बुधवार, 28 मार्च 2018

उत्तराखंड की शादियों का अहम अंग है 'बान'


     क्या आपने कभी सोचा है कि उत्तराखंड की शादियों में 'बान' क्यों दिये जाते हैं? यह हमारी परंपरा, हमारी संस्कृति ​का हिस्सा है जो वर्षों से उत्तराखंड की शादियों का अहम अंग बना हुआ। इसके बिना शादी की रस्म पूरी होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बान या बाना यानि हल्दी हाथ की रस्म लड़की के साथ लड़के को भी निभानी पड़ती है।  उत्तराखंड में परंपरागत ढोल दमौ और मसकबीन की धुन के बीच बान दिये जाते हैं और  स्नान कराया जाता है।
         बान क्यों दिये जाते हैं? इसका सामाजिक, सांस्कृतिक, पारंप​रिक पहलू हो सकता है लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिक सत्य भी छिपा हुआ है। इस पर हम आगे बात करेंगे। पहले आपका परिचय बान से करवा देता हूं। 'बान' बारात जाने से पहले की रस्म है जो दूल्हा और दुल्हन दोनों के घरों में लगभग एक समय में निभायी जाती है। इसमें हल्दी, सुमैया, कच्चुर, चंदन आदि को कूटकर मिश्रण बनाया जाता है। इसे फिर सात पुड़ियों में रखा जाता है जिनमें दूब को डुबाकर उसे दूल्हा या दुल्हन के पांव से लेकर सिर तक यानि पांव, घुटना, हाथ, कंधा और सिर को स्पर्श करके अपने सिर पर रखना होता है। ऐसा पांच या सात बार करना होता है। घर के सदस्य, रिश्तेदार आदि 'बान' देते हैं।


      आचार्य चंद्रप्रकाश थपलियाल ने बान के बारे में बताया, “ बाना (बान) में मुख्य रूप से कच्ची हल्दी, दही, सरसों का तेल, जिराळु, सुमैया, चंदन, दूब का उपयोग किया जाता है। जिस तरह से सात फेरे और सात बचन होते हैं उसी तरह से बाना भी सात ही दिये जाते हैं। यह अलग बात है कि आजकल केवल फोटो खिंचवाने के लिये बाना दिये जा रहे हैं और इसलिए एक, तीन या पांच बार ही बाना देने का रिवाज शुरू हो गया है।’’
       'बान' अमूमन ओखली के पास दिये जाते हैं। दूल्हा या दुल्हन को चौकी (चौक या चौकली) पर बिठाया जाता है। पांच कन्यायें ओखली में सभी चीजों को कूटती हैं। इसके बाद दूल्हा या दुल्हन उसे तांबे की थाली या परात में रखी पुड़ियों में रखते हैं। सबसे पहले पंडित जी बान देते हैं। उसके बाद पांचों कन्यायें तथा बाद में मां—पिताजी, घर के अन्य सदस्य, रिश्तेदार और गांव वाले।  बान देते समय गांव की कुछ महिलाएं मंगल गान भी करती हैं। गढ़वाल और कुमांऊ में अलग अलग मंगल गान का प्रचलन है। जैसे 'दे द्यावा ब्रह्मा जी हल्दी को बान' या 'उमटण दइए मइए मैल छूटाइय'। जब दुल्हन को बान दिये जाते हैं तो माहौल थोड़ा गमगीन होता है। स्वाभाविक है बेटी की बिदाई का गम सभी को सालता है। इस बीच हालांकि जीजा—साली, देवर—भाभी आदि के बीच खूब हंसी ठिठोली भी चलती है। एक दूसरे पर हल्दी लगाकर मजाक किया जाता है।
       अब वही सवाल कि आखिर बान क्यों दिये जाते हैं? माना जाता है कि बान नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने, ग्रह और नजर दोष के निवारण के लिये दिये जाते हैं। हल्दी शुभ होती है और हल्दी से शुभकार्य की शुरुआत करना अच्छा माना जाता है।
        हल्दी हाथ यानि बान का वैज्ञानिक पहलू भी है। आयुर्वेद में हल्दी को औषधि का दर्जा दिया गया है। इस कारण हल्दी हमारी त्वचा के लिए एक तरह से प्राकृतिक का वरदान के समान है। हल्दी के लगाने से त्वचा संबंधी अनेक बीमारियां से छुटकारा पाया जाता है।
       हल्दी का लेप शरीर की कोशिकीय संरचना को इस तरह से फैलाता है, कि इसके हर दरार और छिद्र में ऊर्जा भर सके। हल्दी इस काम में भौतिक रूप से मदद करती है। हल्दी प्राकृतिक एंटी-बायटिक होती है। हल्दी का स्नान दूल्हा और दुल्हन को तमाम रोगों से बचाने में सहायक होता है। इससे त्वचा में भी निखार आता है।
       शादी के समय घर में कई तरह के मेहमान आते हैं जिससे नकारात्मक ऊर्जा फैलने की आशंका रहती है। इसका दूल्हा या दुल्हन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हल्दी के बारे में कहा जाता है कि वह घर में और दूल्हे या दुल्हन के अंदर नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करने से रोकती है। हल्दी नकारात्मक ऊर्जा नष्ट करके सकारात्मक ऊर्जा का सृजन करने में सहायक होती है।
       यह थी बान की कहानी। आपको कैसी लगी जरूर बताईये और 'घसेरी' के वीडियो चैनल को भी जरूर सब्सक्राइब करिये। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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मंगलवार, 20 मार्च 2018

यह जन्मभूमि, यह मातृभूमि इसमें जल्दी आ

चित्र साभार : राजीव विश्वकर्मा 
       उत्तराखंड वर्तमान समय में पलायन की सबसे भीषण मार झेल रहा है लेकिन इसकी शुरुआत कई दशक पहले हो गयी थी जब पहाड़ के युवा ने आजीविका की खातिर मैदानों की तरफ कदम बढ़ाये थे। इसके बाद शहरों का आकर्षण बढ़ता गया तथा उत्तराखंड के युवा देहरादून, लखनऊ, दिल्ली, मुंबई आदि शहरों में नौकरी करने लगे। सेना में नौकरी तब भी और आज भी एक आकर्षण था। सेना से सेवानिवृत होने के बाद मैदानी भागों विशेषकर देहरादून, कोटद्वार, बरेली आदि शहरों में बसने की प्रवृति भी बढ़ी। पहले केवल युवा नौकरी के लिये पलायन करते थे लेकिन बाद में उनके साथ परिवार के अन्य सदस्य भी शहरों की तरफ कूच करने लग गये। परिणाम गांव खाली होने लगे और आज स्थिति​ यह बन चुकी है कि उत्तराखंड के कई गांव महज कागजों में सिमट गये हैं। 
         उत्तराखंड का गठन नौ नवंबर 2000 को हुआ। उम्मीद थी कि पहाड़ की जवानी और पानी थामने के जिस वादे के साथ उत्तराखंड बना था वह पूरा होगा लेकिन हुआ इसका उलटा। इसके बाद पलायन तेजी से बढ़ा। कहते हैं कि 'जहां न जाए रवि, वहां पहुंचे कवि'। गढ़वाली और हिन्दी के कवि श्री जितेंद्र मोहन पंत ने अपनी युवावस्था में ही उत्तराखंड से हो रहे पलायन को भांप लिया था। पलायन पर उन्होंने 1980 में यह कविता लिखी थी जो आज भी प्रासंगिक है। उम्मीद है कि 'घसेरी' के पाठक इसका मर्म समझेंगे। 

                 यह जन्मभूमि, यह मातृभूमि इसमें जल्दी आ 

            (उत्तराखंड से हो रहे पलायन पर अस्सी के दशक में लिखी गयी लंबी कविता)


                                             .... जितेंद्र मोहन पंत 

      (1)
रे पंछी तू किधर तड़पता इस उपवन के। 
तू तो तड़पाता है सबको, दरश न देके।।
अन्य सभी प्राणी उपवन में हैं तेरे संग के।
तू कहां भिन्न है सबसे, किस रंग में रंग के।। 
रे पंछी .......

आ जल्दी से दे दर्श इन्हें ना किसी से डर के। 
तू नहीं मिला तो ये भी रह जाएंगे मरके।। 
जगा मोह को मन में लाकर मोहक बनके। 
मन में बसे हैं तेरे तो आ मनवर मन के।। 
रे पंछी .......

ना विदेश को पग धर, आ घर को मुड़के।
बैठ घोंसले में आकर तीव्र गति से उड़ के।। 
मिल इन सबसे, सभी राह कंटक दमन के। 
हो हर्षित, ला खुशियों के दिन इस चमन के।। 
रे पंछी.........

कहां किनारे पड़ा हुआ है किस सिन्ध के। 
स्वच्छंद विचरण करता था अब कहां है बंधके।। 
किस पिंजड़ें में पड़ा हुआ है, स्वच्छंद वन के।
रे पंछी तू किधर तड़पता इस उपवन के।। 
   (2)
तेरा उपवन सूख गया है, इसे सींच दे। 
सूखे तरुओं में नीर बहा, नव—प्राण खींच दे।। 
बिन तेरे, ना रही तरू तृणों में हरियाली। 
इन्हें हरित कर आ दौड़कर वन के माली।। 
इन तरुओं को और जीर्ण हड्डी न बना दे।
गिने चुने ना बना इन्हें, तू बना घना दे।। 
सूखी तृणों को अब न बना, बना हरी घास दे।
दूर भगा पतझड़ को, अब ला मधुमास दे।। 
इनमें हरियाली कर निर्मित नव पत्रों को। 
कलियों को दे जन्म, बना इनसे कुसुमों को।। 

       (3)
ना अधिक सताओ अब ना सहन करूंगा पीरा।
दर्शन दो भगवान मुझे, मैं दासी मीरा।। 
बन कृष्ण इस घर में फिर से रास रचा दो।
ये त्यागत संसार, अमृत दे इन्हें बचा दो।। 
मुझे शरण दो, शरणज शिवि तुम बन जाओ। 
जगा मोह को मन में एक मोहक बन जाओ।। 
अब तो मैंने मन हृदय में रखा था धीरा। 
तुम बिन सभी भये हैं दुर्बल शरीरा।। 

   (4)
एक उपवन में हम सबका है एक बसेरा।
इस से हुआ शुरू है हम सबका ही सवेरा।। 
जननी, जन्मभूमि आदि से दूर क्यों भागा।
इन सबका मिलता था प्यार, क्यों इसको त्यागा।। 
यह जन्मभूमि, यह मातृभूमि, इसमें जल्दी आ।
मात—तात, भाई—बहन, सभी के संग आ।। 
मोह उत्पन्न कर फिर से, अब बन इन सबका।
दे इन्हें प्यार, ले इनसे प्यार जैसे पहले का।।



श्री जितेंद्र मोहन पंत की कविताओं के लिये कृपया इस लिंक कविता कोश पर क्लिक करें। 

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

गढ़वाली में 'ल' और 'ळ' का अंतर

  
        बाल और बाळ, ढोल और ढोळ, मोल और मोळ, घोल और घोळ, पितलु और पितळु। क्या आप एक जैसे दिखने वाले इन शब्दों का अंतर जानते हैं? अगर आप गढ़वाली या कुमाउंनी लोकभाषा की जानकारी रखते हैं तो आपको इनका अंतर स्पष्ट करने में दिक्कत नहीं होगी। 'ल' और 'ळ' के कारण पूरा अर्थ बदल जाता है। मसलन बाल अर्थात बाल जैसे सिर के बाल जबकि बाळ मतलब जलाओ। माना जाता है कि 'ळ' गढ़वाली में विशिष्ट ध्वनि है, लेकिन यह केवल उत्तराखंड की लोकभाषाओं तक ही सीमित नहीं है। असल में 'ळ' का साम्राज्य काफी विस्तृत है लेकिन हिन्दी में इस अक्षर को नकार देेने के कारण यह उपेक्षित हो गया। मराठी और दक्षिण भारतीय भाषाओं में 'ळ' का धड़ल्ले से उपयोग होता है। वहां हालांकि इसका उच्चारण गढ़वाली की तरह नहीं किया जाता है। अंग्रेजी में इसे 'L', 'LA' और 'ZH' के रूप में लिखा जाता है। इसलिए दक्षिण भारतीय भाषाओं में 'ळ' का उच्चारण हिन्दी के 'झ' जैसा तो मराठी में 'ड़' की तरह लगता है। इसलिए जब हम उनका हिन्दी में उच्चारण करते हैं तो 'ळ' खो जाता है। आईए आज गढ़वाली लोकभाषा को केंद्र में रखकर 'ळ' पर चर्चा करें।     
      'ळ' को हिन्दी में नहीं अपनाया और इसलिए हम मानने लगे कि यह गढ़वाली का ही कोई विशेष अक्षर है लेकिन असल में ऐसा नहीं है। देवनागरी लिपि के व्यंजनों में 'ळ' अक्षर है। आप मराठी वर्णमाला देखिये। उसमें आपको 'ह' के बाद 'ळ' दिखायी देगा। 'कीबोर्ड' में भी यह अक्षर है और इसका कारण यही है कि मराठी में इसका बहुत उपयोग होता है। रेमिंगटन कीबोर्ड में अंग्रेजी की 'G' वाली 'key' को 'Shift' के साथ दबाने से जबकि फोनेटिक में 'N' वाली 'key' को 'Shift' के साथ दबाने से आपका 'ळ' मिल जाएगा। 
        हरियाणवी, राजस्थानी जैसी लोकभाषाओं में 'ळ' अक्षर का उपयोग किया जाता है। संस्कृत की बात करें तो वैदिक संस्कृत में यह अक्षर मिलता है। यही वजह है कि वेदों, उपनिषदों और पुराणों में 'ळ' है लेकिन आम बोलचाल की संस्कृत में यह अक्षर नहीं है। 
       ब 'ळ' के उच्चारण की बात करते हैं। जीभ को ऊपर की तरफ मोड़कर जिह्वाग्र के निचले भाग को मुखगुहा की छत से लगाकर 'ल' बोलने पर उसका मूर्धन्य भेद अर्थात 'ळ' का उच्चारण होता है। अगर आप मराठी सुनेंगे तो यह 'ड़' के अधिक करीब लगेगा लेकिन गढ़वाली में ऐसा नहीं है जहां यह 'ल' का मूर्धन्य भेद ही है। असल में र, ल, ळ, ड, ड़ ये पांचों अक्षर वैकल्पिक वर्ण हैं तथा 'ळ' को 'ल' का पृथक वर्ण माना जाता है। दक्षिण भारतीय भाषाओं जैसे तमिल, मलयालम आदि में इसका उच्चारण 'ल' और 'ड़' का मिश्रण लगता है। एक उदाहरण कनिमोझी करुणानिधि का है। उनका नाम असल में कनिमोझी नहीं है। हिन्दी समाचार पत्रों और चैनलों में उनका यही नाम लिखा और बोला जाता है। अंग्रेजी में उनका नाम 'Kanimozhi' लिखा जाता है और इसलिए हिन्दी में इसे कनिमोझी कर दिया गया जबकि इसका उच्चारण 'कनिमोळी' होना चाहिए था लेकिन क्या करें हिन्दी में 'ळ' नहीं है और अंग्रेजी चैनलों का इससे कोई लेना देना नहीं है।
        गढ़वाली और कुमांउनी जैसी लोकभाषाओं में 'ळ' का विशेष महत्व है। हिन्दी की तरह गढ़वाली भी देवनागरी लिपि पर निर्भर है लेकिन गढ़वाली वर्णमाला में 'ळ' अतिरिक्त व्यंजन रखना ही होगा जैसा कि हिन्दी में नहीं है। गढ़वाली में कई ऐसे शब्द हैं जिनमें 'ल' और 'ळ' से उनका संपूर्ण अर्थ बदल जाता है। इन शब्दों को बोलने और समझने से आपको 'ल' और 'ळ' के बीच का अंतर भी पता चल जाएगा।
  •       आला — आएंगे                          आळा — मकान की दीवार पर सामना रखने की जगह 
  •       कल — बीता या आने वाला कल   कळ — उपाय, तरतीब  
  •       कालि — देवी मां                         काळि — काले रंग की 
  •       खाल — त्वचा, चमड़ा                  खाळ — पहाड़ों पर समतल स्थल 
  •       गाल — गाल, कपोल                    गाळ — गाली 
  •       घोल — घोंसला                            घोळ — घोलना, घोलो 
  •       चाल — आकाशीय बिजली            चाळ — छानना 
  •       छाल — पेड़ का छिलका                छाळ — धोना 
  •       जाला — जाएंगे                            जाळा — जैसे मकड़े का जाळा 
  •       डालि — टोकरी                             डाळि — छोटा पेड़  
  •       ढोल — एक वाद्ययंत्र                   ढोळ — फेंकना 
  •       तौली — छोटी पतीली                   तौळी — उतावली 
  •       दिवाल — दीवार                          दिवाळ — दीवाली 
  •       नाल — जैसे घोड़े, बंदूक की नाल  नाळ — गर्भ में बच्चे को आहार पहुंचाने वाली नलिका 
  •       पाल — फलों को पकाने की विधि  पाळ — दीवार  
  •       बेल — लता                                 बेळ — समय 
  •       भेल — छत्ता                               भेळ — खड़ी ढलान 
  •       मोल — मूल्य                               मोळ — गोबर 
  •       यकुला — अकेला                          यकुळा — एक बार  
  •       लाल — रंग                                   लाळ — लार 
  •       सिलौण — सिलवाना                     सिळौण  — विसर्जित करना 
  •       हाल — दशा, हालचाल                    हाळ — आंच
            ऐसे कई अन्य शब्द हैं जिनमें 'ल' और 'ळ' में अंतर आ जाता है। ब्लॉग में इस पोस्ट के नीचे टिप्पणी वाले कालम में जरूर ऐसे शब्दों का जिक्र करें। 'घसेरी' को इंतजार रहेगा। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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बुधवार, 10 जनवरी 2018

गढ़वाली में 'तुम' है 'आप' नहीं

     कहते हैं कि जब दो भाषाएं आपसी संपर्क में आती हैं तो उससे दोनों समृद्ध होती हैं लेकिन इसका कई बार नकारात्मक असर भी पड़ता है क्योंकि जो भाषा प्रभावी होती है वह हावी हो जाती है और ऐसे में दूसरी भाषा के शब्द मरने लग जाते हैं। अंग्रेजी के प्रभाव और विशेषकर हिन्दी के कुछ समाचार पत्रों में जिस तरह से धड़ल्ले से अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग किया जा रहा है उससे हिन्दी के कई प्रचलित शब्द भी नेपथ्य में जा रहे हैं। यही हाल स्थानीय भाषाओं का भी है। पिछले दिनों मैंने अपनी फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट लिखी थी कि 'आप' गढ़वाली शब्द नहीं और गढ़वाल में सम्मान के लिये 'तुम' का उपयोग होता है। इस पर सार्थक चर्चा हुई और कुछ उपयोगी जानकारी भी मिली। घसेरी में इस बार हम बात 'आप' और 'तुम' को लेकर ही करते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि गढ़वाली में बात करते समय कोई भी आप का उपयोग इसलिए करता है क्योंकि उसे लगता है कि वह सामने वाले को पर्याप्त सम्मान दे रहा है। वैसे इसके लिये 'तुम' पर्याप्त है लेकिन जब जुबान पर हिन्दी चढ़ी होती है तो गढ़वाली बोलते समय भी तुम बोलने में हिचकिचाहट होती है। यही कारण है कि आप अब गढ़वाली में घुसपैठ कर चुका है। गढ़वाली में बात करते समय साफ लग जाता है कि 'आप' इसमें घुसपैठिया है। ठेठ गढ़वाली में 'आप' या 'आपका' के लिये अब भी कोई स्थान नहीं है। अपने से बड़ों के लिये सम्मानजनक शब्द के तौर पर आज भी 'तुम' और 'तुमारा, तुमरा, तुमारू, तुमरू' का ही उपयोग होता है। जैसे 'तुम कख जाणा छयां', 'तुमन क्या खाण', 'तुमरा हथ में क्या च' आदि आदि। आप औपचारिक लगता है तुम नहीं। आप के सामने अपना दुख बयां नहीं किया जा सकता है लेकिन तुम के सामने दिल खोलकर बात की जा सकती है। गढ़वाली की युवा कवयित्री नूतन तन्नू पंत ने सही कहा है कि गढ़वाली में आप बोलने पर अपना भी पराया नजर आता है। तुम में अपनापन है आप में नहीं। उन्होंने गढ़वाली में सुंदर शब्दों में 'आप' और 'तुम' के बीच भावनात्मक भेद करने का अच्छा प्रयास किया है। नूतन लिखती हैं, ''जख तक "अाप" अर "तुम" कु सवाल च त आप थैं बड़ु आदर सूचक शब्द समझिदी बजाए तुम का पर हमरि गढ़वळि मा आप ब्वलदे ही अपणु बि पर्या नजर आन्द,ऑखु लगद पर अगर हम "तुम " से कैथे सम्बोधित करदो त ये शब्द मा इतगा अपण्यास च कि कखि दूरु कु बि अपणू सि लगद। ये मा क्वी शक नीच कि हमरि गढ़वळि अपन्वत्व अर अपण्यास कि प्रति मूर्ति च !!''


कहां से पैदा हुए 'आप' और 'तुम' 


   बसे पहले हिन्दी में अपनी अहम जगह बनाने के बाद अब स्थानीय लोकभाषाओं में घुसपैठ करने वाले 'आप' और भारतीयों के अपनत्व से जुड़े रहे 'तुम' शब्दों के मूल के बारे में जानने की कोशिश करते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 'आप' असल में हिन्दी का शब्द नहीं है। वेदों में आप शब्द है लेकिन किसी के सम्मान के लिये नहीं बल्कि पानी या जल के लिये उसका उपयोग किया गया है। वेदों में जल के लिये 'आपः' या 'आपो देवता' कहा गया है। ‘ऋग्वेद’ के पूरे चार सूक्त ‘आपो देवात’ के लिए समर्पित हैं। तो सवाल उठता है कि हिन्दी में 'आप' शब्द कहां से आया? नेशनल बुक ट्रस्ट के हिन्दी विभाग के संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी के अनुसार ''आप पर्शियन से आया है उर्दू के रास्ते।'' मतलब उन मूल बोलियों में आप नहीं था जिनसे हिन्दी विक​सित हुई। 
    हिन्दी, अंग्रेजी और गढ़वाली साहित्य पर समान रूप से अधिकार रखने वाले मशहूर लेखक श्री भीष्म कुकरेती का भी कहना है कि आप का गढ़वाली में उपयोग नहीं होता है। श्री कुकरेती के शब्दों में, ''आप माने ओप लगण याने बरगद के नीचे न पनपना। संस्कृत में तुम ही है। आप अरबी है या उर्दू, अधिकतर प्रोफेट को आप से पुकारते हैं की आपने ....। आप मुगलों के कारण नही बल्कि स्वतंत्रता के बाद सभ्यता का प्रतीक बन गया। गुजरात में या महराष्ट्र में तुम ही प्रयोग होता है वे भी अब आप पर आ गये हैं।'' स्वतंत्र पत्रकार और लेखक श्री विनायक कुलाश्री शिवार्पणं ने सही कहा कि भाषा-बोली सतत विकसित होती रहने वाली महानद है। उन्होंने कहा, ''हिन्दी स्वयं उर्दू के आप शब्द से नफासत और सभ्यता को पोषित कर रही है। खड़ी बोली क्षेत्रों में तू और तुम का जो पोस्टमार्टम किया जाता है वह भाषाविदों की परिकल्पनाओं से भी पृथक है। तथापि मनुज समुदाय में संवेदनाओं और मंतव्यों को शाब्दिक रुप में विनिमय करने के लिये किसी भी भाषा का समय-समय पर परिष्कृत और सुसंस्कृत होना आवश्यक हैं।''
     अब 'तुम' की बात करते हैं। भारतीय लोकभाषाओं का अध्ययन करने पर पता चलता है कि यहां हिन्दी की जितनी भी उपबोलियां या भाषाएं हैं उनमें एक समय में आप शब्द का अस्तित्व था ही नहीं। गढ़वाली और कुमाउंनी ही नहीं मराठी, बृज, राजस्थानी, हरियाणवी, गुजराती, मगही, पंजाबी आदि किसी भी भाषा को सुन लीजिए वहां आपको 'आप' नहीं मिलेगा। वहां तू, तुम, तेने से काम चलता है। यहां तक कि संस्कृत भाषा, जो विज्ञान सम्मत है, उसमें भी आप नहीं है। संस्कृत में अधिकतर 'त्वम' का उपयोग होता है जिससे कि हमारी लोकभाषाओं का 'तुम' बना है। संस्कृत के विद्वान श्री सच्चिदानंद सेमवाल के शब्दों में, ''तुम शब्द संस्कृत के त्वम् शब्द का तद्भव है। मध्यम पुरुष के लिए शास्त्रों में प्रायः इसी शब्द का प्रयोग है देवी देवता या भगवान् के लिए भी। लेकिन विशेष सम्मान के लिए भवान् शब्द का प्रयोग भी होता है और उसके साथ प्रथम पुरुष की क्रिया लगती है। जैसे भवान् पठति आदि। आप शब्द संस्कृत में है ही नहीं तुम के लिए।''  शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े श्री महेश कुड़ियाल का मानना है कि गढ़वाली संस्कृत के करीब है। उनके शब्दों में, ''गढ़वाली संस्कृत के निकट है, जहां परमात्मा के लिये भी, त्वमेव, माता च पिता त्वमेव .. त्वमादि देव पुरुष: पुराण, त्वम् ही प्रयुक्त होता है, त्वं ब्रम्हा वरुणेन्द्र रुद्र मरुत: सर्वत्र त्वं ही प्रयुक्त है।  आप का आत्मपरत्व या आप्प दीपो भव आदि पाली से हिन्दी में स्वयं के लिये प्रयुक्त होते होते, दूसरों पर भी प्रयुक्त हो गया .. जो सम्मान सूचक बन गया है .. तुम के साथ क्रिया में निवेदन जैसे तुम चलणां या तुम करणां, तुम करला यह गढ़वाली की विशेषता है।''


औपचारिक संबंधों को थामे रखने के लिए 'आप' 


       ढ़वाली साहित्य में अब भी 'तुम' का ही उपयोग होता है। वैसे गढ़वाली की कुछ पत्रिकाओं में आपसी बातचीत में कभी कभार आप का उपयोग कर दिया जाता है जो खटकता भी है। साहित्य में हालांकि 'तुम' का बोलबाला है। गढ़वाली के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री दीनदयाल सुंद्रियाल 'शैलज' भी मानते हैं कि आप औपचारिक है। श्री सुंद्रियाल के शब्दों में, ''मुझे तो बचपन मे, अपने हमउम्र दोस्तों, प्रियजनों और माँ, दीदी आदि को भी तू कहना ही अच्छा लगता था।'' भाषा कोई भी हो मां के लिये अधिकतर एकवचन यानि तू या तुम का उपयोग किया जाता है। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक श्री माधव चतुर्वेदी ने इसे अच्छी तरह से समझाया है। उनके शब्दों में, ‘‘चूंकि उत्तर भारत के परिवारों में पति अपनी पत्नी से बातचीत में एकवचन का प्रयोग करता है और पत्नी अपने पति के  लिये बहुवचन बरतती है। इस कारण बच्चे भी अपने पिता के लिये बहुवचन का प्रयोग करते हैं और मां के लिये एकवचन का प्रयोग। यह विशुद्ध तौर पर घर के बड़ों से मिला भाषा का संस्कार है। ’’
        इसी तरह से योगी आशीष ड़ोभाल ने लिखा, ''तू वह महान शब्द है जिसको पचाना हर किसी के बस की बात नही। तू शब्द का प्रयोग मुख्यता बिना संकोच और धारा प्रवाहिता के साथ एक जन्मदाता माँ और दूसरा जगतमाँ या भगवान के लिए किया जाता है और इन्होंने कभी तू को बुरा नही माना बाकि अन्य की तो नाक लग जाती है।'' लेखक, पत्रकार और शिक्षाविद श्री संजय अथर्व ने सही कहा है कि औपचारिक संबंधों को बनाये रखने के लिये आप है, आपसी मित्रता और गहरे संबंधों के लिये। बकौल श्री अथर्व, ''गढ़वाल, राजस्थान, अवध या कि हमारी मगध की मगही सभी में आप का कोई अस्तित्व नही है। तू ही तू छाया है। इसलिये आप 'आप' के लिए चिंतित नहीं हों। औपचारिक संबंधों को थामे रखने के लिए आप है।''
    अब गढ़वाली, कुमांउनी या अपनी लोकभाषा बोलते समय 'आप' का उपयोग करना है या 'तुम' का, यह फैसला आपको खुद करना है। जहां तक मेरा सवाल है तो अपनी गढ़वाली में मुझे 'तुम' ही पसंद है लेकिन हिन्दी में भारी भरकम शब्द 'आप' के साथ ही जीना पड़ेगा। हिन्दी में लिख रहा हूं इसलिए आप का उपयोग कर रहा हूं .......आपका धर्मेन्द्र पंत। 

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गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

​मिलिये बूंखाल में बलि प्रथा बंद करवाने वाले पीताम्बर सिंह रावत से

       पौड़ी गढ़वाल के थैलीसैंण विकासखण्ड के राठ क्षेत्र का ऐतिहासिक बूंखाल कालिंका मेला एक समय पशु बलि प्रथा के लिये विख्यात था। मेले के दिन यहां पशुओं के खून नदियां बह जाती थी। अशिक्षा और अंधविश्वास के कारण वर्षों से यह प्रथा चली आ रही थी। आखिर में एक शख्स ने इस कुप्रथा को रोकने का बीड़ा उठाया। उनके प्रयासों से प्रशासन ने भी सक्रियता दिखायी। इसी का परिणाम है कि पिछले कुछ वर्षों से बूंखाल मेला बिना पशु बलि के शांति के साथ संपन्न होता है। गढ़वाल में पशु बलि प्रथा के खिलाफ मुहिम छेड़ने वाले इस शख्स का नाम है पीताम्बर सिंह रावत जो डुंगरीखाल गांव के रहने वाले हैं। दो साल पहले मैंने अपने ब्लॉग पर पशु बलि प्रथा के खिलाफ ''देवभूमि में बलि प्रथा : बोलो ना बाबा ना'' शीर्षक से एक आलेख लिखा था जिसमें श्री पीताम्बर सिंह रावत के पत्र का भी जिक्र किया था जो उन्होंने जिलाधिकारी को लिखा था। अब श्री रावत ने बलि प्रथा को रोकने के लिये किये गये अपने प्रयासों और इस दौरान की चुनौतियों के बारे में 'घसेरी' को अपनी कहानी विस्तार से बतायी है। 

पीताम्बर सिंह रावत की बलि प्रथा के खिलाफ लड़ी गयी जंग की कहानी, उन्हीं की जुबानी


श्री पीताम्बर सिंह रावत, अपने नाती और नातिन के साथ। 
       न 1999 तक मेरी भी बलि प्रथा में काफी रुचि रहती थी और दो बार मैंने भी बूंखाल में बागी (भैंसा) और खाडु (मेंढ़ा) की बलि दी थी। इसी दौरान मैंने अपने भाइयों को बागी को मारते हुए देखा। बागी तड़प रहा था और मेरे दोनों भाई बारी बारी से उसकी गर्दन काट रहे थे। उस समय मैं काफी व्यथित हो गया। मैं अंदर से काफी पीड़ा महसूस कर रहा था। बस मैंने तुरंत ही बूंखाल मै बलि प्रथा रोकने का संकल्प ले लिया। यह काम कतई आसान नहीं था यह मैं अच्छी तरह से जानता था, क्योंकि बूंखाल में चोपड़ा गाँव के चक्करचोटया, गोदा गाँव के गोदियाल पुजारी और मलंड गाँव की भूमि इन तीनों गाँव के लोगों का कहना था कि जो भी बूंखाल में बलि प्रथा रोकने की कोशिश करेगा उसी समय उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। । यहां तक कि प्रशासन भी वहां कुछ नहीं कर पाता था। कालीमठ के गब्बर सिंह राणा को उन्होंने जान से मारने की धमकी थी। लगभग सारे सामाजिक कार्यकर्ता नाकाम रहे। उसके बाद मुंबई की डांडी कांठी संस्था से जुड़े लोगों ने भी प्रयास किये लेकिन वे भी कामयाब नहीं हो पाये। 
     मैंने भी संकल्प ले रखा था। मैं अकेले ही अपना संकल्प पूरा करने में लग गया। एकबारगी मैंने सोचा कि मैं अकेला हूं और अकेले इतना बड़ा काम करना मुश्किल है। इतना मैं समझ चुका था कि लोगों को समझाने और उनके साथ बहस करने से कोई फायदा नहीं हैं।  इसलिए पहले मैंने पहले खुद भगवान की शरण ली। मैं भगवान को ही अपना साथी मानने लग गया। चार साल बीत गए लेकिन इन चार वर्षों में मुझे अन्दर ही अन्दर रास्ता दिखायी दिया। फिर मैंने आठ मार्च 2005 को शिवरात्रि  के दिन महाराष्ट्र के चारोटी से पहली पैदल यात्रा शुरू  कर दी। यह यात्रा 16 मार्च 2005 मध्यप्रदेश के झाबुआ में सम्पन्न हुई। इस यात्रा में मुझे काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा लेकिन इससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। मेरा हौसला दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। सन 2006 में मैंने श्राद्धीय नवरात्रि को आठ दिन की यात्रा की। यह यात्रा मेरी गुजरात के अंबा जी की थी इस यात्रा में मुझे कोई खास परेशानी नहीं हुई। सन 2007 में मैंने राजस्थान की यात्रा की। तीन दिन की इस यात्रा में मेरे साथ 36 घंटे तक पांच कुत्तों ने साथ दिया। इसके एक दिन के बाद हरिद्वार से बूंखाल तक की यात्रा मैंने 51 घन्टे में पूरी की। उसके बाद अपने गांव से माता जी की डोली लेकर बूंखाल गया। तब मेरे भाईयों के साथ—साथ सारे गाँव वालों ने मेरा साथ दिया। दो महीने के बाद मेला था और उस समय गांव में हमारे सगे संबंधियों ने बागी की बलि दी। मेरे भाईयों ने भी इस बलि का समर्थन किया। 
 बुखांल देवी मंदिर में बलि प्रथा रोकने के लिये
श्री पीताम्बर सिंह रावत का जिलाधिकारी को लिखा पत्र।
     न 2008 को श्राद्ध के समय मैं बूंखाल गया। मैंने सब्बल, कुदाल और तगारा लिया तथा तीन दिन में बलि कुंड को पत्थरों से बंद कर दिया। मजेदार बात यह है कि उन तीन दिनों में किसी को पता नही चल पाया कि बलि कुंड बंद हो गया चौथे दिन नवरात्र का पहला दिन था उस दिन मैंने खुद ही खुलासा कर दिया कि मैंने बलि कुंड बंद कर दिया है। इससे मेला समिति में खलबली मच गयी। उस समय उन लोगों के साथ मेरी काफी बहस हुई। जब मैंने उनसे कहा कि जब मैने बलि कुंड बंद करने में तीन दिन लगाये तो आप लोगों की चमत्कारी शक्तियां कहां गई थी? उन्होंने मुझे क्यों नहीं रोका? मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे साथ में कोई शक्ति थी जिसने तुम लोगों को अन्धा कर दिया था। जब मैंने यह बात कही तो माहौल कुछ शांत हुआ लेकिन नौवें दिन तक उन पर फिर से अंधविश्वासी शक्तियां हावी हो गयी और उन्होंने बलि कुंड को फिर से खाली कर दिया। मै भी यही चाहता था कि बलि कुंड को वही लोग खोलें। मैंने बचपन से ही वहां के बारे में कई कहानियां सुनी थी। एक कथा के अनुसार कुंड के अन्दर गोरखाओं ने काली मां को गाड़ के रखा है। (एक अन्य कहानी इस तरह से है कि पहले यहां स्थि​त मूर्ति तमाम तरह की बीमारियों और आपदाओं के बारे में ग्रामीणों को पूर्व में ही आगाह कर देती थी। जब 1791 में गोरखा आक्रमण के समय देवी ने आवाज देकर ग्रामीणों को आगाह किया। इसकी भनक गोरखाओं को लग गयी और उन्होंने देवी की मूर्ति का सिर काटकर उसके धड़ को उल्टा करके दफना दिया तथा देवी माँ का सिर वे अपने साथ ले गये, जिसकी पूजा आज भी पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल में होती है।)
    इसके एक साल बाद यानि सन 2009 में श्राद्ध के समय मैं केदारनाथ धाम गया। वहां मैंने बाबा केदारनाथ से आशीर्वाद लिया कि मैं बलि प्रथा रोकने के अपने प्रयासों में सफल रहूं। केदारनाथ से ही मैं सीधे श्रीनगर पहुंचा जहां मैंने एक गैंती ली और पैदल रास्ते चलकर खिर्सू, चौबट्टा होते हुए चोपड़ा गाँव पहुँचा। रात के करीब दस से ग्यारह बजे का समय था। मैं गोदा गांव से होकर गुजरा तो सभी सो चुके थे। मैं वहां से बूंखाल गया और मैंने बलि कुंड के अन्दर जाकर बलि बेदी को निकाला और फिर रात में ही उसे गंगा में विसर्जित कर दिया। बूंखाल मैं मैंने जो भी कार्य किये वो सब अमावस के दिन व रात को किए। इन सब कार्यों को करने के लिए मुझे कितने मुश्किलों का सामना करना पड़ा इसका अन्दाजा आप खुद लगा सकते हो। इसी दौरान मैंने विषम सामाजिक परिस्थितियों में अपनी बेटी की शादी भी की थी।

    पीताम्बर सिंह रावत 
    पता: गांव व पोस्ट डुंगरी खाल, 
    पट्टी बाली कंडारस्यूं  
    जिला पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड। 

        उत्तराखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास में योगदान देने वाले व्यक्तियों, संस्थाओं और संगठनों से लोगों का परिचय कराने का यह 'घसेरी' का छोटा सा प्रयास है। ऐसे लोग जो निस्वार्थ भाव से अपना काम करते हैं और जिसका श्रेय उन्हें कभी नहीं मिल पाता। इसमें घसेरी के सभी पाठकों का सहयोग अपेक्षित है। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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