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मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

पहाड़ी कौथिगौं की शान जलेबी की कहानी

       जलेबी। सुनकर आ गया न मुंह में पानी। जलेबी यूं तो आम भारतीय पकवान है जो उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक देश के हर राज्य में फैला हुआ है। यह अलग बात है कि उत्तर भारतीय इसके ज्यादा मुरीद हैं और तिस पर भी अगर उत्तराखंड की बात करें तो यहां लगने वाले कौथीग यानि मेलों की कल्पना तो जलेबी के बिना की ही नहीं जा सकती है। अगर आप पहाड़ी हैं तो आप जरूर कौथीग गये होंगे और आपने जलेबी का भी भरपूर आनंद लिया होगा। वही गोल गोल रसीली जलेबी, जो पहाड़ के कौथिगों की पहचान हैं। जलेबी बनते हुए तो आप देख ही रहे हैं लेकिन आज हम घसेरी में बात करेंगे जलेबी के इतिहास की। 
     आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जलेबी भारतीय पकवान नहीं है। भारतीयों का जलेबी से परिचय लगभग 550 साल पहले हुआ था। सच कहूं तो जलेबी का इतिहास और इसके भारत में आने की कहानी भी जलेबी की तरह गोलमोल है। एंग्लो इंडियन शब्दों के ऐतिहासिक शब्दकोष 'होबसन जोबसन' के अनुसार जलेबी शब्द अरबी के जुलाबिया या फारसी के जलिबिया से बना है। ईरान में इसे जुलाबिया कहते हैं। वहां दसवीं शताब्दी की पाक कला से जुड़ी कई किताबों में जुलाबिया का जिक्र है। कहा जाता है कि मध्यपूर्व से ही जलेबी भारत में पहुंची। मध्यपूर्व के देशों में जलेबी को जलाबिया कहा जाता है। इनमें भूमध्य सागर से लगा उत्तर अफ्रीकी देश ट्यूनीशिया भी शामिल है। लेबनान में जेलाबिया नाम की एक पेस्ट्री भी मिलती है। मध्यकाल की एक पुस्तक 'किताब—अल—तबीक' में जलाबिया नाम की मिठाई का जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है यह पश्चिम एशिया का मिष्ठान है।


        भारत में जलेबी का सबसे पहला जिक्र 1450 में जैन धर्म के संबंध में लिखी गयी एक पुस्तक में मिलता है। कई भारतीयों का मानना है कि जलेबी भारतीय मिष्ठान है। शरदचंद्र पेंढारकर ने बनजारे बहुरूपिये शब्द में जलेबी का प्राचीन भारतीय नाम कुंडलिका बताया है। संस्कृत में इसे सुधा कुंडलिका कहते हैं। रघुनाथकृत ‘भोज कुतूहल’ नामक ग्रंथ में जलेबी बनाने की विधि बतायी गयी है। कहा जाता है कि भारत में पहले जलेबी का नाम ‘जल-वल्लिका’ था।  संस्कृत भाषा में सन 1600 में एक किताब लिखी गयी थी जिसका नाम था 'गुण्यगुणाबोधिनी', इस किताब में भी जलेबी के बारे में बताया गया है। कहने का मतलब यह है कि जलेबी सिर्फ आपके मुंह में ही पानी नहीं आ रहा है असल में यह सदियों से लोगों के मुंह की लार टपका रही है। भारत में भी जगह के हिसाब से जलेबी के नाम में थोड़ा परिवर्तन आ जाता है। जैसे मराठी में जलेबी को जिलबी और बंगाली में जिलपी कहते हैं। जलेबी की तरह की ही एक मिठाई है इमरती। माना जाता है कि इसका पुराना नाम अमृती यानि अमृत के समान मीठा था लेकिन फारसी प्रभाव के कारण इसे इमरती कहा जाने लगा।
       पिताजी ने बचपन में दूध के साथ जलेबी खाना सिखाया था। वह आदत अब भी नहीं छूटी है। मैं तो जा रहा हूं दूध और जलेबी का आनंद लेने। आप भी आर्डर करिये एक किलो जलेबी और फिर बताईये कि आपको जुलाबिया पसंद है या जल वल्लिका या जलेबी।  आपका धर्मेन्द्र पंत  

शनिवार, 4 जुलाई 2015

चलो भैजी कौथिग जौंला

     बचपन में जब कौथिग की बात आती थी तो मेरे लिये इसका मतलब अपने गांव की कुलदेवी नंदादेवी, पास में स्थित जणदादेवी, माध्योसैण या फिर ईसागर यानि एकेश्वर के कौथिग तक सीमित था। असल में तब ये कौथिग हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा हुआ करते थे और हम इनका बेसब्री से इंतजार करते थे। पहनने को नये कपड़े मिलते थे और इन कौथिग यानि मेलों में सीटी, बांसुरी खरीदने से लेकर जलेबी खाने और बर्फ की आईसक्रीम चूसने का मौका मिल जाता था। कोई दूर का रिश्तेदार मिल जाता तो जेब में दस . बीस पैसे या ज्यादा हुआ तो चवन्नी, अठन्नी डालकर चला जाता तो उसके लिये मन में इज्जत बढ़ जाती थी। नंदादेवी और जणदादेवी कौथिग के लिये हम पांच . दस पैसे इकट्ठा करके रखते थे। जेब में यदि चार . पांच रूपये होते तो कौथिग का आनंद दुगुना हो जाता था। यह 70 और 80 के दशक का किस्सा है जब मैं गांव की संस्कृति और समाज में अपना बचपन बिता रहा था। कौथिग आज भी होते हैं लेकिन दुनिया का डिजिटलीकरण होने के बाद मुझे नहीं लगता कि पहाड़ का आज का बच्चा इन मेलों को लेकर उतना ही उत्साहित होगा जितना कभी मैं या मेरी पीढ़ी के लोग या मेरे से पहले के बच्चे हुआ करते थे। कभी इन कौथिगों में जनसैलाब उमड़ पड़ता था। मैंने देखा है जणदादेवी और एकेश्वर में तिल रखने की जगह तक नहीं बचती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। कौथिग के दिन एकेश्वर के डांडों में लोगों की भीड़ अब महज कल्पना है।
जणदादेवी कौथिग का विहंगम दृश्य। फोटो .. श्री दीनदयाल सुंद्रियाल
     बचपन में एक गीत भी सुना था 'गौचरा को मेला लग्यूं च भारी, मेला म अयीं ह्वेली दीदी, भुली स्याली ....'।  गौचर का मेला एक व्यावसायिक मेला था जिसकी शुरूआत 1943 में हुई थी लेकिन देवभूमि उत्तराखंड में अधिकतर मेले किसी देवस्थल से संबंध रखते हैं। किसी भी देवी या देवता के मंदिर के पास किसी नियत तिथि को कौथिग लगता है। इस तरह से कौथिग में धार्मिक कार्यों के अलावा लोगों को अपने सगे संबंधियों से मिलने और वर्ष भर की अपनी खट्टी मीठी यादों को साझा करने का मौका मिलता था। कोई बेटी अपने मां पिताजी, भाई बहन और गांव वालों से मिलने के लिये इन कौथिगों का बेसब्री से इंतजार करती थी। इसलिए अक्सर कौथिगों में शा​म को विछोह का एक मार्मिक दृश्य भी पैदा हो जाता था। किसी भाग्यशाली बेटी को कौथिग के ​बहाने अपने मायके एक दो दिन बिताने के लिये मिल जाते थे। उसके चेहरे की खुशी यहां पर शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती है। इस तरह की खुशी और पीड़ा की कल्पना आज की 'मोबाइल पीढ़ी' नहीं कर सकती है।
    कौथिग किसी धार्मिक स्थल पर ही लगने का मतलब था कि जाते ही सबसे पहले देवी या देवता को भेंट चढ़ाना। एक पैसे से लेकर दस पैसे तक। कोई सवा रूपया भी रख लेता था। हमें यही कहा जाता था कि जब तक भेंट नहीं चढ़ायी तब तक कौथिग में कुछ खाना पीना नहीं। एक गलत परंपरा भी इन कौथिगों से जुड़ी थी और वह थी पशुबलि देने की। अमूमन बकरों की बलि दी जाती थी। यदि 'अठवाण' होती तो भैंसे की बलि भी दी जाती। मेरे लिये बचपन यह कौथिगों का नकारात्मक पहलू रहा। इधर बकरे का सिर धड़ से अलग होता और दूसरी तरफ लोगों में उसके रक्त का टीका लगाने की होड़ मच जाती। खुशी इस बात की है कि धीरे धीरे लोगों में जागरूकता आयी है और अब कई कौथिगों में बलि प्रथा लगभग समाप्त हो गयी है। कौथिगों में ढोल, दमाउ, हुड़का, डौंर, रणसिंघा आदि बजाये जाते हैं। ढोल की थाप पर यूं कहें कि कौथिगों में पांडव नृत्य या​नि पंडौं पर तो अच्छे खासों के पांव थिरकने लगते थे। कुछ लोगों के शरीर में देवी देवताओं का प्रवेश भी इन कौथिगों का एक हिस्सा रहा है।
   कभी उत्तराखंड के हर गांव में कौथिग होता था। अमूमन इनकी शुरूआत बैशाखी के दिन से होती थी और सितंबर अक्तूबर तक इन सीजन रहता था। अब इनकी संख्या घट गयी है। इसके बावजूद कई कौथिग आज भी उत्तराखंड की पहचान है। इनमें गौचर मेला, श्रीनगर का बैकुंठ चतुर्दशी मेला, उत्तरकाशी का माघ मेला, कोटद्वार के कण्वाश्रम में लगने वाला बसंत पंचमी मेला, अल्मोड़ा का नंदादेवी मेला, बागेश्वर का उत्तरायणी मेला, लोहाघाट का देवीधूरा मेला, टनकपुर का पूर्णागिरी या कालसन मेला, भीमताल में लगने वाला हरेला मेला, काठगोदाम के पास जियारानी का मेला, मुंडणेश्वर का मेला आदि प्रमुख हैं। अकेले पौड़ी गढ़वाल में ही 50 से अधिक बड़े कौथिग लगते हैं। इनमें मुंडणेश्वर, एकेश्वर, जणदादेवी, सल्ट महादेव, अदालीखाल, बिनसर, देवलगढ़, कौड़िया लैंसडाउन का ज्यूनि सेरा का मेला, ताड़केश्वर, संगलाकोटी, देवराजखाल, गिंदी कौथिग, बुंगी कौथिग, नैनीडांडा, रिखणीखाल, बेदीखाल, बीरौंखाल, घंडियाल, नयार घाटी का सत्यवान साबित्री मेला, दीवा मेला, कांडई कौथिग, दनगल (सतपुली), कांडा, थैलीसैण, बैंजरों, लंगूरगढ़ी, डांडा नागराज का कौथिग आदि प्रमुख हैं।
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