बाल और बाळ, ढोल और ढोळ, मोल और मोळ, घोल और घोळ, पितलु और पितळु। क्या आप एक जैसे दिखने वाले इन शब्दों का अंतर जानते हैं? अगर आप गढ़वाली या कुमाउंनी लोकभाषा की जानकारी रखते हैं तो आपको इनका अंतर स्पष्ट करने में दिक्कत नहीं होगी। 'ल' और 'ळ' के कारण पूरा अर्थ बदल जाता है। मसलन बाल अर्थात बाल जैसे सिर के बाल जबकि बाळ मतलब जलाओ। माना जाता है कि 'ळ' गढ़वाली में विशिष्ट ध्वनि है, लेकिन यह केवल उत्तराखंड की लोकभाषाओं तक ही सीमित नहीं है। असल में 'ळ' का साम्राज्य काफी विस्तृत है लेकिन हिन्दी में इस अक्षर को नकार देेने के कारण यह उपेक्षित हो गया। मराठी और दक्षिण भारतीय भाषाओं में 'ळ' का धड़ल्ले से उपयोग होता है। वहां हालांकि इसका उच्चारण गढ़वाली की तरह नहीं किया जाता है। अंग्रेजी में इसे 'L', 'LA' और 'ZH' के रूप में लिखा जाता है। इसलिए दक्षिण भारतीय भाषाओं में 'ळ' का उच्चारण हिन्दी के 'झ' जैसा तो मराठी में 'ड़' की तरह लगता है। इसलिए जब हम उनका हिन्दी में उच्चारण करते हैं तो 'ळ' खो जाता है। आईए आज गढ़वाली लोकभाषा को केंद्र में रखकर 'ळ' पर चर्चा करें।
'ळ' को हिन्दी में नहीं अपनाया और इसलिए हम मानने लगे कि यह गढ़वाली का ही कोई विशेष अक्षर है लेकिन असल में ऐसा नहीं है। देवनागरी लिपि के व्यंजनों में 'ळ' अक्षर है। आप मराठी वर्णमाला देखिये। उसमें आपको 'ह' के बाद 'ळ' दिखायी देगा। 'कीबोर्ड' में भी यह अक्षर है और इसका कारण यही है कि मराठी में इसका बहुत उपयोग होता है। रेमिंगटन कीबोर्ड में अंग्रेजी की 'G' वाली 'key' को 'Shift' के साथ दबाने से जबकि फोनेटिक में 'N' वाली 'key' को 'Shift' के साथ दबाने से आपका 'ळ' मिल जाएगा।
हरियाणवी, राजस्थानी जैसी लोकभाषाओं में 'ळ' अक्षर का उपयोग किया जाता है। संस्कृत की बात करें तो वैदिक संस्कृत में यह अक्षर मिलता है। यही वजह है कि वेदों, उपनिषदों और पुराणों में 'ळ' है लेकिन आम बोलचाल की संस्कृत में यह अक्षर नहीं है।
अब 'ळ' के उच्चारण की बात करते हैं। जीभ को ऊपर की तरफ मोड़कर जिह्वाग्र के निचले भाग को मुखगुहा की छत से लगाकर 'ल' बोलने पर उसका मूर्धन्य भेद अर्थात 'ळ' का उच्चारण होता है। अगर आप मराठी सुनेंगे तो यह 'ड़' के अधिक करीब लगेगा लेकिन गढ़वाली में ऐसा नहीं है जहां यह 'ल' का मूर्धन्य भेद ही है। असल में र, ल, ळ, ड, ड़ ये पांचों अक्षर वैकल्पिक वर्ण हैं तथा 'ळ' को 'ल' का पृथक वर्ण माना जाता है। दक्षिण भारतीय भाषाओं जैसे तमिल, मलयालम आदि में इसका उच्चारण 'ल' और 'ड़' का मिश्रण लगता है। एक उदाहरण कनिमोझी करुणानिधि का है। उनका नाम असल में कनिमोझी नहीं है। हिन्दी समाचार पत्रों और चैनलों में उनका यही नाम लिखा और बोला जाता है। अंग्रेजी में उनका नाम 'Kanimozhi' लिखा जाता है और इसलिए हिन्दी में इसे कनिमोझी कर दिया गया जबकि इसका उच्चारण 'कनिमोळी' होना चाहिए था लेकिन क्या करें हिन्दी में 'ळ' नहीं है और अंग्रेजी चैनलों का इससे कोई लेना देना नहीं है।
गढ़वाली और कुमांउनी जैसी लोकभाषाओं में 'ळ' का विशेष महत्व है। हिन्दी की तरह गढ़वाली भी देवनागरी लिपि पर निर्भर है लेकिन गढ़वाली वर्णमाला में 'ळ' अतिरिक्त व्यंजन रखना ही होगा जैसा कि हिन्दी में नहीं है। गढ़वाली में कई ऐसे शब्द हैं जिनमें 'ल' और 'ळ' से उनका संपूर्ण अर्थ बदल जाता है। इन शब्दों को बोलने और समझने से आपको 'ल' और 'ळ' के बीच का अंतर भी पता चल जाएगा।
आला — आएंगे आळा — मकान की दीवार पर सामना रखने की जगह
कल — बीता या आने वाला कल कळ — उपाय, तरतीब
कालि — देवी मां काळि — काले रंग की
खाल — त्वचा, चमड़ा खाळ — पहाड़ों पर समतल स्थल
गाल — गाल, कपोल गाळ — गाली
घोल — घोंसला घोळ — घोलना, घोलो
चाल — आकाशीय बिजली चाळ — छानना
छाल — पेड़ का छिलका छाळ — धोना
जाला — जाएंगे जाळा — जैसे मकड़े का जाळा
डालि — टोकरी डाळि — छोटा पेड़
ढोल — एक वाद्ययंत्र ढोळ — फेंकना
तौली — छोटी पतीली तौळी — उतावली
दिवाल — दीवार दिवाळ — दीवाली
नाल — जैसे घोड़े, बंदूक की नाल नाळ — गर्भ में बच्चे को आहार पहुंचाने वाली नलिका
पाल — फलों को पकाने की विधि पाळ — दीवार
बेल — लता बेळ — समय
भेल — छत्ता भेळ — खड़ी ढलान
मोल — मूल्य मोळ — गोबर
यकुला — अकेला यकुळा — एक बार
लाल — रंग लाळ — लार
सिलौण — सिलवाना सिळौण — विसर्जित करना
हाल — दशा, हालचाल हाळ — आंच
ऐसे कई अन्य शब्द हैं जिनमें 'ल' और 'ळ' में अंतर आ जाता है। ब्लॉग में इस पोस्ट के नीचे टिप्पणी वाले कालम में जरूर ऐसे शब्दों का जिक्र करें। 'घसेरी' को इंतजार रहेगा। आपका धर्मेन्द्र पंत
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कहते हैं कि जब दो भाषाएं आपसी संपर्क में आती हैं तो उससे दोनों समृद्ध होती हैं लेकिन इसका कई बार नकारात्मक असर भी पड़ता है क्योंकि जो भाषा प्रभावी होती है वह हावी हो जाती है और ऐसे में दूसरी भाषा के शब्द मरने लग जाते हैं। अंग्रेजी के प्रभाव और विशेषकर हिन्दी के कुछ समाचार पत्रों में जिस तरह से धड़ल्ले से अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग किया जा रहा है उससे हिन्दी के कई प्रचलित शब्द भी नेपथ्य में जा रहे हैं। यही हाल स्थानीय भाषाओं का भी है। पिछले दिनों मैंने अपनी फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट लिखी थी कि 'आप' गढ़वाली शब्द नहीं और गढ़वाल में सम्मान के लिये 'तुम' का उपयोग होता है। इस पर सार्थक चर्चा हुई और कुछ उपयोगी जानकारी भी मिली। घसेरी में इस बार हम बात 'आप' और 'तुम' को लेकर ही करते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि गढ़वाली में बात करते समय कोई भी आप का उपयोग इसलिए करता है क्योंकि उसे लगता है कि वह सामने वाले को पर्याप्त सम्मान दे रहा है। वैसे इसके लिये 'तुम' पर्याप्त है लेकिन जब जुबान पर हिन्दी चढ़ी होती है तो गढ़वाली बोलते समय भी तुम बोलने में हिचकिचाहट होती है। यही कारण है कि आप अब गढ़वाली में घुसपैठ कर चुका है। गढ़वाली में बात करते समय साफ लग जाता है कि 'आप' इसमें घुसपैठिया है। ठेठ गढ़वाली में 'आप' या 'आपका' के लिये अब भी कोई स्थान नहीं है। अपने से बड़ों के लिये सम्मानजनक शब्द के तौर पर आज भी 'तुम' और 'तुमारा, तुमरा, तुमारू, तुमरू' का ही उपयोग होता है। जैसे 'तुम कख जाणा छयां', 'तुमन क्या खाण', 'तुमरा हथ में क्या च' आदि आदि। आप औपचारिक लगता है तुम नहीं। आप के सामने अपना दुख बयां नहीं किया जा सकता है लेकिन तुम के सामने दिल खोलकर बात की जा सकती है। गढ़वाली की युवा कवयित्री नूतन तन्नू पंत ने सही कहा है कि गढ़वाली में आप बोलने पर अपना भी पराया नजर आता है। तुम में अपनापन है आप में नहीं। उन्होंने गढ़वाली में सुंदर शब्दों में 'आप' और 'तुम' के बीच भावनात्मक भेद करने का अच्छा प्रयास किया है। नूतन लिखती हैं, ''जख तक "अाप" अर "तुम" कु सवाल च त आप थैं बड़ु आदर सूचक शब्द समझिदी बजाए तुम का पर हमरि गढ़वळि मा आप ब्वलदे ही अपणु बि पर्या नजर आन्द,ऑखु लगद पर अगर हम "तुम " से कैथे सम्बोधित करदो त ये शब्द मा इतगा अपण्यास च कि कखि दूरु कु बि अपणू सि लगद। ये मा क्वी शक नीच कि हमरि गढ़वळि अपन्वत्व अर अपण्यास कि प्रति मूर्ति च !!''
कहां से पैदा हुए 'आप' और 'तुम'
सबसे पहले हिन्दी में अपनी अहम जगह बनाने के बाद अब स्थानीय लोकभाषाओं में घुसपैठ करने वाले 'आप' और भारतीयों के अपनत्व से जुड़े रहे 'तुम' शब्दों के मूल के बारे में जानने की कोशिश करते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 'आप' असल में हिन्दी का शब्द नहीं है। वेदों में आप शब्द है लेकिन किसी के सम्मान के लिये नहीं बल्कि पानी या जल के लिये उसका उपयोग किया गया है। वेदों में जल के लिये 'आपः' या 'आपो देवता' कहा गया है। ‘ऋग्वेद’ के पूरे चार सूक्त ‘आपो देवात’ के लिए समर्पित हैं। तो सवाल उठता है कि हिन्दी में 'आप' शब्द कहां से आया? नेशनल बुक ट्रस्ट के हिन्दी विभाग के संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी के अनुसार ''आप पर्शियन से आया है उर्दू के रास्ते।'' मतलब उन मूल बोलियों में आप नहीं था जिनसे हिन्दी विकसित हुई।
हिन्दी, अंग्रेजी और गढ़वाली साहित्य पर समान रूप से अधिकार रखने वाले मशहूर लेखक श्री भीष्म कुकरेती का भी कहना है कि आप का गढ़वाली में उपयोग नहीं होता है। श्री कुकरेती के शब्दों में, ''आप माने ओप लगण याने बरगद के नीचे न पनपना। संस्कृत में तुम ही है। आप अरबी है या उर्दू, अधिकतर प्रोफेट को आप से पुकारते हैं की आपने ....। आप मुगलों के कारण नही बल्कि स्वतंत्रता के बाद सभ्यता का प्रतीक बन गया। गुजरात में या महराष्ट्र में तुम ही प्रयोग होता है वे भी अब आप पर आ गये हैं।'' स्वतंत्र पत्रकार और लेखक श्री विनायक कुलाश्री शिवार्पणं ने सही कहा कि भाषा-बोली सतत विकसित होती रहने वाली महानद है। उन्होंने कहा, ''हिन्दी स्वयं उर्दू के आप शब्द से नफासत और सभ्यता को पोषित कर रही है। खड़ी बोली क्षेत्रों में तू और तुम का जो पोस्टमार्टम किया जाता है वह भाषाविदों की परिकल्पनाओं से भी पृथक है। तथापि मनुज समुदाय में संवेदनाओं और मंतव्यों को शाब्दिक रुप में विनिमय करने के लिये किसी भी भाषा का समय-समय पर परिष्कृत और सुसंस्कृत होना आवश्यक हैं।''
अब 'तुम' की बात करते हैं। भारतीय लोकभाषाओं का अध्ययन करने पर पता चलता है कि यहां हिन्दी की जितनी भी उपबोलियां या भाषाएं हैं उनमें एक समय में आप शब्द का अस्तित्व था ही नहीं। गढ़वाली और कुमाउंनी ही नहीं मराठी, बृज, राजस्थानी, हरियाणवी, गुजराती, मगही, पंजाबी आदि किसी भी भाषा को सुन लीजिए वहां आपको 'आप' नहीं मिलेगा। वहां तू, तुम, तेने से काम चलता है। यहां तक कि संस्कृत भाषा, जो विज्ञान सम्मत है, उसमें भी आप नहीं है। संस्कृत में अधिकतर 'त्वम' का उपयोग होता है जिससे कि हमारी लोकभाषाओं का 'तुम' बना है। संस्कृत के विद्वान श्री सच्चिदानंद सेमवाल के शब्दों में, ''तुम शब्द संस्कृत के त्वम् शब्द का तद्भव है। मध्यम पुरुष के लिए शास्त्रों में प्रायः इसी शब्द का प्रयोग है देवी देवता या भगवान् के लिए भी। लेकिन विशेष सम्मान के लिए भवान् शब्द का प्रयोग भी होता है और उसके साथ प्रथम पुरुष की क्रिया लगती है। जैसे भवान् पठति आदि। आप शब्द संस्कृत में है ही नहीं तुम के लिए।'' शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े श्री महेश कुड़ियाल का मानना है कि गढ़वाली संस्कृत के करीब है। उनके शब्दों में, ''गढ़वाली संस्कृत के निकट है, जहां परमात्मा के लिये भी, त्वमेव, माता च पिता त्वमेव .. त्वमादि देव पुरुष: पुराण, त्वम् ही प्रयुक्त होता है, त्वं ब्रम्हा वरुणेन्द्र रुद्र मरुत: सर्वत्र त्वं ही प्रयुक्त है। आप का आत्मपरत्व या आप्प दीपो भव आदि पाली से हिन्दी में स्वयं के लिये प्रयुक्त होते होते, दूसरों पर भी प्रयुक्त हो गया .. जो सम्मान सूचक बन गया है .. तुम के साथ क्रिया में निवेदन जैसे तुम चलणां या तुम करणां, तुम करला यह गढ़वाली की विशेषता है।''
औपचारिक संबंधों को थामे रखने के लिए 'आप'
गढ़वाली साहित्य में अब भी 'तुम' का ही उपयोग होता है। वैसे गढ़वाली की कुछ पत्रिकाओं में आपसी बातचीत में कभी कभार आप का उपयोग कर दिया जाता है जो खटकता भी है। साहित्य में हालांकि 'तुम' का बोलबाला है। गढ़वाली के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री दीनदयाल सुंद्रियाल 'शैलज' भी मानते हैं कि आप औपचारिक है। श्री सुंद्रियाल के शब्दों में, ''मुझे तो बचपन मे, अपने हमउम्र दोस्तों, प्रियजनों और माँ, दीदी आदि को भी तू कहना ही अच्छा लगता था।'' भाषा कोई भी हो मां के लिये अधिकतर एकवचन यानि तू या तुम का उपयोग किया जाता है। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक श्री माधव चतुर्वेदी ने इसे अच्छी तरह से समझाया है। उनके शब्दों में, ‘‘चूंकि उत्तर भारत के परिवारों में पति अपनी पत्नी से बातचीत में एकवचन का प्रयोग करता है और पत्नी अपने पति के लिये बहुवचन बरतती है। इस कारण बच्चे भी अपने पिता के लिये बहुवचन का प्रयोग करते हैं और मां के लिये एकवचन का प्रयोग। यह विशुद्ध तौर पर घर के बड़ों से मिला भाषा का संस्कार है। ’’
इसी तरह से योगी आशीष ड़ोभाल ने लिखा, ''तू वह महान शब्द है जिसको पचाना हर किसी के बस की बात नही। तू शब्द का प्रयोग मुख्यता बिना संकोच और धारा प्रवाहिता के साथ एक जन्मदाता माँ और दूसरा जगतमाँ या भगवान के लिए किया जाता है और इन्होंने कभी तू को बुरा नही माना बाकि अन्य की तो नाक लग जाती है।'' लेखक, पत्रकार और शिक्षाविद श्री संजय अथर्व ने सही कहा है कि औपचारिक संबंधों को बनाये रखने के लिये आप है, आपसी मित्रता और गहरे संबंधों के लिये। बकौल श्री अथर्व, ''गढ़वाल, राजस्थान, अवध या कि हमारी मगध की मगही सभी में आप का कोई अस्तित्व नही है। तू ही तू छाया है। इसलिये आप 'आप' के लिए चिंतित नहीं हों। औपचारिक संबंधों को थामे रखने के लिए आप है।''
अब गढ़वाली, कुमांउनी या अपनी लोकभाषा बोलते समय 'आप' का उपयोग करना है या 'तुम' का, यह फैसला आपको खुद करना है। जहां तक मेरा सवाल है तो अपनी गढ़वाली में मुझे 'तुम' ही पसंद है लेकिन हिन्दी में भारी भरकम शब्द 'आप' के साथ ही जीना पड़ेगा। हिन्दी में लिख रहा हूं इसलिए आप का उपयोग कर रहा हूं .......आपका धर्मेन्द्र पंत। ------- घसेरी के यूट्यूब चैनल के लिये क्लिक करें घसेरी (Ghaseri)
पिछले दिनों के आपके दो ट्वीट पढ़ने को मिले और तभी से मेरा मन था कि आपके साथ इस विषय पर संवाद करूं। मैं पौड़ी गढ़वाल जिले के स्योली गांव का मूल निवासी हूं लेकिन फिलहाल नयी दिल्ली में बसा हुआ हूं। पेशे से पत्रकार हूं और वर्तमान में समाचार एजेंसी पीटीआई भाषा में कार्यरत हूं। यह मेरा संक्षिप्त परिचय है। महोदय, आपने दोनों ट्वीट में स्थानीय बोली या भाषा में लोगों से संवाद करने की बात की है। मुझे आपके ट्वीट से महान नेल्सन मंडेला का कथन याद आ गया। उन्होंने कहा था, ‘‘अगर आप किसी व्यक्ति से उस भाषा में बात करते हैं जिसे वह समझता है तो वह उसके केवल दिमाग तक जाएगी लेकिन यदि आप उस से उसकी भाषा में बात करते हैं तो वह उसके दिल तक जाएगी।’’ स्वाभाविक है कि जब स्थानीय भाषा में लोगों से बात करेंगे तो वह उनके दिलों तक जाएगी।
आपके ट्वीट से यह भी स्पष्ट होता है कि आप स्थानीय लोकभाषाओं पर मंडरा रहे खतरे को लेकर चिंतित हैं। असल में जिस तरह से गढ़वाली, कुमांउनी, जौनसारी आदि उत्तराखंड की तमाम भाषाओं को बोलने वाले लोगों की संख्या में कमी आ रही है तो चिंताग्रस्त होना स्वाभाविक है और मुझे खुशी है कि आप इसके प्रति गंभीर हैं।
भैजी मुझे लगता है कि इस संदर्भ में सबसे पहले हमें अपनी लोकभाषाओं के बारे में जानना और फिर उन पर मंडरा रहे खतरों के कारणों का पता लगाना जरूरी है। विश्व भर में स्थानीय भाषाओं पर मंडरा रहे खतरे से यूनेस्को से लेकर भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण तक में चिंता जतायी है। भारत में 1961 की जनगणना में 1652 भाषाओं का जिक्र किया गया है लेकिन 2001 की जनगणना में केवल 122 भाषाओं के बारे में ही बताया गया है। आज ही मैंने एक हिन्दी दैनिक में खबर पढ़ी कि देश की 400 भाषाएं अगले 50 वर्षों में खत्म हो जाएंगी और अचानक ही दिमाग में अपने उत्तराखंड की भाषाएं तैरने लगी।
रावत जी आपने एक पुरानी कहावत सुनी होगी ‘‘कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बाणी।’’ उत्तराखंड में यह अक्षरशः लागू होती है। यहां भाषाओं की भरमार है लेकिन देश भर की 800 से अधिक भाषाओं पर सर्वे करने वाली सरकारी संस्था ‘पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इंडियन लैंग्वेज’ यानि पीएलएसआईएल ने इसमें उत्तराखंड की 13 भाषाओं को स्थान दिया था। ‘भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण’ में भी इन 13 भाषाओं को ही रखा गया है। इन भाषाओं में गढ़वाली, कुमांउनी, जौनसारी, जौनपुरी, रवांल्टी, बंगाणी, जाड़, जोहारी, बुक्साणी, राजी, मार्च्छा, थारू और रंघल्वू शामिल हैं। यूनेस्को ने एक सारणी तैयार की थी जिसमें विश्व की उन सभी भाषाओं को शामिल किया था जो असुरक्षित हैं या जिन पर खतरा मंडरा रहा है। उत्तराखंड की दो प्रमुख भाषाओं गढ़वाली और कुमांउनी को इसमें ‘असुरक्षित’ वर्ग में रखा गया था। जौनसारी और जाड़ जैसी भाषाएं ‘संकटग्रस्त’ जबकि बंगाणी ‘अत्याधिक संकटग्रस्त’ की श्रेणी में आ गयी। अगर वर्तमान स्थिति नहीं बदली तो हो सकता है कि आने वाले 10—12 वर्षों में ही बंगाणी लोकभाषा खत्म हो जाए। भोटान्तिक भाषाएं जैसे जोहारी, मार्च्छा व तोल्छा, जाड़ आदि ‘संकटग्रस्त‘ बन गयी हैं। राजी तो लगभग खत्म होने के कगार पर है। गढ़वाली और कुमांउनी उत्तराखंड की प्रमुख भाषाएं हैं लेकिन इन दोनों पर हिन्दी और अंग्रेजी पूरी तरह से हावी हैं। ऐसे में बाकी भाषाओं की स्थिति अधिक दयनीय बन गयी है।
यूनेस्को के अनुसार, ‘‘यदि किसी भाषा को तीन पीढ़ी के लोग बोलते हैं तो वह सुरक्षित है, यदि दो पीढि़यां बोल रही हैं तो वह संकट में है और यदि केवल एक पीढ़ी बोल रही है तो उस भाषा पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।’’ इस कसौटी पर अगर हम उत्तराखंड की भाषाओं को रखते हैं तो स्थिति गंभीर है और अपनी अगली पीढ़ी को अगर अब भी हमने अपनी भाषाओं के प्रति जागरूक नहीं किया तो फिर आगे हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाएंगे।
भैजी सबसे बड़ा सवाल यह है कि उत्तराखंड की लोकभाषाएं अगर ''संकटग्रस्त'' बनीं तो क्यों? आपको याद होगा कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन का मुख्य मुद्दा था ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी’ को पहाड़ में रोकना है लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। उत्तराखंड राज्य के गठन से पहले ही पहाड़ के गांव खाली होने शुरू हो गये थे। उत्तराखंड की भाषाएं आज अगर संकट से गुजर रही हैं तो उसका सबसे बड़ा कारण है पलायन है। सबसे पहले आपको पलायन रोकने और शहरों में बस चुके पहाड़ियों को गांवों की तरफ आकर्षित करने के लिये ठोस कदम उठाने होंगे। पलायन के पीछे रोजगार बड़ा कारण है और सचाई यह है कि अब तक उत्तराखंड में स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने के सरकार की तरफ से कोई विशेष प्रयास नहीं किये गये। बेहतर शिक्षा और चिकित्सा का अभाव भी एक कारण है जिसके लिये लोग दिल्ली, देहरादून, मुंबई जैसे शहरों में बस गये तथा नयी पीढ़ी के लिये गढ़वाली, कुमांउनी, जौनसारी आदि अपनी भाषा पीछे छूट गयी। लोगों के दिमाग में यह बात बैठ गयी है कि यदि हम अपने बच्चों को अपनी भाषा सिखाते हैं तो वे पिछड़ जाएंगे। इसके लिये अब आपको खुद अपनी भाषाओं का 'ब्रांड एंबेसडर' बनना होगा। आपको लोगों को अपने घरों में स्थानीय भाषा में बात करने के लिये प्रेरित करना होगा। जैसा कि आपने अपने ट्वीट में कहा है, अगर आप उस पर पूरी तरह से अमल करते हैं तो लोगों को भी इससे प्रेरणा मिलेगी। लोगों के दिमाग में यह बात बिठानी होगी कि अपनी भाषा में बात करना हीन भावना नहीं बल्कि सम्मान की बात है। यह संदेश घर घर तक पहुंचाने में आप अहम भूमिका निभा सकते हैं।
मुख्यमंत्री जी उम्मीद है कि आपको यह पत्र उबाऊ नहीं लग रहा होगा। लेकिन भैजी यह गंभीर विषय है क्योंकि जब भाषा जिंदा रहती है तो उसके साथ भूगोल, इतिहास, संस्कृति, सरोकार, कृषि, बागवानी, पशुपालन, परंपराएं, पूरी संस्कृति और सामाजिक सरोकार भी जिंदा रहते हैं। भाषा बदलने के कारण पहाड़ की संस्कृति और परंपराएं भी प्रभावित हो रही हैं।
उत्तराखंड की भाषाओं को बचाने के लिये कहा जा रहा है कि इसे पाठ्यक्रम में शामिल कर देना चाहिए। मैं भी इस कदम का समर्थक हूं। यूनेस्को की महानिदेशक इरिना बुकोवा का कहना है कि ‘‘अच्छी शिक्षा के लिये मातृभाषा जरूरी अवयव है जो असल में महिलाओं ओर पुरुषों के साथ उनके समाज को भी मजबूत बनाने की नींव है।’’ पिछले साल मैंने अपने ब्लॉग में उत्तराखंड की भाषाओंपर लिखा था तो सवाल उठे थे कि क्या इन लोकभाषाओं को भाषा कहना सही होगा क्योंकि यह भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं हैं और इसकी लिपि भी नहीं है। मैंने तब पीपुल्स लिंगुइस्टिक सर्वे के संयोजक गणेश देवी के एक बयान का सहारा लिया था। उन्होंने कहा था, ‘‘जिसकी लिपि नहीं है उसे बोली कहने का रिवाज है। इस तरह से तो अंग्रेजी की भी लिपि नहीं है। उसे रोमन में लिखा जाता है। किसी भी लिपि का उपयोग दुनिया की किसी भी भाषा के लिये हो सकता है। जो भाषा प्रिंटिंग टेक्नोलोजी में नहीं आयी, वह तो तकनीकी इतिहास का हिस्सा है न कि भाषा का अंगभूत अंग। इसलिए मैं इन्हें भाषा ही कहूंगा।’’ संविधान भी हमें इन भाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने की छूट देता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350ए में प्राथमिक स्तर पर अपनी भाषा में शिक्षा की सुविधा देने की बात की गयी है।
भैजी एक बड़ा सवाल यह भी है कि उत्तराखंड की भाषाओं को यदि पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है तो उन्हें किस तरह से समायोजित किया जाए क्योंकि 13 भाषाओं के अलग अलग नहीं रखा जा सकता है। मुझे इसका एक सरल उपाय लगता है कि तीन मुख्य भाषाओं गढ़वाली, कुमांउनी और जौनसारी को उनके क्षेत्रों के हिसाब से पाठ्यक्रम में शामिल करके उनके ज्यादा करीबी भाषाओं के कुछ अध्याय उसमें शामिल किये जा सकते हैं। पाठ्यक्रम में वहां की संस्कृति, वहां के लोक गीतों, मुहावरों, लोक कथाओं, लोकोक्तियों, किवदंतियों, पहेलियों आदि को शामिल किया जा सकता है। कहने का मतलब है कि पाठ्यक्रम रोचक होना चाहिए।
रावत साहब अगर भाषा पाठ्यक्रम का हिस्सा बनती है तो वह रोजगार भी पैदा करेगी। अगर उत्तराखंड की भाषाओं को आप किसी तरह से रोजगार से जोड़ने में सफल रहते हैं तो नयी पीढ़ी खुद ही इन भाषाओं को सीखने का प्रयास करेगी। अभी उत्तराखंड की भाषाओं का सबसे कमजोर पक्ष यही है कि वे रोजगार की भाषाएं नहीं हैं। उनका आर्थिक पक्ष बेहद कमजोर है। हमें अपनी भाषाओं को नयी तकनीकी से भी जोड़ना होगा। हमें स्थानीय भाषाओं की उन विभिन्न पत्र पत्रिकाओं को सहयोग देना होगा जिनमें से अधिकतर आर्थिक संकट के कारण दम तोड़ रही हैं या किसी तरह खींचतान के जिनका प्रकाशन किया जा रहा है।
भैजी आखिर में मैं यही कहूंगा कि प्रत्येक भाषा का एक संपूर्ण इतिहास और भूगोल होता है। जब एक भाषा खत्म होती है तो उसे बोलने वाले पूरे समूह का ज्ञान भी लुप्त हो जाता है। इस संपूर्ण ज्ञान को बचाने की जिम्मेदारी अब आपके मजबूत कंधों पर है। हम सब आपके साथ हैं। हमारा सहयोग हमेशा आपके साथ बना रहेगा। शुभकामनाओं सहित।
आपका भुला
धर्मेन्द्र पंत
एक पलायक पहाड़ी ‘‘दशा और दिशा : उत्तराखंड की लोकभाषाएं’’ के लेखक ------- घसेरी के यूट्यूब चैनल के लिये क्लिक करें घसेरी (Ghaseri)
पिछले साल उत्तराखंड की लोक भाषाओं से संबंधित एक किताब पर काम करते हुए मेरी उत्तराखंड की भाषाविद और लेखिका श्रीमती कमला पंत से कुमांउनी भाषा को लेकर लंबी बातचीत हुई। उन्होंने तब जिक्र किया था कि किस तरह से कुछ कुमांउनी शब्द हिन्दी ने अपनाये। इस संबंध में उन्होंने श्री सुमित्रानंदन पंत से जुड़ा एक किस्सा भी सुनाया था। बकौल श्रीमती कमला पंत, ''मैं जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में थी तो वहां पर तीन दिनों तक निराला जयंती होती थी। वहां पर बड़े बड़े विद्धान आते थे। एक बार सुमित्रनंदन पंत जी ने कविता पाठ करते हुए कहा, ‘फैली खेतों में दूर तलक मख़मल की कोमल हरियाली’। हिन्दी के बाकी कवियों ने विरोध किया कि ‘तलक’ तो कोई शब्द ही नहीं है। उन्होंने फिर बताया कि यह कुमांउनी का शब्द है। फिर धीरे - धीरे यह शब्द हिन्दी ने भी अपना लिया जबकि यह कुमांउनी (यह शब्द गढ़वाली में भी बोला जाता है) का है।''
वैसे सुमित्रानंदन पंत या उत्तराखंड से संबंध रखने वाले अन्य कवियों और लेखकों ने अपने लेखन में गढ़वाली, कुमांउनी या अपनी अन्य लोकभाषाओं के शब्दों का उपयोग बहुत कम किया है जबकि उत्तराखंड की लोकभाषाएं हिन्दी को समृद्ध करने की क्षमता रखते हैं। अगर पंत जी ने अपनी कविताओं में कुमांउनी के चुनिंदा शब्दों का ही उपयोग किया तो इसका कारण यह भी था कि तब उत्तराखंड की इन लोकभाषाओं पर आज की तरह खतरा नहीं मंडरा रहा था। आज स्थिति बदली हुई है और ये लोकभाषाएं खतरे में हैं ऐसे में इनके शब्दों को भी संरक्षण की जरूरत है और इसमें कोई भी लेखक, कवि, गीतकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। गढ़वाली और कुमांउनी में गंध, ध्वनि आदि के लिये कई शब्द हैं जबकि हिन्दी में इनके लिये कोई विशेष शब्द नहीं है। ऐसा कोई संदर्भ आने पर इनका उपयोग किया जा सकता है। मुझे याद है कि वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रभाष जोशी ने मालवा क्षेत्र में उपयोग होने वाले शब्द 'अपुन' का खूब उपयोग किया और बाद में हिन्दी ने उसे अपना लिया। अब भी कई लेखक इस शब्द का उपयोग कर लेते हैं।
यह तो थी शब्दों के उपयोग की बात। आज श्री सुमित्रानंदन पंत का 117वां जन्मदिवस है। बीस मई 1900 को जन्में इस सुकुमार कवि ने अपनी किशारोवस्था कौशानी और अल्मोड़ा में बितायी थी और इसलिए उनकी कविताओं में इन दोनों स्थानों का सुंदर वर्णन मिलता है। उनके बचपन का नाम गुसांई दत्त था लेकिन वह रामायण के लक्ष्मण के चरित्र से प्रभावित थे और इसलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर सुमित्रानंदन पंत कर दिया था। पंत जी 'प्रकृति के चितेरे' थे लेकिन उन्होंने कुमांउनी में बहुत कम या यूं कहें कि सिर्फ एक कविता लिखी थी। यह कविता भी बुरांश पर लिखी गयी थी। आप भी श्री सुमित्रानंदन पंत की कुमांउनी में लिखी गयी इस कविता का आनंद लीजिए।
सार जंगल में त्वि ज क्वे न्हां रे क्वे न्हां,
फुलन छै के बुरूंश! जंगल जस जलि जां।
सल्ल छ, दयार छ, पई अयांर छ,
सबनाक फाडन में पुडनक भार छ,
पै त्वि में दिलैकि आग, त्वि में छ ज्वानिक फाग,
रगन में नयी ल्वै छ प्यारक खुमार छ।
सारि दुनि में मेरी सू ज, लै क्वे न्हां,
मेरि सू कैं रे त्योर फूल जै अत्ती माँ।
काफल कुसुम्यारु छ, आरु छ, अखोड़ छ,
हिसालु, किलमोड़ त पिहल सुनुक तोड़ छ ,
पै त्वि में जीवन छ, मस्ती छ, पागलपन छ,
फूलि बुंरुश! त्योर जंगल में को जोड़ छ?
सार जंगल में त्वि ज क्वे न्हां रे क्वे न्हां,
मेरि सू कैं रे त्योर फुलनक म' सुंहा॥
श्री सुमित्रानंदन पंत को सादर नमन।
आपका धर्मेंद्र पंत
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गढ़वाली में पत्र—पत्रिकाओं के प्रकाशन की परंपरा 100 साल से भी पुरानी है। गढ़वाली में लेखन की शुरुआत अनुवाद से हुई थी और बाद में 1905 में देहरादून से 'गढ़वाली' नाम की पत्रिका के प्रकाशन से कविता और साहित्य लेखन भी होने लगा। बाद में गढ़वाली में कुछ अन्य पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ लेकिन इनमें से अधिकतर लंबे समय तक नहीं चल पायी। ऐसी ही एक पत्रिका थी 'धाद' जिसका प्रकाशन श्री लोकेश नवानी और श्री जगदीश बडोला के प्रयासों फरवरी 1987 में शुरू हुआ था। श्री नवानी और श्री बडोला दोनों ही सरकारी कर्मचारी थे। यही वजह थी कि 'धाद' का पंजीकरण श्री बडोला जी की धर्मपत्नी श्रीमती सुशीला बडोला के नाम से किया गया। वह इस पत्रिका की संस्थापक संपादक भी हैं। 'धाद' से तब कई गढ़वाली लोग जुड़े। बाद में पत्रिका तो बंद हो गयी लेकिन 1991 में 'धाद' ने एक सामाजिक संगठन का रूप ले लिया।
अब वरिष्ठ पत्रकार, कवि और लेखक श्री गणेश खुगशाल 'गणी' के प्रयासों से 'धाद' पत्रिका का अगस्त 2015 से फिर से प्रकाशन शुरू हुआ है। इसे नये कलेवर, नये स्वरूप और वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखकर प्रकाशित किया जा रहा है। यह पत्रिका पूरी तरह से गढ़वाली भाषा में है और इसमें गढ़वाली साहित्य के अलावा वहां की संस्कृति और परंपराओं का समावेश किया जा रहा है। ऐसे समय में जबकि यूनेस्को जैसी संस्था ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि गढ़वाली भाषा पर खतरा मंडरा रहा है तब श्री गणेश खुगशाल 'गणी' का प्रयास वास्तव में सराहनीय है क्योंकि किसी भी भाषा के प्रचार और प्रसार में उसकी पत्रिकाएं अहम भूमिकाएं निभाती हैं। गढ़वाली में पिछले कुछ समय से ऐसी पत्रिकाओं की कमी महसूस हो रही थी जिसे अब पूरे शान से 'धाद' पूरी कर रही है। गढ़वाली में 'धाद' किसी को आवाज देना, पुकारना या सार्वजनिक कार्यों के लिये आम आदमी का आहवान करना होता है और 'धाद' अब पूरे मनोयोग से धाद लगा रही है।
गणेश खुगशाल 'गणी' संपादक 'धाद'
पत्रिका के संपादक श्री गणेश खुगशाल 'गणी' ने प्रवेशांक के संपादकीय में भी लिखा था, ''या धाद वीं भाषै धाद छ, जैं भाषा गीत गाणौं ग्वारा सात समोदर पार बिटि औंणा छन। य वीं भाषा बोलदरों की धाद छ जैं भाषा बोलदरा सात समोदर पार जैकि बि अपणी बोलि भाषै बात कना छन। य वीं भाषा धाद छ ज्व सिर्फ बोले नि जांदी, जैं भाषा मा खूब लिखेंदु बी छ, पढेन्दु बी छ अर सोचेन्दु बि छ। य धाद वीं भाषा मा छ जैं भाषा मा एक सब्द खुणि दर्जनों सब्द छन अर तौ सब्दु की सामर्थ्य अदभुत छ। यना लौकिक सब्द दुन्या कि कै भाषा मा नि मिलदा। जैं भाषा की अपणी संस्कृति अपणो संस्कार अपणी लोक विरासत छ वींई भाषा धाद छ य। य धाद गढ़वल़ि लोक संचेतना, संवाद अर सृजन को दस्तावेज छ। ''
'धाद' का प्रत्येक अंक अपने आप में विशिष्ट बनाने का प्रयास किया गया है। पत्रिका के अब तक दस अंक आये हैं जिनमें से प्रत्येक को एक खास विषय वस्तु पर केंद्रित किया गया है। अगस्त 2015 में प्रवेशांक के बाद इसके अगले अंक लोक उत्सव व परंपरा, गढ़वाल मा रामलीला की परंपरा, 15 बरसौ उत्तराखंड, उत्तराखंड का लोक संसाधन, गढ़वाली कविता ब्याली, आज अर भोल, डांडों की माया अर माया का डांडा, मेरो पिया होरी को खेलइया, गढ़वाल म थौल कौथीग और पोस्टर मा गढ़वलि कविता पर आधारित हैं। गंगा दशहरा करीब है और इसलिए अगला अंक गंगा और उसके महत्व पर केंद्रित होगा। यह अंक जल्द ही आपके हाथों में होगा। पत्रिका में देश और विदेश में गढ़वाल और गढ़वाली से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों की संक्षिप्त रिपोर्ट भी पेश की जा रही है। कुल मिलाकर गढ़वाली भाषा की यह संपूर्ण पत्रिका बनकर उभर रही है जिसमें कई ऐसे लेखक जुड़ रहे हैं जो अब तक केवल हिन्दी और अंग्रेजी में ही लेखन कार्य करते थे। असल में धाद ने गढ़वाली लेखन में नयी क्रांति की शुरुआत कर दी है। 'धाद' पत्रिका गढ़वाल के पुराने और नये लेखकों के लिये मंच बन गयी है। लेखक, कवि और शिक्षक मनोहर मनु 'धाद' के प्रवेशांक से लेकर अब तक के प्रत्येक अंक की समीक्षा पूरे मनोयोग से अपने फेसबुक पेज पर करते रहे हैं।
धाद के बारे में अन्य संक्षिप्त जानकारी यहां दी जा रही है।
मूल्य: 20 रुपए
वार्षिक सदस्यता : 220 रुपये
मुख्य संपर्क :
गणेश खुगशाल ‘गणी’,
126 विकास मार्ग,पौड़ी 246001
मोबाइलः 09412079537
मेल: dhad.garhwali@gmail.com
दिल्ली संपर्क :
ए—162/यूजी—4, दिलशाद कालोनी,
दिल्ली —110 095
मोबाइल : 09013285624
किसी भी पत्रिका में विज्ञापनों की भूमिका अहम होती है। श्री गणेश खुगशाल 'गणी' धाद के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं लेकिन 'धाद' पूरे जोशोखरोश से लगती रहे इसके लिये पत्रिका में विज्ञापनों का होना भी जरूरी है। मेरी व्यक्तिगत राय है कि इसके लिये देश और विदेशों में बसे हर उत्तराखंडी से सहयोग की अपेक्षा की जा सकती है। आपके सहयोग से उत्तराखंड के विकास का दस्तावेज तैयार होगा वहीं लोकभाषा के संरक्षण और सवंर्धन अभियान को भी ताकत मिलेगी। इसलिए मैं यहां पर पत्रिका के विज्ञापन की दरें भी दे रहा हूूं।
'धाद' की विज्ञापन दरें
अंतिम आवरण (रंगीन) : 25,000 रुपये
दूसरा/तीसरा आवरण (रंगीन) : 20,000 रुपये
पूरा पृष्ठ (ब्लैक एंड व्हाइट) : 10,000 रुपये
आधा पृष्ठ (ब्लैक एंड व्हाइट) : 6,000 रुपये
चौथाई पृष्ठ (ब्लैक एंड व्हाइट): 3,000 रुपये
सेंटर स्प्रेड (ब्लैक एंड व्हाइट) : 18,000 रुपये
सेंटर स्प्रेड (आर्ट पेपर रंगीन) : 35,000 रुपये
भाषाओं को बचाना हमारा सांस्कृतिक दायित्व है और वर्तमान समय में 'धाद' उत्तराखंडी लोकभाषा का प्रतिनिधित्व करती है। उम्मीद है कि आप 'धाद' से जुड़ेंगे और उसे आगे बढ़ाने में अपना योगदान देंगे। आपका धर्मेन्द्र पंत।
कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी। यह कहावत उत्तराखंड पर अक्षरश: लागू होती है।
दुनिया आज 'मदर्स डे' मना रही है। मां के लिये भी एक दिन तय कर दिया है, मुझे यह जंचता नहीं है। मां हर दिन याद आती है और हर दिन मां के लिये होता है। पहाड़ों में मां को मां के अलावा ब्वे, बोई, ईजा, आमा कई तरह से पुकारा जाता है। इस पर बाद में चर्चा करेंगे। अभी तो आपसे मैं एक सवाल करता हूं कि उत्तराखंड में कितनी भाषाएं बोली जाती हैं? मैंने यह सवाल कई पहाड़ियों से किया तो उनमें से अधिकतर का जवाब होता था तीन यानि गढ़वाली, कुमांउनी और जौनसारी। आज 'घसेरी' आपको उत्तराखंड की तमाम भाषाओं से अवगत कराने की कोशिश करेगी।
उत्तराखंड में कुल 13 भाषाएं बोली जाती हैं। यह 'घसेरी' नहीं बल्कि भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण का निष्कर्ष है। उत्तराखंड की भाषाओं को लेकर सबसे पहले सर्वेक्षण करने वाले जार्ज ग्रियर्सन ने भी इनमें से अधिकतर भाषाओं की जानकारी दी थी। ग्रियर्सन ने 1908 से लेकर 1927 तक यह सर्वेक्षण करवाया था। इसके बाद उत्तराखंड की भाषाओं को लेकर कई अध्ययन किये गये। हाल में 'पंखुड़ी' नामक संस्था ने भी इन भाषाओं पर काम किया। यह सभी काम 13 भाषाओं पर ही केंद्रित रहा। इनमें गढ़वाली, कुमांउनी, जौनसारी, जौनपुरी, जोहारी, रवांल्टी, बंगाड़ी, मार्च्छा, राजी, जाड़, रंग ल्वू, बुक्साणी और थारू शामिल हैं। इस पर मतभेद हो सकते हैं कि ये भाषाएं हैं या बोलियां। मेरा मानना है कि अगर एक बोली का अपना शब्द भंडार है, वह खुद को अलग तरह से व्यक्त करती है तो उसे भाषा बोलने में गुरेज क्या। कई लोगों को मानना है कि उत्तराखंड की भाषाओं की अपनी लिपि नहीं है तो मेरा इस पर जवाब होता है कि अंग्रेजी की भी अपनी लिपि नहीं है। वह रोमन लिपि में लिखी जाती है तो क्या आप उसे भी भाषा नहीं मानोगे। मराठी की देवनागरी लिपि है और हमारे उत्तराखंड की भाषाओं जो साहित्य लिखा गया उसमें देवनागरी का ही उपयोग किया गया। इस विषय पर आगे कभी लंबी चर्चा हो सकती है। फिलहाल 'घसेरी' के साथ चलिए भाषाओं को लेकर उत्तराखंड की सैर करने।
कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी
हम सभी जानते हैं कि उत्तराखंड में दो मंडल हैं गढ़वाल और कुमांऊ। इन दोनों की अपनी अलग अलग भाषाएं हैं। इनसे जुड़े क्षेत्रों की अन्य भाषाएं इनसे प्रभावित हो सकती हैं लेकिन अध्ययन के दौरान 'घसेरी' ने पाया कि उनकी शब्दावली और वाक्य विन्यास में काफी अंतर पाया जाता है। वैसे साथ में चेतावनी भी है कि यूनेस्को ने उत्तराखंड की सभी भाषाओं को संकटग्रस्त भाषाओं की श्रेणी में शामिल किया है। इसको संकट में हम ही डाल रहे हैं इसलिए सावधान हो जाइये। गढ़वाली और कुमांउनी यहां की दो मुख्य भाषाएं हैं इसलिए पहले इन्हीं के बारे में जान लेते हैं।
गढ़वाली : गढ़वाल मंडल के सातों जिले पौड़ी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, देहरादून और हरिद्वार गढ़वाली भाषी लोगों के मुख्य क्षेत्र हैं। कुमांऊ के रामनगर क्षेत्र में गढ़वाली का असर देखा जाता है। माना जाता है कि गढ़वाली आर्य भाषाओं के साथ ही विकसित हुई लेकिन 11—12वीं सदी में इसने अपना अलग स्वरूप धारण कर लिया था। इस पर हिन्दी के अलावा मराठी, फारसी, गुजराती, बांग्ला, पंजाबी आदि का भी प्रभाव रहा है लेकिन गढ़वाली का अपना शब्द भंडार है जो काफी विकसित है और हिन्दी जैसी भाषा को भी अपने शब्द भंडार से समृद्ध करने की क्षमता रखती है। ग्रियर्सन ने गढ़वाली के कई रूप जैसे श्रीनगरी, नागपुरिया, बधाणी, सलाणी, टिहरियाली, राठी, दसौल्या, मांझ कुमैया आदि बताये थे। बाद में कुछ साहित्यकारों ने मार्च्छा, तोल्छा, जौनसारी का भी गढ़वाली का ही एक रूप माना। गढ़वाली भाषाविद डा. गोविंद चातक ने श्रीनगर और उसके आसपास बोली जाने वाली भाषा को आदर्श गढ़वाली कहा था। वैसे भी कहा गया है, ''कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी। ''
कुमांउनी : कुमांऊ मंडल के छह जिलों नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत और उधमसिंह नगर में कुमांउनी बोली जाती है। वैसे इनमें से लगभग हर जिले में कुमांउनी का स्वरूप थोड़ा बदल जाता है। गढ़वाल और कुमांऊ के सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग दोनों भाषाओं को बोल और समझ लेते हैं। कुमाउंनी की कुल दस उप बोलियां हैं जिन्हें पूर्वी और पश्चिमी दो वर्गों में बांटा गया है। पूर्वी कुमाउंनी मेंकुमैया, सोर्याली, अस्कोटी तथा सीराली जबकि पश्चिमी कुमाउंनी में खसपर्जिया, चौगर्खिया, गंगोली, दनपुरिया, पछाईं और रोचोभैंसी शामिल हैं। कुमांऊ क्षेत्र में ही भोटिया, राजी, थारू और बोक्सा जनजातियां भी रहती हैं जिनकी अपनी बोलियां हैं। पुराने साहित्यकारों ने इसे 'पर्वतीय' या 'कुर्माचली' भाषा कहा है।
जौनसारी : गढ़वाल मंडल के देहरादून जिले के पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्र को जौनसार भाबर कहा जाता है। यहां की मुख्य भाषा है जौनसारी। यह भाषा मुख्य रूप से तीन तहसीलों चकराता, कालसी और त्यूनी में बोली जाती है। इस क्षेत्र की सीमाएं टिहरी ओर उत्तरकाशी से लगी हुई हैं और इसलिए इन जिलों के कुछ हिस्सों में भी जौनसारी बोली जाती है। जार्ज ग्रियर्सन ने इसे पश्चिमी पहाड़ी की बोली कहा था। कहने का मतलब है कि इसे उन्होंने हिमाचल प्रदेश की बोलियों के ज्यादा करीब बताया था। इसमें पंजाबी, संस्कृत, प्राकृत और पाली के कई शब्द मिलते हैं।
जौनपुरी: यह टिहरी जिले के जौनपुर विकासखंड में बोली जाती है। इसमें दसजुला, पालीगाड़, सिलवाड़, इडवालस्यूं, लालूर, छःजुला, सकलाना पट्टियां इस क्षेत्र में आती हैं। टिहरी रियासत के दौरान यह काफी पिछड़ा क्षेत्र रहा लेकिन इससे यहां की अलग संस्कृति और भाषा भी विकसित हो गयी। यह जनजातीय क्षेत्र है। डा. चातक के अनुसार यमुना के उदगम के पास रहने के कारण इन्हें यामुन जाति कहा जाता था। कभी इस क्षेत्र को यामुनपुरी भी कहा जाता था जो बाद में जौनपुरी बन गया।
रवांल्टी : उत्तरकाशी जिले के पश्चिमी क्षेत्र को रवांई कहा जाता है। यमुना और टौंस नदियों की घाटियों तक फैला यह वह क्षेत्र है जहां गढ़वाल के 52 गढ़ोंमें से एक राईगढ़ स्थित था। इसी से इसका नाम भी रवांई पड़ा। इस क्षेत्र की भाषा गढ़वाली या आसपास के अन्य क्षेत्रों से भिन्न है। इस भाषा को रवांल्टी कहा जाता है। डा. चातक ने पचास के दशक में 'गढ़वाली की उप बोली रवांल्टी, उसके लोकगीत' विषय पर ही आगरा विश्वविद्यालय से पीएचडी की थी। वर्तमान समय में भाषा विद और कवि महावीर रवांल्टा इस भाषा के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
जाड़ : उत्तरकाशी जिले के जाड़ गंगा घाटी में निवास करने वाली जाड़ जनजाति की भाषा भी उनके नाम पर जाड़ भाषा कहलाती है। उत्तरकाशी के जादोंग, निलांग, हर्षिल, धराली, भटवाणी, डुंडा, बगोरी आदि में इस भाषा के लोग मिल जाएंगे। जाड़ भोटिया जनजाति का ही एक अंग है जिनका तिब्बत के साथ लंबे समय तक व्यापार रहा। इसलिए शुरू में इसे तिब्बत की 'यू मी' लिपि में भी लिखा जाता था। अभी इस बोली पर काफी खतरा मंडरा रहा है।
बंगाणी : उत्तरकाशी जिले के मोरी तहसील के अंतर्गत पड़ने वाले क्षेत्र को बंगाण कहा जाता है। इस क्षेत्र में तीन पट्टियां— मासमोर, पिंगल तथा कोठीगाड़ आती हैं जिनमें बंगाणी बोली जाती है। यूनेस्को ने इसे उन भाषाओं में शामिल किया है जिन पर सबसे अधिक खतरा मंडरा रहा है।
मार्च्छा : गढ़वाल मंडल के चमोली जिले की नीति और माणा घाटियों में रहने वाली भोटिया जनजाति मार्च्छा और तोल्छा भाषा बोलती है। इस भाषा में तिब्बती के कई शब्द मिलते हैं। नीति घाटी में नीति, गमसाली और बाम्पा शामिल हैं जबकि माणा घाटी में माणा, इन्द्रधारा, गजकोटी, ज्याबगड़, बेनाकुली और पिनोला आते हैं।
जोहारी : यह भी भोटिया जनजाति की एक भाषा है जो पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी क्षेत्र में बोली जाती है। इन लोगों का भी तिब्बत के साथ लंबे समय तक व्यापार रहा इसलिए जोहारी में भी तिब्बती शब्द पाये जाते हैं।
थारू : उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के तराई क्षेत्रों, नेपाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षेत्राों में थारू जनजाति के लोग रहते हैं। कुमांऊ मंडल में यह जनजाति मुख्य रूप से उधमसिंह नगर के खटीमा और सितारगंज विकास खंडो में रहती है। इस जनजाति के लोगों की अपनी अलग भाषा है जिसे उनके नाम पर ही थारू भाषा कहा जाता है। यह कन्नौजी, ब्रजभाषा तथा खड़ी बोली का मिश्रित रूप है।
बुक्साणी : कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक तराई की पट्टी में निवास करने वाली जनजाति की भाषा है बुक्साणी। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से काशीपुर, बाजपुर, गदरपुर, रामनगर, डोईवाला, सहसपुर, बहादराबाद, दुगड्डा, कोटद्वार आदि शामिल हैं।
रंग ल्वू : कुमांऊ में मुख्य रूप से पिथौरागढ़ की धारचुला तहसील के दारमा, व्यास और चौंदास पट्टियों में रंग ल्वू भाषा बोली जाती है। इसे तिब्बती—बर्मी भाषा का अंग माना जाता है जिसे प्राचीन समय से किरात जाति के लोग बोला करते थे। दारमा घाटी में इसे रङ ल्वू, चौंदास में बुम्बा ल्वू और ब्यास घाटी में ब्यूंखू ल्वू के नाम से जाना जाता है।
राजी : राजी कुमांऊ के जंगलों में रहने वाली जनजाति थी। यह खानाबदोश जनजाति थी जिसने पिछले कुछ समय से स्थायी निवास बना लिये हैं। नेपाल की सीमा से सटे उत्तराखंड के पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जिलों में इस जनजाति के लोग रहते हैं। यह भाषा तेजी से खत्म होती जा रही है।
हमने शुरुआत 'मां' से की थी तो अब जान लें कि उत्तराखंड की भाषाओं में मां के लिये क्या बोला जाता है। वैसे यहां की भाषाओं में अब मां आम प्रचलित है लेकिन पहले ब्वे, बोई या ईजा भी बोला जाता था। मां के लिये उत्तराखंड की भाषाओं के शब्द ....
पच्चीस दिसंबर को दुनिया याद करती है क्रिसमस के लिये। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन भी इसी दिन पड़ता है। वाजपेयी जी को भी याद किया जाता है लेकिन हम स्वतंत्रता के एक महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को भूल जाते हैं जिनका जन्म 25 दिसंबर 1891 को गढ़वाल जिले के ग्राम मासी में हुआ था। चंद्र सिंह गढ़वाली, जिनका मूल नाम चंद्र सिंह भंडारी था, का संक्षिप्त परिचय यही है कि वह बचपन से ही क्रांतिकारी विचारधारा के थे। कोई भी साहसिक कार्य करने से नहीं हिचकिचाते थे। उनका जन्म किसान परिवार में हुआ था। मां पिता की इच्छा के विपरीत वह प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लैंसडाउन में गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुए। भारतीय सेना के साथ उन्होंने 1915 में मित्र देशों की तरफ से प्रथम विश्व युद्ध में भी हिस्सा लिया। उन्हें गढ़वाल राइफल्स के अन्य सैनिकों के साथ फ्रांस भेज दिया गया था। लेकिन चंद्र सिंह गढ़वाली से दुनिया का असली परिचय 23 अप्रैल 1930 को हुआ था जब उन्होंने पेशावर में देश की आजादी के लिये लड़ने वाले निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया था। यह एक ऐतिहासिक घटना थी और कहा जाता था कि सुभाषचंद्र बोस ने जब आजाद हिन्द फौज का गठन किया था तो वह चंद्र सिंह गढ़वाली से जुड़ी इस घटना से भी प्रेरित थे। यही वजह थी कि उन्होंने आजाद हिन्द फौज में गढ़वाल राइफल्स के सैकड़ों जवानों को शामिल किया था।
बहरहाल हम यहां पर बात करेंगे पेशावर कांड की। पहले इससे जुड़ी पृष्ठभूमि की संक्षिप्त जानकारी हासिल कर लेते हैं। यह वह दौर था जब पूर्ण स्वराज्य की घोषणा के बाद देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को डांडी मार्च शुरू कर दिया गया था। इस बीच यह चर्चा भी चल रही थी कि भगत सिंह और उनके साथियों राजगुरू और सुखदेव को फांसी दे दी जाएगी। इससे हर राष्ट्रप्रेमी उद्वेलित था। चंद्र सिंह गढ़वाली भी इनमें शामिल थे लेकिन पेशावर कांड भावनाओं के इस उबाल का परिणाम मात्र नहीं था बल्कि इसकी तैयारी योजनाबद्ध तरीके से की गयी थी। चंद्र सिंह गढ़वाली ने 2/18 रायल गढ़वाल राइफल के अपने साथियों को पहले से ही तैयार कर दिया था कि उन्हें भारत की स्वतंत्रता के लिये आवाज उठा रहे पठानों पर गोली चलाने के अग्रेंजो के आदेश को नहीं मानना है।
अंग्रेजों को कानों कान खबर न लगे इसके लिये पूरी तैयारी की गयी थी। चंद्र सिंह गढ़वाली तथा पेशावर बैरक में हरिसिंह लाइन में रह रहे उनके साथी रात में देश की स्थिति और भावी रणनीति पर बंद कमरे में चर्चा करते थे। अंग्रेजों को कुछ भनक लग गयी थी और इसलिए उन्होंने फूट डालो राज करो की अपनी रणनीति के तहत गढ़वाली सैनिकों को उकसाने का काम भी किया। गढ़वाल राइफल्स के जवानों को बताया गया कि पेशावर में केवल दो प्रतिशत हिन्दू रहते हैं और मुसलमान उन्हें सताते हैं। उनके देवी देवताओं को अपमान करते हैं और इसलिए उन्हें इन मुसलमानों पर गोली चलाने से नहीं हिचकिचाना है। सचाई इससे परे थी और चंद्र सिंह गढ़वाली इससे अच्छी तरह से अवगत थे। उन्होंने अपने साथियों को समझा दिया था कि वे अंग्रेजों की चाल में नहीं फंसे। उनका अपने साथियों को स्पष्ट संदेश था, '' कुछ भी हो जाए हमें अपने भाईयों पर गोलियां नहीं चलानी हैं। ''
''गढ़वालीज ओपन फायर'' का जवाब था ''गढ़वाली सीज फायर''
पेशावर में 23 अप्रैल 1930 को विशाल जुलूस निकला था, जिसमें बच्चों से लेकर बूढ़ों और महिलाओं ने हिस्सा लिया। स्वाधीनता की मांग कर रहे हजारों लोगों के नारों से आसमान गूंज रहा था तो दूसरी तरफ अंग्रेजों का खून खौल रहा था। 2/18 रायल गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों को भी प्रदर्शनकारियों पर नियंत्रण पाने के लिये भेज दिया गया। इसकी एक टुकड़ी काबुली फाटक के पास निहत्थे सत्याग्रहियों के आगे खड़ी थी। अंग्रेज कंमाडर के आदेश पर इन सभी प्रदर्शनकारियों को घेर दिया गया था। गढ़वाली सैनिकों को जुलूस को बलपूर्वक तितर बितर करने के लिये कहा गया। सैनिकों ने प्रदर्शनकारियों से हटने को कहा। वे नहीं हटे। कंपनी कमांडर का धैर्य जवाब दे गया और उसने लगभग चिल्लाते हुए आदेश दिया ''गढ़वालीज ओपन फायर'' और फिर यहां पर चंद्र सिंह गढ़वाली का उदय हुआ। वह कमांडर के पास में ही खड़े थे। उन्होंने कड़कती आवाज में कहा, ''गढ़वाली सीज फायर''। देखते ही देखते सभी राइफलें नीचे हो गयी। अंग्रेज कमांडर बौखला गया। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस सैन्य टुकड़ी का वह सर्वोसर्वा है वह उसके हुक्म की अवहेलना करेगी। गढ़वाली सैनिकों का साफ संदेश था कि वह निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोलियां नहीं चलाएंगे। अंग्रेज सैनिकों ने हालांकि बाद में पठानी आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसायी। गढ़वाली सैनिकों से उनके हथियार ले लिये गये। अंग्रेज किसी भी तरह से आंदोलन को कुचलना चाहते थे और इसके लिये उन्हें गढ़वाल राइफल्स से मदद की दरकार थी। इसलिए गढ़वाली सैनिकों को समझाने के प्रयास भी किये गये कि वह निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाने से नहीं हिचकिचाएं लेकिन देश प्रेम से ओत प्रोत गढ़वाली सैनिक टस से मस नहीं हुए। यहां तक कि सभी सैनिकों ने इस्तीफा भी दे दिया था, लेकिन अब अंग्रेज गढ़वाल राइफल्स की इस टुकड़ी से ही बदला लेने के लिये तैयार हो गयी थी। चंद्र सिंह गढ़वाली सहित इन सैनिकों को नौकरी से निकाल दिया गया और उन्हें कड़ी सजा दी गयी लेकिन उन्होंने खुशी . खुशी इसे स्वीकार किया। चंद्र सिंह गढ़वाली जेल से छूटने के बाद महात्मा गांधी से भी जुड़े। गांधी जी ने एक बार कहा था कि यदि उनके पास चंद्र सिंह गढ़वाली जैसे चार आदमी होते तो देश का कब का आजाद हो गया होता। चंद्र सिंह गढ़वाली बाद में कम्युनिस्ट हो गये और सिर्फ उनकी इस विचारधारा की वजह से देश ने इस अमर जवान को वह सम्मान नहीं दिया जिसके वह असली हकदार थे। एक अक्तूबर 1979 को भारत के महान सपूत ने लंबी बीमारी के बाद दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में आखिरी सांस ली थी।
भारत सरकार ने वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के निधन के बाद उन पर डाक टिकट जारी किया था
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने बाद में अपने नाम से गढ़वाली जोड़ा था। उन्हें और उनके साथियों को जब सजा दी गयी तो उन्होंने कहा था कि 'हे गढ़माता हम तेरी इज्जत और शान के लिये अपने प्राण न्यौछावर करने जा रहे हैं।' चंद्र सिंह गढ़वाली अमर हो गये लेकिन हमें उनके उन साथियों को भी याद करने की जरूरत है जिन्होंने हर मोड़ पर पूरी वीरता के साथ अपनी अगुवाई कर रहे इस साथी और गढ़वाल का सिर ऊंचा रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यहां पर चंद्र सिंह गढ़वाली के कुछ साथियों की सूची भी दी जा रही है जिन्हें अंग्रेज सरकार ने सजा दी थी। बैरिस्टर मुकुंदी लाल के प्रयासों से इन सैनिकों को मृत्यु दंड की सजा नहीं मिली लेकिन उन्हें जेल जाना पड़ा था।
पेशावर कांड में वीर चंद्रसिंह गढ़वाली के अलावा जिन अन्य वीर सैनिकों को सजाएं हुई उनकी सूची इस प्रकार है ...
1. हवलदार नारायण सिंह गुंसाई, 2. नायक जीत सिंह रावत, 3. नायक भोला सिंह बुटोला, 4. नायक केशर सिंह रावत, 5. नायक हरक सिंह धपोला, 6. लांस नायक महेंद्र सिंह नेगी, 7. लांस नायक भीम सिंह बिष्ट, 8. लांस नायक रतन सिंह नेगी, 9. लांस नायक आनंद सिंह रावत, 10. लांस नायक आलम सिंह फरस्वाण, 11. लांस नायक भवान सिंह रावत, 12. लांस नायक उमराव सिंह रावत, 13. लांस नायक हुकुम सिंह कठैत, 14. लांस नायक जीत सिंह बिष्ट, 15. लांस नायक सुंदर सिंह बुटोला, 16. लांस नायक खुशहाल सिंह गुंसाई, 17. लांस नायक ज्ञान सिंह भंडारी, 18. लांस नायक रूपचंद्र सिंह रावत, 19. लांस नायक श्रीचंद सिंह सुनार, 20. लांस नायक गुमान सिंह नेगी, 21. लांस नायक माधोसिंह नेगी, 22. लांस नायक शेर सिंह असवाल, 23. लांस नायक बुद्धि सिंह असवाल, 24. लांस नायक जूरासंघ सिंह असवाल, 25. लांस नायक राय सिंह नेगी, 26. लांस नायक दौलत सिंह रावत, 27. लांस नायक डब्बल सिंह रावत, 28. लांस नायक रतन सिंह नेगी, 29. लांस नायक श्याम सिंह सुनार, 30. लांस नायक मदन सिंह नेगी, 31. लांस नायक खेम सिंह गुंसाई। गढ़वाल के जिन वीर सैनिकों को अंग्रेजों ने कोर्ट मार्शल करके नौकरी से बाहर कर दिया था, उनके नाम इस प्रकार है ...
1. लांस नायक पातीराम भंडारी, 2. लांस नायक पान सिंह दानू, 3. लांस नायक राम सिंह दानू, 4. लांस नायक हरक सिंह रावत, 5. लांस नायक लक्ष्मण सिंह रावत, 6. लांस नायक माधो सिंह गुंसाई, 7. चंद्र सिंह रावत, 8. जगत सिंह नेगी, 9. शेर सिंह भंडारी, 10. मान सिंह कुंवर, 11. बचन सिंह नेगी। कुछ जवानों की सेवाएं समाप्त कर दी गयी थी। इनकी सूची इस प्रकार है ...
1. सूबेदार त्रिलोक सिंह रावत, 2. जयसिंह बिष्ट, 3. हवलदार गोरिया सिंह रावत, 4. हवलदार गोविंद सिंह बिष्ट, 5. हवलदार प्रताप सिंह नेगी, 6. नायक रामशरण बडोला।
एक कवि, पत्रकार, समाजसेवी, उच्चकोटि के वक्ता, मंच संचालक, सलाहकार और इन सबसे बढ़कर गढ़वाल और गढ़वाली से अथाह प्रेम करने वाले शख्स की कलम जब चलती है तो इसी तरह की कई मर्मस्पर्शी कविताएं प्रस्फुटित होती हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी गणेश खुगशाल 'गणी' पिछले तीन दशकों से हिन्दी और गढ़वाली में निरंतर लिख रहे हैं लेकिन अब पहली बार गढ़वाली में उनकी कविताओं का संग्रह 'वूं मा बोलि दे' के रूप में सामने आया है। दिल को छूने वाली, गांव गुठ्यार की याद दिलाने वाली और कई सवाल खड़े कर देने वाली ये कविताएं पहाड़ी जीवन का सार हैं।
कविताओं में डूबने पर हर मोड़ पर आपको अपनी मां, अपना गांव, अपना बचपन, अपने खेत, अपना खलिहान, अपना घर सब याद आ जाएंगे। महान गायक नरेंद्र सिंह नेगी के शब्दों में, ''गणि का ये कविता संग्रै मा घर—बण, गौं गुठ्यार, गौं—पचैत, खेती बाड़ि, थौल—तमसा, अजक्यालै राजनीति, कुछ मिट्ठी और कुछ तीती कवितौं को चित्रण, व्यंग्य, गुस्सा, ताना, लाड़, प्यार, भौं—कुछ छ। ''
नेगी जी ने ये शब्द 'वूं मा बोलि दे' का सार हैं। आखिर गणेश खुगशाल 'गणी' को नेगी जी से बेहतर भला कौन जानता है। एक कवि सम्मेलन के दौरान जब गणी ने मां पर लिखी अपनी कविता पढ़ी तो नेगी जी खुद को नहीं रोक पाये और उन्हें गले लगा दिया। यह लगभग 22 साल पुरानी बात है और तब से नरेंद्र सिंह नेगी और गणेश खुगशाल 'गणी' का साथ बना हुआ है। नेगी जी के कार्यक्रमों में मंच संचालक गणी भाई की मीठी बोली का कायल भला कौन नहीं होगा।
पिछले दिनों मुझे भी गणी भाई (बायें) से भेंट करने का सौभाग्य मिला।
पौड़ी गढ़वाल की असवालस्यूं पट्टी के किनगोड़ी गांव में 22 अप्रैल 1968 को जन्में गणेश खुगशाल 'गणी' ने अपनी बाल्यवस्था और किशोरावस्था गांव में बितायी। बाद में उनकी कर्मस्थली मुख्यरूप से पौड़ी बनी लेकिन वह अब भी गांवों से जुड़े हुए हैं और इसलिये उनकी कविताओं में हर तरफ गढ़वाल के गांव, वहां का समाज, संस्कृति और समस्याएं नजर आती हैं। ''हमारि ब्वे, दादी अर काकि बोड्यूं की, जिकुड़ि भोरीन भुक्यूंन ....'' जैसी कई कविताओं में मां पिताजी आदि का ढेर सारा प्यार भरा है। इन कविताओं में गांवों से पलायन का दर्द दिखता है। शीर्षक कविता 'वूं मा बोलि दे' भी इससे अलग नहीं है। 'कूड़ि' कविता में वह मकान से लेकर घर के हर कोने और उससे जुड़ी हर सामग्री में जीवन भरते हैं। 'पोस्टर' से लेकर 'सिलिंडर' तक और 'भड्डू' से लेकर 'जांदिरि' तक को यह कविता संग्रह जीवंत बना देता है।
उत्तराखंड जब भी विपदा में पड़ा तो कवि मन भी विचलित हो उठा और इसलिए केदारनाथ की आपदा पर वह भगवान से पूछ बैठा, ''हे भगवान! तू इथगा रवेलु ह्वेलु, कैन नि जाणि, बरखा दीणैं मा बि, नि मीलु वख पाणि, तेरी जात्रा यनि ह्वेली, कैल नि जाण ..''।
बचपन में मां अक्सर 'कुण्या बूढ़' का डर दिखाकर हमें सुला देती थी। आखिर कौन थी वह 'कुण्या बूढ़, जो अब नहीं डराती? कवि ने '' न कैल देखी, न कैल सूणी, झणि कब अफ्वी—अफ्वी, कै खटला मूड़ मोरिगे कुण्या बूढ़'' में इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश की है। राजनीति पर किये गये कटाक्षों में गणेश खुगशाल 'गणी' के अंदर छिपा पत्रकार सामने आता है। लेकिन वह इसके साथ घंटाघर को बचाये रखने का आग्रह भी सरकार से करते हैं क्योंकि देहरादून में रहने और वहां जाने वाले हर शख्स की यादें इस जगह से जुड़ी हुई हैं।
सरकारा।
तेरी त पता नी क्या गौं छ
पर मेरी हाथ ज्वड़ै इथु कि
तै देरादूणौं तू जो कुछ कैर
पर बचै राखि घंटाघर । ..
इस कविता संग्रह का प्रकाशन विनसर पब्लिशिंग कंपनी देहरादून ने किया है और इसका मूल्य 195 रूपये है।