने के काम में भी महिलाओं की भूमिका अहम होती है। गर्मियों में यहां आलू की खेती भी की जाती है। पहले यहां के लोग तिब्बत के साथ व्यापार भी करते थे। यहां के घर भी पहाड़ों के अन्य गांवों के घरों की तरह मिट्टी, पत्थरों और टिन के बने हुए हैं। छोटे से घर जिनमें छह महीने ताला लगा रहता है। अब कुछ 'लेंटर वाले मकान' भी बनने लग गये हैं। इस तरह के यहां लगभग 150 घर होंगे। इनमें से प्रत्येक घर में अमूमन दो कमरे होते हैं जिनमें जरूरत पड़ने पर पर्यटकों को भी ठहराया जाता है। इन कमरों का एक दिन का किराया 500 से 1000 रूपये तक है। माणा गांव की कुल जनसंख्या लगभग 600 है। यहां के लोग तोल्छा भाषा बोलते हैं जो गढ़वाली के बहुत करीब है। इसलिए यह आसानी से समझ में आ जाती है। मुझे इससे आत्मीयता का अहसास भी हुआ, क्योंकि किसी मोड़ पर कोई न कोई यह जरूर पूछ लेता कि 'आप कौन से गांव के हो।

माणा और महाभारत 

कहा जाता है कि इसी गुफा में महाभारत की रचना की थी व्यास ने

    माणा महाभारत काल का गांव है। इसलिए कहा जा सकता है कि यह उत्तराखंड के सबसे प्राचीन गांवों में से एक है। कहा जाता है कि वेदव्यास ने माणा गांव में ही महाभारत की रचना की थी और पांडव स्वर्गारोहिणी इसी गांव से होकर गये थे। इन दोनों घटनाओं के कुछ चिन्ह अब भी यहां विद्यमान हैं। माणा गांव में व्यास गुफा और गणेश गुफा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार व्यास ने इसी गुफा में महाभारत का सृजन किया था। व्यास के आग्रह पर भगवान ब्रह्मा ने गणेश जी को महाभारत लिखने का काम सौंपा था। कहा जाता है कि तब गणेश ने व्यास के सामने शर्त रखी थी कि उन्हें बीच में रूकना नहीं होगा और लगातार बोलते रहना होगा। व्यास ने भी गणेश से कहा कि वह जो भी कहेंगे उसका अर्थ समझने के बाद ही उन्हें उसे लिखना होगा। इससे व्यास को समय मिल जाता था। यह भी कहा जाता है कि लगातार लिखते रहने से गणेश की कलम टूट गयी थी और उन्होंने तब अपनी सूंड का उपयोग कलम के रूप में किया था। व्यास गुफा लगभग सात वर्ग फीट की होगी जहां पर व्यास ने कई महीने बिताये थे। इससे थोड़ी दूर नीचे गणेश गुफा है जहां पर गणेश जी ने बैठकर महाभारत लिखी थी। माना जाता है कि ये गुफाएं 5000 से भी अधिक साल पुरानी हैं।
        माणा गांव से थोड़ी दूर पर सरस्वती नदी है। इस नदी पर पत्थर से बना पुल है। इसे भीमपुल कहते हैं। इसके बारे में कहा जाता है कि जब पांडव स्वर्गारोहिणी के लिये आगे बढ़ रहे थे तो द्रौपदी सरस्वती नदी को पार नहीं कर पायी। पांडवों ने इसके बाद सरस्वती से रास्ता देने का आग्रह किया लेकिन सरस्वती नहीं मानी। पांडवों में सबसे बलशाली भीम ने तब दो बड़े पत्थर लुढकाकर पुल बना दिया। भीम ने तब अपनी गदा जोर से सरस्वती नदी पर मारी थी जिससे यह विलुप्त हो गयी। यह नदी थोड़ा आगे बढ़कर अलकनंदा में मिलती है लेकिन ऐसा आभास होता है जैसे कि यह विलुप्त हो रही हो। इसके वि​लुप्त होने के पीछे एक और कहानी भी है। गणेश जब महाभारत लिख रहे थे तो सरस्वती बड़ा शोर करते हुए बह रही थी। गणेश ने उससे शोर कम करने को कहा लेकिन सरस्वती नहीं मानी। इससे क्रोधित होकर गणेश ने सरस्वती को विलुप्त होने का श्राप दे दिया था। इस तरह से यह नदी अपने उदगम से कुछ मीटर बहने के बाद ही विलुप्त हो जाती है लेकिन आज भी भीमपुल के पास वह पूरी गर्जना के साथ बहती है। कहा जाता है कि यह नदी आगे जाकर प्रयाग में गंगा और यमुना से मिलती है लेकिन वहां पर भी यह दिखती नहीं है। भीमपुल में संभलकर चलें तो बेहतर है क्योंकि इस पुल से नीचे गिरने का मतलब जान से हाथ धोना है। यहां पर अब भी सुरक्षा के पर्याप्त उपाय नहीं किये गये हैं। 

उदगम स्थल से कुछ दूरी पर जाकर विलुप्त भी हो जाती है सरस्वती नदी
      रस्वती नदी के तट पर ही सरस्वती का मंदिर और दो दुकाने हैं। इन पर लगे बोर्ड पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा भी गया है, 'हिन्दुस्तान की अंतिम दुकान'। यहां से आप सरस्वती नदी का पानी भी अपने साथ लेकर जा सकते हैं। नदी के दूसरे छोर यानि माणा गांव वाले छोर पर 'बर्फानी बाबा' भी बैठते हैं। पूरी तरह से राख से सने बाबा की फोटो लेने में पहले मुझे हिचकिचाहट हुई लेकिन बाद में उन्होंने छोटे बेटे प्रदुल को न सिर्फ आशीर्वाद दिया बल्कि उसके साथ फोटो भी खिंचवाई।
    पांडव स्वर्गारोहण के लिये जब सरस्वती नदी से आगे बढ़े तो उन्होंने एक एक करके देहत्याग करनी शुरू कर दी थी। सबसे पहले द्रौपदी ने देह त्याग की थी। केवल युद्धिष्ठर और उनके साथ एक कुत्ता ही सशरीर स्वर्ग गये थे। यह कुत्ता कोई और नहीं बल्कि धर्म था। पांडव शरीर छोड़ने से पहले जिस आखिरी स्थल पर रूके थे वह वसुधारा है। माणा से लगभग छह किमी दूर इस जगह पर पांडवों ने स्नान किया था। कहा जाता है कि जिसने पाप किये हों उस पर इसका पानी नहीं पड़ता है। यहां पर विष्णु गंगा या अलकनंदा 122 मीटर की ऊंचाई से नीचे गिरती है। बसुधारा का पानी भी गंगाजल की तरह लोग अपने घरों में रखते हैं। माणा से लगभग 18 किमी की दूरी पर सतोपंथ ताल भी है। कहा जाता है कि यहां किसी पवित्र दिन पर ​ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्नान करते हैं। यहां से नीलकंठ पर्वत भी देखा जा सकता है। बसुधारा और सतोपंथ ताल के बीच लक्ष्मीवन पड़ता है जिसने धानो ग्लेसियर के नाम से भी जाना जाता है।

माणा के अन्य आकर्षण : भारत की आखिरी दुकान और बाबा बर्फानी का आशीर्वाद

कैसे और कब जाएं माणा

    द्रीनाथ और माणा गांव का रास्ता एक ही है। कोटद्वार से सतपुली और पौड़ी होते हुए श्रीनगर या फिर हरिद्वार, रिषिकेश या देहरादून से देवप्रयाग होते हुए श्रीनगर पहुंचकर आगे का रास्ता तय होता है। श्रीनगर से आगे रूदप्रयाग, गौचर, कर्णप्रयाग, चमोली, पीपलकोटी और जोशीमठ रास्ते में पड़ते हैं। जोशीमठ से माणा गांव लगभग 46 किमी की दूरी पर है। अप्रैल से सितंबर के महीनों में ही माणा जाया जा सकता है। माणा गांव जाने के लिये बद्रीनाथ में रूकना बेहतर होता है जहां ठहरने और खाने पीने की अच्छी व्यवस्था है। 
(Photo by .. Dharmendra and Pranjal Pant)
                               
                                                                                                          धर्मेन्द्र पंत

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शनिवार, 10 जनवरी 2015

मालवा का राजकुमार बना गढ़वाल का राजा कनकपाल

                                              धर्मेन्द्र मोहन पंत 
           ढ़वाल में सबसे लंबे समय तक पंवार वंश के राजाओं ने राज किया। इस राजघराने के पहले राजा कनकपाल थे लेकिन उन्होंने कब से कब तक राज किया। इसको लेकर इतिहास की तमाम किताबों में अलग अलग राय है। अंग्रेज इतिहासकार बैकेट ने गढ़वाल के राजाओं की जो सूची तैयार की उसके अनुसार कनकपाल सन 1159 में परगना चांदपुर आये थे। यह परगना उन्हें गढ़वाल के तत्कालीन राजा ने दहेज में दिया था। डा. पातिराम पंवार के अनुसार कनकपाल सन 688 यानि संवत 745 में मालवा से गढवाल आये थे। गढ़वाल के इतिहास पर गहन अध्ययन करने वाले भक्त दर्शन ने इसे ईस्वी सन 888 यानि संवत 945 माना है। पंडित हरिकृष्णा रतूड़ी ने अपनी दो किताबों में विरोधाभासी तिथियों का वर्णन किया है। अपनी किताब 'गढ़वाल दर्शन' में उन्होंने लिखा है कि कनकपाल 688 ईस्वी सन में गढ़वाल आये थे जबकि 'गढ़वाल का इ​तिहास में उन्होंने इसे 888 ईस्वी सन बताया है।  भक्त दर्शन का शोध अधिक विश्वसनीय माना जा सकता है क्योंकि उन्होंने अपनी किताब में पंवार वंश के 37वें राजा से लेकर सभी राजाओं के बारे में ​अच्छी जानकारी जुटायी थी।

अधिकतर का मत यही है कि राजा कनकपाल ने ईस्वी सन 888 यानि
संवत 945 से गढ़वाल पर राज किया था। 

               कुछ इतिहासकार पंवार वंश का सीधा संबंध पांडवों से जोड़ते हैं। कहा जाता है कि परीक्षित की चौदहवीं पीढ़ी के क्षेमराज दिल्ली के राजा बने लेकिन उनके मंत्री विसर्प ने राजा को मरवाकर खुद सिंहासन हासिल कर लिया था। राजा क्षेमराज की पत्नी तब गर्भवती थी। वह अपनी विश्वासपात्र दासी के साथ रात को महल से भाग गयी थी और कई कष्ट सहते हुए बद्रीकाश्रम पहुंचकर ऋषियों के शरण में आ गयी। रानी ने वहां एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम राजपाल रखा गया गया। तब उस क्षेत्र में कोई राजा नहीं था और ऋषियों ने राजपाल को शस्त्र और शास्त्र विद्या में निपुण बनाकर उसे क्षेत्र का राजा बना दिया। कहा जाता है कि राजपाल ने तब बद्रीनाथ की यात्रा पर आये किसी विक्रमसिंह नाम के राजा की मदद से कुमांऊ के राजा सुखवंत को परास्त किया था। राजपाल का पुत्र अनंगपाल था जिसकी केवल एक पुत्री थी। अनंगपाल ने अपनी बेटी के पुत्र पृथ्वीराज को अपना उत्तराधिकारी बनाया। इन्हीं पृथ्वीराज की पीढ़ी में भानुप्रताप हुआ था जो 52 गढों के राजाओं में सबसे शक्तिशाली था। बद्रीनाथ का राजा होने के कारण सभी उन्हें धार्मिक दृष्टि से भी ऊंचा मानते थे। भानुप्रताप की भी दो पुत्रियां थी जिनमें से बड़ी बेटी का विवाह उन्होंने कुमाऊं के राजा से किया जबकि दूसरी पुत्री की शादी राजा कनकपाल से की थी।
       राजा कनकपाल के गढ़वाल आगमन की कहानी भी रोचक है। वह मालवा के राजकुमार थे। उस समय उज्जैन और धार क्षेत्र में पंवार वंश का राज्य था। ब्रिटिश इतिहासकार हार्डविक के अनुसार कनकपाल वर्तमान गुजरात क्षेत्र से गढ़वाल आया था। उसका नाम तब भोगदंत था और वह  चांदपुर के राजा सोन पाल की सेना में भर्ती हुआ और बाद में सेनापति बन गया। राजा ने अपनी कन्या का विवाह उससे किया। भोगदंत बेहद वीर और साहसी था। उसने बाद में राजा को गद्दी से उतारा और स्वयं कनकपाल नाम से राजा बन गया था। एक और अंग्रेज इतिहासकार जीआरसी विलियम के अनुसार कनकपाल गुजरात से नहीं बल्कि मालवा से आया था और वह गढ़वाल पहुंचने से पहले सहारनपुर में बसा था। एक और किस्से के अनुसार कनकपाल धार के राजा वाकपति का छोटा भाई था लेकिन एक ब्रहमचारी साधु से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उसके मन में वैराग्य आ गया। जब उसके गुरू का निधन हो गया तो वह अपने कुछ मित्रों के साथ हरिद्वार पहुंचा। वह बद्रीनाथ धाम भी जाना चाहता था लेकिन पहाड़ों के कठिन रास्तों के कारण मित्रों ने उसे रोक दिया।
           एक पौराणिक ग्रंथ के अनुसार राजा भानुप्रताप को तब भगवान बद्रीनाथ ने सपने में कहा कि  वह धार नरेश को अपने यहां बुलायें और उनके साथ अपनी बेटी का विवाह कर दें। राजा भानुप्रताप ने ऐसा ही किया लेकिन कनकपाल तो वैरागी था। कहा जाता है कि जब कनकपाल ने राजकुमारी को देखा तो उन्हें देखते ही रह गया और उनके रूप लावण्य पर इतने मोहित हो गया कि उसने विवाह के लिये हां कर दी। भानुप्रताप जब वृ​द्ध हो गये तो वह अपने दामाद को राजपाट सौंपकर अपनी पत्नी सहित वानप्रस्थ पर चले गये थे। इस तरह से गढ़वाल में पंवार वंश की नींव पड़ी थी।
      किस्से और कहानियां भले ही अलग अलग हों लेकिन सभी एक बात से सहमत दिखते हैं और वह यह कि पंवार वंश का पहला राजा कनकपाल था। इसके अलावा इस पर भी सहमति दिखती है कि वह मालवा क्षेत्र से आया था जो कि वर्तमान समय के राज्यों मध्यप्रदेश के पश्चिम, गुजरात के पूर्व और राजस्थान के दक्षिण के हिस्से को मिलकर बनता है।
       गढ़वाल में पंवार वंश की शुरूआत का यह संक्षिप्त विवरण है। इससे इतर भी किस्से और कहानियां हो सकती है। यदि आपको इससे जुड़ा कोई भी पौराणिक तथ्य, किस्सा या कहानी पता हो तो कृपया जरूर शेयर करें।

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