गुरुवार, 8 अगस्त 2019

कुमांऊ के चंद वंश के राजा

                चंद वंश का संस्थापक कौन था इसको लेकर इतिहासकारों की राय अलग अलग है। कुमांऊ का इतिहास नामक पुस्तक के लेखक बद्रीदत्त पांडे ने अपनी किताब में कन्नौज के चंद वंश के राजकुमार सोमचंद को कुमांऊ में चंद वंश का संस्थापक माना है लेकिन कुछ अन्य इतिहासकार थोहरचंद को चंद वंश का संस्थापक मानते हैं। चंद वंश की स्थापना कब हुई इसको लेकर भी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। श्री बद्रीदत्त पांडे ने सोमचंद का राज्यकाल 700 ईस्वी सन से 721 ईस्वी सन तक माना है मतलब उनके अनुसार चंदवंश की स्थापना 700 ईस्वी सन में हुई थी। कुमांऊ और गढ़वाल के इतिहास के जानकार एडविन थामस एटकिन्सन का मानना था कि चंद वंश की स्थापना सन 953 में हुई जबकि एक अन्य इतिहासकार डा. एम पी जोशी इसे सन 1250 मानते हैं। हम यहां पर श्री बद्रीदत्त पांडे की सूची के अनुसार आपको कुमांऊ के चंद वंश के राजाओं की जानकारी देंगे।

1.             सोमचंद          700—721

             कहा जाता है राजकुमार सोमचंद अपने 27 साथियों के साथ भगवान बद्रीनाथ के दर्शन के लिये आये थे। तब उनका कुमांऊ के कत्यूरी शासक ब्रह्मदेव से संपर्क हुआ और उन्होंने राजकुमार के चाल चलन और रहन सहन से प्रभावित होकर अपनी एकमात्र पुत्री का विवाह सोमचंद से कर दिया। उन्होंने सोमचंद को 15 बीघा जमीन दहेज में दी थी। राजा सोमचंद ने चंपावत में अपना किला बनवाया जिसका नाम 'राजबुंगा' रखा। सोमचंद ने वहां अपना राज्य स्थापित किया तथा चंपावत को अपनी राजधानी बनाया। इनके चार फौजदार या किलेदार थे जिन्हें चार आलों के नाम से जाना जाता था। ये फौजदार थे —कार्की, बोरा, तड़ागी और चौधरी। आपस में लड़ने वाले विभिन्न क्षेत्रीय सरदारों पर जीत दर्ज की। महर और फरत्याल वर्गों की शुरुआत राजा सोमचंद के काल में ही हुई थी।



2.   आत्मचंद        721—740

3.   पूरणचंद                   740-758

4.   इंद्र चंद                     758-778  इस राजा ने कुमांऊ में पहली बार रेशम का कारखाना खोला था।

5.   संसार चंद      778-813     

6.   सुधा चंद       813-833

7.   हमीर चंद उर्फ हरिचंद  833-856

8.   बीणाचंद                   856-869

               राजा बीणाचंद भोग विलास में लीन रहे। इसका फायदा उठाकर खस राजाओं ने कुमांऊ पर अपना आधिपत्य जमा दिया। खस राजाओं ने अपना राष्ट्रीय झंडा फहराया। कन्नौज और झूंसी से आये 'विदेशी राजा और उसके कर्मचारियों' को बाहर भगाने के लिये कहा। खस राजाओं ने लगभग 200 वर्षों तक कुमांऊ पर राज किया। खस राजाओं के बारे में कहा जाता है कि लोकप्रिय नहीं थे लेकिन कुछ शिलालेखों से पता चलता है कि इस दौरान कई मंदिरों का जीर्णोद्धार किया गया। बद्रीदत्त पांडे के अनुसार खस राजाओं के अजीब नाम थे जैसे बिजड़, जीजड़, जड़, कालू, कलसू, जाहल, मूल, गुणा, पीड़ा, नागू, भागू, जयपाल, सौपाल या सोनपाल, इंद्र या इमि।

9.   वीर चंद         1065-1080  कहते हैं कि खसों के शासन के दौरान चंद वंश के राजपूत तराई भाबर चले गये थे। बाद में खसों से परेशान होकर जनता ने तराई से चंद वंश के एक राजकुमार वीरचंद को गद्दी पर बिठाया था। उसने चंपावत पर आक्रमण करके राजा सोनपाल को मारकर फरि से चंदवंश की स्थापना की थी।

10.                रूप चंद         1080-1093 

11.                लक्ष्मी चंद      1093-1113 

12.                धरम चंद       1113-1121 

13.                करम चंद या कूर्म चंद  1121-1140 

14.                कल्याण चंद या बल्लाल चंद    1140-1149 

15.                नामी चंद निर्भय चंद   1149-1170

16.                नर चंद                   1170-1177

17.                नानकी चंद     1177-1195 

18.                राम चंद        1195-1205 

19.                भीषम चंद      1205-1226 

20.                मेघ चंद        1226-1233 

21.                ध्यान चंद      1233-1251 

22.                पर्वत चंद       1251-1261 

23.                थोहर चंद       1261-1275 

24.                कल्याण चंद द्वितीय  1275-1296 

25.                त्रिलोक चंद    1296-1303  छखाता राज्य पर कब्ज़ा किया। भीमताल में किले का निर्माण किया।

26.                डमरू चंद       1303-1321 

27.                धर्म चंद        1321-1344 

28.                अभय चंद      1344-1374 

29.                गरुड़ ज्ञान चंद 1374-1419  भाभर तथा तराई पर अधिकार स्थापित किया। कहते हैं कि बादशाह तुगलक ने इन्हें 'गरुड़' की उपाधि दी थी। इनका सेनापति नीलू कठायत काफी वीर और साहसी था।  कहते हैं कि राजा ने धोखे से अपने सेनापति को मरवाया था।

30.                हरि चंद         1419 -1420

31.                उद्यान चंद    1420-1421  राजधानी चम्पावत में बालेश्वर मन्दिर की नींव रखी। एक साल की मालगुजारी माफ करवायी। चौगर्खा पर कब्जा किया। इनका राज्य उत्तर में सरयू से लेकर दक्षिण में तराई तक तथा पूर्व में काली से लेकर पश्चिम में सुंवाल तक फैला था।

32.                आत्म चंद द्वितीय     1421-1422 

33.                हरी चंद द्वितीय        1422-1423 

34.                विक्रम चंद     1423-1437  बालेश्वर मन्दिर का निर्माण पूर्ण किया। लेकिन बाद में भोग विलास में लीन हो गये।

35.                भारती चंद 1437-1450  डोटी राजा विक्रमचंद को अपनी भोग विलासिता के कारण राजकाज छोड़कर भागना पड़ा था। उनकी जगह उनके भतीजे भारतीचंद राजा बने जो लोकप्रिय, साहसी और चरित्रवान राजा थे। अपने पुत्र कुंवर रत्नचंद की मदद से डोटी राजाओं को परास्त किया। भारती चंद ने अपने जीवित रहते ही 1450 में अपने बेटे रत्नचंद को राजकाज सौंप दिया था। राजा भारती चंद का 1461 में निधन हुआ।

36.                रत्न चंद        1450-1488  बेहद प्रतापी राजा जिनके शासनकाल में कुमांऊ के राजाओं का प्रभाव बढ़ा। जागीश्वर मंदिर में बड़ा भंडारा करवाया था। अपने पिता राजा भारती चंद के निधन के बाद डोटी से दोबारा युद्ध करके उन्हें पराजित किया। बम राजाओं को हराकर सोर को अपने राज्य में मिलाया।

37.                कीर्ति चंद      1488-1503  अपने पिता की तरह वीर और निडर थे। बारामंडल पर विजय प्राप्त की। कैड़ारो—बौरारो को चंद राज्य में मिलाया। पाली और फल्दकोट पर भी विजय पताका फहरायी। पौराणिक बृद्धकेदार का निर्माण सम्पन्न किया तथा सोमनाथेश्वर महादेव का पुनर्निर्माण किया।

38.                प्रताप चंद      1503-1517 

39.                तारा चंद        1517-1533 

40.                माणिक चंद    1533-1542 

41.                कल्याण चंद तृतीय     1542-1551 

42.                पूर्ण चंद        1551-1555 

43.                भीष्म चंद      1555-1560  चम्पावत से राजधानी खगमराकोट में बसायी। आलमनगर की नींव रखी। इस राजा को खस जाति के सरदार श्रीगजुवाठिंगा ने सोते समय मार डाला था।

44.                बालो कल्याण चंद      1560-1568  श्रीगजुवाठिंगा को हराकर बारामण्डल पर फिर से कब्ज़ा किया। राजधानी खगमराकोट से आलमनगर में बसायी जिसका नाम अल्मोड़ा रखा। गंगोली के मणकोटि राजा और दानपुर के छोटे छोटे खस राजाओं को हराकर उन्हें अपने राज्य में मिलाया।

45.                रुद्र चंद         1568-1597  चंद राजाओं में सबसे अधिक विद्धान, शिक्षाप्रेमी, प्रतापी, शूरवीर और दानी राजा। काठ एवं गोला यानि शाहजहांपुर के नवाब हुसैनखां टुकड़िया ने तराई पर कब्जा कर दिया था। राजा रुद्रचंद ने हुसैन खां के निधन के बाद तराई पर फिर से कब्जा किया। रुद्रपुर नगर की स्थापना की तथा वहां महल और किला बनवाया। अस्कोट, दारमा, जोहार और सीरा पर कब्जा किया। कुमांऊ में संस्कृत भाषा के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

46.                लक्ष्मी चंद      1597-1621  राजा रुद्रचंद के बड़े पुत्र शक्तिसिंह अंधे थे इसलिए उनके छोटे बेटे लक्ष्मीचंद ने अपने पिता के निधन के बाद राजकाज संभाला। अल्मोड़ा में लक्ष्मेश्वर और बागेश्वर में बागनाथ मंदिर की स्थापना की। सात बार गढ़वाल पर चढ़ाई की लेकिन हर बार उन्हें हार मिली। एक बार बादशाह जहांगीर के दरबार में भी गये थे।

47.                दिलीप चंद     1621-1624 

48.                विजय चंद     1624-1625 

49.                त्रिमल चंद     1625-1638  राजा लक्ष्मीचंद के चार बेटे थे —दिलीपचंद, त्रिमलचंद, नारायण चंद और नीला गुंसाई। दिलीपचंद ने केवल तीन साल राज किया। उनके पुत्र विजयचंद केवल एक साल राज कर पाये। उनके चाचा त्रिमलचंद उन्हें शासन से हटाकर खुद राजा बन गये थे। राजा विजयचंद ने रसोई दरोगा और राजचेलियों ने मिलकर मारा था इसलिए राजा त्रिमलचंद ने रसोई और राजचेलियों के लिये खास नियम बनवाये थे।

50.                बाज़ बहादुर चंद                   1638-1678  एटकिन्सन के अनुसार दिल्ली के बादशाह यानि औरंगजेब को खुश करने के लिये राजा बाजबहापुरचंद ने कुमांऊ से जजिया भी वसूल किया था और उसे दिल्ली भेजा था। इसके हालांकि कोई प्रमाण नहीं हैं। गढ़वाल के बधानगढ़ और लोहबागढ़ पर चढ़ाई की। तिब्बत पर भी आक्रमण किया। बाजपुर नगर की स्थापना की।

51.                उद्योत चंद    1678-1698  बधानगढ़ पर चढ़ाई की। चार मंदिरों उद्योतचंदेश्वर, पार्वतीश्वर,त्रिपुरादेवी और विष्णुमंदिर का निर्माण करवाया। अल्मोड़ा में रंगमहल बनवाया।

52.                ज्ञान चंद       1698-1708 

53.                जगत चंद      1708-1720  धार्मिक प्रवृति के राजा थे। कहा जाता है कि राजा जगतचंद ने 1000 गायें दान की थी।

54.                देवी चंद        1720-1726  इस राजा के बारे में कहा जाता है कि वह अपने सलाहकारों की हाथों की कठपुतली थे और उन्होंने पिता द्वारा जमा किये गये धन को दान किया लेकिन इसमें से अधिकतर धन उनके दरबारी हड़प गये थे।

55.                अजीत चंद     1726-1729  राजा ज्ञानचंद की बेटी का लड़का जिसके पिता का नाम नरपतसिंह कठेड़िया था। गैड़ा बिष्टों ने राजा देवीचंद को मारकर अजीतचंद को गद्दी पर बिठाया था लेकिन वह कठपुतली राजा ही रहे। इस दौरान पूरनमल और वृद्ध पिता मानिकचंद गैड़ा बिष्ट ने राजकाज संभाला। उनके अन्यायपूर्ण राज्यकाल को कुमांऊ में 'गैड़ागर्दी' नाम से जाना जाता है।

56.                कल्याण चंद पंचम      1729-1747 गैंडागर्दी के दिनों में ही राजा अजीत सिंह की हत्या कर दी गयी थी। उनके स्थान पर राजा उद्योतचंद के छोटे बेटे कल्याणचंद को राजा बनाया गया जो पूर्व में अपने भाई के डर से डोटी में गरीबी में दिन बिता रहे थे। इस राजा ने पूरनमल और मानिकचंद गैड़ा के अत्याचारों से लोगों को मुक्ति दिलायी। इस राजा के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने चंदवंश के कुंवर और रौतेलों को मारने का आदेश दिया था। इनके समय में रोहिला सरदार अली मोहम्मद खान ने कुमांऊ पर चढ़ाई करके विजय प्राप्त की थी लेकिन वे राजा से धन लेकर वापस लौट गये। रोहिलों ने दूसरी बार आक्रमण किया लेकिन वे पराजित हो गये।

57.                दीप चंद        1747-1777 कल्याचंद के निधन के बाद उनके बेटे दीपचंद ने छोटी अवस्था में राजकाज संभाला। पानीपत की तीसरे युद्ध में मराठों के खिलाफ रोहिल्लों का साथ दिया था। मिलनसार और दयालु प्रवृति के थे। इनके समय में कुमांऊ में सुख शांति रही। इनके राज्यकाल में शिवदेव जोशी का काफी प्रभाव था। राजा दीपचंद को षडयंत्र के तहत कैद किया गया जहां उनकी मौत हुई।

58.                मोहन चंद      1777-1779  गढ़वाल के राजा ललितशाह ने राजा मोहनचंद को पराजित करके अपने पुत्र प्रद्युम्नशाह को कुमांऊ की गद्दी सौंप दी थी जो प्रद्युम्नचंद के नाम से राजा बने।
59.                प्रद्युम्न शाह प्रद्युम्न चंद      1779 -1786  राजा ललितशाह की दूसरी रानी डोटियाली रानी से जन्में पुत्र। राजा ललितशाह का गढ़वाल लौटते समय बीमार होने से निधन हो गया था। गढ़वाल के राजा उनके बड़े पुत्र जयकृतशाह बने लेकिन उनकी अपने सौतेले भाई प्रद्युम्नशाह से नहीं बनी। जयकृतशाह के आकस्मिक निधन के बाद गढ़वाल लौटे जिसका फायदा उठाकर मोहन चंद ने फिर से कुमांऊ की सत्ता हासिल कर ली।

60.                मोहन चंद      1786-1788  दूसरी बार भी अधिक समय तक राजकाज नहीं चला सके। राजा मोहनचंद को मारकर चतुर राजनीतिज्ञ हर्षदेव जोशी ने राजा प्रद्युम्नशाह को फिर से गद्दी संभालने को कहा था। आखिर में उन्होंने राजा उद्योतचंद के रिश्तेदार शिवसिंह को शिवचंद नाम से राजा नियुक्त किया था। 

61.                शिव चंद        1788 कुछ महीनों तक ही राज कर पाये। नाममात्र के राजा। सारा राजकाज हर्षदेव जोशी देखते थे। कुंवर लालसिंह से पराजित होकर हर्षदेव जोशी के साथ गढ़वाल भाग गये थे।

62.                महेन्द्र चंद     1788-1790 मोहनचंद के पुत्र। इनके राज्यकाल में जोशियों को काफी परेशान किया गया।

चंदवंश का अंत 
         राजा दीपचंद के समय से ही क्षेत्र में अराजकता फैल गयी थी। इसके वंशजों के आपस में ही लड़ते रहने का फायदा गोरखाओं ने उठाया और अल्मोड़ा पर आधिपत्य किया जिसके साथ ही चंद वंश का भी अंत हो गया।


                                                              आपका धर्मेन्द्र पंत 

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रविवार, 23 जून 2019

पहाड़ों की कोयल हिलांस

             
           ढ़वाल और कुमांऊ के कवियों और गीतकारों की रचनाओं में अहम स्थान पाने वाला पक्षी है हिलांस। खुदेड़ गीतों का पक्षी जिसकी कूक सुनकर ससुराल में काम में व्यस्त कोई  नवविवाहिता  मायके की यादों में खो जाती थी। बसंत में जब चारों तरफ फूल खिले होते हैं तब हिलांस अपनी समधुर आवाज से इनमें चार चांद लगाता है। यही वजह है कि पहाड़ों की कोयल कहे जाने वाला हिलांस गीतकारों की पसंद बन गया। हिलांस को अंग्रेेजी में Great barbet और Great Himalayan Barbet कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम Megalaima virens है। नीदरलैंड के पक्षी विज्ञानी पीटर बोडार्ट (1730 – 6 May 1795) ने हिलांस का वैज्ञानिक नाम Psilopogon virens बताया था। यह Megalaimidae परिवार से संबंध रखता है।
          भारत में उत्तराखंड के अलावा जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल के पर्वतीय क्षेत्रों, सिक्किम, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम और त्रिपुरा में भी यह पक्षी पाया जाता है। भारत के अलावा पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमा, थाईलैंड, चीन, लाओस और वियतनाम में भी हिलांस प्रजाति के पक्षी रहते हैं। Source : Birds of India 
             हिलांस को हिन्दी में त्रिहो, असमी में हेतुलुका, तिब्बती में कुन न्योंग, नेपाली न्यहुल या नयाल कहा जाता है। हिलांस लगातार पीहू पीहू का स्वर निकालते हैं। 
              हिलांस की लंबाई 30 से 35 सेंटीमीटर और वजन 160 से 300 ग्राम होता है। इसमें नर और मादा का भेद करना मुश्किल होता है क्योंकि दोनों एक जैसे दिखते हैं। हिलांस अपनी मधुर आवाजा से लुभाता है लेकिन इसमें कई रंगों का समावेश होता है और इस वजह से भी यह लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करता है। इसका सिर और गला गहरे नीले रंग का तो चोंच पीले रंग की होती है। चोंच लंबी होती है जिसके आगे के हिस्से का ऊपरी भाग का कुछ हिस्सा काले रंग का होता है।  हिलांस का गला और पूंछ छोटी होती है। हिलांस की पीठ का गर्दन के पास वाला हिस्सा गहरे भूरे रंग का होता है। पीठ का बीच का हिस्सा भूरे रंग का होता है जिसमें हल्का पीलापन भी होता है। पीठ का निचला हिस्सा हरे रंग से सजा रहता है। पूंछ का ऊपरी भाग हरे रंग का होता है जिसमें पीले रंग की हल्की रेखाएं होती है। हिलांस का निचले हिस्से का अगला भाग गहरे भूरे रंग का होता है। इसके बाद का हिस्सा हल्के नीले रंग जबकि पेट पीला और हरा रंग लिये होता है। पूंंछ के पीछे वाले भाग का अगला हिस्सा लाल रंग का होता है।
           हिलांस ऊंचे पेड़ों पर रहना पसंद करता है। इसलिए इसे देवदार के वृक्ष खास प्रिय हैं। पहाड़ी गांवों के आसपास यह पक्षी खड़ीक, तूण आदि के पेड़ों पर रहना पसंद करते हैं। हिलांस उत्तराखंड में मुख्य रूप से 1000 से 3000 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। सर्दियों के समय हिलांस निचले हिस्सों में आ जाते है।  यह समूह में नहीं रहता है। जंगली फल जैसे अंजीर, पयां, तथा फूल, बीज आदि इसके प्रमुख भोजन है। कभी कभी यह कीड़े मकोड़े भी खाता है। हिलांस का प्रजनन काल फरवरी से सितंबर तक होता है। कोयल की तरह हिलांस भी घोसला बनाने में मेहनत नहीं करता। यह मुख्य रूप से ​पेड़ की सुराख में या ऐसे सुराख में अंडे देता है जिसे किसी अन्य चिड़िया ने छोड़ रखा हो। हिलांस एक बार में दो से चार अंडे देती है जिनसे 15 दिन में चूजे बाहर निकल आते हैं।
            हिलांस को लेकर यह थी संक्षिप्त सी जानकारी। अब यह गीत गुनगुनाना नहीं भूलना हिलांस उड़ी हिलांस उड़ी जा, मेरो रैबार मांजी में बतै जा ...... आपका धर्मेन्द्र पंत 

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गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

नवयौवनाओं को समर्पित गीत है थड़िया


       उत्तराखंड के मशहूर नृत्यगीतों में से एक है थड़िया। यह नवयौवनाओं को समर्पित गीत है। थड़िया 'थाड़' शब्द से बना है। थाड़ का मतलब है आंगन। बसंतपंचमी से लेकर बैशाखी तक गढ़वाल के गांवों में किसी के आंगन में लोकगीतों का आयोजन किया जाता है। गांव के लोग विशेषकर महिलाएं इन गीतों में भाग लेती हैं। थड़िया इन गीतों का अहम अंग है।

        सेरा कि मिडोळयूँ नै डाळि पयाँ जामी, नै डाळि पयाँ जामी 
        द्यबतूं का सतन, नै डाळि पयाँ जामी

      ड़िया को देवताओं का नृत्य माना जाता है जिसमें नवयुवतियां हिस्सा लेती हैं। मधुर गीतों और ताल के साथ होता है थड़िया जिनकी विषय वस्तु धार्मिक भावना से लेकर प्रकृति और समाज में घटित घटनाएं होती हैं। गढ़वाल में चैत के महीने में विवाहित बेटियां अपने मायके आती हैं और इन गीतों के जरिये अपने बचपन और यौवन को याद करती हैं। थड़िया में नर्तकों को दो टोलियों में बांटा जाता है। नर्तक एक दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर लयबद्ध तरीके से गीत गाते हुए आगे बढ़ते हैं। इस गीत में सिर, कमर और पांवों का तालमेल बनाये रखना अहम होता है। एक मशहूर थड़िया गीत यहां पर दे रहा हूं।

रणिहाट नि जाणो गजेसिंह
राण्यूं को रणिहाट गजेसिंह 
मेरो बोल्युं मान्याली गजेसिंह  
हळज़ोत का दिन  गजेसिंह  
तू हौसिया बैख गजेसिंह  
सया तीला बाखरी गजेसिंह  
छाट्ट -छाट्ट छींकदी गजेसिंह  
बड़ा बाबू का बेटा गजेसिंह  
त्यरा कानू कुंडल गजेसिंह  
त्यरा हाथ धागुला गजेसिंह  
त्वे राणि लूटली गजेसिंह  
तौन मारे त्यरो बाबू गजेसिंह  
वैर्यों को बंदाण  गजेसिंह  
त्वे ठौन्ऱी मारला गजेसिंह  
आज न भोळ गजेसिंह  
भौं कुछ ह्वे जैन गजेसिंह  
मर्द मरि जाण गजेसिंह  
बोल रइ जाण गजेसिंह  

              कैसी लगी आपको थड़िया के बारे में यह संक्षिप्त जानकारी जरूर बतायें। घसेरी का अपना यूट्यूब चैनल है जिसमें ​थड़िया और उत्तराखंड के अन्य लोकगीतों और लोकनृत्यों के बारे में जानकारी दी गयी। यूट्यूब चैनल पर जाने के लिये नीचे घसेरी पर क्लिक करें। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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मंगलवार, 26 मार्च 2019

बिन्देश्वर या बिनसर महादेव : कभी पांडवों ने की थी यहां पूजा

     उत्तराखंड देवभूमि है। यह असल में मंदिरों का गढ़ है जिसमें प्रत्येक मंदिर का अपना विशेष महत्व है। उत्तराखंड में ही केदार क्षेत्र में पांच शैव पीठ आते हैं — ताड़केश्वर महादेव, एकेश्वर महादेव, बिन्देश्वर महादेव, क्यूंकालेश्वर महादेव और किल्किलेश्वर महादेव। हम एकेश्वर महादेव और ताड़केश्वर महादेव की पहले चर्चा कर चुके हैं। आज बात करते हैं बिंदेश्वर महादेव की। इन पांचों शैव पीठ पर घसेरी के यूट्यूब चैनल पर वीडियो प्रेषित किया गया है जो लोगों को काफी पसंद आ रहा है।  
        बिनसर महादेव मंदिर पौड़ी गढ़वाल जिले के ही थलीसैण ब्लॉक की चौथाण पट्टी में स्थित है। यह थलीसैण से लगभग 22 किमी और जिला मुख्यालय पौड़ी से लगभग 114 किमी और कोटद्वार से लगभग 175 किमी दूर है। यह दूधातोली डांडा में स्थित यह मंदिर बांज, देवदार आदि के वृक्षों से घिरा है जिससे इसकी प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। बिनसर को भगवान शिव और माता पार्वती की पावन स्थली माना जाता है।
       गढ़वाली में बिनसर का मतलब सुबह की बेला होता है, लेकिन इसे बिन्देश्वर मंदिर भी कहते हैं। माना जाता है कि राजा पृथ्वी जिसे स्थानीय भाषा में राजा पिरथु कहते हैं, ने अपने पिता बिंदु की याद में बिनसर मंदिर का निर्माण करवाया था। इसी कारण इसे बिंदेश्वर महादेव कहा जाता है। मंदिर के निर्माण को लेकर हालांकि एकमत नहीं है। 
         कुछ पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय इस जंगल में बिताया था और तब उन्होंने यहां पर भैरवनाथ के मंदिर का निर्माण किया था। कहा जाता है कि केवल एक रात में उन्होंने मंदिर का निर्माण किया और पूजा अर्चना के बाद अज्ञातवास पर निकल गये थे। मंदिर के गर्भगृह में गणेश, हरगौरी और महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा भी स्थापित है। महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा पर नागरी लिपि अंकित है जिससे पता चलता है कि यह प्रतिमा नौवीं शताब्दी या उससे पहले स्थापित की गयी थी।
       बिनसर महादेव 2480 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर बैंकुंठ चर्तुदशी के अवसर पर मेला लगता है। गढ़वाल और कुमांऊ की सीमा के पास में स्थित होने के कारण मेले में दोनों मंडलों विशेषकर पौड़ी, अल्मोड़ा, चमोली और रूद्रप्रयाग जिलों के लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। यहां पर भी इस अवसर पर संतान प्राप्ति के लिये खड़रात्रि की जाती है। बोलो जय बिनसर महादेव। .... आपका धर्मेन्द्र पंत 

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

स्वस्थ जीवन और फिटनेस का मूलमंत्र बन गया है 'वीगन'

             क्या आप बता सकते हैं कि भारत का सबसे फिट खिलाड़ी कौन है? मुझसे पूछा जाएगा तो मैं झट से विराट कोहली का नाम लूंगा। कोहली ने फिटनेस के लिये जीवनशैली पूरी तरह से बदल दी है। वह शुद्ध शाकाहारी बन गये हैं। असल में वह वीगन (Vegan) बन चुके हैं। इसका मतलब है कि उन्होंने मांस ही नहीं बल्कि दुग्ध उत्पादों का भी त्याग कर दिया है। इससे उन्हें अधिक ऊर्जावान और फिट बनने में मदद मिली। कोहली की पहल पर भारतीय फुटबाल टीम के कप्तान सुनील छेत्री वीगन बने और उन्हें अपनी फिटनेस में सकारात्मक बदलाव नजर आये। सेरेना विलियम्स को तो आप जानते ही हैं। एक बच्चे की मां और 37 साल की सेरेना आज भी टेनिस कोर्ट पर अपने से आधी उम्र की युवा खिलाड़ियों के छक्के छुड़ाती हैं। सेेरेना भी शुद्ध शाकाहारी यानि वीगन हैं। इसकी प्रेरणा उन्हें अपनी बड़ी बहन वीनस विलियम्स से मिली। 
             फार्मूला वन में अभी चोटी के रेसिंग ड्राइवर लुई हैमिल्टन भी वीगन हैं। फुटबालर लियोनेल मेस्सी मांस या दुग्ध उत्पादों का सेवन नहीं करते क्योंकि वह खुद को फिट रखना चाहते है। उन्होंने  Nutritionist (पोषण विशेषज्ञ) की सलाह पर ऐसा किया और पाया कि इससे उनके शरीर में सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं। अर्जेंटीना के उनके साथी सर्जियो एगुएरा, कोलंबिया के सेबे​स्टियन पेरेज, इंग्लैंड के जर्मेन डेफो जैसे कई अन्य फुटबालर वीगन हैं। माइक टायसन का नाम तो आपने सुना ही होगा। कभी होलीफील्ड का कान चबाने वाला एक मुक्केबाज 2013 में वीगन बन गया था। उनका कहना है, ''वीगन बनने से मुझे स्वस्थ जिंदगी जीने का एक और मौका मिला।'' एक अन्य हैवीवेट मुक्केबाज डेविड हेय भी वीगन हैं। सूची बहुत लंबी जिसमें महान धावक कार्ल लुईस, आस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज पीटर सिडल, टीएनए विश्व चैंपियन पहलवान एस्टिन एरीज आदि आदि शामिल हैं। 
        अब भारतीयों की बात करते हैं। हमारी संस्कृति शाकाहार से जुड़ी है। हमारे रिषि मुनि वीगन हुआ करते थे। हिमालय में धुनि रमाये रखने वाला साधु वीगन होता है। कोई भी असली साधु वीगन होता है जिससे उन्हें विषम परिस्थितियों में भी खुद को स्वस्थ रखने में मदद मिलती है। भारत में पिछले दो दशकों से 'जिम' की नयी संस्कृति पैदा हुई जिसने भारतीयों के दिमाग में एक बात भरी कि अगर बॉडी—शॉडी बनानी है तो अंडे खाओ, मांस भक्षण करो, खूब प्रोटीन खाओ। यहां तक कि दूध में अंडा मिलाकर खाने का बेहद ही घृणित और विरोधाभासी भोजन करने की सलाह ये नासमझ जिम वाले देते हैं। इसके लिये वे प्रोटीनयुक्त पाउडर की सिफारिश भी करते हैं जिसमें शक्तिवर्धक दवाईयों की अधिकता होती है। अगर इस तरह के भोजन से ही ताकतवर बनना है तो जिम जाने की क्या जरूरत? विभिन्न जिम के इन नासमझ और अधकचरे ट्रेनर के चंगुल में फंसे तमाम लोगों को बता दूं कि जो तस्वीर मैंने यहां पर लगायी है वह बर्नी डुप्लेसिस की है जो शुद्ध शाकाहारी यानि वीगन हैं। वह बॉडी बिल्डर हैं और उन्हें 2014 में मिस्टर यूनीवर्स चुना गया था। इससे कई वर्ष पहले वह वीगन बन गये थे। आप गूगल में Alexander Dargatz, Patrik Baboumian, Dominick Thompson, Nimai Delgado, Samantha Shorkey, Anastasia Zinchenko, Karl Bruder, Victoria Lissack आदि के नाम सर्च कर लो। ये सभी बॉडी बिल्डर हैं और वीगन हैं। 
        वीगन बनने का मतलब है कि कोलस्ट्राल और हृदयगति से लेकर एकाग्रता और रात को अच्छी नींद सभी में सुधार। आप मांस, अंडे और दुग्ध उत्पाद छोड़ दीजिए और फिर देखिये सकारात्मक परिवर्तन। मैं बचपन से शुद्ध शाकाहारी हूं और दुग्ध उत्पादों ने कभी मुझे लुभाया नहीं। इसलिए कई बार वीगन बनने का मन किया। अब संकल्प ले लिया है। .... और हां कितने लोग मेरा अनुसरण कर रहे हैं?
आपका धर्मेन्द्र पंत

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