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रविवार, 3 जनवरी 2016

देवताओं का प्रिय, उत्तराखंड का राज्य पुष्प ..ब्रह्म कमल

  अद्भुत, अद्धितीय, अनुपम, अनोखा, अप्रतिम, अनोखा, विलक्षण, देवताओं का ​प्रिय और उत्तराखंड का राज्य पुष्प। अगर आप 'ब्रह्म कमल' की तारीफ में कुछ लिखना चाहेंगे तो विशेषण कम पड़ जाएंगे। एक ऐसा पुष्प जो साल में केवल एक बार खिलता है। एक ऐसा पुष्प जो अपनी विरादरी के अन्य फूलों से विपरीत सूर्यास्त के बाद खिलकर अपने सौंदर्य और सुगंध से पूरे वातावरण को मदहोश कर देता है। एक बेहद दुर्लभ पुष्प जो देवताओं को भी प्रिय है। हिमालय में फूलों का राजा क्योंकि भारत में इसकी जो 61 प्रजातियां पायी जाती हैं उनमें से अकेली 58 हिमालय में मिलती हैं। हिमालय के अलावा यह फूल उत्तरी म्यांमा और दक्षिण पश्चिम चीन में भी पाया जाता है।  उत्तराखंड में यह फूल कई स्थानों पर पाया जाता है लेकिन फूलों की घाटी, केदारनाथ, हेमकुंड, रूपकुंड, पिंडारी, चिफला आदि जगहों पर आप आसानी से इस दिव्य फूल के दर्शन कर सकते हैं।
    एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि भले ही यह कमल की तरह दिखता है लेकिन पानी में नहीं ​बल्कि जमीन पर उगता है। अमूमन ब्रह्म कमल 3000 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर मिलता है। इसे कई अन्य नामों से भी जाना जाता है जैसे कि हिमालच प्रदेश में दूधाफूल, कश्मीर में गलगल, श्रीलंका में कदुफूल और जापान में गेक्का विजिन जिसका शाब्दिक अर्थ है चांदनी रात की खूबसूरत स्त्री।  चीन में इसे तानहुआयिझियान कहते हैं जिसका अर्थ है प्रभावशाली लेकिन कम समय तक ख्याति रखने वाला।  इसका वानस्पति नाम  साउसुरिया ओबुवालाटा है। वैसे कुछ लोग दावा करते हैं कि आर्किड कैक्टस प्रजाति का फूल जिसका वानस्पतिक नाम इपिफीलम ओक्सीपेटालम है, वह असल में ब्रह्म कमल है। ये सभी ब्रह्म कमल की ही प्रजातियां हैं जो रात में खिलती हैं और इस तरह के फूल को आप घरों में भी उगा सकते हैं लेकिन उत्तराखंड का जो ब्रह्म कमल है वह साउसुरिया ओबवालाटा है। यह फूल  बरसात के दिनों में जुलाई से लेकर सितंबर अक्तूबर तक ही खिलता है।

ब्रहमा का सृजन है ब्रह्म कमल

     ब्रह्म कमल से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं और गा​थाएं हैं। माना जाता है कि इसका सृजन स्वयं ब्रहमा ने किया था। इसके पीछे भी एक पौराणिक कहानी है। कहा जाता है कि माता पार्वती ने जब गणेश का सृजन किया तो तब भगवान शिव बाहर गये हुए थे। माता पार्वती स्नान कर रही थी और उन्होंने गणेश को घर के बाहर ​खड़ा करके आदेश दिया कि वह किसी को भी अंदर नहीं आने दें। तभी भगवान शिव पधार गये। गणेश ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया और क्रोध में शिव ने उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। माता पार्वती के आने के बाद उन्हें असलियत का पता चला। माता पार्वती के आग्रह पर ब्रहमा ने ब्रह्म कमल का सृजन किया जिसकी मदद से हाथी का सिर गणेश के धड़ पर जोड़ा गया। ब्रह्मा अपने चार हाथों में से एक हाथ में सफेद पुष्प लिये हुए हैं। यह ब्रहम कमल ही है। यह भी कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु हिमालय क्षेत्र में आये थे तो उन्होंने भगवान शिव को 1000 ब्रह्म कमल चढ़ाये थे।
     पृथ्वी पर ब्रह्म कमल के आगमन से भी एक कहानी जुड़ी है। भगवान राम और रावण की सेना के बीच युद्ध चल रहा था। इस युद्ध में एक बार लक्ष्मण मूर्छित हो गये थे। हनुमान हिमालय पर्वत से संजीवनी लेकर गये और लक्ष्मण को होश आ गया। इससे भगवान राम के साथ देवता भी खुश हो गये। उन्होंने आकाश से पुष्प वर्षा की। यह कोई और पुष्प नहीं बल्कि ब्रह्म कमल था। इस दौरान ये पुष्प फूलों की घाटी पर भी पड़ा जहां इसने अपनी जड़े जमा दी और फिर यह हिमालय में यत्र तत्र फैल गया।
     भीम और हनुमान के मिलन से भी ब्रह्म कमल का जोड़ा जाता है। महाभारत से पहले जब पांडव वनों में अपने दिन गुजार रहे थे तब हिमालय प्रवास के दौरान एक दिन  द्रौपदी इसकी सुंगध से मदहोश हो गयी और उन्होंने भीम को यह पुष्प लाने के लिये कहा। भीम पुष्प की खोज में निकल पड़े। रास्ते में उन्हें अपनी पूंछ फैलाये हनुमान मिले। भीम ने कड़े शब्दों में रास्ते से हट जाने को कहा। हनुमान ने भीम को अपनी शक्ति का परिचय दिया और जब भीम को अपनी गलती का अहसास हुआ तो उन्हें बताया कि ब्रह्म कमल बद्रीनाथ में मिलेगा।
     ब्रह्म कमल साल में एक बार और वह भी रात में चंद घंटों के लिये खिलता है। कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति इसे खिलता हुआ देखता है उसकी मनोकामना पूरी होती है। कहने का मतलब है कि ब्रह्म कमल को खिलता हुआ देखना बेहद पुण्य माना जाता है। बद्रीनाथ और केदारनाथ सहित उत्तराखंड के कई मंदिरों में इस फूल को चढ़ाने का बड़ा महत्व माना जाता है। इससे ब्रह्म कमल के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है क्योंकि चढ़ावे के लिये इसका बद्रीनाथ और केदारनाथ क्षेत्र में अंधाधुंध दोहन किया जाता है। हेमकुंड साहिब में इसका दोहन हो रहा है। पर्यावरण में आ रहे बदलावों का भी इस पुष्प पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। ब्रह्म कमल मां नंदादेवी का भी प्रिय पुष्प है। नंदाष्टमी के समय इसे तोड़ा जाता है लेकिन इसमें भी नियमों का पालन करना पड़ता है। पिथौरागढ़ में 35 किमी के दुर्गम रास्ते से होकर 17000 फीट की उंचाई पर स्थित हीरामणि कुंड से ब्रह्म कमल लाकर मां नंदा को अर्पित किया जाता है। यहां ब्रह्मकमल हर तीसरे साल नंदादेवी पर्वत शृंखला से लाया जाता है। नंदा अष्टमी के दिन देवताओं पर चढ़ाये गये ब्रह्म कमल के फूलों को प्रसाद के रूप में भी बांटा जाता है।

औषधीय गुण भी हैं ब्रह्म कमल में

    ब्रह्म कमल औषधीय गुणों से भी भरपूर है। इसके अंदर से निकलने वाले पानी को अमृत कहा जाता है क्योंकि इसके सेवन से व्यक्ति एकदम से स्पूर्त हो जाता है और उसकी थकान मिट जाती है। ब्रह्म कमल के फूलों की राख को शहद के साथ मिलाकर खाने से यकृत की वृद्धि रोकने में मदद मिलती है। इसे मिर्गी के दौरे रोकने में भी सहायक माना जाता है और घाव भरने में भी इससे मदद मिलती है। इसे जीवाणुरोधी माना जाता है और इसका इस्तेमाल सर्दी-ज़ुकाम, हड्डी के दर्द आदि में भी किया जाता है। लोग इसके कपड़ों के बीच डालकर रखते हैं। इसकी मदहोश करने वाली सुगंध से कपड़े महकते रहते हैं और उन पर कीड़े भी नहीं लगते। मूत्र संबंधी रोगों में भी इसका उपयोग किया जाता है। भोटिया जनजाति के लोग तो इसे अपने घरों में लटकाकर रखते हैं क्योंकि उनका मानना है कि यह बीमारियों को आने से रोकता है। वियतनामी लोग इसका सूप बनाकर टानिक के रूप में पीते हैं। तिब्बती लोग इसका उपयोग लकवा और दिमागी रोगों के लिये करते हैं। यह जलोदर (एक रोग जिसमें पेट में पानी जमा हो जाता है) को दूर करने में भी उपयोगी है।

घर में उगाईये ब्रह्म कमल

      ब्रह्म कमल की कुछ प्रजातियों को आप घर में भी उगा सकते हैं। इसकी पत्ती को तने सहित काटकर पानी में डुबोकर रखा जाता है। लगभग तीन सप्ताह में इसमें जड़ें आ जाती हैं जिसे किसी गमले में मिट्टी डालकर लगाया जा सकता है। इसका तना काटकर मिट्टी में रोपने पर भी नये पौधा तैयार हो जाता है। असल में इपिफीलम ओक्सीपेटालम श्रेणी के पौधे को उगाना आसान होता है जो हिमालय के अलावा देश के कई अन्य हिस्सों में भी पाया जाता है।
     ब्रह्म कमल का संरक्षण हालांकि जरूरी है। आप इसे देवताओं को अर्पित करिये लेकिन इसकी सीमा तय होनी चाहिए। अगर इसको बचाये रखने के प्रयास नहीं किये गये तो उत्तराखंड का राज्य पुष्प विलुप्त होने की कगार पर पहुंच सकता है। तब आप इसे देवकोप कहेंगे लेकिन उससे बचाव के उपाय अभी से शुरू कर देने चाहिए। आपका धर्मेन्द्र पंत


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रविवार, 26 अप्रैल 2015

भारत में भूकंप के क्षेत्र: सावधान उत्तराखंड, सावधान नोएडा

                                                                       धर्मेन्द्र पंत 
    हिमालयी क्षेत्र भूकंप के लिहाज से भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे संवेदनशील है। हिमालय दुनिया की सबसे नयी पर्वत श्रृंखला है जिसका लगभग 70 लाख वर्ष पूर्व तक निर्माण होता रहा। हिमालय के निर्माण की शुरूआत लगभग साढ़े पांच करोड़ साल पहले यूरेशिया और गोंडवानालैंड की टक्कर के कारण टेथिस सागर से हुई थी। तब भारतीय प्रायद्वीप एशिया का हिस्सा नहीं था। इसके उत्तरी भाग में यूरेशिया था तथा उसके और गोंडवानालैंड के बीच में टेथिस सागर था। भारत का प्रायद्वीपीय हिस्सा यूरेशिया टेक्टोनिक प्लेट से टकराया था जिसके कारण हिमालय का ​निर्माण हुआ था। अब भी भारतीय हिस्सा लगभग 47 मिलीमीटर प्रतिवर्ष की गति से एशिया के उत्तरी भाग से टकरा रहा है। सरल शब्दों में कहें तो भारतीय प्लेट प्रति वर्ष एशिया के अंदर धंस रही है और यह सब हिमालयी क्षेत्र में हो रहा है। धरती के अंदर हो रहे इन बदलावों के कारण पूरे हिमालयी क्षेत्र में भूकंप का खतरा बना रहता है। इन क्षेत्रों में जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, नेपाल, भूटान, ​उत्तरी बिहार, सिक्किम, उत्तरी बंगाल और लगभग पूर्वोत्तर के सभी राज्य आते हैं। भारतीय प्लेट के एशियाई क्षेत्र में घुसने के कारण वहां बड़ी मात्रा में तनाव पैदा होता है और ऊर्जा का सृजन होता है। जब ऊर्जा की मात्रा बढ़ जाती है तो वह बाहर निकलने के लिये छटपटाने लग जाती है और कई बार हिमालयी क्षेत्र में इस वजह से भी भूकंप आ जाते हैं। 

भारत में भूकंप के जोन 


    जोन—5 यानि सबसे ज्यादा खतरा :  यदि पूरे भारत की बात करें तो उसे चार भूकंपीय क्षेत्रों में बांटा जा सकता है और इनमें हिमालयी क्षेत्र सबसे अधिक सक्रिय यानि अत्याधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं। इन क्षेत्रों यानि जोन में जोन—5 पांच में भूकंप का सबसे अधिक खतरा रहता है जिसमें रिक्टर स्केल पर नौ से भी अधिक तीव्रता के भूकंप आ जाते हैं। इस जोन में पूरा पूर्वोत्तर भारत, जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात में कच्छ का रन, उत्तर बिहार का कुछ हिस्सा और अंडमान निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं।
भारत के भूकंपीय क्षेत्र का मानचित्र
   जोन—4 यानि अधिक जोखिम वाला क्षेत्र : इसमें जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्से, दिल्ली, सिक्किम, उत्तर प्रदेश के उत्तरी भाग, सिंधु-गंगा थाला, बिहार और पश्चिम बंगाल, गुजरात के कुछ हिस्से और पश्चिमी तट के समीप महाराष्ट्र का कुछ हिस्सा और राजस्थान आता है। दिल्ली में भूकंप की आशंका वाले इलाकों में यमुना तट के करीबी इलाके, पूर्वी दिल्ली, शाहदरा, मयूर विहार, लक्ष्मी नगर और गुड़गांव, रेवाड़ी तथा नोएडा के नजदीकी क्षेत्र शामिल हैं।
   जोन—3 कम खतरे की संभावना : तीसरा जोन जिनमें खतरे की संभावना कम बनी रहती है उसे जोन—3 श्रेणी में रखा गया है। जोन-3 में केरल, गोवा, लक्षद्वीप द्वीपसमूह, उत्तर प्रदेश के बाकी हिस्से, गुजरात और पश्चिम बंगाल, पंजाब के हिस्से, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक शामिल हैं।
    जोन—2 कम तीव्रता वाला क्षेत्र:  भारत के कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां भूकंप बहुत कम सक्रिय है। इनमें अधिकतर प्रायद्वीपीय भारत आता है जिसे सबसे पृथ्वी का सबसे पुराना भूभाग माना जाता है। इसे जोन—2 में रखा जाता है। दक्षिण भारत के अधिकतर हिस्से इस जोन में आते हैं। 

भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील है उत्तराखंड 


     त्तराखंड राज्य भूकंप की दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्रों में आता है। मतलब यहां बेहद ताकतवर भूकंप आते हैं। इसका गवाह इतिहास भी रहा है। उत्तराखंड, नेपाल, हिमाचल प्रदेश में जमीन के अंदर कई सक्रिय समानांतर थ्रस्ट फाल्ट है। इन फाल्ट्स के खिसकने से 7.5 से भी अधिक की तीव्रता के भूकंप आते हैं। उत्तराखंड में पिछले 200 वर्षों से 7.5 या इससे अधिक क्षमता का भूकंप नहीं आया है और इसलिए संभावना यह है कि इस क्षेत्र में किसी भी समय 7.5 या इससे अधिक क्षमता का ताकतवर भूकंप आ सकता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तरकाशी में 1991 में 6.8 और चमोली में 1999 में 6.4 की तीव्रता वाले भूकंप ने ही तबाही मचा दी थी। जब टिहरी बांध का निर्माण चल रहा था और मैं गढ़वाल विश्वविद्यालय में भूगोल का छात्र था। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखकर ही मैं टिहरी बांध के विरोधियों में शामिल हो गया था। आज भी मुझे उसमें खतरा नजर आता है। आपको यह बता दूं कि उत्तराखंड में इससे पहले सबसे ताकतवर भूकंप सितंबर 1803 में आया था जिसकी रिक्टर स्केल पर तीव्रता 7 आंकी गयी थी। इस भूकंप में 200 से 300 लोगों की जानें गयीं थी। नेपाल में 7.9 की तीव्रता वाले भूकंप आने से साबित हो जाता है कि यह शक्तिशाली भूकंप वाले क्षेत्र में आता है।
   
जोन—5 और जोन—4 में आता है उत्तराखंड 
उत्तराखंड में उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाण, पिथौरागढ़, बागेश्वर तथा अल्मोड़ा, पौड़ी और टिहरी के कुछ हिस्से जोन—5 में आते हैं और यहां खतरनाक भूकंप आने की संभावना बनी रहती थी। इसके बाकी हिस्से भी जोन—4 में आते हैं और इसलिए वहां भी खतरा कम नहीं रहता है। उत्तराखंड में पिछले 25 वर्षों में दो बड़े भूकंप आये थे। 19 अक्तूबर 1991 को उत्तरकाशी में आये भूकंप से 768 लोगों की मौत हो गयी थी और 5000 से अधिक लोग घायल हो गये थे। इस कारण 18 हजार से अधिक इमारतें नष्ट हो गयी थी। इसके बाद 28 मार्च 1999 को चमोली के पिपलकोटी इलाके में भूकंप आया जिसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 6.4 आंकी गयी। इससे 115 लोगों की जानें गयी थी। इन दोनों भूकंप का प्रभाव समीपवर्ती राज्यों में भी देखने को मिला था। तब तीन यानि 31 मार्च तक भूकंप आते रहे थे जिन्हें 'आफ्टरशॉक' कहा जाता है। इनके अलावा पांच जनवरी 1997 को धारूचुला में 5.6 तीव्रता, 14 दिसंबर को गोपेश्वर में 5.0 तीव्रता का, पांच अगस्त 2006 को उत्तराखंड—नेपाल सीमा पर और 22 जुलाई 2007 को उत्तरकाशी में भूकंप आया था। इसके अलावा जब भी भूकंप का केंद्र कश्मीर, पाकिस्तान या नेपाल रहा तो उसका असर उत्तराखंड सहित पूरे उत्तर भारत में देखने को मिला था।
   अभी दिक्कत उत्तराखंड में भवन निर्माण से आ रही है। देहरादून जैसे शहरों में बड़ी इमारतें बन रही हैं जबकि यह भूकंप के जोन—4 में आता है। भूकंप आने पर ऊंची इमारतों को सबसे अधिक खतरा रहता है और इसलिए मुझे दिल्ली के सटे नोएडा में बनी गगनचुंबी इमारतों को देखकर वहां रह रहे लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंता होने लगती है। 
   बहरहाल भूगोल का छात्र होने के कारण मुझे जितना पता था मैंने जानकारी यहां देने की कोशिश की है। यदि आपको इसमें कुछ जोड़ना है तो नीचे टिप्पणी वाले कालम में जरूर इसको साझा करें।

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