तीलू रौतेली लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
तीलू रौतेली लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 8 मार्च 2017

उत्तराखंड की कुछ प्रसिद्ध महिलाएं

                             अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (आठ मार्च) पर विशेष


मुगलों की नाक काटने वाली रानी कर्णावती 

        भारतीय इतिहास में जब रानी कर्णावती का जिक्र आता है तो फिर मेवाड़ की उस रानी की चर्चा होती है जिसने मुगल बादशाह हुमांयूं के ​लिये राखी भेजी थी। इसलिए रानी कर्णावती का नाम रक्षाबंधन से अक्सर जोड़ दिया जाता है। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि इसके कई दशकों बाद भारत में एक और रानी कर्णावती हुई थी और यह गढ़वाल की रानी थी। इस रानी को मुगलों की नाक काटने के लिये जाना जाता है और इसलिए कुछ इतिहासकारों ने उनका जिक्र नाक क​टी रानी या नाक काटने वाली रानी के रूप में किया है। रानी कर्णावती ने गढ़वाल में अपने नाबालिग बेटे पृथ्वीपतिशाह के बदले तब शासन का कार्य संभाला था जबकि दिल्ली में मुगल सम्राट शाहजहां का राज था। रानी कर्णावती वह पवांर वंश के राजा महिपतशाह की पत्नी थी। जब महिपतशाह की मृत्यु हुई तो उनके पुत्र पृथ्वीपतिशाह केवल सात साल के थे। राजगद्दी पर पृथ्वीपतिशाह ही बैठे लेकिन राजकाज उनकी मां रानी कर्णावती ने चलाया। इस दौरान जब मुगलों ने गढ़वाल पर आक्रमण किया तो रानी कर्णावती ने उन्हें छठी का दूध याद दिलाया था। गढ़वाल की सेना ने मुगल सेना को हरा दिया था। मुगल सैनिकों के हथियार छीन दिये गये थे और आखिर में उनके एक एक करके नाक काट दिये गये थे। कहा जाता है कि जिन सैनिकों की नाक का​टी गयी उनमें सेनापति नजाबत खान भी शामिल था।  विस्तार से पढ़ने के लिये क्लिक करें "मुगल सैनिकों की नाक काटने वाली गढ़वाल की रानी कर्णावती"

युवा वीरांगना तीलू रौतेली 

          केवल 15 वर्ष की उम्र में रणभूमि में कूद कर सात साल तक अपने दुश्मन राजाओं को छठी का दूध याद दिलाने वाली गढ़वाल की वीरांगना थी 'तीलू रौतेली'। इस महान वीरांगना का जन्म कब हुआ। इसको लेकर कोई तिथि स्पष्ट नहीं है। गढ़वाल में आठ अगस्त को उनकी जयंती मनायी जाती है और यह माना जाता है कि उनका जन्म आठ अगस्त 1661 को हुआ था। उस समय गढ़वाल में पृथ्वीशाह का राज था। इसके विपरीत जिस कैंत्यूरी राजा धाम शाही की सेना के साथ तीलू रौतेली ने युद्ध किया था उसने इससे पहले गढ़वाल के राजा मानशाह पर आक्रमण किया था जिसके कारण तीलू रौतेली को अपने पिता, भाईयों और मंगेतर की जान गंवानी पड़ी थी। तीलू रौतेली ने इसका बदला चुकता करने की ठानी और आखिर में वह इसमें सफल रही। इस वीरांगना ने केवल 22 साल की उम्र में प्राण त्याग दिये थे लेकिन इतिहास में वह अपना नाम हमेशा के लिये अजय अमर कर गयी। विस्तार से पढ़ने के लिये क्लिक करें "तीलू रौतेली ..वर्षों पहले बन गयी थी लक्ष्मीबाई"

शराबबंदी की समर्थक टिंचरी माई 

        लीसैंण के मंज्यूड़ गांव में 1917 को जन्मी दीपा नौटियाल ने बचपन में ही अपने माता पिता को गंवा दिया था। चाचा ने बचपन में ही उनकी शादी सेना के जवान से कर दी जो युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गया। तब दीपा की उम्र 19 साल की थी। वह संन्यासिन बनी और बाद में पहाड़ लौटकर यहां की कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने लगी। उन्होंने पहाड़ में शराबबंदी के लिये आवाज उठायी। अंग्रेज अफसर से डरे बिना अपने गांव में टिंचरी यानि शराब की दुकान जला डाली। तभी से लोग उन्हें टिंचरी माई कहने लगे। उन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक कार्यों में समर्पित कर दिया था। उन्हें इच्छागिरी माई के नाम से भी जाना जाता है। टिंचरी माई ने 19 जून 1992 को अंतिम सांस ली थी। 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बिशनी देवी शाह 

        देश के स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड की महिलाओं का भी अहम योगदान रहा और इनमें बिशनी देवी शाह प्रमुख हैं। उनका जन्म 12 अक्तूबर 1902 को बागेश्वर में हुआ था और वह किशोरावस्था से ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ी थी और देश के आजाद होने तक इसमें सक्रिय रही। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भी अहम भूमिका निभायी थी। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े होने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इस महान स्वतंत्रता सेनानी का वर्ष 1974 में 73 वर्ष की उम्र में निधन हुआ। 

सुप्रसिद्ध लेखिका शिवानी 

     त्तराखंड की प्रसिद्ध उपन्यासकार शिवानी उर्फ गौरा पंत का जन्म 17 अक्तूबर 1923 को हुआ था।  उन्होेंने 12 साल की उम्र से लिखना शुरू किया और फिर 21 मार्च 2003 को अपने निधन तक लगातार लेखन से जुड़ी रही। उनकी लिखी कृतियों मे कृष्णकली, भैरवी, आमादेर शन्तिनिकेतन, विषकन्या चौदह फेरे, कृष्णकली, कालिंदी, अतिथि, पूतों वाली, चल खुसरों घर आपने, श्मशान चंपा, मायापुरी, कैंजा, गेंदा, भैरवी, स्वयंसिद्धा, विषकन्या, रति विलाप आदि प्रमुख हैं। हिंदी साहित्य जगत में शिवानी को ऐसी लेखिका के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने अपनी कृतियों में उत्तर भारत के कुमाऊं क्षेत्र के आसपास की लोक संस्कृति की झलक दिखायी और किरदारों का बहुत सुंदर तरीके से चरित्र चित्रण किया। हिंदी के अलावा उनकी संस्कृत, गुजराती, बंगाली, उर्दू तथा अंग्रेजी पर भी अच्छी पकड़ थी। 

चिपको की प्रणेता : गौरा देवी 

      गौरा देवी विश्व प्रसिद्ध चिपको आन्दोलन की जननी रही हैं। उनका जन्म 1925 में हुआ था। वह पहाड़ में जंगलों की अंधाधुंध कटाई का विरोध करने के लिये गौरा देवी अपनी साथियों के साथ पेड़ों से चिपक गयी थी। तब पहाड़ों में वन निगम के माध्यम से ठेकेदारों को पेड़ काटने का ठेका दिया जाता था। गौरा देवी को जब पता चला कि पहाड़ों में पेड़ काटने के ठेके दिये जा रहे हैं तो उन्होंने अपने गांव में महिला मंगलदल का गठन किया। गौरा देवी कहा करती थी कि वन हमारे भगवान हैं इन पर हमारे परिवार और हमारे मवेशी पूर्ण रूप से निर्भर हैं। उनका विवाह 11 वर्ष में हो गया था और 22 साल की उम्र में उनके पति का निधन हो गया था। उन्होंने इसके बाद अपने बेटे की पर​वरिश करने के साथ अपना जीवन गांव और जंगल की रक्षा के लिये समर्पित कर दिया था। उन्हें 1986 में पहले वृक्ष मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। पेड़ों की रक्षा के लिये अपना जीवन समर्पित करने वाली गौरा देवी ने चार जुलाई 1991 को अंतिम सांस ली।

जागर को नयी पहचान दी बसंती बिष्ट ने 

     त्तराखंड में देवी देवताओं के स्तुति गान यानि जागर गायन का काम मुख्य रूप से पुरूष करते हैं लेकिन श्रीमती बसंती बिष्ट ने न सिर्फ इस विधा से जुड़ी बल्कि उन्होंने देश विदेश में जागर गायन को पहचान भी दिलायी। वह मां भगवती नंदा के जागरों के गायन के मशहूर हैं। अपनी मां से जागर गायन सीखने वाली बसंती देवी को भारत सरकार ने लोक संगीत के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिये वर्ष 2017 में पदमश्री से सम्मानित किया। वह उत्तराखंड आंदोलन से भी जुड़ी रही और इस बीच वह अपने गीतों के जरिये इस आंदोलन को मजबूती देती रही। बसंती बिष्ट ने नंदा देवी की जागरों की एक पुस्तक ‘नंदा के जागर- सुफल ह्वे जाया तुम्हारी जात्रा’ भी लिखी है। 

भारत की पहली एवरेस्ट विजेता महिला बछेंद्री पाल 

       उत्तराखंड में साहसिक खेलों में अहम योगदान देने वाली महिलाओं की बात आती तो सुश्री चंद्रप्रभा ऐतवाल और फिर बछेंद्री पाल का नाम स्वाभाविक ही जुबान पर आ जाता है। ये दोनों ही पर्वतारोहण से जुड़ी थी। पिथौरागढ़ के धारचूला गांव में 24 दिसंबर 1941 को जन्मीं चंद्रप्रभा ने पर्वतारोहण की विभिन्न अभियानों की अगुवाई की और उन्हें पदमश्री और अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। बछेंद्री पाल ने पर्वतारोहण को नये आयाम तक पहुंचाया। 24 मई 1954 को उत्तरकाशी के नकुरी में जन्मी बछेंद्री पाल ने 23 मई 1984 को एवरेस्ट फतह किया था और ऐसा करने वाली वह भारत की पहली महिला पर्वतारोही बनी थी। उन्हें 1984 में पदमश्री और इसके दो साल बाद अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 
  
         उत्तराखंड की कई अन्य महिलाओं ने भी विभन्नि क्षेत्रों में विशिष्ट उपलब्धियां हासिल की। इनकी सूची काफी लंबी है जैसे कि उत्तराखंड की पहली महिला कुलपति प्रो. सुशीला डोभाल (1977 में पहली बार और 1984—85 में दूसरी बार गढ़वाल विश्वविद्यालय की कुलपति बनी थी), उत्तराखंड की पहली महिला आईएएस अधिकारी ज्योति राव पांडेय, भारत की पहली महिला मेजर जनरल माया टम्टा, बैडमिंटन में विशेष छाप छोड़ने वाली मधुमिता बिष्ट, भारतीय महिला क्रिकेट टीम की स्पिनर एकता बिष्ट आदि प्रमुख हैं। यहां पर कई नामों का जिक्र नहीं हो पाया। उम्मीद है कि घसेरी के पाठक टिप्पणी वाले कालम में इस कमी को पूरा करेंगे। आपका धर्मेन्द्र पंत 


------- घसेरी के यूट्यूब चैनल के लिये क्लिक करें  घसेरी (Ghaseri)

------- Follow me on Twitter @DMPant

बुधवार, 27 जनवरी 2016

तीलू रौतेली ..वर्षों पहले बन गयी थी लक्ष्मीबाई


जणदादेवी में तीलू रौतेली की प्रतिमा। फोटो..रविकांत घिल्डियाल
       झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, दिल्ली की रजिया सुल्ताना, बीजापुर की चांदबीबी, मराठा महारानी ताराबाई, चंदेल की रानी दुर्गावती आदि के बारे में आपने सुना होगा लेकिन आज मैं आपका परिचय गढ़वाल की एक ऐसी वीरांगना से करवा रहा हूं जो केवल 15 वर्ष की उम्र में रणभूमि में कूद पड़ी थी और सात साल तक जिसने अपने दुश्मन राजाओं को छठी का दूध याद दिलाया था। गढ़वाल की इस वीरांगना का नाम था 'तीलू रौतेली'। मेरे गांव स्योली के पास स्थित जणदादेवी में इस वीरांगना की प्रतिमा लगी है जो लोगों उनके वीरता, संकल्प और साहस की याद दिलाती है। मेरे गांव के सरहद से ही लगा गांव है गुराड जहां तीलू रौतेली का जन्म हुआ था। पिताजी श्री राजाराम पंत को गढ़वाल और उसके इतिहास की अच्छी जानकारी थी और उन्हीं से मैंने सबसे पहले तीलू रौतेली की कहानी सुनी थी। 
    तीलू रौतेली का जन्म कब हुआ। इसको लेकर कोई तिथि स्पष्ट नहीं है। गढ़वाल में आठ अगस्त को उनकी जयंती मनायी जाती है और यह माना जाता है कि उनका जन्म आठ अगस्त 1661 को हुआ था। उस समय गढ़वाल में पृथ्वीशाह का राज था। इसके विपरीत जिस कैंत्यूरी राजा धाम शाही की सेना के साथ तीलू रौतेली ने युद्ध किया था उसने इससे पहले गढ़वाल के राजा मानशाह पर आक्रमण किया था जिसके कारण तीलू रौतेली को अपने पिता, भाईयों और मंगेतर की जान गंवानी पड़ी थी। पंडित हरिकृष्णा रतूड़ी ने 'गढ़वाल का इतिहास' नामक पुस्तक में लिखा है कि राजा मानशाह 1591 से 1610 तक गढ़वाल राजा रहे और 19 साल राज करने के बाद 34 साल की उम्र में वह स्वर्ग भी सिधार गये थे। इसलिए यह कहा जा सकता है कि तीलू रौतेली का जन्म ईस्वी सन 1600 के बाद हुआ था। गढ़वाल में तीलू रौतेली को लेकर जो लोककथा प्रचलित हैं मैं यहां पर उसका ही वर्णन कर रहा हूं।

वीरता की पर्याय बन गयी थी गुराड तल्ला की तीलू 

      तीलू रौतेली की वीरता का किस्सा सुनने से पहले उनके पिता थोकदार भूपसिंह गोर्ला के बारे में जानना जरूरी है। एक वीर पुरूष जिन्हें गढ़वाल के राजा ने चौंदकोट परगना के गुराड गांव की थोकदारी दी थी। उनके दो जुड़वां बेटे थे भगतू और पर्त्वा या पथ्वा। ये दोनों भी अपने पिताजी की तरह वीर थे। एक समय था जबकि गढ़वाल और कुमांऊ में कत्यूरी राजाओं की तूती बोलती थी लेकिन बाद में वह पूर्वी क्षेत्र तक सी​मित रह गये थे। गढ़वाल के राजा और कत्यूरी राजाओं के बीच तब युद्ध आम माना जाता था। भूप​सिंह एक बार जब निजी काम से गढ़वाल के राजा से मिलने के लिये गये तो उन्होंने उन्हें कैत्यूरी राजा पर आक्रमण करने का भी आदेश दिया। इस बीच बिंदुआ कैंत्यूरा ने चौंदकोट क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया। भगतू और पथ्वा ने इस जंग में उसका डटकर सामना किया और आखिर में बिंदुआ कैंत्यूरा को जान बचाकर भागना पड़ा। इन दोनों भाईयों के शरीर पर कुल मिलाकर 42 घाव हुए थे और राजा ने उनकी वीरता से खुश होकर उन्हें 42 गांव पुरस्कार में दे दिये थे। 
     भगतू और पथ्वा की छोटी बहन थी तीलू रौतेली जिसने बचपन से ही तलवार और बंदूक चलाना सीख लिया था। छोटी उम्र में ही तीलू की सगाई ईड़ा के भुप्पा नेगी से तय कर दी गयी थी लेकिन शादी होने से पहले ही उनका मंगेतर युद्ध में वीर गति का प्राप्त हो गया था। तीलू ने इसके बाद शादी नहीं करने का फैसला किया था। इस बीच कैत्यूरी राजा धामशाही ने अपनी सेना फिर से मजबूत की और गढ़वाल पर हमला बोल दिया। खैरागढ़ में यह युद्ध लड़ा गया। मानशाह और उनकी सेना ने धामशाही की सेना का डटकर सामना किया लेकिन आखिर में उन्हें चौंदकोट गढ़ी में शरण लेनी पड़ी। इसके बाद भूपसिंह और उनके दोनों बेटों भगतू और पथ्वा ने मोर्चा संभाला।  भूपसिंह सरैंखेत या सराईखेत और उनके दोनों बेटे कांडा में युद्ध में मारे गये।
       सर्दियों के समय में कांडा में बड़े कौथिग यानि मेले का आयोजन होता था और परंपरा के अनुसार भूपसिंह का परिवार उसमें हिस्सा लेता था। तीलू ने भी अपनी मां से कहा कि वह कौथिग जाना चाहती है। इस पर उसकी मां ने कहा, ''कौथिग जाने के बजाय तुझे अपने पिता, भाईयों और मंगेतर की मौत का बदला लेना चाहिए। अगर तू धामशाही से बदला लेने में सफल रही तो जग में तेरा नाम अमर हो जाएगा। कौथिग का विचार छोड़ और युद्ध की तैयारी कर। '' मां की बातों ने तीलू में भी बदले की आग भड़का दी और उन्होंने उसी समय घोषणा कर दी कि वह धाम शाही से बदला लेने के बाद ही कांडा कौथिग जाएगी। उन्होंने क्षेत्र के सभी युवाओं से युद्ध में शामिल होने का आह्वान किया और अपनी सेना तैयार कर दी। तीलू ने सेनापति की पोशाक धारण की। उनके हाथों में चमचमाती तलवार थी। उनके साथ ही उनकी दोनों सहेलियों बेल्लु और रक्की  यानि पत्तू भी सैनिकों की पोशाक पहनकर तैयार हो गयी। उन्होंने पहले अपनी कुल देवी राजराजेश्वरी देवी की पूजा की और फिर काले रंग की घोड़ी 'बिंदुली' पर सवार तीलू, उनकी सहेलियां और सेना रणक्षेत्र के लिये निकल पड़ी। हुड़की वादक घिमंडू भी उत्साहवर्धन के लिये उनके साथ में था।
तीलू रौतेली गुराड तल्ला की रहने वाली थी।
गांव में उनकी यह प्रतिमा गुराड की ऐतिहासिक
विरासत की याद दिलाती है। फोटो : सुनील रावत।
 
       तीलू ने खैरागढ़ (वर्तमान में कालागढ़) से अपने अभियान की शुरूआत की और इसके बाद लगभग सात साल तक वह अधिकतर समय युद्ध में ही व्यस्त रही। उन्होंने दो दिन तक चली जंग के बाद खैरागढ़ को कैत्यूरी सेना से मुक्त कराया था। वह जहां भी गयी स्थानीय लोगों और वहां के समुदाय प्रमुखों का तीलू को भरपूर समर्थन मिला। असल में धाम शाही क्रूर राजा था और वह जनता पर अनाप शनाप कर लगाता रहता था। इससे जनता त्रस्त थी और उन्हें तीलू के रूप में नया सहारा मिल गया था। तीलू ने खैरागढ़ के बाद टकोलीखाल में मोर्चा संभाला और वहां बांज की ओट से स्वयं विरोधी सेना पर गोलियां बरसायी। कैत्यूरी सेना का नेतृत्व कर रहा बिंदुआ कैंत्यूरा को जान बचाकर भागना पड़ा। इसके बाद उन्होंने भौण (इडियाकोट) पर अपना कब्जा जमाया। तीलू जहां भी जाती वहां स्थानीय देवी या देवता की पूजा जरूर करती थी और वहीं पर लोगों का उन्हें समर्थन भी मिलता था। उन्होंने सल्ट महादेव को विरोधी सेना से मुक्त कराया लेकिन भिलण भौण में उन्हें कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। भिलण भौण के युद्ध में उनकी दोनों सहेलियां बेल्लु और रक्की वीरगति को प्राप्त हो गयी। तीलू इससे काफी दुखी थी लेकिन इससे उनके अंदर की ज्वाला और धधकने लगी। उन्होंने जदाल्यूं की तरफ कूच किया और फिर चौखुटिया में गढ़वाल की सीमा को तय की। इसके बाद सराईखेत और कालिंका खाल में भी उन्होंने कैत्यूरी सेना को छठी का दूध याद दिलाया। सराईखेत को जीतकर उन्होंने अपने पिता की मौत का बदला लिया लेकिन यहां युद्ध में उनकी प्रिय घोड़ी बिंदुली को जान गंवानी पड़ी। बीरोंखाल के युद्ध के बाद उन्होंने वहीं विश्राम किया।
    तीलू रौतेली ने गढ़वाल की सीमा तय कर दी थी। इसके बाद उन्होंने कांड़ागढ़ लौटने का फैसला किया लेकिन शत्रु के कुछ सैनिक उनके पीछे लगे रहे। तीलू और उनकी सेना ने तल्ला कांडा में पूर्वी नयार के किनारे में अपना शिविर लगाया। रात्रि के समय में उन्होंने सभी सैनिकों को सोने का आदेश दे दिया। चांदनी रात थी और पास में नयार बह रही थी। गर्मियों का समय था और तीलू सोने से पहले नहाना चाहती थी। उन्होंने अपने सा​थी सैनिकों और अंगरक्षकों को नहीं जगाया और अकेले ही नयार में नहाने चली गयी। तीलू पर नहाते समय ही एक कत्यूरी सैनिक रामू रजवार ने पीछे से तलवार से हमला किया। उनकी चीख सुनकर सैनिक जब तक वहां पहुंचते तब तक वह स्वर्ग सिधार चुकी थी। तीलू रौतेली की उम्र तब केवल 22 वर्ष की थी, लेकिन वह इतिहास में अपना नाम अमर कर गयी।
      तीलू रौतेली की याद में गढ़वाल में रणभूत नचाया जाता है। डा. शिवानंद नौटियाल ने अपनी पुस्तक 'गढ़वाल के लोकनृत्य' में लिखा है, '' जब तीलू रौतेली नचाई जाती है तो अन्य बीरों  के रण भूत /पश्वा जैसे शिब्बू पोखरियाल, घिमंडू हुडक्या, बेलु-पत्तू सखियाँ, नेगी सरदार आदि के पश्वाओं को भी नचाया जाता है। सबके सब पश्वा मंडांण में युद्ध नृत्य के साथ नाचते हैं। ''
      महान वीरांगना तीलू रौतेली को शत शत नमन।
     आपका धर्मेन्द्र पंत


------- घसेरी के यूट्यूब चैनल के लिये क्लिक करें  घसेरी (Ghaseri)

------- Follow me on Twitter @DMPant

© ghaseri.blogspot.in 
badge