गुरुवार, 12 जुलाई 2018

ताड़केश्वर धाम : भगवान शिव की विश्रामस्थली



     केदार क्षेत्र में पांच शैव पीठ आते हैं। इनमें से एकेश्वर महादेव के बारे में हम पहले जानकारी दे चुके हैं। अन्य चार शैव पीठ हैं  ताड़केश्वर महादेव, बिन्देश्वर महादेव, क्यूंकालेश्वर महादेव और किल्किलेश्वर महादेव। इनमें से आज हम आपको ले चलते हैं ताड़केश्वर महादेव के दर्शन करवाने के लिये। पौड़ी गढ़वाल जिले के जयहरीखाल विकासखंड में चखुल्याखाळ गांव के पास स्थित है ताड़केश्वर महादेव का मंदिर। यह लैन्सडाउन से 38 किलोमीटर, कोटद्वार से 70 किलोमीटर और रिखणीखाळ से 26 किलोमीटर की दूरी पर 1800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। महाकवि कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में ताड़केश्वर धाम का वर्णन किया है। रामायण और पुराणों में भी ताड़केश्वर धाम का जिक्र है। यहां भगवान शिव का मंदिर है। देवदार, बांज, बुरांश और काफल के पेड़ों के बीच स्थित ताड़केश्वर महादेव सदियों से लोगों की आस्था का केंद्र रहा है जहां शिवरात्रि पर विशेष पूजा अर्चना होती है। शिवरात्रि के दिन यहां बड़ा मेला लगता है। यहां देखकर लगता है कि प्रकृति भी पूरी तरह भगवान शिव पर मोहित है और इसलिए यह प्रकृति प्रेमियों के लिये भी आदर्श स्थल है। ताड़केश्वर महादेव क्षेत्र को योग और साधना के लिये उत्तम स्थल माना जाता है। ताड़केश्वर महादेव इस क्षेत्र के कई गांवों के कुलदेवता हैं।

ताड़केश्वर महादेव के दर्शन करने के लिये यह वीडियो देखें 





     ताड़केश्वर महादेव को लेकर दो पौराणिक कथायें प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार ताड़कासुर का वध करने के बाद भगवान शिव यहां विश्राम करने के लिये पहुंचे थे। सूर्य की ताप से बचाने के लिये तब मां पार्वती ने यहां देवदार के सात वृक्ष लगाये थे। एक कथा के अनुसार मां पार्वती ने स्वयं देवदार के वृक्षों का रूप धारण कर लिया था। प्रांगण में अब भी देवदार के गगनचुंबी वृक्ष हैं। दूसरी पौराणिक कथा में कुछ अलग तरह का वर्णन है। इस कथा के अनुसार ताड़केश्वर की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अमरत्व का वरदान दे दिया। इसमें एक शर्त थी कि केवल भगवान शिव का पुत्र ही उनका वध कर पाएगा। ताड़केश्वर ने शर्त पर आधारित यह वरदान स्वीकार कर लिया। इसके बाद हालांकि ताड़केश्वर के तेवर बदल गये। ताड़केश्वर ने निर्दोष लोगों और साधुओं को मारना शुरू कर दिया और पूरे क्षेत्र में अशांति फैला दी। ऐसे में सभी संत भगवान शिव की शरण में पहुंचे। भगवान शिव ने पार्वती से विवाह किया और फिर कार्तिकेय का जन्म हुआ। कार्तिकेय ने ताड़केश्वर को मार दिया लेकिन जब वह अंतिम सांसे ले रहा था तब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। ताड़केश्वर ने भगवान शिव का ध्यान किया और उनसे माफी मांगी। भोले शंकर फिर से पसीज गये। ताड़केश्वर ने जहां कभी तपस्या की थी वहां पर स्थित मंदिर का नामकरण ताड़केश्वर के नाम पर कर दिया और उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में लोग उनकी ताड़केश्वर महादेव के नाम से पूजा करेंगे। इस स्थान को अब ताड़केश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि ताड़केश्वर महादेव ने अपने भक्तों के सपनों में आकर कहा था कि यह मंदिर उनका आवास है और देवदार का यह सुंदर वन उनका बगीचा है। 
      ह भी कहा जाता है कि एक विशेष जाति के लोगों का यहां आना वर्जित है। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार एक समय इस क्षेत्र में इस जाति का दबदबा था जो लोगों पर अत्याचार करते थे। भगवान ताड़केश्वर ने जब इसका विरोध किया इस जाति के लोगों ने उन्हें युद्ध के लिये ललकारा। इस युद्ध में उस जाति ने धूर्तता से जीत हासिल कर ली। इसके बाद ताड़केश्वर ने इस स्थान पर भगवान शिव की पूजा की थी। जब उन्हें वरदान मिला तो उन्होंने इस जाति के लोगों से बदला लिया। कहते हैं कि यही वजह है कि उक्त जाति के लोग यहां पूजा के लिये नहीं आते हैं। इस मंदिर में सरसों का तेल भी नहीं चढ़ाया जाता है।
      ताड़केश्वर महादेव मंदिर में पहले शिवलिंग था लेकिन अब वहां पर भगवान शिव की मूर्ति है जिसमें वह तांडव करते हुए दिखाये गये हैं। कहा जाता है कि जहां शिवलिंग था वहां कुछ साल पहले भगवान शिव की यह मूर्ति मिली थी। शिवलिंग अब भी मंदिर प्रांगण में है। यहां पर लोटे रखे हुए हैं जिनसे भक्तगण शिवलिंग में पानी चढ़ाते हैं। यह पानी मंदिर परिसर में स्थित कुंड का है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे मां लक्ष्मी ने बनाया था। मंदिर में जटाधारी नारियल और तिल का तेल चढ़ाया जाता है। नारियल की जटा मंदिर के प्रांगण में ही निकालनी होती है। इसके लिये वहां पर पूरी व्यवस्था की गयी है। वहां पर नारियल पानी चढ़ाने के बाद आधा नारियल मंदिर में अर्पित किया जाता है और बाकी हिस्सा भक्तगण प्रसाद के रूप में अपने साथ ले जाते हैं। मुख्य मंदिर के करीब एक अन्य मंदिर है जो मां पार्वती का है। मंदिर परिसर में ही हवन कुंड है जहां हर समय अग्नि प्रज्ज्वलित रहती है। यहां भक्तगण धूप अर्पित करते हैं। लोग यहां अपनी मुरादें लेकर आते हैं और मान्यता है कि जिसकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है वह मंदिर में घंटी चढ़ाता हैं। यहां अब तक हजारों घंटियां चढ़ायी गयी हैं। प्रवेश द्वार से लेकर मंदिर और फिर निकास मार्ग पर दोनों तरफ इन घंटियों को देखा जा सकता है। शादी और बच्चे के जन्म के बाद भी यहां घंटी चढ़ायी जाती है। मंदिर के पास में ही आश्रम और धर्मशाला है जहां खानपान की भी व्यवस्था है।
       केदार क्षेत्र के अन्य शैव पीठ की तरह ताड़केश्वर महादेव में भी स्थानीय निवासी पहले अनाज को भगवान शिव को अर्पित करते हैं। यहां पर हर साल भंडारे का भी आयोजन किया जाता है। ताड़केश्वर मंदिर समिति यहां सारी व्यवस्था करती है।
       ताड़केश्वर महादेव मंदिर से लगभग एक किमी दूर सड़क मार्ग है। यहां पर गाड़ियों के पार्किंग की अच्छी व्यवस्था है जहां से मंदिर के लिये प्रसाद खरीदा जा सकता है। यहां से आसानी से उतराई के रास्ते मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। दिल्ली से ताड़केश्वर की दूरी 281 किमी और देहरादून से 187 किमी है। दिल्ली और देहरादून दोनों स्थानों से कोटद्वार होते हुए ताड़केश्वर पहुंचा जा सकता है। कोटद्वार मोटर और रेल मार्ग से जुड़ा है। यहां सबसे करीबी हवाई अड्डा जौली ग्रांट है जो ताड़केश्वर से लगभग 180 किमी दूर है। पौड़ी और सतपुली होते हुए लैन्सडाउन के रास्ते ताड़केश्वर जाया जा सकता है। लैन्सडाउन से डेरियाखाल होते हुए सड़क ताड़केश्वर तक जाती है। सड़क के दोनों तरफ चीड़, बांज और काफल के वृक्ष यात्रा को सुखद बनाते हैं। ताड़केश्वर धाम की यात्रा का सबसे उपयुक्त समय मार्च से अगस्त तक है। गर्मियों के समय मंदिर सुबह पांच बजे से शाम सात बजे तक जबकि सर्दियों में सुबह छह बजकर 30 मिनट से शाम पांच बजे तक खुला रहता है। बोलो ताड़केश्वर महादेव की जय।
धर्मेन्द्र पंत 

गुरुवार, 14 जून 2018

क्या शिलाजीत का जनक है सुरै?

            ह सुनकर थोड़ा अजीब लग सकता है कि हमारे गांवों में घर के आसपास, खेतों के किनारों और चट्टानों के करीब उगने वाला सुरै से शिलाजीत की उत्पत्ति हो सकती है जिसे कई रोगों की उत्तम दवा माना जाता है। लेकिन कुछ वनस्पति विज्ञानियों ने शिलाजीत की उत्पत्ति पर अध्ययन किया और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सुरै इस महत्वपूर्ण औषधि का जनक हो सकता है। आईये आज घसेरी में जानते हैं इस सुरै के बारे में। 
           सुरै पहाड़ों में उगने वाला एक शंक्वाकार पौधा है जिस पर बहुतायत में कांटे होते हैं। यह नागफनी प्रजाति का पौधा है जिसे सुरैं, सुरई, सरू, सुरू, श्योण, सेहुंड नाम से भी जाना जाता है। नेपाली में इसे काने सिउंडी कहते हैं। इसकी शाखाएं पतली होती है। इसकी लकड़ी पर घुन नहीं लगती है। सुरै का वानस्पतिक नाम यूफोर्बिया रॉयलियाना है। असल में उत्तराखंड में इसकी दो प्रजातियां 'यूफोर्बिया रायलियाना' और 'नेरिफोलिया' पायी जाती हैं। सुरै के पौधे की लंबाई पांच से छह फीट तक होती है। इसके तने कांटेदार और शाखाएं पंचकोणीय होती हैं। शीत ऋतु में इसकी पत्तियां झड़ जाती है तथा बसंत के मौसम में इसमें हरे व पीले फूल लगते हैं। मुख्य रूप से इसका उपयोग जलावन, बाड़ बनाने, भवन सामग्री, डिब्बे बनाने तथा ललित कला आदि में किया जाता है, लेकिन आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्वति में सुरै का काफी महत्व है। 
             कुछ वनस्पति विज्ञानियों का मानना है कि शिलाजीत के निर्माण में सुरै और इसकी प्रजाति के पौधों की भूमिका अहम होती है। कई अन्य तरह की औषधियों के निर्माण में सुरै का उपयोग किया जाता है जो पाचन, पेट और सांस संबंधी रोगों में प्रयोग की जाती है। त्वचा संबंधी रोगों के लिये इससे विशेष औषधि बनायी जाती है। इसकी जड़ों से सुगंधित तेल भी तैयार किया जाता है जो घावों और फोड़े फुंसियों पर लगाया जाता है। कान दर्द और दांत दर्द में इससे निकलने वाले सफेद दूध का उपयोग किया जाता है। बवासीर और भगंदर के लिये भी इसे उपयोगी माना जाता है। मस्से और तिल से निजात पाने के लिये भी इसका उपयोग किया जाता रहा है। सोराइसिस के रोग में भी इसका प्रयोग किया जाता है। लेकिन इन सब औषधियों का उपयोग किसी चिकित्सक की देखरेख में ही किया जाना चाहिए।


सुरै के बारे में यह वीडियो देखें और चैनल भी सब्सक्राइब करें। 




             ब बात करते हैं सुरै के शिलाजीत से संबंध के बारे में। वनस्पति विज्ञानी एच सी पांडे ने 1973 में अपने एक आलेख में जिक्र किया था कि सुरै में काफी दूध या लेटेक्स होता है और इसलिए इसकी शिलाजीत की उत्पत्ति में अहम भूमिका हो सकती है क्योंकि यह पौधा हिमालय की उन चट्टानों पर काफी पाया जाता है जहां शिलाजीत मिलती है। उनसे पहले दो अन्य वनस्पति विज्ञानियों राजनाथ और प्रसाद ने 1942 में इंडियन साइंस कांग्रेस में शिलाजीत के निर्माण के संबंध में सुरै या थुअर का जिक्र किया था। जिन चट्टानों पर शिलाजीत पायी जाती है उनका अध्ययन करने पर भी पता चला कि यह चट्टानों से पैदा नहीं होती बल्कि किसी बाहरी स्रोत से यह इन चट्टानों पर जमती है। यह माना गया कि लेटेक्स या गोंद वाले पौधों से इसकी उत्पत्ति होती है। एस घोषाल, जेपी रेड्डी और वीके लाल नाम के तीन वनस्पति विज्ञानियों ने 1976 में प्रकाशित अपने एक आलेख में बताया था कि शिलाजीत में बड़ी मात्रा में जो आर्गेनिक तत्व पाये जाते हैं वह सुरै के लेटेक्स में भी मिलते हैं। हिमालय में जिन चट्टानों पर शिलाजीत पायी जाती है उसके आसपास की सुरै के लेटेक्स यानि दूध को गर्मियों में एकत्रित करके वह इस नतीजे पर पहुंचे थे। इसके बाद कई विज्ञानियों के निर्माण में सुरै की भूमिका को अहम बताया था। उनका मानना था कि लंबे समय तक चट्टान पर एक जगह पर एकत्रित होने से यही दूध बाद में शिलाजीत में बदल जाता है।
          तो देखा आपने जिस सुरै को आप बड़ी हेय दृष्टि से देखते हैं वह असल में बेहद उपयोगी है लेकिन सावधान। इससे निकलने वाले दूध को भूल से भी पीने की गलती नहीं करें। यह दूध आंखों के लिये बेहद खतरनाक होता है। इससे आंख में काफी जलन होती है और यहां तक कि इससे आंख की रोशनी भी जा सकती है।
          प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार निम्न रोगों में सुरै और शिलाजीत का उपयोग किया जाता है। इनको देखकर आप समझ सकते हैं कि दोनों में काफी समानता है। 

सुरै का प्रयोग


तीव्रवीरेचका, मूत्रजनक, संदिग्धवात, श्वास, कुष्ठ, पांडु, अमावात, वातरिक्त, कास, अग्निमन्ध्या, उदर रोग, गुल्म, यकृत वृद्धि, उपदंश, चर्मरोग 

शिलाजीत का प्रयोग 


पांडु रोग, कुष्ठ, अमावात, संधिवात, वातरक्त, कास, प्रमेद, सरकारा, अशमारी, मूत्रकृच्छा, क्षय, अर्सा, अप्समारा, उन्माद, सोठा, उदर कृमि, सुला, गुल्मा, संधि सोठा, सलिपादा, गंदमाला, कमला, फिरंगा, श्वेतप्रदर, शुक्रदौर्बल्य, विषमज्वर, शोशा, मेदोरोजा, गड़दोष, दौर्बल्य, वेदन हारा।

        तो कैसी लगी आपको सुरै के बारे में यह जानकारी। जरूर बतायें। आप इस पर वीडियो भी देख सकते हैं जो पोस्ट के साथ दिया गया है। आप सभी से घसेरी चैनल और ब्लॉग सब्सक्राइब करने का भी अनुरोध है। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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मंगलवार, 22 मई 2018

उत्तराखंड के जंगलों में आग : कारण और बचाव


    गर्मियां शुरू होते ही उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने की खबरें भी आने लगी हैं। श्रीनगर के आसपास के जंगल पिछले कुछ दिनों से आग से धधक रहे हैं। ठोस सरकारी नीति के अभाव में यह लगभग हर साल का किस्सा बन गया है। उत्तराखंड के जंगलों में 1992, 1997, 2004, 2012 और 2016 में लगी आग को भला कौन भुला सकता है। वर्ष 2016 में लगी आग भीषण थी। तब आग ने इतना विकराल रूप ले लिया है कि पहली बार आग बुझाने के लिए वायु सेना, थल सेना और एनडीआरएफ़ तक को लगाना पड़ा था।
      जंगल में लगी आग से पूरा पारिस्थतिकीय तंत्र गड़बड़ा जाता है लेकिन फिर भी हर साल या तो आग लग जाती है या उसे लगा दिया जाता है। सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि उत्तराखंड के जंगलों में हर साल गर्मियों में आग क्यों लगती है। 
      उत्तराखंड में चीड़ के जंगल बहुतायत में हैं जो कि आग लगने का मुख्य कारण हैं। चीड़ की सूखी पत्तियां यानि पिरूळ न सिर्फ आग तेजी से पकड़ता है बल्कि उसे फैलाने में भी अहम भूमिका निभाता है। मार्च से जून तक चीड़ की ये नुकीली पत्तियां नीचे गिर जाती हैं। भारतीय वन संस्थान के अध्ययन के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्र में फैले चीड़ के जंगल से एक साल में लगभग छह टन पिरूळ ​गिरता है। सड़कों में गिरा पिरूळ और उससे बना बुरादा असल में बारूद के ढेर जैसा होता है। गलती से भी इसमें तीली या जली बीड़ी पड़ जाए तो फिर आग पकड़ने में देर नहीं लगती है। 




        त्तराखंड में कभी बांज, देवदार, काफळ, बुरांश आदि के अधिक पेड़ थे। बांज, बुरांश की पत्तियां पशुओं के चारे के काम भी आती हैं और इनकी जड़ों में पानी रोकने की भी क्षमता होती है जबकि चीड़ के पेड़ की प्रकृति इसके ठीक विपरीत है। देवदार, बांज, बुरांश ​आदि को इमारती लकड़ी के लिये काटा गया और अंग्रेजों ने लीसा के लोभ में चीड़ के पेड़ों को बढ़ावा दिया। अब आलम यह है कि उत्तराखंड में जहां भी नजर दौड़ाओ चीड़ के पेड़ नजर आते हैं जो न जंगल के लिये लाभकारी हैं और ना ही आम आदमी के लिये। चीड़ के पेड़ और सख्त वन्य कानूनों ने स्थानीय निवासियों की वनों से दूरी भी बढ़ा दी। जिन वनों को वे अपना समझते थे वे उनके लिये पराये हो गये। 
       पिरूळ अपने नीचे किसी अन्य वनस्पति को नहीं पनपने देता है इसलिए पशुओं के लिये भी जंगल बेमतलब के हो गये। स्थानीय निवासी भी पिरूळ को पसंद नहीं करते और कई बार वे इसमें आग लगा देते हैं। जंगलों में आग लगने की अधिकतर घटनाएं इंसानों की वजह से होती हैं जैसे आगजनी, कैम्पफ़ायर, बिना बुझी सिगरेट या बीड़ी फेंकना, जलता हुआ कचरा छोड़ना आदि। 
       इस आग से बचा जा सकता है कि लेकिन अब भी उत्तराखंड में इसके लिये कोई मास्टर प्लान नहीं है। सबसे पहले तो चीड़ के जंगलों को बढ़ने से रोकना होगा तथा स्थानीय निवासियों को बांज, बुरांश आदि के पेड़ लगाने के लिये उत्साहित करना होगा। जैसा हमने पहले आपको बताया कि पिरूळ आग लगने और उसे फैलाने का मुख्य कारक है। उत्तराखंड में अगर आग के आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2014 में 384.5 हेक्टेयर व 2015 में 930.55 हेक्टेयर क्षेत्र में आग लगी थी जो कि वर्ष 2016 में 4,423.35 हेक्टेयर तक पहुंच गयी। इस आग से करोड़ों रूपये का नुकसान हुआ। बेहतर यही है कि बाद में नुकसान उठाने के बजाय सरकार इस रूपये का पहले सदुपयोग करे। पिरूळ से खाद बनाने व्यवस्था की जा रही है लेकिन इसे व्यापक स्तर पर चलाया जाना चाहिए। पिरूळ इकट्ठा करके उससे खाद तैयार करने में स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेगा। आग बुझाने के लिये केवल दमकलकर्मियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। स्थानीय लोग अपनी तरफ से प्रयास करते हैं लेकिन सरकार को उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। इसको रोजगार का रूप दिया जा सकता है। यही नहीं लीसा माफिया के खिलाफ भी सरकार को सख्त कदम उठाने होंगे जो अपनी चोरी छिपाने के लिये जंगलों में आग लगा देते हैं।
धर्मेन्द्र पंत 

बुधवार, 9 मई 2018

हाँ,हाँ वी खाडू छौं मी

       गर्मियां शुरू हो गयी हैं। यह वह समय है ​जबकि दिल्ली, देहरादून या अन्य शहरों में बस चुके उत्तराखंडी कुछ दिनों के लिये अपने गांवों की सुध लेते हैं। कुछ दिनों के लिये ही सही गांव थोड़ा आबाद लगते हैं। इनमें से अधिकतर पूजा पाठ के लिये गांव आते हैं। साल भर में कई सिरयौण यानि मन्नतें की होती हैं। हम पहाड़ी इनको पूरा करने का इसे सही समय मानते हैं क्योंकि स्कूलों की छुट्टियां होती हैं। कुछ लोगों की सिरयौण में भेड़—बकरे की बलि भी शामिल होती है। शिक्षा के प्रसार और जागरूकता बढ़ने के बाद इसमें कमी आयी है लेकिन अब भी बलि प्रथा चलन में है। श्री केशव डुबर्याळ "मैती" की यह कविता बलि प्रथा पर तीखा कटाक्ष है। उम्मीद है कि आप सभी इस कविता का मर्म समझेंगे।


हाँ,हाँ वी खाडू छौं मी

केशव डुबर्याळ "मैती"


जै थै तू अपणा द्यब्ता थैं ढूंढ़णु छै,
सुण ले मनखी मेरी दुनिया उजाड़ी,
तेरु भल्लू हूंद त खूब करी,
पर एक बार ज्यूंदाळ् डाळदी बगति,
अपणा मुख जने भी हेरी। 

द्यब्ता ही खुश कनि तिन त मेरी ही बलि किले,
पर कीला फरें पाल्युं रौं,नि सकदु कुछ कैरी,
हे कच्ब्वाली का कचोर करदरा,
ल्वेबली का लब्लाट करदरा,
सुण ले मनखी,
गिचन नि बोल सकदु,
तेरी आत्मा झकजोर सकदु। 

अगर तू मनखी होलु,
तोड़ ये अन्धविश्वास,
छोड़ मेरी ज्युडी,
हम दगडी भी,
बिश्वास की डोर बांधी दे,
बिश्वास की डोर बांधी दे। 

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

स्वास्थ्य के लिये सर्वोत्तम है पंदेरा का पानी

      
        पंदेरा....यानि का पानी का प्राकृतिक स्रोत। उत्तराखंड में हर गांव ऐसे स्थान पर बसा है जहां पर पानी का प्राकृतिक स्रोत यानि पंदेरा हो। यह अलग बात है कि समय के साथ कई स्थानों पर पानी के ये प्राकृतिक स्रोत सूख गये हैं या उनमें बहुत कम पानी आने लगा है। इसका एक कारण वनों का कटाव भी है। पंदेरा, पंद्यर, पनेरा, पंदेरू या पंद्यारू कभी गांव की महिलाओं का मिलन स्थल हुआ करता था। घर की घटनाओं और मन की बात का गवाह होता था पंदेरा। गर्मियों में ठंडा शीतल जल और सर्दियों में गुनगुना पानी देता है पंदेरा। आपने गढ़वाल की आवाज महान गायक नरेंद्र सिंह नेगी का गीत सुना होगा, ''छुयुं मा मिसे गिन पंदेरों में पंदेरी .....''। सरकारों ने पिछले कई वर्षों से गांव गांव में पानी पहुंचाने की भी कोशिश की।  घरों के आसपास नल लगे लेकिन पंदेरा की फिर भी बादशाहत बनी रही। पलायन ने जरूर उसे अपनी सखी सहेलियों से बहुत दूर कर दिया। जिस पंदेरा में कभी भीड़ लगी रहती थी, जहां लोग अपनी बारी का इंतजार करते थे आज वहां सन्नाटा छाया रहता है। 
      पंदेरा हमारे पहाड़ी गांवों को जीवनदायिनी जल ही नहीं देता है बल्कि जब स्वास्थ्यप्रद पेयजल की बात आती तो पहाड़ी पंदेरा या पहाड़ के प्राकृतिक स्रोतों का पानी सर्वश्रेष्ठ विकल्प माना जाता है। दुनिया के अधिकतर लोगों को यह पानी नसीब नहीं होता लेकिन कि हम पहाड़ी उसी पानी को दुत्कार रहे हैं। सामने झरना बह रहा है लेकिन हमें बोतलबंद पानी पीने का शौक चर्राया है। पहाड़ों में बोतलबंद पानी .... यह सुनकर ही अजीब लगता है। मेरी तो आपको यही राय है कि बोतलबंद पानी फेंकिये और पंदेरा का पानी पीजिए। यह आपके तन और मन में नयी ऊर्जा भरेगा जो बोतलबंद पानी कभी नहीं कर सकता।




    पंदेरा के पानी के कई प्राकृतिक लाभ हैं। इसे 'लिविंग वाटर' यानि 'क्रियाशील जल' कहा जाता है। क्रियाशील इसलिए क्योंकि यह मानव शरीर के लिये जरूरी महत्वपूर्ण ऊर्जा से भरा होता है। इसलिए जब आप पंदेरा का पानी पीते हो तो यह आपके शरीर में ऊर्जा भरता है। बहने वाला पानी क्रियाशील जल होता है लेकिन जो तुरंत स्रोत से निकला हो वह पानी गुणों से भरपूर माना जाता है जो कई  वर्षों से भूमिगत जल के रूप में जमा रहता है। इसमें खनिज लवण पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। यह बेहद स्वच्छ, स्वास्थ्यवर्धक और प्रदूषकों से मुक्त होता है। पंदेरा के पानी का स्वाद अद्भुत होता है जिसका किसी अन्य तरह के पानी से तुलना ही नहीं की जा सकती है। विश्व की अधिकतर नदियां पहाड़ों से निकलती हैं लेकिन आगे बढ़ने के साथ इनमें कई प्रदूषक तत्व मिल जाते हैं। प्राकृतिक जल स्रोत से निकला पानी बोतल में बंद मिनरल वाटर और नल के पानी से कई गुणा उपयोगी होता है। 
     पंदेरा में पानी में प्राकृतिक खनिजों का बहुत अच्छा संयोजन होता है जैसे मैग्निसियम, कैल्सियम, पोटेशियम और सोडियम जो आपके स्वास्थ्य के लिये बेहद जरूरी होते हैं। कई कंपनियां इसका फायदा उठाकर प्राकृतिक स्रोतों का पानी बेच रही हैं लेकिन कई दिनों तक बोतल में बंद रखने के लिये उसमें कुछ रसायन मिलाये जाते हैं जिससे इसके कई मूल गुण समाप्त हो जाते हैं। 
    पंदेरा का पानी पीने से आप तरोताजा महसूस करते हैं, लेकिन इसके कई अन्य फायदे भी हैं। कई अध्ययनों से पता चला है कि पहाड़ी प्राकृतिक जल स्रोतों का पानी किसी व्यक्ति के वजन को उसके शरीर के अनुसार बनाये रखने में अहम भूमिका निभाता है। अगर आपको अपना वजन बढ़ाना है या घटाना है तो फिर प्राकृतिक जल स्रोतों का शुद्ध पानी पीजिये और कुछ दिनों में आपको फर्क नजर आने लगेगा। पंदेरा का पानी पीने से आपकी त्वचा भी चमकदार बनती है। मैं जब पहाड़ में अपने गांव जाता हूं तो अद्भुत तरीके से मेरी पाचन शक्ति बढ़ जाती है और भूख लगती है। असल में यह वहां के पानी का कमाल है। अध्ययनों से पता चला है कि प्राकृतिक  स्रोतों का पानी आपकी पाचन शक्ति और मेटाबोलिज्म यानि उपापचय को बढ़ाता है। यह पोषक तत्वों को पचाने में मदद करता है। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि प्राकृतिक स्रोतों का पानी जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द को कम करने में मददगार होता है। यह रक्तसंचार को सुधारने में योगदान देता है। पंदेरा का पानी शरीर में मौजूद विषैले तत्वों बाहर निकालने यानि डिटॉक्सीफिकेशन में प्राकृतिक रूप से मदद करता है।
     अब आपको पता चल गया होगा कि गुणों की खान है पंदेरा का पानी। पहाड़ियों के स्वस्थ रहने का राज है पंदेरा का पानी। इसलिए पहाड़ में केवल पंदेरा या प्राकृतिक जल स्रोतों का ही पानी पीना। 
    तो कैसे लगी आपको पंदेरा के पानी की यह कहानी अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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