पहाड़ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पहाड़ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

ककड़ी : जिसमें समायी हैं पहाड़ियों की यादें

     
         कड़ी अपणा घर गौं कि ककड़ी जीन हम चोर भी बणौं, जीन हम थै गाळि भि खलैं पर फिर भि हम थै वा बौत प्यारि छै। हर पहाड़ी कि ककड़ी दगण कुछ खास याद जुड़ि ह्वेली। आवा आज घसेरी दगड़ इनि खास यादु थै कि ताजा कर दौं। 
             ककड़ी चा पिंपरी ह्वा या खरस्याणा पिंगळु यि सब्या हमरि यादु क पिटारम समईं छन। जरा वे दिन थै याद कारदि जब ककड़ी क लगुला पर पिंगला फूल ऐन। वै दिन बटै बधें जांदि छै एक आस। अब ककड़ी लगलि अर इथगा स्वच्छदै गिच म पाणि आंद बैठि जांदू छाई। सुबेर उठि दिखदा छाई कि पिंपरी लगि छा या न। जनि पिंपरी दिखेंदी छै हम चिल्लाण बैठि जांद छाई ''मां देख पिंपरी लगिग्या'' अर मां तुरंत डंटदि छै, उंगळी न कैर वीं जना। मां थै डैर रैंदि छै कि उंगळी कैरि कि कखि पिंपरी सैड़ि न जा। याद छ तुम थै कि हम द्वीं उंगलौं बीच अंग्वठा डाळि बतांदा छाई कि वखम छ ककड़ी लगीं। पिंपरी जब हर दुसरा दिन बड़ी हूंदि छै त हमरि खुशी भि बडदा जांदि छै। यी पिंपरी एक दिन जब हैरि ककड़ी बण जांद छै त सब्या घर वला मिलि बैठि वींथै खांदा छा। ककड़ी पैलि पिछनै कु हिस्सा थोड़ा कटदा छन अर फिर वैथै बाकि हिस्सा म रगणद छन जब तक कि सफेद झाग नि आ जांदू। ब्वलद छन कि यांसै ककड़ी कु कड़ुपन दूर ह्वेंजांद। लूण दगण ककड़ी खाणौ अपणु अलग हि आनंद छ।



    ककड़ी खाण म मजा औंदु पर ककड़ी चोरी करणौं एक अलग तरौ रोमांच छ। दुसरों कि न अपणि ककड़ी भि चोरी कै खाणि। ककड़ि चोरि करणि भि एक कला छ अर यांक भि कुछ कायदा कानून छा। जनकि चप्पल—जुता पैलि उतार दीणा, फुफसाट ज्यादा नि करणि, कंडली की झसाक चुपचाप कै सैणी। स्कूल जांद दा या गोर चरांद दां पता चैलि जांदू छाई कि कैकि ककड़ी लगीं छ। जब गोट लगदि छै त रात म चोरि कि ककड़ी खाणौं अलग आनंद आंदू छाई। ककड़ी चोरि हूण पर गाळि भी खूब सुणेंदिन अर घारम पिटै भि हूंदा छाई। हर गौं म एक द्वी इना जरूर हूंदा छाई जो ककड़ी चोरि करण म माहिर छा। ब्वनौ मतलब यौछ कि वो ककड़ी चोर क रूप म फेमस हूंदा छाई। भले ब्वलद छन कि चोर गीज़ू कखडी बिटी, बाग गीज़ू बखरी बिटी, पर या बात इक्का दुक्का ककड़ी चोरू पर हि फिट बैठ द। 

वीडियो भी देखें 


            जैं ककड़ी दगण हमरि इथगा याद जुड़ि छन वींक बारम कुछ औरि बता भि जाण जदौं। हमर पहाड़ै ककड़ी अपणा खास स्वाद क कारण अलग पैचाण रखद। ककड़ी कु वानस्पतिक नाम कुकुमिस सैटिवस छ। हिन्दी म ये खुणि खीरा ब्वलदन। अपणि य ककड़ी गुणों कि खान छ। ककड़ी म 95 प्रतिशत पाणि हूंद। ये मा विटामिन ए, बी, सी अर के खूब पये जांद अर यी वजह छ कि ककड़ी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढांद। ककड़ी पिशाब क रोग दूर करद। ये कि तासीर ठंडी हूंद अर यो पुटगै जलन, पित्त या निंद नि आण जन रोगु म भि फैदा पहुचांद। 
             त कन लगी मी दगण तुमथै ककड़ी स्वाद। जरूर बतायां। तुमरू दगड्या धर्मेन्द्र पंत 

सोमवार, 7 नवंबर 2016

जब मुझे दिल्ली से वापस पहाड़ भेजने आया था 'देवदूत'

                                                                                                                 
       ह नब्बे के दशक के शुरूआती वर्षों की एक मायूस शाम थी। नौकरी अब जरूरत बन गयी थी। दिन भर की तलाश के बाद वापस ठिकाने पर लौटने के लिये बस की एक सीट पर सिमटा था मैं। भीड़ तब भी थी और जाम भी। करोलबाग की लाल बत्ती पर हर दुपहिया और चौपहिया सवार अपना वाहन आगे निकालने  की जुगत में दिख रहा था। सबको घर पहुंचने की जल्दबाजी थी। मुझे नहीं। दुपहिया वाहन पर बैठा एक नवविवाहित जोड़ा चुहलबाजी कर रहा था। कौतुहल भी जागा और ईर्ष्या भी हुई।
      ''क्या अभी पढ़ रहे हो?''
      ''जी, नहीं। ''
      पास में बैठे बुजुर्ग ने तंद्रा तोड़ दी थी। सवाल का जवाब हां भी था और न भी। हर पहाड़ी युवा की तरह बीए करने के बाद मैं भी दिल्ली की गलियों में भटकने के लिये आ गया था। कुछ तो दसवीं और 12वीं करने के बाद ही दिल्ली का रूख कर गये थे।  मैं अब प्राइवेट छात्र के रूप में एमए कर रहा था।
''अच्छा तो अब नौकरी कर रहे हो?'' बुजुर्ग का अगला सवाल था।
       ''नहीं तलाश रहा हूं। '' जब पहली बार पहाड़ से बाहर निकला था तो भैजी ने सिखाया था कि किसी भी अनजान व्यक्ति को अपने बारे में नहीं बताना इसलिए स्वर हल्का सा तल्ख हो गया था।
      ''बेटा कहां के रहने वाले हो आप?'' इस बार उनके शब्दों में जिज्ञासा के साथ स्नेह भी था।
     ''पौड़ी ....गढ़वाल।'' मैं अब भी उनमें दिलचस्पी नहीं ले रहा था, इसलिए टालू रवैया अपनाया।
     ''पहाड़ तो इतने सुंदर हैं। फिर दिल्ली क्यों आ गये।'' अब इसका क्या जवाब देता वह तो मैं पहले ही दे चुका था। लेकिन सेवानिवृति की जिंदगी जी रहे वह बुजुर्ग मुझसे मुखातिब होकर बोले जा रहे थे।
      ''आपको वहीं कोई रोजगार तलाश करना चाहिए। दिल्ली में कुछ नहीं रखा है। बेटा मैं अपने अनुभव से बोल रहा हूं यहां तो दो वक्त की रोटी तो मिल जाएगी लेकिन चैन कभी नहीं मिलेगा। ''
       वह धाराप्रवाह बोले जा रहे थे और मेरी खीझ बढ़ती जा रही थी। अब इन्हें कैसे समझाऊं की घर की आर्थिक स्थिति कैसी है और मां पिताजी ने मुझे किस उम्मीद से दिल्ली भेजा है? कुछ बातें वह सही भी कह रहे थे। दिल्ली आने पर कुछ दिन तक आंखों में जलन रही लेकिन अब एक महीना हो चुका था और आंखें अभ्यस्त हो गयी थी।
    ''बेटा ऐसा नहीं हो सकता कि पहाड़ में रोजगार की कमी होगी। बस उसे तलाश करने की जरूरत है। मैं पहाड़ का नहीं हूं लेकिन आप वहां के रहने वाले हो और आपको यह अच्छी तरह से पता होगा कि वहां कैसे ​बेहतर तरीके से जिंदगी जी सकती है। आपको दिल्ली का मोह छोड़ देना चाहिए। ''
     मेरी खीझ अब बढ़ गयी थी और आखिर में साहस करके मैं सीधे शब्दों में उनसे पूछ ही बैठा, ''क्या आप मुझे कहीं नौकरी दिला सकते हो। ''
    मेरे सवाल से शायद उन्हें निराशा हुई। वह थोड़ी देर मौन रहे और मैंने सोचा चलो बला टली। पटेल नगर आने वाला था। उन्होंने अपने झोले से डायरी निकाली। मेरी उम्मीद जाग गयी। शायद ये मेरा कुछ काम कर देंगे। उन्होंने डायरी का निचला हिस्सा फाड़कर उस पर अपना फोन नंबर लिखा और मुझे थमाया।
     ''बेटा मेरी इतनी हैसियत नहीं है कि मैं आपको नौकरी दिला पाऊं लेकिन ये मेरा नंबर है। मेरे सुझाव पर गौर करना और अगर आपको लगे कि दिल्ली छोड़कर वापस पहाड़ लौट जाना चाहिए तो मुझे जरूर फोन करना। मैं मदद करूंगा। ''
    वह कागज की पर्ची मेरे हाथ में थमाकर सीट से उठ गये। मैंने कुछ देर तक उन्हें देखा और फिर मुंह फेर लिया। पर्ची अब भी हाथ में थी। उन बुजुर्ग के बस से उतरते ही पर्ची तार तारकर होकर खिड़की से बाहर लहरा रही थी।
    ''फोन करूंगा तो फिर बुढ़ा यही बड़बड़ाएगा कि पहाड़ लौट जा, पहाड़ लौट जा। कैसे चला जाऊं वापस पहाड़। क्या करूंगा वहां? कुछ भी तो नहीं रखा है वहां। सरकारी नौकरी के नाम पर अगर मिल गयी तो मास्टरी करो और क्या है? बुढ़े को कुछ पता नहीं चला आया भाषण देने।''
      वो दिन और आज की दोपहर। घर से दफ्तर आने को बस में बैठा हूं। ज्यादा कुछ नहीं बदला है लेकिन हवा दमघोंटू है। सांस लेना मुश्किल और आंखें चरमरा रही हैं। पता है वह बुजुर्ग और उनके लिखे फोन नंबर की पर्ची के पुर्जे अब कहीं नहीं मिलेंगे लेकिन आज उनकी सलाह पर गौर करना चाहता हूं।
  धर्मेन्द्र पंत 


------- घसेरी के यूट्यूब चैनल के लिये क्लिक करें  घसेरी (Ghaseri)

------- Follow me on Twitter @DMPant

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

पहाड़ की रामलीला

      रामलीला। यह शब्द भले ही अब उतना आकर्षित नहीं करता है लेकिन कभी हमारे लिये इसके खास मायने होते थे। रामलीला माताओं, बहनों, बहू, बेटियों के लिये असूज यानि आश्विन महीने में खेतों में दिन भर की कमरतोड़ मेहनत के बाद रात में कुछ समय साथ में बिताने का मौका देती थी। रामलीला गांव के युवाओं को पर्दा उठने के बाद अपने अंदर छिपे कलाकार को सामने लाने का अवसर देती थी। रामलीला गांव के माहौल को राममय बनाने का काम करती थी। रामलीला एक समय में गांव में लोगों के मनोरंजन के लिये वही भूमिका निभाती थी जिसकी जगह आज एकता कपूर के धारावाहिकों और कपिल की कामेडी नाइट्स ने ली है। यह पहाड़ों की सत्तर और अस्सी या​ फिर नब्बे की दशक के शुरुआती वर्षों की रामलीला थी। यह वह दौर था तब घरों में बुद्ध बख्शा नहीं पहुंचा था या फिर कुछ घरों तक ही उसकी घुसपैठ थी और तिस पर भी ले देकर एक दूरदर्शन था जो रामायण और महाभारत केवल एक दिन रविवार को और वह भी सुबह दिखाता था।

पहाड़ों में होने वाली रामलीला का एक दृश्य।
           फोटो सौजन्य ... श्री दीनदयाल सुंद्रियाल।
     तो चलिये मेरे साथ पहाड़ों की आज से 20 . 30 साल पुरानी रामलीला का आनंद उठाने के लिये। पहाड़ों में असूज के महीने में बहुत काम होता है। इसलिए कोशिश की जाती थी कि रामलीला कुछ दिन बाद (दशहरे के बाद भी) शुरू की जाए ताकि लोगोें पर काम का अधिक भार नहीं रहे और वे मनोयोग से इसका आनंद ले सकें। यह वह समय होता है जब पहाड़ों में ठंड दस्तक देनी शुरू कर देती है। पहले बिजली नहीं होती थी तो पेट्रोमैक्स (गैस) की रोशनी में रामलीला खेली जाती थी। बिजली आने के बाद भी एक या दो गैस तैयार रखे जाते थे। आखिर बिजली का क्या भरोसा। जब तय हो जाता था कि रामलीला अमुक तारीख से होनी है तो फिर जिज्ञासा का विषय यह होता था कि राम कौन बना है और रावण कौन। इसी तरह से अन्य पात्र भी होते थे। राम, सीता और रावण ही नहीं बल्कि हनुमान, अंगद, छवि राजा, ताड़िका, कुंभकर्ण आदि कुछ ऐसे पात्र होते थे जिनका जिक्र होते ही बरबस किसी खास शख्स का नाम जुबान पर आ जाता था। अच्छी ढील ढौल वाला और खूब गर्जन तर्जन करने वाला व्यक्ति ही रावण बनता था। स्वर सुरीला है तो फिर उसे राम या सीता बना दिया जाता। हां पहाड़ों की रामलीला की खासियत यह थी कि इसमें महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष पात्र ही निभाते थे। महिलाओं की भूमिका रामलीला में यही होती थी कि वे महिला पात्रों की साड़ी अच्छी तरह से लगा देती थी। रामलीला से पहले रिहर्सल में सभी पात्रों को अच्छी तरह से जांचा परखा जाता था। इसी दौरान धनुष, बाण, गदा आदि अस्त्रों को भी तैयार किया जाता था।
    रामलीला अमूमन सात या आठ दिन की ही होती थी। सातवें दिन की रात को रावण बध और आठवें दिन सुबह से लेकर दोपहर तक राजतिलक। हर दिन रामलीला की शुरुआत आरती से होती थी। प्रत्येक दिन दिन नयी आरती। कभी मां दुर्गा तो कभी राम, कृष्ण या विष्णु की। इससे पहले फीता यानि रिबन काटने की रश्म निभायी जाती थी। आखिर मोटा पैसा तो इसी से आता था। फीता कौन काटेगा इसके लिये काफी माथापच्ची करनी पड़ती थी। अगर कोई नौकरी से छुट्टी पर आया है तो उसे फीता काटने के लिये तैयार कर दिया जाता था। किसी के घर में कुछ अच्छा काम हुआ हो तो वह खुद ही इसके लिये हामी भर देता था। रिबन काटने वाला भी अपने सामर्थ्य के हिसाब से पैसे दे देता था, 11 रूपये से लेकर 51 रूपये तक। 101 रूपये बहुत कम।
     पहाड़ों की रामलीला अमूमन रावण, कुंभकर्ण और विभीषण की तपस्या से शुरू होती थी। यदि ​श्रवण की कथा डालनी है तो फिर पहले यह नाटक खेला जाता था। ब्रह्मा अक्सर उसी व्यक्ति को बना दिया जाता था जिसे राम की भूमिका निभानी हो। ब्रह्मा प्रकट होते और रावण के पास आकर कहते ​''एवमस्तु ​तुम बड़ तप कीना ....।'' यह आज तक मेरी समझ में नहीं आया कि रावण तब पूरे जोश में क्यों वरदान मांगता था। प्रोज मास्टर की भूमिका अहम होती थी। उसे आप निर्देशक कह सकते हो। पात्र को अपने कान खुले रखने पड़ते थे क्योंकि प्रोज मास्टर धीमे से संवाद बोलता था जो उसे जोर से दोहराने पड़ते। गलती की गुंजाइश न के बराबर होती थी। सीन समाप्त होने पर प्रोज मास्टर ही सीटी बजाकर पर्दे की डोरी खींच देता और फिर अगले सीन की तैयारी में जुट जाता। रामलीला का सबसे व्यस्त इंसान। इस बीच यदि सीन तैयार होने में देरी है तो कुछ कामिक टाइप के लोगों को पहले ही तैयार कर दिया जाता था। लोगों को हंसाने के लिये जोकर या मसखरे खास तौर पर रामलीलाओं में बुलाये जाते थे। बीच में दानदाताओं के नामों की घोषणा भी की जाती थी। 

मन मोह लेती था राम सीता का पहला मिलन

     रामलीला आगे बढ़ती थी। शिव का कैलाश एक कुर्सी बन जाती थी जिसके ऊपर चादर पड़ी रहती। शिव कुर्सी पर विराजमान हो जाते और पार्वती उसके हत्थे पर। रावण को वही कुर्सी हिलानी पड़ती थी। रामजन्म और फिर राम का मुनियों की रक्षा के लिये वन में जाना। राम की भूमिका निभाने वाले पात्र को चौपाई गाने में माहिर होना पड़ता था। आखिर ताड़िका बध के समय भी राम को ''अरी दुष्ट पापिनी तू जड़ नारी, नहीं जाने हम हैं धनुर्धारी ...'' जैसी चौपाई गानी पड़ती थी। सुबाहू और लक्ष्मण का युद्ध भी रोमांचक होता था।
    लेकिन वह राम और सीता का पहला मिलन होता जो मन मोह लेता। सीता अपनी सखियों के साथ गाती ''पूजन को अंबे गौरी चलियो स​खी सहेली ...। '' सीता के पात्र की पहली परीक्षा यहीं पर होती। लक्ष्मण भी बड़े भाई से कहता कि ''देखो जी देखो महाराज कि वह है लल​नी ..।'' और फिर राम अपनी चौपाई पर आ जाते '' तात जनक तनया यह सोई धनुष यज्ञ जेहि कारण होई ...। '' सीता स्वयंवर का तो सभी बेसब्री से इंतजार करते थे। रामलीला का सबसे लंबा और रोमांचक सीन जिसमें हास्य भी होता और रोमांच भी। राजा ऐसे पात्र होते थे जो राजा कम और मसखरे ज्यादा लगते थे। इनमें छवि राजा की भूमिका अहम होती थी। लोगों को हंसाने की जिम्मेदारी उसी पर रहती। जब वह बोलता ''....पांच बुलाये पंद्रह आये , पंद्रह चौके साठ ...'' यदि तब जनता हंसी नहीं तो मतलब वह अपनी भूमिका में खरा नहीं उतरा। धनुष टूटने के बाद इंतजार रहता था परशुराम . लक्ष्मण संवाद की। यहां पर परशुराम के साथ लक्ष्मण के पात्र की भी अग्निपरीक्षा होती थी। यदि दोनों मंझे होते थे और पूरी तैयारियों के साथ आते थे तो फिर समां बंध जाता था।  
   प्रत्येक दिन के लिये तय होता था कि किस दिन रामलीला कहां तक खेलनी है। राम को वनवास होने पर जब वह नदी पार करते तो एक साड़ी दोनों तरफ से आर पार पकड़ ली जाती थी। उसे हिलाते और केवट के साथ राम, लक्ष्मण और सीता उसे पार करते। सीता का गीत समाप्त होते ही साड़ी लांघकर नदी पार हो जाती थी। शूपर्णखा और मंथरा कौन बनेगा इसके लिये काफी माथापच्ची करनी पड़ती थी। शूपर्णखा ने 'हाय रे नाक कट गयी' कहकर यदि लोगों में हंसी और बच्चों में डर भर दिया तो समझो वह अपने काम में सफल हो गया। रावण केवल एक शॉल अपने मुकुट के ऊपर से ओढ़ लेता और सीता हरण के लिये उसका भेष बदल जाता। हनुमान, बाली और सुग्रीव के पात्रों पर पूरी लिपस्टिक लगा दी जाती। बेचारों को बाद में चेहरा साफ करने में काफी परेशानी होती थी। हनुमान के समुद्र पार करते समय भी नदी बनी साड़ी ही समुद्र बन जाती। अशोक वाटिका में हनुमान यह सुनिश्चित करता कि उसमें अधिक से अधिक फल लगे हों। किसी के बगीचे से मौसमी फल या फिर कुछ सेब, केले खरीदकर मंच पर लटका दिये जाते। हनुमान उसे आधा खाकर जनता की तरफ फेंक देता। लंका दहन के लिये हनुमान की पूंछ लंबी कर दी जाती। उसे मशाल लगायी जाती। हनुमान को हिदायत रहती कि वह आग लगने के तुरंत बाद जनता के बैठने के बीच में बने रास्ते पर एक दो चक्कर लगाये और फिर तुरंत पर्दे के पीछे चला जाए जहां आग बुझाने के लिये पानी की पूरी तैयारी रहती थी। जब युद्ध शुरू होता तो लक्ष्मण के मूर्छित होने पर वही थाली पर्वत बन जाती जिससे दिन के शुरू में आरती हुई थी। उसमें अधिक से अधिक दिये जला दिये जाते थे। युद्ध कई तरह से लड़ा जाता लेकिन रावण की सेना के जिस भी बड़े सेनानायक को मरना होता वह तभी जमीन पर गिरता जब पीछे से पटाखा फूट जाए। कई बार पटाखा फुस्स हो जाता तो संदेश पहुंचा दिया जाता। ''मार दे यार पटाखा फुस्स हो गया। '' सबसे बड़ा पटाखा रावण के लिये सुरक्षित होता था।
    राजतिलक के दिन सुबह से ही गांव में उत्सव सा माहौल रहता था। राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान वास्तव में वन में भेज दिये जाते। उनका मेकअप वहीं होता था। इधर तैयारियां चलने लगती। खूब ढोल नगाड़े बजते। भरत और शत्रुघ्न के साथ पूरे गांववासी राम को लेने आधे रास्ते तक जाते। इसके बाद सब मंच पर लौटते और राम राजा के कपड़े पहनकर सिंहासन पर विराजमान हो जाते। लोगों को पहली बार मंच पर आने का मौका इसी दिन मिलता था। वे राम, लक्ष्मण और सीता के पांव छूकर आशीर्वाद लेते और अपनी तरफ से कुछ भेंट भी रख जाते थे। मेरी खुद की रामलीला से कई यादें जुड़ी हैं। मैं रामलीला में राम भी बना तो उससे पहले महिला पात्र भी। हर पात्र का अलग आनंद होता था। कुछ इसी तरह से होती थी सत्तर और अस्सी के दशक की रामलीला।
आपका धर्मेन्द्र पंत 
    

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

पहाड़ में क्रिकेट और मेरी क्रिकेट टीम

    प्रिय मित्र प्रकाश पांथरी का संदेश आया कि देहरादून में क्रिकेट की उत्तराखंड प्रीमियर लीग चल रही है। सुनकर अच्छा लगा। उत्तराखंड की क्रिकेट में काफी संभावनाएं हैं। वहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है लेकिन दिक्कत यही है कि उत्तराखंड क्रिकेट संघ को अभी भारतीय क्रिकेट बोर्ड से मान्यता नहीं मिली है, इसलिए हमारी रणजी टीम नहीं है और जब तक ऐसा नहीं होता तब तक हमारे खिलाड़ियों को दिल्ली और दूसरे अन्य राज्यों की शरण में ही जाना पड़ेगा। बहरहाल प्रकाश के संदेश से मुझे उत्तराखंड की अपनी क्रिकेट की भी याद आ गयी। संभवत: मेरी पहली और उसके बाद की पीढ़ी या वर्तमान पीढ़ी की यादें भी कुछ इसी तरह से होंगी। आप चाहें तो अपनी इन यादों को नीचे टिप्पणी वाले बाक्स में साझा कर सकते हैं। 
   
पहाड़ो की क्रिकेट बयां करता चित्र
उत्तराखंड की क्रिकेट खेतों में खेली जाती है। सीढ़ीनुमा खेतोें में। शायद ही वहां कोई ऐसा खेत होगा जिसमें सभी बाउंड्री एक ही खेत के अंदर आ जाएं। यहां तो बस कोई थोड़ा चौड़ा सा खेत मिला और वही बन जाता है क्रिकेट का मैदान। अब भले ही साजो सामान होंगे लेकिन एक जमाना था जबकि बल्ला बांज, खड़ीक या किसी अन्य पेड़ की टहनी काटकर बना दिया जाता था। पहले उसे बल्ले का रूप दिया जाता और फिर उस पर कांच की बोतल तोड़कर इतना अधिक 'रंदा' लगाया जाता था कि वह खूब चमकने लग जाए। इस तरह से तैयार होता हमारा 'पहाड़ी विलो' (इंग्लिश विलो और कश्मीर विलो की तर्ज पर)। विकेटों की तो कमी ही नही होती थी। तीन . तीन डंडे तो किसी भी जगह पर उपलब्ध हो जाते थे। कुछ नहीं तो किसी की 'कठगल' (एक साथ रखी गयी ढेर सारी लकड़ियां) से चुपके से दो तीन लकड़ियां खींच ली। अब गेंद की बात कर लें। पहले हम प्लास्टिक गलाकर गेंद बनाते थे। मोम की काली गेंद। कई बार जब वह टन से बल्ले से लगती थी तो पूरा हाथ झनझना जाता था। न पैड, न ग्लब्स, न एल गार्ड न हेलमेट और फिर भी बड़ी बहादुरी से इस काली गेंद का सामना करते थे। बाद में आयी कार्क की बॉल। वह भी माशाअल्ला अगर शरीर पर कहीं लग जाए तो हिस्सा काला पड़ जाता था। फिर भी कार्क की बॉल से खूब क्रिकेट खेली। क्षेत्ररक्षण के लिये कोई नियत स्थान नहीं होते थे। असल में जो ऊपर वाले खेत में पीछे खड़ा है वह तो बल्लेबाज को देख ही नहीं पाता था। अगर आन साइड में पहाड़ी है तो फिर जो शाट किसी समतल मैदान पर मिडविकेट पर आसानी से कैच कर लिया जाता वह वहां छक्का हो जाता था। ऐसे कई छक्के जड़ने वाले वहां कि क्रिकेट की हीरो कहलाते थे।
    इसी तरह से जो नीचे वाले खेतों में खड़े हैं उन क्षेत्ररक्षक महोदय को भी बल्लेबाज की शक्ल या बल्ला नहीं दिखता था। बस शाट पड़ने पर बाकी साथियों के चिल्लाने पर वह समझ जाता था कि गेंद उसकी तरफ आ रही है। थोड़ा हवा में खेले गये कई अच्छे ड्राइव ऐसे खेतों में कैच में तब्दील हो जाते हैं। यह अलग बात थी कि क्रिकेट के कुछ कायदे कानून हमें पता थे और इसलिए हमेशा उन नियमों का सहारा लेकर ही मैच खेलते थे। मैच किसी दूसरे गांव से होते थे। तब 10, 20, 50 या ज्यादा हुआ तो 100 रूपये के मैच खेल लेते थे। बाकायदा क्रिकेट टूर्नामेंट भी हुआ करते थे। उनकी फीस 11, 21, 31 रूपये हुआ करती थी। इनाम में मिलती थी शील्ड या कोई कप।

मेरी प्रिय, मेरी क्रिकेट टीम

    ब मैं बात करता हूं कि स्योली गांव की अपनी क्रिकेट टीम की। पिताजी ने बचपन में ही एक बल्ला ​बना दिया था। यानि पांच छह साल में ही अपुन क्रिकेटर बन गये थे। किशोरावस्था में कदम रखा और फिर बड़े लड़कों की टीम से खेलने लगे। मैं और मेरा चचेरा भाई वीरू (वीरेंद्र पंत) हम दोनों ने अपने से उम्र में 10 . 12 साल बड़े देवेंद्र भैजी, भरतराम भैजी, आनंद भैजी आदि के साथ भी क्रिकेट खेली है। इन लोगों के साथ हम दोनों ने कई बार पारी का आगाज किया। मैं नहीं बता सकता कि हमें पारी की शुरूआत के लिये क्यों भेजा जाता था, क्योंकि गेंद तो पुरानी ही होती थी। अगर गेंद नयी होती तो उसका सामना करने का सौभाग्य हमें प्राप्त नहीं होता था। देवेंद्र भैजी और भरतराम भैजी दोनों बहुत अच्छी क्रिकेट खेलते थे। दोनों आलराउंडर थे, हां देवेंद्र भैजी की एक आदत मुझे याद है वह ओवर की आखिरी गेंद पर रन लेने के लिये जरूर दौड़ते थे ताकि बल्लेबाजी उनके पास ही रहे। इस चक्कर में कई बार हम जैसे नन्हें क्रिकेटर रन आउट हो जाते थे। इनके बाद महेंद्र ​भैजी, चंद्र प्रकाश भैजी, सतीश भैजी आदि के साथ भी क्रिकेट खेली। सच कहूं तो इनमें से हमारी कोई भी टीम मजबूत नहीं थी। हमारा वही हाल था जो भारतीय क्रिकेट टीम का शुरूआती दिनों में था। बहरहाल इस बीच पहली बार गांव में खरीदा हुआ बल्ला आ गया था। उसे शायद सहारनपुर से खरीदा गया था और तब कहते थे कि उसके ऊपर मछली की खाल चढ़ी हुई है। जो भी हो उसे थोड़ी देर हाथ में पकड़ने पर ही मैंने खुद को धन्य मान लिया था क्योंकि उस बल्ले से खेलने के लिये पांच रूपये अदा करने थे जो मेरी जेब में नहीं थे।
बाण्यूं के खेत। जब इनमें फसल नहीं होती थी
तो यह हमारे लिये लार्ड्स बन जाता था।

बहुत मजबूत थी हमारी टीम

    जब हमारी असल टीम बनी तो वह काफी मजबूत थी। समय बदला और हमारे पास दो तीन बल्ले, पैड, ग्लब्स आदि आ गये और हम लेदर की गेंद से खेलने लगे। एल गार्ड और हेलमेट तब भी हमारे पास नहीं थे। वीरू हमेशा हमारा कप्तान रहा। मैं उसके साथ उप कप्तानी करता था। स्वाभाविक है कि वीरू की गैरमौजूदगी में कप्तानी मुझे मिलती। वीरू बहुत तेज गेंदबाजी करता था डेल स्टेन की तरह। मेरा काम था ओपनर या वनडाउन आकर एक छोर पर विकेट संभाले रखना। कट और ड्राइव प्रिय शाट हुआ करते थे मेरे। गेंदबाजी भी कर लेता था। वीरू चाहता था कि जब वह गेंदबाजी करे तो मैं स्लिप में क्षेत्ररक्षण करूं। मुझे याद है कि एक बार उसने हैट्रिक बनायी और तीनों कैच स्लिप में मैंने लिये थे। असल में 12 . 15 फीट की दूरी पर नीचे वाला खेत लगता था तो बल्लेबाज वहां तक गेंद पहुंचाकर रन चुराने के लिये कट करने की कोशिश करता लेकिन मैं स्लिप में उसे कैच कर लेता। मनोज यानि अनुज पंत जैसा धुरंधर खिलाड़ी था हमारे पास। आज जो महेंद्र सिंह धोनी करता है मनोज अस्सी के दशक में वह सब किया करता था। विकेटकीपर के रूप में उसका कोई सानी नहीं था। पलक झपकते ही स्टंप आउट कर देता था। उसके लंबे और करारे शाट जानदार हुआ करते थे। छक्के जड़ने में वह भी माहिर था। परमानंद कुशल क्षेत्ररक्षक था। शायद ही कभी कोई कैच उससे छूटा होगा, जोंटी रोड्स था वह हमारा। रमेश जुयाल की गेंदों में अच्छी तेजी थी। अब सोचता हूं कि वह अनजाने में कभी कभी स्विंग भी करा लेता था शायद। दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज रमेश हमारे बीच नहीं है। विपिन अच्छा तेज गेंदबाज था। आज इशांत शर्मा को देखकर मुझे विपिन की गेंदबाजी की याद आ जाती है। गजेंद्र मोहन मध्यक्रम संभालता था और मनोज का भाई बिजू वो भी जरूरत पड़ने पर अच्छी लप्पेबाजी करता था। पदमेंद्र (पनैली) हमेशा रफ क्रिकेटर रहा लेकिन कभी उसका बल्ला भी चल जाता था। भक्ति स्पिन करा लेता था तो जयप्रकाश कितनी तेज गेंद हो या बाउंसर शरीर पर झेल लेता था। डाइव लगाते हुए मैंने सबसे पहले जयप्रकाश को ही देखा था। राजेंद्र जुयाल आन साइड पर लंबे शाट जमाने में माहिर था। प्रदीप को आप किसी भी क्रम में बल्लेबाजी के लिये भेज दो वह हमेशा तैयार रहता था। वह जुनूनी क्रिकेटर था। चंद्रमोहन ने जब क्रिकेट में रूचि दिखायी तो उसकी खातिर हम गांव से दूर चढ़ाई चढ़कर उसके पास के खेत (मलखेत) में भी क्रिकेट खेलने गये। इनके अलावा कुछ पुछल्ले बल्लेबाज भी थे। जो गेंदबाजी नहीं करते थे और जरूरत पड़ने पर ही उन्हें बल्लेबाजी का मौका मिलता था लेकिन जीत का जज्बा उनमें भी भरपूर था। इन सबके बीच सर्वज्ञानंद को नहीं भुलाया जा सकता। गजब का जज्बा और जुनून था उनमें। हम सभी से उम्र में काफी बड़े। जब फौज से आते थे तो फिर हमारी क्रिकेट चमक उठती थी। एक और फौजी अशोक पर भी हमें भरोसा रहता था, पर वह वालीबाल अच्छा खेलता था। गांव में जब हमारा करियर अवसान पर था तो बिजेंद्र पंत, योगेश आदि ने क्रिकेट की परपंरा बनाये रखी। मैं राजकीय महाविद्यालय चौबट्टाखाल की तरफ से भी क्रिकेट खेला। वहां मैं चंद्रप्रकाश पांथरी यानि प्रकाश पांथरी का कायल था। बहुत तेज गेंदबाजी करता था और जमकर रन भी बटोरता था। लटिबौ का ज्ञान सिंह कलात्मक बल्लेबाज था। कई और साथी थे जिनके साथ मैंने क्रिकेट का पूरा आनंद लिया।

हमारे लिये लार्ड्स था बाण्यूं का खेत 

    मैदान की बात करूं तो गांव में हमारे दो प्रिय मैदान हुआ करते थे। बा​ण्यूं (जिसका फोटो यहां दिया गया है) और पंदरैखोली। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर कोई भी खेत हमारे लिये मैदान बन जाता था। रौताबूण भी स्कूल के नीचे हमने अपने प्रयासों से एक खेत को समतल करके उसे इस लायक बनाया था कि उसमें 22 गज की पिच और स्लिप और शार्ट कवर के क्षेत्ररक्षक समा सकें। स्कूल के समय में पांथर के ऊपर जंगल में समतल सी जगह थी वहां क्रिकेट खेलते थे। उसे सिपाहिखेत कहते हैं। भेटी गांव में भी चोटी पर कुछ समतल खेत थे लेकिन वहां लंबा शाट मारने पर गेंद खो जाने का डर रहता था। गांव से मीलों दूर सुरखेत में भी कई बार क्रिकेट खेली। तब बल्लेबाजी एक छोर से हुआ करती थी। इसलिए यह कह सकता हूं कि दायें हाथ के बल्लेबाज के लिये वहां आफ साइड में खुला मैदान था।
     आपने भी तो पहाड़ों में ऐसे ही मैदानों पर क्रिकेट खेली होगी। पहाड़ की क्रिकेट से जुड़े अपने कुछ किस्से यहां टिप्पणी वाले कालम में शेयर करना नहीं भूलें। आपका धर्मेन्द्र मोहन पंत .....

------- घसेरी के यूट्यूब चैनल के लिये क्लिक करें  घसेरी (Ghaseri)

------- Follow me on Twitter @DMPant

मंगलवार, 17 मार्च 2015

कभी पहाड़ी रसोईघरों की शान होता था 'भड्डू'

      पिछले साल वरिष्ठ पत्रकार भाई त्रिभुवन उनियाल ने गांव आने का न्यौता दिया। उन्होंने गांव में कुछ दिन बिताने के लिये संक्षिप्त रूपरेखा भी तैयारी कर ली थी। इसका सार यही था कि बचपन की यादों को ताजा करना है। ''भड्डू में दाल बनाएंगे ..... तुमने भड्डू की दाल खायी होगी लेकिन एक बार मेरे हाथ से भड्डू में बनी दाल खाओगे तो फिर उंगलियां चाटते रहोगे। '' उनकी बातें सुनकर ही लार टपकने लग गयी थी। त्रिभुवन भाई के न्यौते पर अब तक उनके गांव नहीं जा पाया हूं। 
      पिछले दिनों कवि और वरिष्ठ पत्रकार गणेश खुगशाल 'ग​णी' यानि गणी भैजी अपना कविता संग्रह ''वूं मा बोलि दे'' भेंट कर गये। गढ़वाली में उनके इस कविता संग्रह में एक कविता 'भड्डू' पर भी पढ़ने को मिली। '' भड्डू, न त लमडु, न टुटु, न फुटु, पर जख गै होलु, स्वादी स्वाद रयूं ....।'' 
      और अब एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार और समाचार एजेंसी 'भाषा' में मेरे वरिष्ठ साथी विवेक जोशी जी की फेसबुक वाल पर 'भड्डू' के बारे में पढ़ा,  ''एक ज़माने में हर घर में भड्डू हुआ करता था ....जिसमें पका खाना स्वाद की पराकाष्ठा होती थी ..गढ़वाल में श्रीनगर की बस से जब में अल्मोड़ा आता तो ग्वालदम में बड़े बड़े भड्डुओं में पकी दाल खाता .....। इससे पुरानी यादें फिर से ताजा हो गयीं।
चित्र में नीचे भड्डू है। इसके ऊपर लोटा रखा हुआ है। 
फोटो सौजन्य ​.. 
विवेक जोशी
           मां . पिताजी अब नहीं रहे। बड़ी चाचीजी और छोटे चाचाजी से 'भड्डू' को लेकर बात की। चाचीजी भावुक हो गयी, ''अब कहां वह स्वाद। भड्डू में बनी दाल बहुत स्वादिष्ट होती थी। अब तो बस कुकर में रखो, सीटी बजवाओ और खत्म। कुकर की दाल में भड्डू में बनी दाल का स्वाद थोड़े ही लाया जा सकता है। '' बड़ी भाभीजी ने भी भड्डू को लेकर अपनी यादें ताजा की, ''दादी कहती थी कि भड्डू में दाल रखी है, झैल (आंच) लगी रहनी चाहिए। ''
     भड्डू पीतल या कांसे का बर्तन होता है। कांसे की मोटी परत से बना बर्तन जिसका निचला हिस्सा चौड़ा और भारी जबकि ऊपरी हिस्सा संकरा होता है। पहाड़ों में कई सदियों से भड्डू का उपयोग दाल और मांस पकाने के लिये किया जाता रहा। इसमें दाल बनाने में समय लगता है। विवेक जोशी जी के शब्दों में, ''भड्डू हमें कई सन्देश देता है ...मसलन संयम क्योंकि ये आज का कुकर नहीं है ...साथ ही भड्डू आज की भागदौड की जिंदगी के विपरीत हमेशा फुर्सत के क्षणों का अहसास कराता था।''
     लेकिन तेजी से भागती जिंदगी ने भड्डू को पीछे छोड़ दिया। पहाड़ों के घरों में कुकर चमकने लगे और भड्डू किसी कोने में दम तोड़ने लगा। कथाकार और लेखक शिशिर कृष्ण शर्मा की कहानी, ''बंद दरवाजों का सूना महल'' में एक जगह लिखा है, ''सबसे ज्यादा ताज्जुब मुझे भड्डू को देखकर हुआ। भड्डू, याने कि काँसे का घड़ेनुमा बर्तन जिसका इस्तेमाल कभी पहाड़ों में दाल पकाने के लिए किया जाता था और जिसका तर्पण आम पहाड़ी रसोईघरों में प्रेशर कुकर की घुसपैठ के साथ दशकों पहले हो चुका था। वो ही भड्डू भुवन जी की रसोई में किसी प्रेत की भांति आज भी मौजूद था।'' 


------- घसेरी के यूट्यूब चैनल के लिये क्लिक करें  घसेरी (Ghaseri)


     ड्डू   छोटे . बड़े कई आकार का होता था। छोटा भड्डू परिवार के काम आता था तो बड़ा भड्डू गांव के। गांव में कोई शादी हो या अन्य कार्य बड़े भड्डू (गेडू या ग्याडा या टोखणी) में ही दाल बनती थी। बड़ा भड्डू या ग्याडा भी पंचायत के बर्तन होते थे। यदि किसी के पास ग्याडा होता था तो वह उसे पंचायत को दे देता था। पिछले दिनों चाचाजी ने बताया कि गांव के ग्याडा को उसके मूल मालिक के बेटे ने फिर से अपने पास रख दिया। सच कहूं तो अच्छा नहीं लगा क्योंकि उससे मेरी और मेरी पीढ़ी के कई मित्रों की ढेर सारी यादें जुड़ी हुई हैं। वह इतना भारी था कि खाली होने पर भी दो व्यक्ति मिलकर ही उसे चूल्हे में रख पाते थे। उसमें पानी भी भरकर रखा जाता था। 

   
 बड़ा भड्डू यानि ग्याडा। पहाड़ में कहीं
इसे टोखणी भी कहा जाता है। 
 जिस परिवार में भड्डू होता था उसके पास इसे चूल्हे से उतारने के लिये संडासी भी होती थी। वैसे भड्डू को संडासी से निकालना हर किसी के वश की बात नहीं होती थी। आज भी पहाड़ के कई परिवारों के पास भड्डू होगा लेकिन इनका इस्तेमाल बहुत कम किया जाता है। मेरी तो यही गुजारिश है कि यदि आपके परिवार में भड्डू है तो उसे कोने से निकालिए और फिर उसमें दाल बनाकर खाईये। यह स्वादिष्ट ही नहीं स्वास्थ्यवर्धक भी होगी। 
       भड्डू में दाल बनाने का तरीका भी अलग होता है। दाल बनाने से पहले इसके चारों तरफ राख को गीली करके उसका लेप लगाया जाता था और फिर इसमें दाल या गोश्त बनता था। लंबे समय तक शिक्षा विभाग से जुड़े रहे और प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत होने वाले श्री जीवनचंद्र जोशी ने विवेक जी की पोस्ट पर अपनी टिप्पणी कुछ इस तरह से दी, ''इन बर्तनों का रात में ही चूल्हे की राख से श्रृंगार भी कर दिया जाता था क्योंकि दूसरी सुबह फिर परिवार के लिए इन्हें अपनी ड्यूटी करनी पड़ती थी..।''
        भड्डू में अमूमन उड़द और राजमा की दाल ही बनायी जाती थी। इन दालों को रात में भिगोकर रख दो और सुबह इन्हें भड्डू में पकाओ। इसमें तेल, मसाले और नमक मिलाकर धीमी आंच पर भड्डू में अच्छी तरह से पकने दो और बाद में इसमें लाल मिर्च, जीरा, धनिया और यहां तक कि जख्या का तड़का लगा दो। भड्डू की बनी गरमागर्म दाल खाओगे तो फिर दुनिया के बड़े से बड़े 'सेफ' के हाथों की बनी दाल का स्वाद भी भूल जाओगे। 
       भड्डू पर मैं जितनी जानकारी जुटा सकता था। वह आपके सामने है। आप इसे अधिक समृद्ध कर सकते हैं। कृपया नीचे टिप्पणी वाले कालम में भड्डू पर अपनी जानकारी जरूर साझा करें। आपकी अमूल्य टिप्पणियों का इंतजार रहेगा। 
                                   आपका धर्मेन्द्र पंत



------- Follow me on Twitter @DMPant

     
   © ghaseri.blogspot.in 
                     
     
badge