पिठाई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पिठाई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

जब मैं पहली बार बाराती बना .....

आजकल बारात के स्वागत के समय प्रवेश द्वार पर रिबन बांध दिया जाता है। पहले युवक मंगल दल के सदस्य स्वागत करते थे और स्वागत गीत गाने के साथ नारे लगाते थे। 

    भैजी ने जब ग्रेजुएशन करने के बाद नौकरी के लिये शहरों की तरफ रूख किया तो तब मैं 13 साल का था। भैजी के दूर परदेस में जाने से मन उदास था लेकिन उसका कोई कोना उल्लास से भी भरा था। अब गांव में किसी लड़के की शादी होने पर बारात में जाने का मौका मुझे मिलेगा क्योंकि बुबाजी (पिताजी) शादियों में केवल औपचारिकता के लिये शरीक होते थे। पहले भैजी ने बारात में जाने की जिम्मेदारी निभायी और स्वाभाविक था कि अब मेरी बारी थी। ऐसी जिम्मेदारी जिसे मैं खुशी खुशी लेने के लिये ही नहीं बल्कि छीनने के लिये तैयार बैठा था। मां—पिताजी को भी बता दिया था कि अब यह जिम्मेदारी मेरी है। आखिर कब तक मैं दूसरों को ही नमकीन, बिस्कुट और लड्डू का आनंद उठाते हुए देखता। गांव में लड़कियों की शादियों में आने वाले बारातियों को चाय के साथ नमकीन, बिस्कुट के स्वाद से मिलने वाले आनंद को अधिकतर समय मैंने केवल अहसास किया था। जिंदगी में एक अवसर आया था जब मैं पहली बार बाराती बना था। तब मैं 10-11 साल का था। गांव की एक शादी में पिताजी के अलावा भैजी को अलग से बाराती बनने का न्यौता दिया था। मैंने जिद पकड़ ली कि जब पिताजी को मिलने वाले न्यौते पर भैजी बाराती बनते हैं तो इस बारे मुझे मौका मिलना चाहिए। भैजी साथ में थे इसलिए मुझे अनुमति मिल गयी। नये कपड़े तो नहीं थे लेकिन मेरे पास तब जो सबसे सुंदर कपड़े थे उन्हें पहन लिया। मां ने बालों में तेल लगाकर, उन्हें कंघी से अच्छी तरह संवारकर तैयार कर दिया था। भैजी को हिदायत मिल चुकी थी कि वह मेरा ध्यान रखें। 
     बारात निकल पड़ी और मैं बड़ी शान से उसमें चल रहा था। ढोल दमौ की थाप पर कुछ लोग नाच रहे थे लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था कि गांव के प्रत्येक व्यक्ति की नजर मुझ पर ही है। ऐसे में थोड़ा इतरा कर चलना लाजिमी था। बारात गांव से निकल पड़ी और गांव के ठीक आगे खड़ी चढ़ाई (जिसे हम चांद की धार कहते थे) से होकर हमें पहाड़ी के दूसरी तरफ उतराई होते हुए दूर बसे एक गांव में जाना था। मैं भी बारात के आगे चलने वाले सफेद रंग के ध्वज के पीछे चलते हुए चढ़ाई चढ़ने लगा। यहां पर पहले मैं आपको बारात के साथ चलने वाले सफेद और लाल रंग के ध्वज के बारे में बता देता हूं। उत्तराखंड में प्रचलन है कि जब दूल्हा अपने घर से निकलकर दुल्हन के घर जाता है तो आगे सफेद रंग का ध्वज (निशाण) होता और पीछे लाल रंग का। यह प्रथा भी सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। निशाण का मतलब है निशान या फिर संकेत। इसका संदेश यह होता है कि हम आपकी पुत्री का वरण करने आये हैं और शांति के साथ विवाह संपन्न करवाना चाहते हैं। इसलिए सफेद ध्वज आगे रहता है। लाल रंग का ध्वज इस संदेश के साथ जाता था कि शादी के लिये वे युद्ध करने के लिये भी तैयार हैं। जब विवाह संपन्न हो जाता है तो फिर घर वापसी के समय लाल रंग का निशाण आगे और सफेद रंग का पीछे होता है। लाल रंग का ध्वज तब इसलिए आगे रखा जाता है जिसका मतलब यह होता है कि वे विजेता बनकर लौटे हैं और दुल्हन को साथ लेकर आ रहे हैं।

गांवों में आजकल दिन की शादियां होने लगी हैं। इसलिए शादियों की रंगत भी फीकी पड़ गयी है।

   त्साह से लबरेज होने के कारण मुझे चढ़ाई तो बहुत आसान लग रही थी। मां ने हिदायत दे रखी थी कि बारात के पीछे नहीं चलना है। जब भी गांव में बारात आती थी तो मां कहती थी कि उसके पीछे नहीं चलना चाहिए। इसके पीछे उनके अपने तर्क थे। कुछ डरावने किस्से भी। बारात के छामाखाल पहुंचने पर सड़क के दर्शन हो गये थे। यहां पर ढोल वादक ने अपनी कला का भरपूर प्रदर्शन किया तो मसकबाज और दमौ वादक ने उसका पूरा साथ दिया। युवा लड़के थिरकने लगे और उनसे कुछ दूरी पर मेरे भी पांव चलने लगे। अभी शमां बंधा ही था कि तभी सड़क में दूसरी तरफ से एक और बारात आती दिखायी दी। एक बुजुर्ग ने आवाज लगायी कि दूल्हे को छिपाओ। मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। हमें सड़क के नीचे वाले रास्ते पर निकलना था और हमारी बारात ने तुरंत वह रास्ता पकड़ लिया। दूल्हे को उनके कुछ दोस्त घेरे हुए थे ताकि दूसरे दूल्हे की नजर उस पर नहीं पड़े। पता चला कि कमोबेश यही स्थिति दूसरे दूल्हे की होगी। बाद में मां ने बताया कि दो दूल्हों या दुल्हनों का मिलन अशुभ माना जाता है।
    बारात जब दुल्हन के गांव में पहुंची तो सभी घराती स्वागत के लिये तैयार बैठे थे। उस समय आज के जमाने की तरह गेट पर रिबन बांधने का रिवाज नहीं था। गांव का युवक मंगल दल बारातियों का गीत और नारों से स्वागत करता था। गांव में अब भी यह प्रचलन है। युवक मंगल दल के दो सदस्य आगे कपड़े का बना बड़ा बैनर पकड़ते है जिस पर लिखा होता था 'अमुक गांव का युवक मंगल दल आपका स्वागत करता है।' बारात के इस स्वागत के लिये बाद में युवक मंगल दल के सदस्यों को कुछ इनाम भी मिलता है। हमारा भी स्वागत पूरे जोर शोर से किया गया। घराती गांव वाले लड़के गा रहे थे, ''स्वागत प्यारे, बंधु हमारे स्वागत हम सब करते हैं, दया करोगे, लाज रखोगे यही भरोसा रखते हैं .....'' बीच—बीच में नारे में लगा रहे थे जैसे ''हर्ष—हर्ष, जय—जय। बाल युवक मंगल दल आपका स्वागत करता है। वर—वधु की जोड़ी अमर रहे।'' स्वागत करने के बाद युवक मंगल दल के सदस्यों की ही जिम्मेदारी थी वे हमारी आवभगत करें। आवभगत का मतलब सभी बारातियों को पहले पानी के लिये पूछना और फिर उन तक चाय, नमकीन, बिस्कुट और कोई मिठाई पहुंचाना। पहले मिठाई का मतलब होता था लड्डू। मेरे मुंह में तो अभी से पानी आ रहा था।
    दुल्हन के घर के पास में बड़ी चांदनी (शामियाना) लगा रखी थी। उसके अंदर गांव के विभिन्न घरों से मांगकर कुर्सियां सजायी गयी थी। कुछ चारपाईयां लगी थी। नीचे दरियां बिछी हुई थी। सभी बच्चों को नीचे दरियों में बैठने का आदेश मिल चुका था। बड़े बुजुर्ग कुर्सियों या चारपाई पर विराजमान थे। पास में ही दूल्हे को मिलने वाला पलंग और उस पर चमचमाती चादर और रजाई रखी थी। दूल्हे के दोस्तों ने उस पर कब्जा जमा लिया था। गैस (पेट्रोमैक्स) की रोशनी से नहा रही थी चांदनी। उस समय गांवों में प्रचलन था कि बारात पहुंचने पर दुल्हन की सहेलियां मांगल गीत गाती और मजाकिया अंदाज में दूल्हे, उसकी तरफ के पंडित, उसके दोस्तों आदि को 'मांगल में ही गालियां' देकर छेड़ती। जैसे ..., ''अरे ब्योला तु बामण नि ले जाणू ....। हमरा गांऊ कुकर भुख्यूंच, ब्योला कु बबा उबर लुक्युंच ....। '' इनमें आग्रह भी होता था जैसे, ''छ्वटी बटै कि बड़ि बणाई सैंती पालि की, ये फूल थै रख्यां जवैं संभालि कि.....। '' इस दौरान बारात में आये युवा नौजवान भी लड़कियों से नैन मटका करने की कोशिश करते। उन्हें भी मांगल में ही गालियां पड़ती।
     मेरी नजर नमकीन बिस्कुट पर थी। उसे पहले बड़े बुजुर्गों में बांटा जा रहा था। मन में धुकधुकी लगी थी कि कहीं मेरी बारी आते आते नमकीन बिस्कुट खत्म नहीं हो जाए। जहां पर मैं बैठा था कि वहां पर भी अब दो युवक चाय, नमकीन—बिस्कुट से भरी कागज प्लेटें बांटने लगे थे। एक कांच में गिलास में भरकर चाय देता और दूसरा नमकीन से भरा पैकैट या प्लेट पकड़ाता। अब मुझे बाराती होने का असली आनंद मिलने वाला था। लेकिन यह किस्सा मेरे साथ ही घटने वाला था। बाराती बच्चों के बीच में मैं छूट गया। अब वे दूसरी तरफ बैठे बारातियों की आवभगत कर रहे थे। मेरे आंसू निकल पड़े। मेरी निगाहें भैजी को खोज रही थी। केवल उन्हीं से मैं अपनी व्यथा कह सकता था। भैजी पीछे बैठे थे। मैं तुरंत ही उनके पास चला गया और फिर सुबकने लगा। मैंने उन्हें कारण बताया तो उन्होंने ढाढस बंधाते हुए अपनी प्लेट मुझे दे दी। मैं तो नयी प्लेट लेने की जिद पर अड़ा था। पास में बैठे गांव के एक चाचाजी को जब माजरा पता चला तो उन्होंने स्वागतकर्मियों को हड़काया। अब तो तुरंत ही मेरे पास चाय और नमकीन बिस्कुट की प्लेट पहुंच गयी। अब तक हालांकि जिस आनंद की मैंने कल्पना की थी वह काफूर हो चुका था।
अठारह साल पहले भी बारात पहुंचने पर 
वरमाला का चलन शुरू हो गया था। मैंने भी ऐसा 
किया था। मेरी शादी का एक चित्र।
     कुछ देर बाद पंडित जी पिठाई लेकर आ गये और उनके साथ लिफाफों में बंद दक्षिणा। पंडित जी और लिफाफा पकड़ाने वाले दोनों से कोई चूक नहीं हुई। मैंने तुरंत लिफाफा खोला तो भैजी ने सनकाया (सनकाण यानि इशारा, संकेत करना) भी कि मैं अभी ऐसा नहीं करूं। लिफाफे के अंदर एक रूपये के चमचमाते नोट ने कुछ देर पहले के मेरे सारे अवसाद को खत्म कर दिया था। लिफाफा भैजी को सौंप दिया। रात का भोजन करने के बाद कुछ बाराती अपने लिये सोने की जगह तलाश करने लगे। बाकी बारातियों को अभी रात्रि मनोरंजन के लिये बुलाये गये जोकरों को देखना था। इच्छा तो मेरी भी थी लेकिन तभी मुझे नमकीन—बिस्कुट नहीं मिलने पर उस गांव के लड़कों को हड़काने वाले चाचाजी आ गये। उन्होंने बताया कि उन्हें सोने की जगह मिल गयी है। चारपाई एक है और मैं उनके साथ सो जाऊंगा। अभी हम लेटे ही थे कि कुछ और बाराती जगह की तलाश में पहुंच गये। चाचाजी ने चुपके से मेरे कान में कहा, ''चौड़े होकर सोजा नहीं तो इनमें से कोई हमारे साथ घुस जाएगा।'' मैंने तुरंत आदेश पर अमल किया। 
     सुबह रात का बचे खाने का ही नाश्ता किया, चाय पी और फिर उस गांव के लड़कों के साथ क्रिकेट खेलने लग गये। बाकी वेदी में चले गये क्योंकि वहां पर भी गांव की लड़कियों की गालियों से दूल्हे, उसके साथियों और अन्य की पूजा होने वाली थी। इस दौरान खूब मजाक और चुहलबाजी होती। मुझे तो वर्षों बाद पता चला कि इसका अलग आनंद है। हालांकि धीरे धीरे यह प्रथा खत्म होती गयी और अब शायद ही किसी गांव में बारात आने पर लड़कियां 'मांगल में मजाकिया गालियां' देती होंगी। दिन का खाना करने के बाद बारात जाने से पहले फिर से पिठाई लगी। फिर से एक रूपये की दक्षिणा मिली। दक्षिणा मिलते ही कुछ लोग गांव की तरफ कूच करने लगे। मैं भी उनके साथ हो लिया। मुझे दुल्हन का दहाड़ें मारकर रोना कभी अच्छा नहीं लगा और अब यहां भी यही होने वाला था। दूल्हे के साथ कुछ बाराती विशेषकर उसके साथी रह जाते। दुल्हन की सहेलियां गांव से दूर तक उसे छोड़ने के लिये आती और इस बीच भी खूब मजाक चलता था। भले ही मुझे तब इससे मतलब नहीं था। रास्ते में मुझे मेरे गांव की लड़कियां दिखी। वे दुल्हन को लेने आयी थी। मैं तो जल्द से जल्द घर पहुंचकर मां के सामने बारात के अपने पहले अनुभव को बयां करने के लिये बेताब था।
       इसके बाद मैं कई बार बाराती बना। तेरह साल की उम्र ही चाय पीनी छोड़ दी थी और कुछ वर्षों बाद नमकीन—बिस्कुट का मोह भी खत्म हो गया। पिछले कुछ वर्षों से तो बारात में मिलने वाली दक्षिणा का खुलकर विरोध भी कर रहा हूं। अब बाराती बनना औपचारिकता पूरी करने जैसा होता है। उसमें पहले जैसा आनंद और उत्साह नहीं बचा है। गांव में दिन की शादियां हो रही हैं और शहरों में तो यह दो तीन घंटे का खेल है। मेरी शादी भी शहर में हुई। दिल्ली से गुड़गांव गयी थी मेरी बारात। आज से ठीक 18 साल पहले पांच फरवरी 1999 को अंजू मेरी जीवनसंगिनी बनी थी। ऐसे में मैंने अपनी पहली बारात की कुछ यादें ताजा करने की कोशिश की। आपको कैसे लगी ब्लॉग के नीचे कमेंट वाले कालम में यह जरूर बतायें। आपका धर्मेन्द्र पंत


------- घसेरी के यूट्यूब चैनल के लिये क्लिक करें  घसेरी (Ghaseri)

------- Follow me on Twitter @DMPant

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

पिठाई शिष्टाचार है, दक्षिणा नहीं

पिठाई का म हत्व है, दक्षिणा का नही। मुख्य फोटो सौजन्य : बिजेन्द्र पंत 
        पिछले साल (2014) दो अवसर ऐसे आये जबकि मुझे अपने करीबी रिश्तेदारों की शादी में जाने का मौका मिला। दोनों अवसरों पर मैं वर पक्ष से था। पहली शादी 'लव मैरिज' थी। लड़की सिख परिवार से थी लेकिन विवाह दोनों परिवारों की सहमति से हरिद्वार के शांतिकुंज में संपन्न हुआ। सारी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद हम जिस धर्मशाला में ठहरे हुए थे विदाई के समय उसके हाल में एकत्रित होने के लिये कहा गया। पता चला कि लड़की वाले 'पिठाई' लगाने के लिये वरपक्ष के सभी लोगों को वहां बुला रहे हैं। वही पुराना चलन। पंडित जी पिठाई यानि तिलक लगाते और ​वधु के पिताजी एक लिफाफा बाराती के हाथ में रख देते। जब मेरी बारी आयी तो मैंने तिलक लगाने के बाद लिफाफा लेने से इन्कार कर दिया। वह जिद करने लगे। मैंने कहा, ''ये मेरे उसूल हैं। मैं पिठाई लगाता हूं दक्षिणा नहीं पकड़ता।'' वे फिर भी अड़े रहे। उनका कहना था, ''यह आपके यहां की परंपरा है और हम भी उसी को निभा रहे हैं। आपको दक्षिणा लेनी पकड़नी पड़ेगी।'' मैंने उनको समझाया और उन्हें जल्द ही मेरी बात समझ भी आ गयी। इसके कुछ महीनों बाद मेरे भांजे की शादी थी। वहां भी इसकी पुनरावृत्ति हुई। दुल्हन की मां को पता चला तो उन्हें लगा कि शायद दूल्हे का मामा नाराज है और इसलिए वह दक्षिणा नहीं ले रहे हैं। वह मेरे पास आयी लेकिन उन्हें समझाने में मुझे समय लगा।
         यदि हमारे यहां पिठाई के महत्व को समझा जाता और उसकी पवित्रता के साथ दक्षिणा को नहीं जोड़ा जाता तो शायद मुझे इन दोनों व्यक्तियों को समझाने की जरूरत नहीं पड़ती। इसलिए पहले हम पिठाई के महत्व और फिर दक्षिणा के बारे में जानेंगे। बाकी यह फैसला करना आपका काम है कि आपने पिठाई लेनी या फिर पिठाई लगवानी है। (पहाड़ों में दक्षिणा लेने को पिठाई लेना भी कहा जाता है)। 
  

पिठाई या तिलक लगाने का महत्व  

              पिठाई का चलन पहाड़ों से दशकों से चला आ रहा है। भारतीय अपने आतिथ्य के लिये जाने जाते हैं। 'अतिथि देवो भव' हम सभी ने सुना होगा। 'पिठाई' शिष्टाचार का हिस्सा है। इससे हम मेहमान के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते हैं।  मेहमान के घर में प्रवेश करते समय और फिर विदाई पर पिठाई या तिलक लगाया जाता था। समय के साथ पिठाई के मायने बदल गये और ये बदलाव इसमें 'दक्षिणा' जोड़ देने से हुए। आलम यह है कि अब पहाड़ों में पिठाई का मतलब केवल तिलक लगाने तक सीमित नहीं रह गया है। इसका मतलब यह भी लगाया जाता है कि आपकी जेब में कुछ पैसे आएंगे। 'पिठाई कितनी लगी?' यह सवाल अक्सर घर के लोग भी कर देते हैं। शायद इस सवाल ने बच्चों में पिठाई के प्रति दिलचस्पी जगायी। मुझे लगता है कि यह पिठाई की पवित्रता से खिलवाड़ है।
         पिठाई लगाने का महत्व अलग है। पिठाई को मस्तक पर दोनों भौहों के बीचों बीच लगाया जाता है। इस जगह पर आज्ञाचक्र होता है। यह चक्र हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है, जहां शरीर की प्रमुख तीन नाडि़यां इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना आकर मिलती हैं। इसलिए इस स्थान को त्रिवेणी या संगम के नाम से भी जाना जाता है। यह हमारे चिं​तन मनन का स्थान होता है जो चेतन या अवचेतन अवस्था में भी जागृत रहता है। यहां से पूरे शरीर का संचालन होता है। ज्योतिषविदों का कहना है कि पिठाई या तिलक लगाने से ग्रहों की शांति होती है। अगर विज्ञान की बात करें तो जिस स्थान पर तिलक लगाया जाता है वहां पर पीनियल ग्रंथि होती है। तिलक लगाने पर पहले पीनियल ग्रंथि और फिर आज्ञाचक्र जागृत होता है। पिठाई सात्विकता का प्रतीक मानी जाती है। अक्सर आपने देखा होगा कि तिलक लगाते समय सिर पर हाथ रखा जाता है। इसका भी महत्व है। इससे आज्ञाचक्र से निकलने वाली सकारात्मक ऊर्जा पूरे शरीर में प्रवाहित होती। व्यक्ति के मन में सकारात्मक विचार आते हैं। यही वजह थी कि अतिथि के घर पर आने और विदाई के समय पिठाई लगायी जाती है ताकि वह सकारात्मक ऊर्जा के साथ घर में प्रवेश करें और उसी ऊर्जा के साथ विदाई भी लें। शादी और विवाह आदि में बाराती पहले दो दिन तक रहते थे और उन पर हर दिन पिठाई इसलिए लगायी जाती थी कि ताकि उनके मस्तिष्क में शांति और शीतलता बनी रहे। ज्योतिषविदों के अनुसार हल्दी, चंदन, केशर, कुमकुम आदि का तिलक लगाने से व्यक्ति सात्विक, सकारात्मक, आत्मविश्वास से पूर्ण, शांत और संयमित बना रहता है। 

पिठाई नहीं दक्षिणा पर नजर  

        लेकिन समय के साथ पिठाई या तिलक के मायने मतलब बदल गये। माथे पर इसके महत्व को समझने के बजाय लिफाफे के अंदर की राशि को अधिक महत्व दिया जाने लगा। शुरूआत एक पैसा, दो पैसे या एक रूपये से हुई होगी जो आज 100, 200, 500 और 1000 रूपये तक पहुंच गयी है। आपका जितना सामर्थ्य है आप उतनी दक्षिणा पिठाई में दे सकते हैं। यह पिठाई नहीं दक्षिणा है। हिन्दी शब्दकोष में दक्षिणा के  जो अर्थ मुझे मिले। उनसे आप भी अवगत हो जाइये। इसके अर्थ हैं.... 1. उपहार; दान; बख़्शीश, 2. वह धन जो किसी व्यक्ति को कर्मकांड या पूजा-हवन आदि करने के बदले दिया जाता है, 3. चढ़ावा और 4. किसी को दिया जाने वाला अनुचित धन; घूस; रिश्वत। आप इनमें से किसी भी अर्थ को लेकर क्या दक्षिणा लेना चाहेंगे? शायद नहीं। अगर पिठाई लगाने की अच्छी परपंरा के साथ दक्षिणा जोड़कर उसका स्वरूप बिगाड़ दिया गया तो मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि हम फिर से पिठाई के महत्व को समझें और उसके मूलरूप को अपनाने के लिये अपने प्रयास तेज कर दें। फैसला आपका है लेकिन इसका सकारात्मक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा। दहेज को पहली सीढ़ी पर ही नकार देने से उसके लिये आगे का रास्ता भी बंद होगा। आपका धर्मेन्द्र पंत 


------- घसेरी के यूट्यूब चैनल के लिये क्लिक करें  घसेरी (Ghaseri)

------- Follow me on Twitter @DMPant

© ghaseri.blogspot.in 
       
badge