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शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

पेशावर कांड का महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली

    च्चीस दिसंबर को दुनिया याद करती है क्रिसमस के लिये। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन भी इसी दिन पड़ता है। वाजपेयी जी को भी याद किया जाता है लेकिन हम स्वतंत्रता के एक महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को भूल जाते हैं जिनका जन्म 25 दिसंबर 1891 को गढ़वाल जिले के ग्राम मासी में हुआ था। चंद्र सिंह गढ़वाली, जिनका मूल नाम चंद्र सिंह भंडारी था, का संक्षिप्त परिचय यही है कि वह बचपन से ही क्रांतिकारी विचारधारा के थे। कोई भी साहसिक कार्य करने से नहीं हिचकिचाते थे। उनका जन्म किसान परिवार में हुआ था। मां पिता की इच्छा के विपरीत वह प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लैंसडाउन में गढ़वाल राइफल्स में भ​र्ती हुए। भारतीय सेना के साथ उन्होंने 1915 में मित्र देशों की तरफ से प्रथम विश्व युद्ध में भी हिस्सा लिया। उन्हें गढ़वाल राइफल्स के अन्य सैनिकों के साथ फ्रांस भेज दिया गया था। लेकिन चंद्र सिंह गढ़वाली से दुनिया का असली परिचय 23 अप्रैल 1930 को हुआ था जब उन्होंने पेशावर में देश की आजादी के लिये लड़ने वाले निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया था। यह एक ऐतिहासिक घटना थी और कहा जाता था कि सुभाषचंद्र बोस ने जब आजाद हिन्द फौज का गठन किया था तो वह चंद्र सिंह गढ़वाली से जुड़ी इस घटना से भी प्रेरित थे। यही वजह थी कि उन्होंने आजाद हिन्द फौज में गढ़वाल राइफल्स के सैकड़ों जवानों को शामिल किया था।
     बहरहाल हम यहां पर बात करेंगे पेशावर कांड की। पहले इससे जुड़ी पृष्ठभूमि की संक्षिप्त जानकारी हासिल कर लेते हैं। यह वह दौर था जब पूर्ण स्वराज्य की घोषणा के बाद देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को डांडी मार्च शुरू कर दिया गया था। इस बीच यह चर्चा भी चल रही थी कि भगत सिंह और उनके साथियों राजगुरू और सुखदेव को फांसी दे दी जाएगी। इससे हर राष्ट्रप्रेमी उद्वेलित था। चंद्र सिंह गढ़वाली भी इनमें शामिल थे लेकिन पेशावर कांड भावनाओं के इस उबाल का परिणाम मात्र नहीं था बल्कि इसकी तैयारी योजनाबद्ध तरीके से की गयी थी। चंद्र सिंह गढ़वाली ने 2/18 रायल गढ़वाल राइफल के अपने साथियों को पहले से ही तैयार कर दिया था कि उन्हें भारत की स्वतंत्रता के लिये आवाज उठा रहे पठानों पर गोली चलाने के अग्रेंजो के आदेश को नहीं मानना है। 
    अंग्रेजों को कानों कान खबर न लगे इसके लिये पूरी तैयारी की गयी थी। चंद्र सिंह गढ़वाली तथा पेशावर बैरक में हरिसिंह लाइन में रह रहे उनके साथी रात में देश की स्थिति और भावी रणनीति पर बंद कमरे में चर्चा करते थे। अंग्रेजों को कुछ भनक लग गयी थी और इसलिए उन्होंने फूट डालो राज करो की अपनी रणनीति के तहत गढ़वाली सैनिकों को उकसाने का काम भी किया। गढ़वाल राइफल्स के जवानों को बताया गया कि पेशावर में केवल दो प्रतिशत हिन्दू रहते हैं और मुसलमान उन्हें सताते हैं। उनके देवी देवताओं को अपमान करते हैं और इसलिए उन्हें इन मुसलमानों पर गोली चलाने से नहीं हिचकिचाना है। सचाई इससे परे थी और चंद्र सिंह गढ़वाली इससे अच्छी तरह से अवगत थे। उन्होंने अपने साथियों को समझा दिया था कि वे अंग्रेजों की चाल में नहीं फंसे। उनका अपने साथियों को स्पष्ट संदेश था, '' कुछ भी हो जाए हमें अपने भाईयों पर गोलियां नहीं चलानी हैं। ''

''गढ़वालीज ओपन फायर'' का जवाब था ''गढ़वाली सीज फायर''

   पेशावर में 23 अप्रैल 1930 को विशाल जुलूस निकला था, जिसमें बच्चों से लेकर बूढ़ों और महिलाओं ने हिस्सा लिया। स्वाधीनता की मांग कर रहे हजारों लोगों के नारों से आसमान गूंज रहा था तो दूसरी तरफ अंग्रेजों का खून खौल रहा था। 2/18 रायल गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों को भी प्रदर्शनकारियों पर नियंत्रण पाने के लिये भेज दिया गया। इसकी एक टुकड़ी काबुली फाटक के पास निहत्थे सत्याग्रहियों के आगे खड़ी थी। अंग्रेज कंमाडर के आदेश पर इन सभी प्रदर्शनकारियों को घेर दिया गया था। गढ़वाली सैनिकों को जुलूस को बलपूर्वक ति​तर बितर करने के लिये कहा गया। सैनिकों ने प्रदर्शनकारियों से हटने को कहा। वे नहीं हटे। कंपनी कमांडर का धैर्य जवाब दे गया और उसने लगभग चिल्लाते हुए आदेश दिया ''गढ़वालीज ओपन फायर'' और फिर यहां पर चंद्र सिंह गढ़वाली का उदय हुआ। वह कमांडर के पास में ही खड़े थे। उन्होंने कड़कती आवाज में कहा, ''गढ़वाली सीज फायर''। देखते ही देखते सभी राइफलें नीचे हो गयी। अंग्रेज कमांडर बौखला गया। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस सैन्य टुकड़ी का वह सर्वोसर्वा है वह उसके हुक्म की अवहेलना करेगी। गढ़वाली सैनिकों का साफ संदेश था कि वह निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोलियां नहीं चलाएंगे। अंग्रेज सैनिकों ने हालांकि बाद में पठानी आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसायी। गढ़वाली सैनिकों से उनके हथियार ले लिये गये। अंग्रेज किसी भी तरह से आंदोलन को कुचलना चाहते थे और इसके लिये उन्हें गढ़वाल राइफल्स से मदद की दरकार थी। इसलिए गढ़वाली सैनिकों को समझाने के प्रयास भी किये गये कि वह निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाने से नहीं हिचकिचाएं लेकिन देश प्रेम से ओत प्रोत गढ़वाली सैनिक टस से मस नहीं हुए। यहां तक कि सभी सैनिकों ने इस्तीफा भी दे दिया था, लेकिन अब अंग्रेज गढ़वाल राइफल्स की इस टुकड़ी से ही बदला लेने के लिये तैयार हो गयी थी। चंद्र सिंह गढ़वाली सहित इन सैनिकों को नौकरी से निकाल दिया गया और उन्हें कड़ी सजा दी गयी लेकिन उन्होंने खुशी . खुशी इसे स्वीकार किया। चंद्र सिंह गढ़वाली जेल से छूटने के बाद महात्मा गांधी से भी जुड़े। गांधी जी ने एक बार कहा था कि यदि उनके पास चंद्र सिंह गढ़वाली जैसे चार आदमी होते तो देश का कब का आजाद हो गया होता। चंद्र सिंह गढ़वाली बाद में कम्युनिस्ट हो गये और सिर्फ उनकी इस विचारधारा की वजह से देश ने इस अमर जवान को वह सम्मान नहीं दिया जिसके वह असली हकदार थे। एक अक्तूबर 1979 को भारत के महान सपूत ने लंबी बीमारी के बाद दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में आखिरी सांस ली थी। 

भारत सरकार ने वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के निधन
के बाद उन पर डाक टिकट जारी किया था
    वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने बाद में अपने नाम से गढ़वाली जोड़ा था। उन्हें और उनके साथियों को जब सजा दी गयी तो उन्होंने कहा था कि 'हे गढ़माता हम तेरी इज्जत और शान के लिये अपने प्राण न्यौछावर करने जा रहे हैं।' चंद्र सिंह गढ़वाली अमर हो गये लेकिन हमें उनके उन साथियों को भी याद करने की जरूरत है जिन्होंने हर मोड़ पर पूरी वीरता के साथ अपनी अगुवाई कर रहे इस साथी और गढ़वाल का सिर ऊंचा रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यहां पर चंद्र सिंह गढ़वाली के कुछ साथियों की सूची भी दी जा रही है जिन्हें अंग्रेज सरकार ने सजा दी थी। बैरिस्टर मुकुंदी लाल के प्रयासों से इन सैनिकों को मृत्यु दंड की सजा नहीं मिली लेकिन उन्हें जेल जाना पड़ा था।  

पेशावर कांड में वीर चंद्रसिंह गढ़वाली के अलावा जिन अन्य वीर सैनिकों को सजाएं हुई उनकी सूची इस प्रकार है ...
1. हवलदार नारायण सिंह गुंसाई, 2. नायक जीत सिंह रावत, 3. नायक भोला सिंह बुटोला, 4. नायक केशर सिंह रावत, 5. नायक हर​क सिंह धपोला, 6. लांस नायक महेंद्र सिंह नेगी, 7. लांस नायक भीम सिंह बिष्ट, 8. लांस नायक रतन सिंह नेगी, 9. लांस नायक आनंद सिंह रावत, 10. लांस नायक आलम सिंह फरस्वाण, 11. लांस नायक भवान सिंह रावत, 12. लांस नायक उमराव सिंह रावत, 13. लांस नायक हुकुम सिंह कठैत, 14. लांस नायक जीत सिंह बिष्ट, 15. लांस नायक सुंदर सिंह बुटोला, 16. लांस नायक खुशहाल सिंह गुंसाई, 17. लांस नायक ज्ञान सिंह भंडारी, 18. लांस नायक रूपचंद्र सिंह रावत, 19. लांस नायक श्रीचंद सिंह सुनार, 20. लांस नायक गुमान सिंह नेगी, 21. लांस नायक माधोसिंह नेगी, 22. लांस नायक शेर सिंह असवाल, 23. लांस नायक बुद्धि सिंह असवाल, 24. लांस नायक जूरासंघ सिंह असवाल, 25. लांस नायक राय सिंह नेगी, 26. लांस नायक दौलत सिंह रावत, 27. लांस नायक डब्बल सिंह रावत, 28. लांस नायक रतन सिंह नेगी, 29. लांस नायक श्याम सिंह सुनार, 30. लांस नायक मदन सिंह नेगी, 31. लांस नायक खेम सिंह गुंसाई।
गढ़वाल के जिन वीर सैनिकों को अंग्रेजों ने कोर्ट मार्शल करके नौकरी से बाहर कर दिया था, उनके नाम इस प्रकार है ...
1. लांस नायक पातीराम भंडारी, 2. लांस नायक पान सिंह दानू, 3. लांस नायक राम सिंह दानू, 4. लांस नायक हरक सिंह रावत, 5. लांस नायक लक्ष्मण सिंह रावत, 6. लांस नायक माधो सिंह गुंसाई, 7. चंद्र सिंह रावत, 8. जगत सिंह नेगी, 9. शेर सिंह भंडारी, 10. मान सिंह कुंवर, 11. बचन सिंह नेगी।
कुछ जवानों की सेवाएं समाप्त कर दी गयी थी। इनकी सूची इस प्रकार है ...
1. सूबेदार त्रिलोक सिंह रावत, 2. जयसिंह बिष्ट, 3. हवलदार गोरिया सिंह रावत, 4. हवलदार गोविंद सिंह बिष्ट, 5. हवलदार प्र​ताप सिंह नेगी, 6. नायक रामशरण बडोला। 

पुनश्च:... मेरे पिताजी श्री राजाराम पंत गढ़वाल राइफल्स में थे और वे बड़े गर्व से वीर चंद्रसिंह गढ़वाली का यह किस्सा सुनाया करते थे। जब 1994.95 में देहरादून में हिमालय दर्पण नामक समाचार पत्र में कार्यरत था तो उत्तराखंड आंदोलन पर एक विशेषांक निकाला गया था। मुझसे भी लिखने के लिये कहा गया और मैंने वीर चंद्रसिंह गढ़वाली पर लेख लिख दिया था। उस विशेषांक के संपादक श्री रमेश पहाड़ी थे। उन्होंने उस लेख को बहुत अच्छी तरह से संपादित किया और उत्तराखंड आंदोलन के उस विशेषांक में भी उसे जगह दी थी। आओ हम सब आज फिर से गढ़वाल के इस महान सपूत को याद करें। आपका धर्मेन्द्र पंत

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शनिवार, 1 अगस्त 2015

मेरे बचपन का 'शहर' कालौंडांड यानि लैन्सडाउन

बादलों का शहर लैन्सडाउन और मुख्य बाजार। फोटो : श्रीदेव उनियाल और ठाकुर मनमोहन सिंह रावत।
   चपन में अक्सर पिताजी के साथ लैन्सडाउन जाया करता था। दादी के लिये वह हमेशा कालौंडांड और मां के लिये लैन्सीडौन रहा लेकिन गढ़वाल राइफल्स के जवान पिताजी के लिये लैन्सडाउन। उन्होंने ही समझाया था कि गढ़वाली लोगों के लिये तो वह कालौंडांड या कालूडांड ही था लेकिन अंग्रेजों का शासन था। उन्हें यह नाम जंचा नहीं और उन्होंने लार्ड लैन्सडाउन का नाम उसे दे दिया। लार्ड लैन्सडाउन का नाम असल में सर हेनरी चाल्र्स कीथ पेटी फिट्जमौरिस था जो लैन्सडाउन के पांचवें मार्क्वस (इंग्लैंड में अमीरों को दी जाने वाली पदवी) थे। लैन्सडाउन हमें भी जंच गया और कालौंडांड पुरानी पीढ़ी के साथ ही मर गया। लार्ड लैन्सडाउन 1884 से 1888 तक भारत के वायसराय रहे थे। वे इससे पहले कनाडा के गवर्नर जनरल थे इसलिए वहां भी एक कस्बे का नाम लैन्सडाउन है। मैंने इसे कालौंडांड बनते भी देखा है और अब लैन्सडाउन तो है ही। मैंने यहां काले घने बादलों को इसकी पहाड़ियों पर विचरण करते हुए कई बार देखा है। ऐसे बादल कि दिन में अंधेरा हो जाए। इसके अलावा यहां बांज के जंगल भी हैं। यही वजह थी कि हमारे पुरखों ने इसे कालौंडांड नाम दिया। मतलब काला पहाड़। यह स्वीकार करने में हिचक नहीं कि यदि अंग्रेजों ने हमसे कालौंडांड छीना तो लैन्सडाउन को कुछ खूबसूरत इमारतें भी दी। यहां अंग्रेजों के जमाने के बंगले अब भी देखे जा सकते हैं। स्वच्छता और सुंदरता ही मुझे अक्सर लैन्सडाउन खींचकर ले आती थी। इसलिए तो एक बार दूर दूसरी पहाड़ी पर स्थित मंजकोट (बड़े भाई की ससुराल) से सुबह लेकर लैन्सडाउन घूमने के लिये निकल पड़ा था। पहले दो तीन किमी नीचे घाटी में उतरना और फिर मैतगढ़ से जयहरीखाल तक चार . पांच किमी की खड़ी चढ़ाई। जयहरीखाल से लैन्सडाउन तक बांज के जंगल के बीच से गुजरती साफ सुथरी सड़क का तो हर मोड़ जाना पहचाना सा लगता था। अब भले मोटरवाहनों की संख्या बढ़ गयी है लेकिन फिर भी यदि शांति और सुकून चाहिए तो कभी इस सड़क पर टहलने के लिये जरूर निकलना।

सवा सौ साल पहले अंग्रेजों ने मिटा दिया था कालौंडांड 

बादल घिरे और अंधेरा हुआ। तभी कहा होगा
                कालौंडांड यानि काला पहाड़। फोटो: श्री​देव उनियाल

     लैन्सडाउन उत्तराखंड के गढ़वाल जिले में 1706 मीटर यानि 5,597 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां सेना की गढ़वाल राइफल्स का मुख्यालय और ट्रेनिंग सेंटर है। गढ़वाल रेजीमेंट का इतिहास 100 साल से भी पुराना है। फील्ड मार्शल सर एफएस राबर्ट्स ने 1886 में गढ़वाल की अलग से रेजीमेंट बनाने की सिफारिश की थी और पांच मई 1887 को इसकी स्थापना कर दी गयी। गढ़वाल राइफल्स की पहली बटालियन चार नवंबर 1887 को लेफ्टिनेंट कर्नल ई पी मैनवारिंग के नेतृत्व में कालौंडांड पहुंची थी। तब लैन्सडाउन का नाम कालौंडांड ही था। इसका नाम 21 सितंबर 1890 को बदला गया लेकिन गढ़वाली लोगों की जुबान पर यह नाम रचने बसने में दशकों लग गये थे। गढ़वाल राइफल्स की यहां जो पहली बैरक बनी थी उसे मैनवारिंग लाइन्स नाम दिया गया था। लैन्सडाउन की स्वच्छता का बड़ा श्रेय गढ़वाल राइफल्स को जाता है, क्योंकि यहां का कैंटोनमेंट बोर्ड शहर, पार्क और सड़कों की सफाई और सुंदरता का ध्यान रखता है।
      लैन्सडाउन बांज, चीड़ और देवदार के पेड़ों से घिरा है। इनके बीच में बुरांश के भी पेड़ हैं। लाल लेकिन बड़े फूलों के कारण बुरांस का पेड़ दूर से अलग ही नजर आ जाता है। बसंत में जब बुरांश का फूल अपने पूरे शबाव पर होता है तो वह लोगों को इन जंगलों की तरफ आने के लिये आकर्षित करता है। अंग्रेजों के जमाने में यह काफी लोकप्रिय और पसंदीदा पहाड़ी स्थल था लेकिन बाद में मसूरी, नैनीताल लोगों को अधिक आकर्षित करने लगे और लैन्सडाउन एक शांत पहाड़ी स्थल बना रहा। अब भी लैन्सडाउन के प्रति लोगों का आकर्षण बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन मैं आपको सलाह दूंगा कि यदि आप दिल्ली या आसपास के शहरों में रहते हैं तो सप्ताहांत में घूमकर आईये लैन्सडाउन। मैं गारंटी देता हूं वहां की खूबसूरती, पहाड़, जंगल आपका मनमोह देंगे। लैन्सडाउन जाने और वहां घूमने के लिये दो दिन का समय पर्याप्त है।

संतोषी माता मंदिर से सूर्यास्त का मनोरम दृश्य। फोटो : मोना पार्थसारथी

कब जाएं लैन्सडाउन

     साल में वैसे किसी भी समय आप लैन्सडाउन जा सकते हैं लेकिन गर्मियों के लिये यह आदर्श स्थल है। बरसात में तो लैन्सडाउन वास्तव में कालौंडांड बन जाता है लेकिन काली घटाओं और घने कोहरे के बीच कुछ समय बिताना है तो सावन के महीने में आप इस पहाड़ी स्थल की सैर कर सकते हैं। सितंबर से नवंबर के बीच का समय भी लैन्सडाउन की सैर के लिये आदर्श समय है। जनवरी और फरवरी में यहां बहुत अधिक ठंड पड़ती है। तब यहां बर्फ भी गिर जाती है।

पहले कोटद्वार और फिर लैन्सडाउन

      ब आप पूछेंगे कि लैन्सडाउन जाना कैसे है। यदि आप दिल्ली में रहते हैं या दिल्ली के रास्ते जाना चाहते हैं तो फिर सबसे बढ़िया विकल्प रेलगाड़ी और बसें हैं। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से रात को सवा दस बजे मसूरी एक्सप्रेस निकलती है जिसमें कुछ डब्बे कोटद्वार के लिये लगे रहते हैं। बस सवार हो जाइये रेलगाड़ी में और सुबह आप पहुंच जाएंगे कोटद्वार जो लैन्सडाउन का सबसे करीबी रेलवे स्टेशन भी है। दूसरा उपाय बसें हैं। मोरीगेट के अंतरराज्यीय बस अड्डे से रात 11 बजे तक कोटद्वार के लिये उत्तराखंड परिवहन निगम और उत्तरप्रदेश परिवहन निगम की बसें लगातार चलती रहती हैं। किराया भी ज्यादा नहीं है। ये बसें सुबह चार से पांच बजे तक आपको कोटद्वार पहुंचा देंगी। देहरादून, बरेली, आगरा, जयपुर, चंडीगढ़ आदि शहरों से भी कोटद्वार के लिये बसें आती हैं। आप अपनी गाड़ी से भी जा सकते हैं क्योंकि दिल्ली से कोटद्वार की दूरी केवल 208 किमी है और सफर में चार या पांच घंटे लगेंगे।
गढ़वाल राइफल्स का मुख्यालय है लैन्सडाउन। फोटो : मोना पार्थसारथी
      कोटद्वार से लैन्सडाउन के लिये बसें और टैक्सियां बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन के पास में ही लगी रहती हैं। यहां पर आपको बसों के ड्राइवर और कंडक्टर लैन्सडाउन, लैन्सडाउन चिल्लाते हुए मिल जाएंगे। घुस जाईये किसी बस या टैक्सी में और यह सस्ते में आपको लैन्सडाउन पहुंचा देगी। आप यहां से टैक्सी बुक करके भी जा सकते हैं। एक या डेढ़ घंटे में आसानी से कोटद्वार से लैन्सडाउन पहुंचा जा सकता है। रास्ते में पहले दुगड्डा पड़ेगा। उसके आगे से बायीं तरफ एक रास्ता गुमखाल तो दूसरा लैन्सडाउन के लिये निकल जाएगा। कोटद्वार से लैन्सडाउन केवल 40 किमी दूर है। अगर आप मसूरी या देहरादून से लैन्सडाउन जाना चाहते हैं तो तब भी तीन या चार घंटे में पहुंच सकते हैं। मसूरी से लैन्सडाउन की दूरी लगभग 200 किमी है। इसके लिये भी आपको पहले कोटद्वार ही आना पड़ेगा। एक रास्ता पौड़ी से भी यहां आता है लेकिन वह काफी लंबा है और उसमें समय भी अधिक लगेगा। पौड़ी से लैन्सडाउन 78 किमी दूर है। यदि आप हवाई यात्रा करके लैन्सडाउन के करीब पहुंचना चाहते हैं तो आपको देहरादून के जौली ग्रांट हवाई अड्डे पर उतरना पड़ेगा। वहां से लैन्सडाउन 150 किमी दूर है।

टिप इन टाप से लेकर भुल्ला ताल, हर जगह है मस्त

      लैन्सडाउन में रूकने के लिये कुछ सस्ते होटल और रेस्ट हाउस हैं लेकिन गढ़वाल मंडल विकास निगम का रेस्ट हाउस जो मुख्य शहर से ऊपर पहाड़ी पर स्थित है और यहां से आप लैन्सडाउन का मनोहारी दृश्य भी देख सकते हैं। बेहतर होगा कि आप गढ़वाल मंडल विकास निगम के दिल्ली या देहरादून कार्यालय से पहले कमरे बुक करालें।
      अब लैन्सडाउन तो पहुंच गये लेकिन घूमने कहां जाएं। अगर आपको पर्वत श्रृंखलाओं की लंबी कतार और घाटियां देखनी हैं तो टिप इन टाप पर चले जाइये। पर्यटन विभाग ने यहां पर लकड़ी की कुछ झोपड़ियां भी बनायी हैं। आप आराम से यहां पर एक या दो दिन बिता सकते हैं। भुल्ला ताल (गढ़वाली में भुल्ला छोटे भाई को कहा जाता है) के शांत और स्वच्छ माहौल में भी कुछ समय जरूर बिताना। यह कृत्रिम झील है जो गढ़वाल राइफल्स ने बनायी थी। लैन्सडाउन में पानी की कमी शुरू से रही है और उसकी पूर्ति को ध्यान में रखकर यह झील बनायी गयी। आप यहां वोटिंग का भी लुत्फ उठा सकते हैं। क्वीन्स लाइन पर चर्च अंग्रेजों के जमाने की यादें ताजा कर देता है। क्वीन्स लाइन डेनमार्क की एलेक्जेंडरा (एलेक्जेंडरा कैरोलिना मैरी चारलोटी लौसी जूलिया) के नाम पर रखा गया जो इंग्लैंड के महाराजा इडवर्ड सप्तम की रानी थी। इसका निर्माण 1901 से 1910 के बीच कराया गया था। यह टिप इन टॉप के रास्ते पर पड़ता है।
लैन्सडाउन का आकर्षण है भुल्ला ताल। फोटो : श्रीदेव उनियाल
      सेना और उससे जुड़ी चीजों में दिलचस्पी रखते हैं तो दरवान सिंह संग्रहालय होकर आ जाइये। संतोषी माता का मंदिर भी यहां की खूबसूरती में चार चांद लगाता है। मुख्य बाजार से डेढ़ से दो किमी की दूरी पर भीम पकौड़ा है। यहां एक पत्थर के ऊपर दूसरा पत्थर बड़ी कुशलता से रखा हुआ है। कहा जाता है कि जब पांडव वनों में भटक रहे थे तो एक रात उन्होंने यहां भी बितायी और भीम ने इन पत्थरों को एक दूसरे के ऊपर रखा है। यह चट्टान आसानी से हिलायी जा सकती है लेकिन यह कभी गिरती नहीं। और हां यहां 'लवर्स लेन' भी है। बांज, चीड़ और देवदार के पेड़ों से घिरी सड़क। ट्रेकिंग पर निकल जाइये। यह घूमने के लिये आदर्श स्थल है। यदि आपके पास समय है तो लैन्सडाउन से लगभग 40 किमी की दूरी पर ​ताड़केश्वर महादेव का मंदिर है। सुंदर, सुरम्य और शांत स्थल। यहां भगवान शिव का मंदिर है जो देवदार के पेड़ों से घिरा है। यह गढ़वाल स्थित सिद्धपीठों में से एक है। लैन्सडान से टैक्सी लेकर आप आसानी से ताड़केश्वर महादेव जा सकते हैं। मुख्य सड़क से यह मंदिर लगभग एक किमी की चढ़ाई पर है। शिवरात्रि के दिन यहां बड़ा मेला लगता है। 
       तो फिर देर किस बात की। घूम आइये एक दिन दो तीन दिन के लिये लैन्सडाउन और फिर लिख भेजिये कि आपको कैसे लगा मेरे बचपन का यह 'शहर'। (धर्मेन्द्र पंत)

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