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मंगलवार, 26 मार्च 2019

बिन्देश्वर या बिनसर महादेव : कभी पांडवों ने की थी यहां पूजा

     उत्तराखंड देवभूमि है। यह असल में मंदिरों का गढ़ है जिसमें प्रत्येक मंदिर का अपना विशेष महत्व है। उत्तराखंड में ही केदार क्षेत्र में पांच शैव पीठ आते हैं — ताड़केश्वर महादेव, एकेश्वर महादेव, बिन्देश्वर महादेव, क्यूंकालेश्वर महादेव और किल्किलेश्वर महादेव। हम एकेश्वर महादेव और ताड़केश्वर महादेव की पहले चर्चा कर चुके हैं। आज बात करते हैं बिंदेश्वर महादेव की। इन पांचों शैव पीठ पर घसेरी के यूट्यूब चैनल पर वीडियो प्रेषित किया गया है जो लोगों को काफी पसंद आ रहा है।  
        बिनसर महादेव मंदिर पौड़ी गढ़वाल जिले के ही थलीसैण ब्लॉक की चौथाण पट्टी में स्थित है। यह थलीसैण से लगभग 22 किमी और जिला मुख्यालय पौड़ी से लगभग 114 किमी और कोटद्वार से लगभग 175 किमी दूर है। यह दूधातोली डांडा में स्थित यह मंदिर बांज, देवदार आदि के वृक्षों से घिरा है जिससे इसकी प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। बिनसर को भगवान शिव और माता पार्वती की पावन स्थली माना जाता है।
       गढ़वाली में बिनसर का मतलब सुबह की बेला होता है, लेकिन इसे बिन्देश्वर मंदिर भी कहते हैं। माना जाता है कि राजा पृथ्वी जिसे स्थानीय भाषा में राजा पिरथु कहते हैं, ने अपने पिता बिंदु की याद में बिनसर मंदिर का निर्माण करवाया था। इसी कारण इसे बिंदेश्वर महादेव कहा जाता है। मंदिर के निर्माण को लेकर हालांकि एकमत नहीं है। 
         कुछ पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय इस जंगल में बिताया था और तब उन्होंने यहां पर भैरवनाथ के मंदिर का निर्माण किया था। कहा जाता है कि केवल एक रात में उन्होंने मंदिर का निर्माण किया और पूजा अर्चना के बाद अज्ञातवास पर निकल गये थे। मंदिर के गर्भगृह में गणेश, हरगौरी और महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा भी स्थापित है। महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा पर नागरी लिपि अंकित है जिससे पता चलता है कि यह प्रतिमा नौवीं शताब्दी या उससे पहले स्थापित की गयी थी।
       बिनसर महादेव 2480 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर बैंकुंठ चर्तुदशी के अवसर पर मेला लगता है। गढ़वाल और कुमांऊ की सीमा के पास में स्थित होने के कारण मेले में दोनों मंडलों विशेषकर पौड़ी, अल्मोड़ा, चमोली और रूद्रप्रयाग जिलों के लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। यहां पर भी इस अवसर पर संतान प्राप्ति के लिये खड़रात्रि की जाती है। बोलो जय बिनसर महादेव। .... आपका धर्मेन्द्र पंत 

सोमवार, 29 मई 2017

अखबार में आया रोल नंबर और मैं पास हो गया

         मां . पिताजी दोनों ​के मन में थोड़ा डर, थोड़ी चिंता भर गयी थी। डर और चिंता में भगवान ज्यादा याद आते हैं और इसलिए उन्होंने भी 'सत्यनारायण व्रत कथा' करवाने की मन्नत कर ली। असल में परिस्थितियां कुछ ऐसी ही बन गयी थी। मैं तब 15 साल का था जब मैंने उत्तर प्रदेश बोर्ड के तहत हाईस्कूल की परीक्षा दी थी। वर्ष था 1985 और उस साल परीक्षा में नकल रोकने के लिये परीक्षा केंद्र बदल दिये गये थे। मैं राजकीय इंटर कालेज नौगांवखाल में पढ़ता था लेकिन मेरा परीक्षा केंद्र राजकीय इंटर कालेज एकेश्वर था। मेरे गांव स्योली से लगभग दस किमी दूर। गांव के सामने लगभग तीन . चार किमी की चढ़ाई और फिर जंगल के रास्ते से गुजरकर पहुंचना पड़ता था एकेश्वर। परीक्षा सुबह सात बजे शुरू होती थी लेकिन मुझे एकेश्वर पहुंचने के लिये चार बजे उठना पड़ता था। गांव के कुछ और बच्चे भी परीक्षा दे रहे थे और पिताजी हमें आधे रास्ते तक छोड़ने के लिये आते थे। वह तब मुझे हर दिन एक रूपया दिया करते थे, जिन्हें मैंने खर्च नहीं किया। कुल 13 पेपर दिये थे और इस तरह से मेरे पास 13 रुपये जमा हो गये थे। 
        एकेश्वर में पढ़ने वाले बच्चों का परीक्षा केंद्र नौगांवखाल था। पहले दिन के पेपर में किसी तरह की सख्ती नहीं थी, लेकिन शाम को जब 12वीं की परीक्षा के दौरान नौगांवखाल में एकेश्वर के दो लड़कों का Rustication (रस्टकेशन हिन्दी में कहें तो निष्कासन मतलब जिसका रस्टकेशन हो गया उसके लिये आगे की परीक्षा बेमतलब हो  जाती है) कर दिया गया। एकेश्वर में खबर पहुंची और फिर वहां बदले की आग झुलसने लगी। कुछ बच्चों को दो परीक्षा केंद्रों के बीच चली आपसी जंग का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। नकल करते हुए पकड़े जाने पर उनका रस्टकेशन कर दिया गया। जो नकल के भरोसे थे वे भी 'बेचारे' बन गये। हमारे साथ भी दूसरे पेपर से कड़ी सख्ती बरती गयी। मार्च के महीने में सुबह काफी ठंड पड़ती थी लेकिन परीक्षा केंद्र पर हमारे जूते, मोजे, दस्ताने तक निकलवा दिये जाते थे। मुझे याद है कि तब जिला शिक्षा अधिकारी एक बेहद सख्त मिजाज की महिला थी जो नकल करने पर तुरंत रस्टकेशन करती थी। उनके 'फ्लाइंग स्क्वाड' में भी आठ . दस कड़क और परीक्षार्थियों की नजर में 'निर्मम' व्यक्ति शामिल थे। नकल के खिलाफ बना यह माहौल दिल में खौफ भी पैदा कर रहा था। गणित के पेपर में मुझे भी आशंका थी। मां . पिताजी को भी अपनी इस आशंका से अवगत करा दिया था और यही उनके डर व चिंता की मुख्य वजह थी। 


     जिस दिन परीक्षा परिणाम आना था। सभी के चेहरों पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती थी। ​तब परिणाम स्थानीय समाचार पत्र अमर उजाला में प्रकाशित होता था। उसमें रोल नंबर के आगे प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी और तृतीय श्रेणी यानि F, S और T लिखा रहता था।  जिसका नंबर आ गया वह उत्तीर्ण जिसका नहीं आया वह अनुत्तीर्ण। जिस समाचार पत्र में परीक्षा परिणाम छपा रहता था उसके लिये मारामारी रहती थी। मुझे याद है कि नौगांवखाल का एक व्यक्ति पहले दिन शाम को ही कोटद्वार में डेरा जमा लेता था। वहां अखबार हाथ में आते ही वह उसे लेकर जल्द से जल्द नौगांवखाल पहुंच जाता और फिर उसके पास परीक्षा परिणाम देखने वालों की लाइन लग जाती। जो विद्यार्थी उत्तीर्ण हो जाता उससे पांच से दस रूपये लेता और अनुत्तीर्ण होने वाले को टेढ़ी नजर से देखता। आखिर उसने अनुत्तीर्ण होकर उसके पांच रूपये का नुकसान करा दिया था। बाद के वर्षों में परीक्षा परिणाम देखने से पहले ही 10 से 20 रुपये लिये जाने लगे थे।  
      पिताजी मेरा परीक्षा परिणाम देखने गये थे और मैं जंगल में गोरू (गाय बछड़े यानि डंगर) चराने चला गया था। मन में धुकधुकी लगी हुई थी। गांव का एक चचेरा भाई, जो मुझसे उम्र में बड़ा था, अपने गोरू मेरे पास छोड़कर नौगांवखाल निकल गया। उन्होंने कहा था कि अगर मैं पास हो गया तो वह जल्द से जल्द यह खबर मुझे देगा। मुझे याद है कि वह मुझे देखकर चिल्लाया था, 'धर्मेंद्र तू पास हो गया, सेकेंड डिवीजन है तेरी।' सच या झूठ। कई विचार एक साथ मन में कौंधे और फिर लगा कि पांव अब जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं। गांव से केवल मैं ही पास हुआ था, बाकी सारे फेल। हमारी स्कूल से दसवीं की परीक्षा में शामिल लगभग 120 विद्यार्थियों में से केवल 18 पास हुए थे और उनमें मैं भी शामिल था। फिर भी थोड़ी धुकधुकी बनी रही क्योंकि किसी ने बताया कि प्रूफ की गलती से भी नंबर में गड़बड़ी हो सकती थी। इसलिए अगला एक सप्ताह इसी दुआ में बीता कि हे भगवान अखबार में जो कुछ छपा है वह सच निकले और जब मार्कशीट यानि अंक प्रमाणपत्र आया तो सब कुछ सच निकला। गणित में दो नंबर के ग्रेस मार्क्स से मैं द्वितीय श्रेणी में दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर ​गया था। मां ​. पिताजी खुश थे और उन्होंने बाकायदा सत्यनारायण की कथा करवायी।


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         सवीं की परीक्षा में मेरे 47 प्रतिशत अंक आये थे। बारहवीं में 51 प्रतिशत और फिर बीए में 58.5 प्रतिशत अंक लाकर मैं कालेज में अव्वल आया था। मैंने 1995 में प्राइवेट छात्र के तौर पर राजनीति शास्त्र से एमए किया। कुल 63 प्रतिशत अंक थे लेकिन मैं विश्वविद्यालय में प्रथम आया था। तब की भाषा में कहूं तो गोल्ड मेडलिस्ट, जो मुझे कभी नहीं मिला। हां विश्वविद्यालय में प्रथम का एक प्रमाणपत्र हेमवतीनंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय ने जरूर थमा दिया था। इस बीच पत्रकारिता की डिग्री भी प्रथम श्रेणी (65%) में ली थी। हमारे जमाने में अगर 10वीं या 12वीं की परीक्षा में किसी के 60 प्रतिशत अंक आते थे तो उसे जीनियस समझा जाता था। उसकी इज्जत बढ़ जाती थी लेकिन आज की स्थिति बदल गयी है। आलम यह है कि 95 प्रतिशत वाला भी पक्के तौर पर नहीं कह सकता है कि उसे दिल्ली विश्वविद्यालय में मनपसंद विषय में मनपसंद कालेज में एडमिशन मिल जाएगा। हमारे समय में निरीक्षक भी बड़े कंजूस हुआ करते थे, पता नहीं किन किन कारणों से अंक काट देते थे लेकिन अब राजनीति शास्त्र, हिन्दी या अंग्रेजी में भी 100 में से 100 नंबर आ रहे हैं। अपने जमाने में तो केवल गणित में यह संभव था। अंकों की इस होड़ में परीक्षार्थियों पर भी दबाव बढ़ रहा है। इससे रट्टामार पद्वति को भी प्रश्रय मिल रहा है। कुल मिलाकर हमारा जमाना ही सही था। दबाव हम पर भी रहता था तभी तो मैंने दसवीं की परीक्षा में बचाये गये 13 रूपयों को खाने पर खर्च नहीं किया था क्योंकि मैं भी उस दिन का इंतजार कर रहा था जब मेरी परीक्षाएं समाप्त हों और मैं बचाये गये पैसों से अपनी मनपसंद पत्रिका 'क्रिकेट सम्राट' खरीदकर रिलैक्स होकर उसे पढूं। क्रिकेट सम्राट के तीन अंकों के लिये मेरे पास पैसा था और अगले तीन महीने तक मैंने ऐसा किया भी। 
       और हां मेरा सभी माता पिताओं से आग्रह है कि वे अपने बच्चों पर अंकों के इस बोझ का दबाव नहीं बनायें। उन्हें अनुशासन में रखें लेकिन अपनी जिंदगी स्वतंत्र और सहज होकर जीने दें। मेरा बेटा जब परीक्षा के तनाव में था तो मैंने उसे समझाया कि ''हमारी जिंदगी में परीक्षा का उतना ही महत्व है जितना एक बड़े से कमरे रखे गये छोटे से फूलदान का। फूल खिल रहे हैं तो अच्छा लगेगा लेकिन अगर फूलदान टूट भी गया तो ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। बस बिखरे टुकड़ों को समेटकर उन्हें भूतकाल के हवाले करना है। जल्द ही नया फूलदान उसकी जगह ले लेगा। जिंदगी परीक्षा से कई ज्यादा महत्वपूर्ण है।'' इसलिए जिनके बच्चों के नंबर कम आये हैं उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है। स्वेट मार्टेन ने कहा था कि 'प्रत्येक व्यक्ति के अंदर विशिष्ट प्रतिभा छिपी होती है, बस जरूरत है उसे पहचानने की। जिसने उसे पहचान लिया उसने जग जीत लिया।'' आप भी अपने बच्चों के अंदर छिपी प्रतिभा को पहचानने में उनकी मदद करिये। मैं भी प्रयास कर रहा हूं। 
आपका धर्मेंद्र पंत 



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शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

शैव पीठ एकेश्वर में 'खड़रात्रि' से पड़ी थी कौथीग की नींव

जय एकेश्वर महादेव : स्थानीय लोगों की प्रयासों से मंदिर को नया स्वरूप मिला है। फोटो सौजन्य ... रविकांत 

     बैसाख, यानि भारतीय काल गणना के अनुसार वर्ष का दूसरा महीना। भारतीय काल गणना के सभी 12 महीनों में बैसाख को सबसे पवित्र माना जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार नारद ने राजा अम्बरीष से कहा कि ब्रह्माजी ने बैसाख मास को सभी महीनों में उत्तम बताया है। कहते हैं कि यह भगवान विष्णु का भी प्रिय मास है। इसका संबंध देव अवतारों और धार्मिक परंपराओं से है। बैसाख में ही विभिन्न देव मंदिरों के पट खुलते हैं और विभिन्न स्थलों पर विशेष महोत्सवों का आयोजन किया जाता है। उत्तराखंड में बैसाख के महीने ऐसे कई महोत्सवों या मेलों का आयोजन किया जाता है जिन्हें स्थानीय भाषा में थौळ या कौथीग कहा जाता है। गढ़वाल मंडल में बैसाख के महीने में कई स्थानों पर अलग अलग तिथियों को इस तरह के कौथीग का आयोजन होता है। ऐसा ही एक मेला है 'इगासर कौथीग' या एकेश्वर का मेला। आज 'घसेरी' आपका परिचय एकेश्वर से कराएगी। आज इगासर का कौथीग है तो इस पावन दिन पर मेरे साथ कौथीग का आनंद लीजिए। 
      इगासर कौथीग हर साल दो गते बैसाख को होता है। इसका अपना धार्मिक महत्व है। एकेश्वर में शैव पीठ है और यहां पर भगवान शिव का मंदिर है। माना जाता है कि शैवपीठ के कारण ही इस जगह का नाम एकेश्वर पड़ा। केदार क्षेत्र के अंतर्गत पांच शैव पीठ आते हैं और इनमें एकेश्वर भी शामिल है। अन्य शैव पीठ ताड़केश्वर महादेव, बिन्देश्वर महादेव, क्यूंकालेश्वर महादेव और किल्किलेश्वर महादेव हैं। एकेश्वर के शिव मंदिर में वर्षों पहले से पति पत्नी संतान की प्राप्ति के लिये 'खड़रात्रि' करते रहे हैं। उत्तराखंड के कई मंदिरों में खड़रात्रि की जाती है। खड़रात्रि में संतान प्राप्ति के लिये महिलाएं अपने पति के साथ रात भर हाथ में दीपक जलाकर खड़ी रहती हैं और इस बीच भगवान शिव की स्तुति करती हैं। एकेश्वर महादेव में हर साल बैसाख दो गते को खड़रात्रि होती है। इस दिन यहां श्रद्धालु पूजा अर्चना के लिये आते हैं। धीरे धीरे इसने मेले का रूप ले लिया है और फिर बैशाख दो गते को एकेश्वर में मेला लगने लगा। एकेश्वर को गढ़वाली भाषा में इगासर कहते हैं और इसलिए इस मेले को 'इगासर कु कौथीग' कहा जाता है। चौंदकोट ही नहीं पौड़ी गढ़वाल में इस मेले से कौथीग की शुरूआत होती है। कौथीग के दिन लोग खेतों में उगाये गये पहले अनाज को भी भगवान शिव का अर्पण करते हैं। शिवरात्रि के दिन भी यहां शिवलिंग में दूध, गंगाजल और बेलपत्री चढ़ाने के लिये भक्तों की भीड़ लगी रहती है।भक्तजन समय समय पर एकेश्वर महादेव में भंडारे का आयोजन भी करते हैं। 

एकेश्वर महादेव मंदिर के पास स्थि​त वैष्णवी दरबार में लेखक परिवार के साथ। 
     एकेश्वर का आज से नहीं बल्कि हजारों वर्षों से धार्मिक महत्व रहा है। कुछ पौराणिक संदर्भों में कहा गया है कि यहां पर पांडवों ने भगवान शिव की तपस्या की थी। जहां तक मंदिर का सवाल है तो कहा जाता है कि उसकी स्थापना संवत 810 के आसपास आदि गुरू शंकराचार्य ने की थी। यहां कई प्राचीन मूर्तियां हैं जिससे लगता है कि इस मंदिर की स्थापना सैकड़ों वर्ष पहले की गयी थी। मंदिर का कई बार पुननिर्माण हुआ। पिछले कुछ वर्षों में स्थानीय लोगों की मदद से इसे नया और भव्य रूप दिया गया इसलिए अब यह वर्तमान समय के मंदिरों जैसा ही लगता है। एकेश्वर के मुख्य मंदिर के अलावा यहां पर मां वैष्णवी दरबार, वैष्णवी देवी गुफा और भैरव मंदिर भी है। कहा जाता है कि भैरव मंदिर के अंदर से लेकर बद्रीनाथ मंदिर तक सुरंग थी जो कि वर्षों पहले बंद कर दी गयी।

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     एकेश्वर महादेव कई वर्ष पहले मोटर मार्ग से जुड़ गया था। कोटद्वार या पौड़ी के रास्ते यहां पहुंचा जा सकता है। सतपुली से एकेश्वर के लिये बस या टैक्सी नियमित रूप से जाती रहती हैं। पौड़ी के रास्ते सतपुली होते हुए या फिर ज्वाल्पा से जणदादेवी होते हुए पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा बौंसाल और ज्वाल्पा के बीच से भी दो नये मोटरमार्ग बन गये हैं जो एकेश्वर तक जाते हैं। एकेश्वर में पहुंचने पर सड़क से ही मंदिर का सीढ़ीनुमा रास्ता है। मंदिर के पास ही बांज और चीड़ का जंगल तथा शीतल जल का झरना है। 
     कौथीग मंदिर के ऊपर स्थित बाजार में लगता है। एक जमाने में यहां मंदिर तक पूरी सड़क पर दुकानें सजी होती थी। मेरा गांव स्योली है जो एकेश्वर से लगभग आठ दस किमी की दूरी पर स्थित है, लेकिन मैं केवल एक बार इगासर कौथीग गया था। उस समय वहां बहुत भीड़ होती थी और लोग बाजार के ऊपर स्थित जंगल में भी बैठे रहते थे। तरह तरह की दुकानें सजी रहती थी। सच कहूं तो उस समय कुछ उपद्रवी तत्वों से डर भी लगता था। घर वाले इगासर कौथीग जाने के लिये इसलिए मना करते थे क्योंकि वहां लगभग हर साल किन्हीं भी दो गुटों या गांवों के बीच झगड़ा हो जाता था। अब मुझे बताया गया है कि ऐसा नहीं है। कौथीग में ज्यादा भीड़ नहीं होती और दुकानें भी कम सजती हैं। एकेश्वर महादेव के दर्शन करने के लिये आसपास के गांवों के लोग जरूर जाते हैं। तो फिर देर किस बात की। आप भी जाइए न इगासर कौथीग। मुझे पूरा विश्वास है कि एकेश्वर महादेव के दर्शन करके आपको अच्छा लगेगा। तो बटोर लाइये एकेश्वर से कुछ यादें और मेरे साथ इस ब्लॉग पर शेयर करिये। मुझे इंतजार रहेगा। बोलिये जय एकेश्वर महादेव। आपका अपना धर्मेन्द्र पंत


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शनिवार, 4 जुलाई 2015

चलो भैजी कौथिग जौंला

     चपन में जब कौथिग की बात आती थी तो मेरे लिये इसका मतलब अपने गांव की कुलदेवी नंदादेवी, पास में स्थित जणदादेवी, माध्योसैण या फिर ईसागर यानि एकेश्वर के कौथिग तक सीमित था। असल में तब ये कौथिग हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा हुआ करते थे और हम इनका बेसब्री से इंतजार करते थे। पहनने को नये कपड़े मिलते थे और इन कौथिग यानि मेलों में सीटी, बांसुरी खरीदने से लेकर जलेबी खाने और बर्फ की आईसक्रीम चूसने का मौका मिल जाता था। कोई दूर का रिश्तेदार मिल जाता तो जेब में दस . बीस पैसे या ज्यादा हुआ तो चवन्नी, अठन्नी डालकर चला जाता तो उसके लिये मन में इज्जत बढ़ जाती थी। नंदादेवी और जणदादेवी कौथिग के लिये हम पांच . दस पैसे इकट्ठा करके रखते थे। जेब में यदि चार . पांच रूपये होते तो कौथिग का आनंद दुगुना हो जाता था। यह 70 और 80 के दशक का किस्सा है जब मैं गांव की संस्कृति और समाज में अपना बचपन बिता रहा था। कौथिग आज भी होते हैं लेकिन दुनिया का डिजिटलीकरण होने के बाद मुझे नहीं लगता कि पहाड़ का आज का बच्चा इन मेलों को लेकर उतना ही उत्साहित होगा जितना कभी मैं या मेरी पीढ़ी के लोग या मेरे से पहले के बच्चे हुआ करते थे। कभी इन कौथिगों में जनसैलाब उमड़ पड़ता था। मैंने देखा है जणदादेवी और एकेश्वर में तिल रखने की जगह तक नहीं बचती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। कौथिग के दिन एकेश्वर के डांडों में लोगों की भीड़ अब महज कल्पना है।
जणदादेवी कौथिग का विहंगम दृश्य। फोटो .. श्री दीनदयाल सुंद्रियाल
     चपन में एक गीत भी सुना था 'गौचरा को मेला लग्यूं च भारी, मेला म अयीं ह्वेली दीदी, भुली स्याली ....'।  गौचर का मेला एक व्यावसायिक मेला था जिसकी शुरूआत 1943 में हुई थी लेकिन देवभूमि उत्तराखंड में अधिकतर मेले किसी देवस्थल से संबंध रखते हैं। किसी भी देवी या देवता के मंदिर के पास किसी नियत तिथि को कौथिग लगता है। इस तरह से कौथिग में धार्मिक कार्यों के अलावा लोगों को अपने सगे संबंधियों से मिलने और वर्ष भर की अपनी खट्टी मीठी यादों को साझा करने का मौका मिलता था। कोई बेटी अपने मां पिताजी, भाई बहन और गांव वालों से मिलने के लिये इन कौथिगों का बेसब्री से इंतजार करती थी। इसलिए अक्सर कौथिगों में शा​म को विछोह का एक मार्मिक दृश्य भी पैदा हो जाता था। किसी भाग्यशाली बेटी को कौथिग के ​बहाने अपने मायके एक दो दिन बिताने के लिये मिल जाते थे। उसके चेहरे की खुशी यहां पर शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती है। इस तरह की खुशी और पीड़ा की कल्पना आज की 'मोबाइल पीढ़ी' नहीं कर सकती है।
    कौथिग किसी धार्मिक स्थल पर ही लगने का मतलब था कि जाते ही सबसे पहले देवी या देवता को भेंट चढ़ाना। एक पैसे से लेकर दस पैसे तक। कोई सवा रूपया भी रख लेता था। हमें यही कहा जाता था कि जब तक भेंट नहीं चढ़ायी तब तक कौथिग में कुछ खाना पीना नहीं। एक गलत परंपरा भी इन कौथिगों से जुड़ी थी और वह थी पशुबलि देने की। अमूमन बकरों की बलि दी जाती थी। यदि 'अठवाण' होती तो भैंसे की बलि भी दी जाती। मेरे लिये बचपन यह कौथिगों का नकारात्मक पहलू रहा। इधर बकरे का सिर धड़ से अलग होता और दूसरी तरफ लोगों में उसके रक्त का टीका लगाने की होड़ मच जाती। खुशी इस बात की है कि धीरे धीरे लोगों में जागरूकता आयी है और अब कई कौथिगों में बलि प्रथा लगभग समाप्त हो गयी है। कौथिगों में ढोल, दमाउ, हुड़का, डौंर, रणसिंघा आदि बजाये जाते हैं। ढोल की थाप पर यूं कहें कि कौथिगों में पांडव नृत्य या​नि पंडौं पर तो अच्छे खासों के पांव थिरकने लगते थे। कुछ लोगों के शरीर में देवी देवताओं का प्रवेश भी इन कौथिगों का एक हिस्सा रहा है।
   कभी उत्तराखंड के हर गांव में कौथिग होता था। अमूमन इनकी शुरूआत बैशाखी के दिन से होती थी और सितंबर अक्तूबर तक इन सीजन रहता था। अब इनकी संख्या घट गयी है। इसके बावजूद कई कौथिग आज भी उत्तराखंड की पहचान है। इनमें गौचर मेला, श्रीनगर का बैकुंठ चतुर्दशी मेला, उत्तरकाशी का माघ मेला, कोटद्वार के कण्वाश्रम में लगने वाला बसंत पंचमी मेला, अल्मोड़ा का नंदादेवी मेला, बागेश्वर का उत्तरायणी मेला, लोहाघाट का देवीधूरा मेला, टनकपुर का पूर्णागिरी या कालसन मेला, भीमताल में लगने वाला हरेला मेला, काठगोदाम के पास जियारानी का मेला, मुंडणेश्वर का मेला आदि प्रमुख हैं। अकेले पौड़ी गढ़वाल में ही 50 से अधिक बड़े कौथिग लगते हैं। इनमें मुंडणेश्वर, एकेश्वर, जणदादेवी, सल्ट महादेव, अदालीखाल, बिनसर, देवलगढ़, कौड़िया लैंसडाउन का ज्यूनि सेरा का मेला, ताड़केश्वर, संगलाकोटी, देवराजखाल, गिंदी कौथिग, बुंगी कौथिग, नैनीडांडा, रिखणीखाल, बेदीखाल, बीरौंखाल, घंडियाल, नयार घाटी का सत्यवान साबित्री मेला, दीवा मेला, कांडई कौथिग, दनगल (सतपुली), कांडा, थैलीसैण, बैंजरों, लंगूरगढ़ी, डांडा नागराज का कौथिग आदि प्रमुख हैं।
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