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रविवार, 3 अप्रैल 2016

मनमोहक ही नहीं औषधि भी है बुरांश

बसंत में पहाड़ों में बुरांश की निराली छटा बरबस ही आकर्षित कर देती है। 
     आज सुबह दीदी ने व्हाट्सएप पर फूलों से लद बुरांश के पेड़ की तस्वीर भेजी तो गांवों में बिताये दिनों की याद ताजा हो गयी। जब चौबट्टाखाल से स्नातक कर रहा था तो वहां से लगभग दस किमी दूर स्थित अपने गांव पैदल ही आता था। महाविद्यालय से निकलते ही भूख लगने लगती थी लेकिन बसंत ऋतु में चिंता नहीं होती थी। जंगल से गुजर रही सड़क के रास्ते आगे आने पर बायीं तरफ बुरांश का बड़ा सा पेड़ था। उसमें से एक अच्छा सा बुरांश का फूल तोड़ा और फिर उसकी एक एक पंखुड़ी को चबाते हुए नौगांवखाल तक का रास्ता कट जाता था। इससे आगे के लिये भी पर्याप्त ऊर्जा मिल जाती थी। तब मैं इतना ही जानता था कि बुरांश स्वास्थ्य के अच्छा होता है लेकिन यह पता नहीं था कि वास्तव में यह तो गुणों की खान है। फूल की सुंदरता पेड़ पर होती है लेकिन अपने औषधीय गुणों के कारण शायद बुरांश की किस्मत में खिलने के बाद चटनी, शरबत, जूस आदि के रूप में परिवर्तित होकर लोगों के जीवन में उमंग और उल्लास भरना है। 
       अगर आपको बुरांश की सुंदर छटा देखनी है तो आजकल पहाड़ों में चले जाईये। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, नेपाल से लेकर अरूणाचल प्रदेश तक आपको लाल चटख रंग का यह फूल स्वागत में पलक पांवड़े बिछाये हुए दिखेगा। उत्तराखंड की विभिन्न भाषाओं और बोलियों के कवियों गी​तकारों ही नहीं बल्कि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' से लेकर श्रीकांत वर्मा तक कई कवि इससे प्रभावित थे। सुमित्रानंदन पंत ने कुमांउनी में बुरांश के बारे में लिखा है। उनके शब्दों में ''जंगल में जो स्थान बुरांश का है वह किसी अन्य चीज का नहीं। '' गढ़वाली के सुप्रसिद्ध गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने बसंत को लेकर कई गीत रचे हैं और स्वाभाविक है कि बुरांश के बिना पहाड़ों में बसंत का गुणगान करना मुश्किल है। एक जगह पर वह लिखते हैं, 'डांडयूं खिलणा होला बुरांशी का फूल, पाख्युं हैंसणी होली फ्योंली मुलमुल'। इस तरह से अन्य गी​तकारों ने भी बुरांश को अपने गीतों में बहुत अधिक तवज्जो दी है। कवि महेशानंद गौड़ 'चंद्रा' का यह गीत काफी प्रसिद्ध है, ''चल रूपा बुरांश क, फूल ​बणि जौला, छमछम हीट छींछाड़ियूं को पाणी पेई औला।'' कुमांउनी में कई गीतों में बुरांश का वर्णन है। जैसे कि ''पारा भीडा बुरूंशी फूली छौ मैं ज कूंछू मेरी हीरू अरै छौ।'' या ''बुरांश दादू तू बड़ा उतालू रे औरू फूल तू फूलण नी देन्दो।''
        बुरांश बसंत ऋतु में जंगलों में खिलने वाला फूल है। यह 1500 से 3500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित स्थानों पर पाया जाता है। इसका पेड़ सामान्यत: 10 से 15 मीटर तक लंबा होता है। नगालैंड के कोहिमा के माउंट जाफू में 1993 में बुरांश का 108 फुट लंबा पेड़ पाया गया था जो गिनीज बुक आफ रिकार्ड में दर्ज है। बुरांश के अलावा इसे बुरूंश, लाली गुरांस (विशेषकर नेपाल में), बुरास, बराह, इरास आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम 'रोडोडेंड्रन आरबोरियम' है जो लाल, गुलाबी और सफेद रंग का होता है। इनमें लाल रंग का बुरांश औषधीय गुणों से भरपूर होता है। यह उत्तराखंड का राज्य वृक्ष, हिमाचल प्रदेश और नगालैंड का राज्य पुष्प और नेपाल का राष्ट्रीय पुष्प है। 

बुरांश के औषधीय गुण  


     रिष्ठ पत्रकार अरूण जैन ने एक किस्सा सुनाया। उन्हें पहाड़ों में घूमने का शौक है। उनके शब्दों में, ''एक बार पहाड़ों में काफी चलने के बाद मैं बहुत थकान महसूस कर रहा था। तब किसी ने मुझे बुरांश का शरबत पिलाया था। मैंने पहली बार यह शरबत पिया था। पीने में तो सामान्य सा लगा लेकिन इसके बाद मेरी थकान रफूचक्कर हो गयी। मेरी स्फूर्ति लौट आयी थी। मुझे लगा कि मैंने शरबत नहीं अमृत पिया। '' वास्तव में किसी अमृत से कम नहीं है बुरांश और उससे बना शरबत। उत्तराखंड में तो इसके शरबत से मेहमानों का स्वागत किया जाता है। यह शरीर में ताजगी लाता है और थकान दूर करने में सहायक होता है। इसकी चटनी भी बनायी जाती है। इसकी पत्तियों की खाद बनायी जाती है। इनको जलाने से कीड़े मकौड़े नहीं आते हैं। 
     बुरांश पोटेशियम, कैल्शियम, आयरन, विटामिन सी से भरपूर होता है। अध्ययनों के अनुसार में क्यूरेसिटिन, रियुटिन और कोमारिक अम्ल जैसे सक्रिय जैविक यौगिक भी बुरांश के फूल में पाये जाते हैं। ये तीनों सेब में भी पाये जाते हैं और इनकी मौजूदगी के कारण ही कहा जाता है कि 'रोज एक सेब खाने का मतलब बीमारियों से दूर रहना।' विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि फ्लैवोनोइड क्वेरसेटिन, फेनोलिक्स, सैपोनिन्स, टैनिन आदि औषधीय तत्वों से भरपूर फाइटोकेमिकल्स पाये जाते हैं। 
     आपने गांवों में देखा होगा कि कुछ बीमारियों में बुरांश की पत्तियों और उसके फूल का उपयोग किया जाता है। मसलन सिरदर्द या हाथ पांव में जलन होने पर इसकी पत्तियों का लेप लगाना, घावों पर पंखुड़ियों को पीस कर लगाना, पेट की जलन दूर करने के लिये बुरांश का शरबत पीना या इसकी पंखुड़ियों का चबा चबा कर खाना। गांवों में एलर्जी, अस्थमा और मौसम बदलने पर होने वाली बीमारियों से बचने के लिये लोग इसकी पंखुड़ियों का सेवन करते थे। नेपाल में लोग वर्षों से मधुमेह के रोग के लिये इसका उपयोग करते रहे हैं और जो नवीनतम शोध बुरांश पर किये गये हैं उनके अनुसार हृदय रोगियों और मधुमेह के रोगियों के लिये बेहद उपयोगी है। टाइप एक और टाइप दो के डायबिटीज के रोगी भी इसका उपयोग कर सकते हैं। उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में भी यह अपनी भूमिका निभाता है। कोलेस्ट्राल को नियंत्रित करने में इसकी भूमिका होती है। दिल के लिये इसका शरबत या जूस काफी उपयोगी होता है। इसका नियमित सेवन करने से दिल का दौरा पड़ने की संभावना कम हो जाती है। यह यकृत यानि लीवर के रोगों को भी दूर करने की क्षमता रखता है। बुरांश में लौहतत्व होते हैं और इसलिए हीमोग्लोबिन की कमी दूर करने में भी यह सहायक होता है। 
    बुरांश गुर्दा यानि किडनी और पेशाब की जलन को दूर करने में सहायक होता है। यहां तक कि यदि मुंह में छाले हैं तो इसकी पंखुड़ियों को चबाने से राहत मिलती है। इसकी पंखुड़ियों और पत्तियों से पाउडर बनाया जाता है जिनका सेवन करने से डायरिया में राहत मिलती है। पेचिस में इसका सेवन उपयोगी होता है क्योंकि इसमें फ्लैवोनोइड्स, टैनिस, स्टेरोल आदि फाइटोकैमिकल्स पाये जाते हैं। बुरांश के कुछ गुण कैंसर जैसी बीमारी नहीं होने देते हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट पाये जाते हैं जिससे यह शरीर के खराब तत्वों का नष्ट करता है। कहने का मतलब है कि यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण इसका जूस पीने से त्वचा में भी निखार आता है। बुरांश के फूल से चेहरे पर लगाने के लिये लेप (फेसपैक) भी तैयार किया जाता है। यह लेप फूलों के पाउडर और शहद को मिलाकर तैयार किया जाता है।
    कहने का मतलब है कि बुरांश का जूस बेफिक्र होकर ​पियें लेकिन बहुत अधिक मात्रा में नहीं क्योकि अति तो किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती है। बुरांश का पेड़ दिखे तो एक फूल लेकर उसकी पंखुड़ियों को चबाकर खाने से आपको लाभ ही मिलेगा। इसका महत्व समझें और फूलों को बर्बाद नहीं करें। यदि इसका उपयोग नहीं करना है तो उसे पेड़ पर ही रहने दें। उम्मीद है विभिन्न स्रोतों से  बुरांश के बारे में ली गयी यह जानकारी आपको उपयोगी लगी होगी। बुरांश को लेकर अपने अनुभव जरूर साझा करें। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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रविवार, 22 नवंबर 2015

गुणों की खान है कोदा यानि मंडुआ

 कोदा के खेत और कोदा से बनी रोटी। इसे सब्जी, घी, कई तरह के नमक या दूध किसी के साथ भी खा सकते हैं।

   मैंने बचपन से उसे क्वादू या कोदो कहा। कोदा उसके लिये सही शब्द हो सकता है। अगर आप हिन्दी भाषी हैं तो मैं आपको बता दूं कि मैं 'मंडुआ' की बात कर रहा हूं। बचपन में मेरी आदत थी सुबह नाश्ते में दूध और रात की बनी कोदा की रोटी खाने की। उसका स्वाद अद्भुत होता था। मां को रात को बोलता था, ''मां एक क्वादो कु टिकड़ सुबेर खुणी भि बणै दे''। पिताजी ने एक किस्सा सुनाया था जो आज याद आ रहा है। गढ़वाल राइफल्स में कोई अंग्रेज था। उसे गढ़वाली तो आ गयी थी लेकिन यहां के खानपान के अनभिज्ञ था। एक बार अकेला किसी गांव से गुजर रहा था। भूख लगी तो गांव की एक वृद्ध महिला ने उसे खाने के लिये कोदा की मोटी रोटी और उसके ऊपर ढेर सारा घी दे दिया। अंग्रेज घी खा गया और महिला को यह कहते हुए रोटी वापस कर दी 'लो माताजी आपकी प्लेट''। कहने का मतलब है कि कोदा की रोटी मोटी बनती है और अगर वह बासी है तो कड़क भी बन जाती है। इसी रोटी को दूध के साथ खाने का आनंद मैंने काफी उठाया है। अब भी कोदा की आटा कहीं से मंगाकर महीने में एक दो बार इसकी रोटी खाता हूं। बासी नहीं सादी रोटी। आज कोदा पर लिखने से पहले पत्नी से इसकी रोटी बनवायी। चार रोटी छकने के बाद लिख रहा हूं कोदा की कहानी। 
     कहा जाता है है कोदा यानि मंडुआ का मूल निवास अफ्रीका महाद्वीप है। मतलब सबसे पहले इसकी खेती अफ्रीका में की गयी और लगभग 3000 से 4000 वर्ष पहले यह भारत आया था। हड़प्पा की खुदाई में भी पता चला कि उस समय के निवासी भी कोदा की खेती करते थे। बाद में पहाड़ और पहाड़ी जीवन का अहम हिस्सा बन गया। इसे 2000 से 3000 मीटर की ऊंचाई पर उगाया जा सकता है। पिछले दिनों एक भाई ने बताया कि पहाड़ी लोगों का कोदा से मोहभंग हो रहा है। इसकी खेती कम की जा रही है। मैं खुद पलायनवादी, जो पहाड़ छोड़कर दिल्ली भाग आया, किसी को भी उपदेश देने का हक नहीं रखता हूं लेकिन सच कहूं तो कोदा के बारे में सुनकर अच्छा नहीं लगा। यह कोदा हमारी संस्कृति, खानपान का अहम हिस्सा रहा है। यदि पहाड़ी हट्टे कट्ठे मजबूत होते हैं तो उसका काफी श्रेय कोदा को जाता है। गुणों की खान है कोदा। इसलिए इसे अनाजों का राजा भी कहते हैं। इसके दाने काले या राई के रंग के होते हैं और इसलिए इसकी रोटियां भी काली, भूरे रंग की होती हैं। यह ऐसा अनाज है जिस पर कीड़ा नहीं लगता और इसे लंबे समय तक रखा जा सकता है। 
     कोदा की बुवाई मई जून में की जाती है। इसकी खेती के लिये बहुत उपजाऊ जमीन और बहुत अधिक पानी की जरूरत नहीं होती है। जब सीढ़ीनुमा खेतों में कोदा की बुवाई होती है तो मस्त धूल उड़ती रहती है। गेंहूं की बुवाई के लिये जहां हल बहुत ध्यान रखकर चलाना पड़ता है वहीं कोदा की बुवाई में 'डामर' भी पड़ जाए तो चिंता नहीं। मैंने भी हल चलाया है और सच कहूं तो मुझे सबसे ज्यादा मजा कोदा की बुवाई करने में ही आया। 
    बरसात आने पर कोदा की निराई गुड़ाई का काम शुरू हो जाता है। कोदा को छांट . छांटकर खेत की मेढ़ पर लगाने में सुख की अनुभूति होती थी क्योंकि इसका पौधा कहीं पर कैसे भी रोप दिया जाए वह जिंदगी से हार नहीं मानता है। अक्तूबर . नवंबर में इसकी फसल तैयार हो जाती है। पौधे के ऊपर का अनाज निकालकर इकट्ठा करके घर के एक कोने पर रख देते हैं और निचला वाला हिस्सा पशुओं के ​खाने के लिये एकत्रित कर देते हैं। बाद में खलिहान में ले जाकर इसके छोटे . छोटे दाने अलग कर दिये जाते हैं। बस फिर आटा ​तैयार कीजिए और फिर रोटी बनाईये, बाड़ी या फिर पल्यो। आपका शरीर भी इसका सेवन करके आपको दुआ देगा। 

गुणों की खान है कोदा

     चपन में मां से सुना है कि अगर हम लोग पहाड़ी चढ़ लेते हैं तो इसका श्रेय कोदा को जाता है। कोदा खाने से हड्डी मजबूत बनती हैं और इसका सेवन करने वाला ताकतवर बनता है। ऐसा कहकर वह हमें कोदा खाने के लिये प्रेरित करती थी। कोदा बच्चों से लेकर वृद्धजनों तक सभी के लिये समान रूप से उपयोगी है। जापान में तो इससे शिशुओं के लिये खास तौर पर पौष्टिक आहार तैयार किया जाता है। उत्तराखंड सरकार ने भी सरकारी अस्पतालों में मरीजों को कोदा के बने व्यंजन देने की व्यवस्था की थी। कहने का मतलब यह है कि कोदा को छह माह के बच्चे से लेकर गर्भवती महिलाओं, बीमार व्यक्तियों और वृद्धजनों तक सभी को दिया जा सकता है। इससे उन्हें फायदा ही होगा।
    कोदा कैल्सियम, फासफोरस, आयोडीन, विटामिन बी, लौह तत्वों से भरपूर होता है। इसमें चावल की तुलना में 34 गुना और गेंहू की तुलना में नौ गुना अधिक कैल्सियम पाया जाता है। प्रति 100 ग्राम कोदा में प्रोटीन 7.6 ग्राम, वसा 1.6 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 76.3 ग्राम, कैल्सियम 370 मिग्रा, खनिज पदार्थ 2.2 ग्राम, लौह अयस्क 5.4 ग्राम पाया जाता है। इसके अलावा इसमें फास्फोरस, विटामिन ए, विटामिन बी.1 यानि थियामाइन, विटामिन बी.2 यानि रिबो​फ्लेविन, विटामिन बी.3 यानि नियासिन, फाइबर, गंधक और जिंक आदि भी पाया जाता है।  
     कैल्सियम और फास्फोरस हड्डियों और दांतों को मजबूत करते हैं। इसमें कैल्सियम और फास्फोरस उचित अनुपात में होने के कारण यह बढ़ते बच्चों के लिये बेहद लाभकारी होता है। मधुमेह के रोगियों के लिये तो कोदा वरदान साबित हो सकता है। इसमें पाये जाने वाले काबोहाइड्रेट जटिल किस्म के होते हैं जिनका पाचन धीरे धीरे होता है और ऐसे में ये रक्त में शर्करा की मात्रा को सं​तुलित बनाये रखते हैं। हृदय रोगियों के लिये भी यह बहुत अच्छा भोजन है। कोदा से ब्लड प्रेशर को संतुलित करने में भी मदद मिलती है। इसके सेवन से खून में हानिकारक चर्बी घट जाती है और लाभकारी चर्बी बढ़ जाती है। फाइबर अधिक होने के कारण भी इसका खाने से कोलस्ट्राल कम करने में मदद मिलती है। इससे बवासीर के रोगियों को भी फायदा होता है। क्षारीय अनाज होने के कारण कोदा का नियमित सेवन करने वाले व्यक्ति को अल्सर नहीं होता है। अल्सर के रोगियों को कोदा के बने भोजन का नियमित सेवन कराने से लाभ मिलता है। लौह अयस्क होने के कारण कोदा खून की कमी भी दूर करता है। आपने चिकित्सकों के मुंह से अक्सर सुना होगा कि पहाड़ी लोगों का हीमोग्लोबिन काफी अधिक होता है। उसका कारण कोदा ही है। इसके सेवन करने वाले को कभी एनीमिया नहीं हो सकता। यहां तक कि यह कैंसर जैसे रोग की रोकथाम में लाभकारी है। यहीं नहीं इससे जल्दी बुढ़ापा नहीं आता। चेहरे पर झुरियां देर से पड़ती हैं।
   इसलिए मेरा सभी पहाड़ियों से विनम्र निवेदन है कि गेंहूं उगाओ या नहीं लेकिन कोदा जरूर उगाओ और रोज उसका सेवन करो। हमारा सौभाग्य नहीं है कि हम रोज कोदे की रोटी या बाड़ी खा सकें लेकिन जिन्हें यह नसीब हो रहा है वे इससे मुंह न फेरें। कोदा हम पहाड़ियों के लिये अमृत है। कोदा पर आपकी जान​कारियों के इंतजार में आपका धर्मेन्द्र पंत।

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