शनिवार, 18 जून 2016

गढ़वाली लेखन में नयी क्रांति है 'धाद'


            ढ़वाली में पत्र—पत्रिकाओं के प्रकाशन की परंपरा 100 साल से भी पुरानी है। गढ़वाली में लेखन की शुरुआत अनुवाद से हुई थी और बाद में 1905 में देहरादून से 'गढ़वाली' नाम की पत्रिका के प्रकाशन से कविता और साहित्य लेखन भी होने लगा। बाद में गढ़वाली में कुछ अन्य पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ लेकिन इनमें से अधिकतर लंबे समय तक नहीं चल पायी। ऐसी ही एक पत्रिका थी 'धाद' जिसका प्रकाशन श्री लोकेश नवानी और श्री जगदीश बडोला के प्रयासों फरवरी 1987 में शुरू हुआ था। श्री नवानी और श्री बडोला दोनों ही सरकारी कर्मचारी थे। यही वजह थी कि 'धाद' का पंजीकरण श्री बडोला जी की धर्मपत्नी श्रीमती सुशीला बडोला के नाम से किया गया। वह इस पत्रिका की संस्थापक संपादक भी हैं। 'धाद' से तब कई गढ़वाली लोग जुड़े। बाद में पत्रिका तो बंद हो गयी लेकिन 1991 में 'धाद' ने एक सामाजिक संगठन का रूप ले लिया। 
           अब वरिष्ठ पत्रकार, कवि और लेखक श्री गणेश खुगशाल 'गणी' के प्रयासों से 'धाद' पत्रिका का अगस्त 2015 से फिर से प्रकाशन शुरू हुआ है। इसे नये कलेवर, नये स्वरूप और वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखकर प्रकाशित किया जा रहा है। यह पत्रिका पूरी तरह से गढ़वाली भाषा में है और इसमें गढ़वाली साहित्य के अलावा वहां की संस्कृति और परंपराओं का समावेश किया जा रहा है। ऐसे समय में जबकि यूनेस्को जैसी संस्था ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि गढ़वाली भाषा पर खतरा मंडरा रहा है तब श्री गणेश खुगशाल 'गणी' का प्रयास वास्तव में सराहनीय है क्योंकि किसी भी भाषा के प्रचार और प्रसार में उसकी पत्रिकाएं अहम भूमिकाएं निभाती हैं। गढ़वाली में पिछले कुछ समय से ऐसी पत्रिकाओं की कमी महसूस हो रही थी जिसे अब पूरे शान से 'धाद' पूरी कर रही है। गढ़वाली में 'धाद' किसी को आवाज देना, पुकारना या सार्वजनिक कार्यों के लिये आम आदमी का आहवान करना होता है और 'धाद' अब पूरे मनोयोग से धाद लगा रही है। 

गणेश खुगशाल 'गणी'
संपादक 'धाद'
       पत्रिका के संपादक श्री गणेश खुगशाल 'गणी' ने प्रवेशांक के संपादकीय में भी लिखा था, ''या धाद वीं भाषै धाद छ, जैं भाषा गीत गाणौं ग्वारा सात समोदर पार बिटि औंणा छन। य वीं भाषा बोलदरों की धाद छ जैं भाषा बोलदरा सात समोदर पार जैकि बि अपणी बोलि भाषै बात कना छन। य वीं भाषा धाद छ ज्व सिर्फ बोले नि जांदी, जैं भाषा मा खूब लिखेंदु बी छ, पढेन्दु बी छ अर सोचेन्दु बि छ। य धाद वीं भाषा मा छ जैं भाषा मा एक सब्द खुणि दर्जनों सब्द छन अर तौ सब्दु की सामर्थ्य अदभुत छ। यना लौकिक सब्द दुन्या कि कै भाषा मा नि मिलदा। जैं भाषा की अपणी संस्कृति अपणो संस्कार अपणी लोक विरासत छ वींई भाषा धाद छ य। य धाद गढ़वल़ि लोक संचेतना, संवाद अर सृजन को दस्तावेज छ। ''
            'धाद' का प्रत्येक अंक अपने आप में विशिष्ट बनाने का प्रयास किया गया है। पत्रिका के अब तक दस अंक आये हैं जिनमें से प्रत्येक को एक खास विषय वस्तु पर केंद्रित किया गया है। अगस्त 2015 में प्रवेशांक के बाद इसके अगले अंक लोक उत्सव व परंपरा, गढ़वाल मा रामलीला की परंपरा, 15 बरसौ उत्तराखंड, उत्तराखंड का लोक संसाधन, गढ़वाली कविता ब्याली, आज अर भोल, डांडों की माया अर माया का डांडा, मेरो पिया होरी को खेलइया, गढ़वाल म थौल कौथीग और पोस्टर मा गढ़वलि कविता पर आधारित हैं। गंगा दशहरा करीब है और इसलिए अगला अंक गंगा और उसके महत्व पर केंद्रित होगा। यह अंक जल्द ही आपके हाथों में होगा। पत्रिका में देश और विदेश में गढ़वाल और गढ़वाली से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों की संक्षिप्त रिपोर्ट भी पेश की जा रही है। कुल मिलाकर गढ़वाली भाषा की यह संपूर्ण पत्रिका बनकर उभर रही है जिसमें कई ऐसे लेखक जुड़ रहे हैं जो अब तक केवल हिन्दी और अंग्रेजी में ही लेखन कार्य करते थे। असल में धाद ने गढ़वाली लेखन में नयी क्रांति की शुरुआत कर दी है। 'धाद' पत्रिका गढ़वाल के पुराने और नये लेखकों के लिये मंच बन गयी है। लेखक, कवि और शिक्षक मनोहर मनु 'धाद' के प्रवेशांक से लेकर अब तक के प्रत्येक अंक की समीक्षा पूरे मनोयोग से अपने फेसबुक पेज पर करते रहे हैं। 

           धाद के बारे में अन्य संक्षिप्त जानकारी यहां दी जा रही है।    
              मूल्य: 20 रुपए
              वार्षिक सदस्यता : 220 रुपये 
        मुख्य संपर्क :
              गणेश खुगशाल ‘गणी’,
              126 विकास मार्ग,पौड़ी 246001
              मोबाइलः 09412079537
              मेल: dhad.garhwali@gmail.com 
       दिल्ली संपर्क : 
              ए—162/यूजी—4, दिलशाद कालोनी,
              दिल्ली —110 095
               मोबाइल : 09013285624
          किसी भी पत्रिका में विज्ञापनों की भूमिका अहम होती है। श्री गणेश खुगशाल 'गणी' धाद के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं लेकिन 'धाद' पूरे जोशोखरोश से लगती रहे इसके लिये पत्रिका में विज्ञापनों का होना भी जरूरी है। मेरी व्यक्तिगत राय है कि इसके लिये देश और विदेशों में बसे हर उत्तराखंडी से सहयोग की अपेक्षा की जा सकती है। आपके सहयोग से उत्तराखंड के विकास का दस्तावेज तैयार होगा वहीं लोकभाषा के संरक्षण और सवंर्धन अभियान को भी ताकत मिलेगी। इसलिए मैं यहां पर पत्रिका के विज्ञापन की दरें भी दे रहा हूूं। 

                      'धाद' की विज्ञापन दरें 


           अंतिम आवरण (रंगीन)          : 25,000 रुपये
           दूसरा/तीसरा आवरण (रंगीन) : 20,000 रुपये 
           पूरा पृष्ठ (ब्लैक एंड व्हाइट)    : 10,000 रुपये 
           आधा पृष्ठ (ब्लैक एंड व्हाइट) :  6,000 रुपये 
           चौथाई पृष्ठ (ब्लैक एंड व्हाइट):  3,000 रुपये 
           सेंटर स्प्रेड (ब्लैक एंड व्हाइट) : 18,000 रुपये 
           सेंटर स्प्रेड (आर्ट पेपर रंगीन) : 35,000 रुपये 

         भाषाओं को बचाना हमारा सांस्कृतिक दायित्व है और वर्तमान समय में 'धाद' उत्तराखंडी लोकभाषा का प्रतिनिधित्व करती है। उम्मीद है कि आप 'धाद' से जुड़ेंगे और उसे आगे बढ़ाने में अपना योगदान देंगे। आपका धर्मेन्द्र पंत।

गुरुवार, 2 जून 2016

कौसानी : प्रकृति की गोद में सुकून के पल

                                                       यात्रा वृतांत : मोना पार्थसारथी 

कौसानी की शान है अनासक्ति आश्रम, जहां महात्मा गांधी ने कुछ दिन बिताये थे। सभी फोटो सौजन्य : मोना पार्थसारथी। 
        सुमित्रानंदन पंत की कविताओं और गांधी आश्रम की वजह से कौसानी अल्मोड़ा के बारे में यूं तो बचपन से सुन रखा था लेकिन वहां जाने का मौका अब जाकर मिला। चार दिन की छुटटी मिली और हमने : मैं, पार्थ और सिद्वांत : पुरानी दिल्ली से रात को रानीखेत एक्सप्रेस पकड ली। सुबह पांच बजे काठगोदाम उतरे और सीधे कौसानी के लिये टैक्सी ली। बीच में कैंची धाम स्थित नीब करौरी बाबा के आश्रम कुछ समय बिताते हुए करीब पांच घंटे में कौसानी पहुंचे जहां वन विभाग के विश्राम घर में पहले ही से बुकिंग थी। यूं तो तीनों दिन वहीं रूकना तय था लेकिन शाम को अनासक्ति आश्रम या गांधी आश्रम जाने के बाद इरादा बदल दिया और अगले दिन आश्रम रहने चले गए। लक्जरी तलाशने वालों को आश्रम में रहना शायद पसंद नहीं आये लेकिन वहां एक दिन के प्रवास ने जो यादों की धरोहर दी, उसे ताउम्र भुलाना मुश्किल होगा। चाहे शाम को होने वाली प्रार्थना हो या आश्रम का सादा भोजन या वहां व्यवस्था संभालने वाले उम्रदराज लेकिन काम के मामले में युवाओं को शर्मिंदा करने वाले गांधीवादी, सब कुछ अनूठा था। मूसलाधार बारिश के बीच सामने हिमालय की वादियों को निहारते हुए 'रघुपति राघव राजा राम' या 'वैष्णव जन तो तेणे कहिये' के सामूहिक गान की अनुभूति का शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता। उसे सिर्फ महसूस ​ही किया जा सकता है।
     आश्रम में भोजन बिना प्याज लहसुन का और एकदम नाममात्र के दाम पर उपलब्ध है। कमरों का किराया (400 से 600 रूपये) भी बहुत कम है लेकिन टीवी, पंखा, गीजर जैसी सुविधायें तलाशेंगे तो आपको निराशा होगी। मैं इतना ही कहूंगी कि हर माता पिता को अपने बच्चों को लेकर एक बार इस आश्रम में जरूर रूकना चाहिये। कौसानी से लगभग 17 किलोमीटर दूर बैजनाथ मंदिर भी प्रकृति की गोद में नदी किनारे बसा बेहद सुरम्य स्थान है। आप कौसानी से टैक्सी करके एक दिन में बैजनाथ, चाय के बागान और शाल फैक्टी देख सकते हैं। चाय बागान के पास लवली रेस्त्रां में आप ठेठ कुमाउंनी खाने मसलन मडुंआ (कोदा) की रोटी, भट की दाल, आलू के गुटके, झोली(कढ़ी) आदि का लुत्फ उठा सकते हैं। यहां से कौसानी की मशहूर चाय खरीदी जा सकती है। बैजनाथ के रास्ते में एक बात जो मुझे बहुत अखरी, वह कभी गाइड बनने या पहाडी गाने सुनाने की मनुहार करती गाडियों के पीछे भागती छोटी छोटी बच्चियां। ड्राइवर ने बताया कि यहां बेरोजगारी और शराबखोरी इतनी है कि बच्चों को भी ऐसे काम करने पड़ते हैं। अगले दिन सुबह सूर्योदय से ही आश्रम में चहल पहल थी चूंकि मौसम साफ होने से सामने हिमालय दर्शन का मौका कोई नहीं छोड़ना चाहता था। धवल हिमराज पर सूरज की रक्ताभ किरणें मानो चांदी पर सोना उड़ेल रही थी और इसे कैमरों में कैद करने की होड़ लगी थी। स्विटजरलैंड तो मैं कभी गई नहीं लेकिन अगर गांधीजी ने इसे मिनी स्विटजरलैंड कहा तो गलत नहीं कहा था।


कौसानी और बैजनाथ : प्रकृति की अद्भुत देन के साथ खुद में इतिहास भी समेटे हुए हैं। 

      आश्रम में सबसे विदा लेकर हम अगले गंतव्य जागेश्वर को रवाना हुए। अल्मोड़ा से करीब 40 किलोमीटर आगे चीड के जंगलों के बीच अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य की छटा बिखेेरे जागेश्वर के प्राचीन मंदिर में असंख्य शिवलिंग हैं। मंदिर में दर्शन के बाद भी अल्मोड़ा लौटे जहां शिखर होटल में ठहरना था। शहर के बीच माल रोड पर स्थित यह शहर का सबसे सुविधाजनक और बेहतरीन होटल है जिसमें आपको हर तरह के कमरे मिल जायेंगे। अगर आप अल्मोड़ा जाने की सोच रहे हैं तो मैं यही सलाह दूंगी कि इसी होटल में रूकें।
      अल्मोड़ा घना बसा हुआ शहर है और आपको यहां हिल स्टेशन जैसा अहसास नहीं होगा। यहां कौसानी की तुलना में काफी गर्मी भी थी। शहर के दूसरे छोर यानी ब्राइट एंड पर रामकृष्ण कुटीर से सूर्यास्त का अनुपम दृश्य देखा जा सकता है। इसके अलावा आप नंदादेवी के मंदिर के दर्शन कीजिये और भीमसिंह मोहनसिंह रौतेला की मशहूर बाल मिठाई और सिंगोडी का मजा लीजिये। अल्मोड़ा से लौटते समय कैंची धाम जरूर रूकें जहां आश्रम देखने के साथ ही बाहर से ताजे फल खरीद सकते हैं। इसके अलावा यहां मारूति रेस्त्रां में सादे लेकिन बेहद स्वादिष्ट शाकाहारी खाने का आनंद लिया जा सकता है।


      त्तराखंड और हिमाचल के अनेकानेक पर्यटन स्थलों पर घूमने के बाद मैं इतना ही कहूंगी कि अगर आप भीडभाड से परे प्रकृति के बीच आप सुकून के पल बिताना चाहते हैं तो कौसानी आपके लिये उत्तम जगह है। यहां कोई इटिंग ज्वाइंटस या पाइंट टू पाइंट टूरिस्ट आकर्षण नहीं है लेकिन अपार शांति है। सादगी में सौंदर्य है। कौसानी प्रवास के दौरान ड्राइवर मंगल सिंह : मोबाइल नंबर 09410047723 : का खास तौर पर जिक्र करना चाहूंगी जिसने पर्यटक समझकर लूटने की बजाय बेहद मुनासिब दाम लिये लिहाजा अगर आप जाना चाहे तो उसे फोन करने पर वह काठगोदाम स्टेशन आपको लेने आ जायेगा।

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शनिवार, 21 मई 2016

काफल खाओ, जवां बन जाओ

आयुर्वेद में कायफल और संस्कृत में कटफल कहा जाता है काफल को जो अच्छा एंटी-आक्सीडेंट भी है। 
       र पहाड़ी व्यक्ति ने काफल जरूर खाये होंगे और उनसे जुड़ी एक कहानी भी सुनी होगी। उत्तराखंड में हर जगह यह कहानी प्रचलित है। इसको प्रस्तुत करने का तरीका भले ही अलग हो लेकिन उसका सार एक है। वही 'काफल पाको, मिल नी चाखो' वाली कहानी। आपको याद तो आ गयी होगी। चलो एक बार मैं फिर से सुना देता हूं। 
     किसी गांव में एक गरीब विधवा महिला रहती थी जो खेती करके या खेतों में मेहनत मजदूरी करके अपना और अपनी छोटी बेटी का पेट पालती थी। एक बार वह जंगल गयी और वहां से टोकरी भर के काफल ले आयी। उसे खेतों में काम करने जाना था, इसलिए उसने अपनी बेटी से कहा कि वह काफल का ध्यान रखे लेकिन साथ ही सख्त हिदायत भी दे दी कि वह उन्हें खाये नहीं। जब वह खेतों से काम करके आ जाएगी तो दोनों मिलकर खाएंगे। लाल, काले रसीले काफल देखकर बेटी का मन बहुत ललचा रहा था लेकिन उसने खुद पर काबू रखा। मां थक हार कर आयी तो बेटी ने आते ही कहा मां भूख लगी क्या अब हम काफल खा लें। मां ने टोकरी की तरफ देखा तो पाया कि टोकरी पहले की तरह भरी हुई नहीं थी। वह थकी और भूखी थी और उसने तुरंत बेटी से कहा, ''तूने काफल खाये'। बेटी ने कहा, 'नहीं मां मैंने नहीं खाये। मैंने तो काफल चखे भी नहीं। ' मां को गुस्सा आ गया कि बेटी काफल भी खा गयी और झूठ भी बोल रही है। उसने आव देखा न ताव बेटी को जोर से थप्पड़ मारा। वह नीचे गिर गयी और उसका सिर पत्थर से लग गया। भूखी और प्यासी नन्हीं सी जान ने वहीं पर दम तोड़ दिया। महिला बदहवास हो गयी कि उसने सिर्फ काफल के लिये अपनी बेटी मार दी। उसने काफल बाहर रख दिये। रात को जब ओस पड़ी तो उसने देखा कि काफल की टोकरी तो भरी हुई है। तब उसे समझ में आया कि दिन में धूप से काफल भी सिकुड़ गये थे। बेटी ने सच में काफल नहीं खाये थे। बेटी के गम में उसने भी दम तोड़ दिया। कहते हैं कि ये दोनों मां बेटी पक्षी बन गये। आज भी चैत के महीने में पहाड़ों में एक चिड़िया कुछ इस तरह से बोलती है, 'काफल पाको, मिल नी चाखो' (काफल पके हैं, लेकिन मैंने नहीं चखे)। इसके जवाब में एक दूसरी चिड़ियां कुछ इस तरह से क्रंदन करती है, 'पुर पुतई पूर पूर' (पूरे हैं बेटी पूरे हैं)। 
   यह कहानी बेहद मार्मिक है जो हमें सीख देती है कि जल्दबाजी या ताव में कभी कोई काम नहीं करना चाहिए। यदि गुस्से को काबू कर लिया तो कई काम बिगड़ने से बच जाते हैं। आईए अब बात करते हैं कि इस कहानी केंद्र बिंदु काफल के बारे में ....

देवताओं का फल है काफल 


      काफल बेहद लोक​​प्रिय, औषधीय गुणों से भरपूर लेकिन बहुत जल्दी खराब होने वाला पहाड़ी फल है जो मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नेपाल में पाया जाता है। यह असल में एक जंगली फल है जिसकी खेती नहीं की जाती है। इसको आयुर्वेद में कायफल और संस्कृत में कटफल कहा जाता है। पहाड़ों में ऊंचाई वाले स्थानों पर पाये जाने वाले काफल का पेड़ का अमूमन 10-15 मीटर ऊंचा होता है। इसका फल छोटा बेर जैसा होता है जिसके अंदर गुठली भी होती है। काफल चैत्र और बैशाख के महीने में होता है। उत्तराखंड के एक मशहूर गीत के बोल भी हैं, ''बेडू पाको बारामासा, ओ नरैणी काफल पाको चैता, मेरी छैला।'' यानि बेडू हर महीने पकता है लेकिन काफल चैत के महीन में ही पकता है। अप्रैल से लेकर जून तक पहाड़ों में लोग जंगलों से काफल लेकर सड़कों के किनारे इसे बेचते हैं। पर्यटकों को खासा लुभाता है यह फल। हिमाचल प्रदेश में इसे काला भौरा और पूर्वोत्तर के राज्यों में सोहफी के नाम से भी जानाता जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम माइरिका इस्कुलाटा है। 
     काफल शुरू में हरा होता है जबकि बाद में लाल तो कुछ कुछ काल, मटमैले और बैंगनी से बन जाते हैं। जब यह हरा होता है तो इसका स्वाद खट्टा जबकि पकने पर मीठा होता है। कुमाऊँनी भाषा के पहले कवि गुमानी पंत ने इसे स्वर्ग से धरती पर आया फल बताया है। उन्होंने काफल की व्यथा का वर्णन इस तरह से किया है, ''खाणा लायक इंद्र का, हम छियां भूलोक आई पणां। पृथ्वी में लग यो पहाड़, हमारी थाती रची देव लै। एसो चित्त विचारी काफल सबै राता भया क्रोध लै। कोई बड़ा—खुड़ा शरम लै काला धुमैला भया। '' (हम स्वर्ग लोक में इंद्र देवता के खाने योग्य थे और अब धरती पर आ गए। पृथ्वी में ईश्वर ने पहाड़ों पर हमारा स्थान बनाया। इस पर विचार करते हुए काफल गुस्से से लाल तो कुछ बड़े बूढ़े शर्म से काले या मटमैले हो गये।) काफल गुच्छों में लगता है। कच्चे काफलों की चटनी बनायी जाती है जो बहुत स्वादिष्ट होती है। 
   काफल अभी उत्तराखंड में आय का अच्छा स्रोत बन गया है। गर्मियों में सड़कों के किनारे या बाजारों में ग्रामीण टोकरियों में लेकर यह फल बेचते हैं। कहते हैं कि मैदानों में रहने वाले पर्यटक ने एक बार किसी ग्रामीण से पूछा कि 'ये काफल है भइया?' तो उसे जवाब मिला, 'हां काफल है भैया'। पर्यटक गुस्से से तिलमिला गया। मेरा मजाक उड़ा रहा है। बाद में उसे समझाया गया कि असल में फल का नाम ही काफल है। पर्यटकों को यह वैसे काफी पसंद आता है। 

काफल खाओगे तो रहोगे जवान 


    काफल औषधीय गुणों से भरपूर है। कहा जाता है कि काफल खाने वाला व्यक्ति हमेशा जवान रहता है। इसका कारण इसमें एंटी-आक्सीडेंट गुणों का पाया जाना है। इसके इन गुणों से यह तनाव कम करने, स्ट्रोक और कैंसर से बचाने में सहायक होता है। यह पेट की कई बीमारियों का निदान करता है और लू लगने से बचाता है। यदि आपको भूख नहीं लगती है तो काफल खाईये। आयुर्वेद के अनुसार यह भूख की अचूक दवा है। मधुमेह के रोगियों के लिये भी यह उपयोगी है।  काफल में फायटोकेमिकल पोलीफेनोल पाया जाता है जो विषाणुरोधी होता है। यह सूजन कम करने में लाभकारी होता है। काफल रसीला फल है लेकिन इसमें रस की मात्रा 40 प्रतिशत ही होती है। इसमें विटामिन सी, खनिज लवण, प्रोटीन, फास्फोरस, पोटेशियम, कैल्शियम, आयरन और मैग्निशीयम होता है। 
    आयुर्वेद के अनुसार काफल के फल ही नहीं बल्कि छाल भी बेहद उपयोगी होती है। इसकी छाल में मायरीसीटीन, मायीसीट्रिन और ग्लाइकोसाईड पाया जाता है। इसकी छाल चबाने से दांतों के दर्द में राहत मिलती है। यही नहीं काफल की छाल को उबालकर तैयार द्रव्य में अदरक और दालचीनी मिलाकर उससे अस्थमा, डायरिया, टाइफाइड जैसी बीमारियों का इलाज भी किया जाता है। पेट गैस की समस्या दूर करने के लिये भी इसकी छाल का उपयोग किया जाता है। इसकी छाल का पेस्ट बनाकर घाव पर लगाने से वह जल्दी ठीक होता है। जोड़ों के दर्द में भी इसे उपयोगी माना जाता है। काफल की छाल को पीसकर उसका पाउडर तैयार किया जाता है जो जुकाम, गले की बीमारी और खांसी में उपयोगी होता है। काफल का फूल से भी कान दर्द, लकवा और डायरिया के लिये औ​षधि तैयार की जाती थी। 
   काफल खाना है तो पहाड़ जाना ही पड़ेगा क्योंकि मैंने पहले भी लिखा था कि इसे लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है। मेरे गांव के जंगल के शुरू में ही काफल का बड़ा सा पेड़ था। हमारे गांव स्योली का शायद ही कोई शख्स होगा जिसने उस पेड़ के काफल नहीं खाये होंगे। मैंने तो खूब खाये हैं। आपने भी पहाड़ में रहते हुए काफल खाये होंगे। तो बताईये काफल से जुड़ी अपनी कहानी। अभी मैं तो चला काफल खाने, बाद में किसी और विषय पर बात करते हैं। आपका पहाड़ी भाई धर्मेन्द्र पंत 

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रविवार, 8 मई 2016

उत्तराखंड में बोली जाती हैं 13 भाषाएं

कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी। यह कहावत उत्तराखंड पर अक्षरश: लागू होती है। 

   दुनिया आज 'मदर्स डे' मना रही है। मां के लिये भी एक दिन तय कर दिया है, मुझे यह जंचता नहीं है। मां हर दिन याद आती है और हर दिन मां के लिये होता है। पहाड़ों में मां को मां के अलावा ब्वे, बोई, ईजा, आमा कई तरह से पुकारा जाता है। इस पर बाद में चर्चा करेंगे। अभी तो आपसे मैं एक सवाल करता हूं कि उत्तराखंड में कितनी भाषाएं बोली जाती हैं? मैंने यह सवाल कई पहाड़ियों से किया तो उनमें से अधिकतर का जवाब होता था तीन यानि गढ़वाली, कुमांउनी और जौनसारी। आज 'घसेरी' आपको उत्तराखंड की तमाम भाषाओं से अवगत कराने की कोशिश करेगी।
       उत्तराखंड में कुल 13 भाषाएं बोली जाती हैं। यह 'घसेरी' नहीं बल्कि भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण का निष्कर्ष है। उत्तराखंड की भाषाओं को लेकर सबसे पहले सर्वेक्षण करने वाले जार्ज ग्रियर्सन ने भी इनमें से अधिकतर भाषाओं की जानकारी दी थी। ग्रियर्सन ने 1908 से लेकर 1927 तक यह सर्वेक्षण करवाया था। इसके बाद उत्तराखंड की भाषाओं को लेकर कई अध्ययन किये गये। हाल में 'पंखुड़ी' नामक संस्था ने भी इन भाषाओं पर काम किया। यह सभी काम 13 भाषाओं पर ही केंद्रित रहा। इनमें गढ़वाली, कुमांउनी, जौनसारी, जौनपुरी, जोहारी, रवांल्टी, बंगाड़ी, मार्च्छा, राजी, जाड़, रंग ल्वू, बुक्साणी और थारू शामिल हैं। इस पर मतभेद हो सकते हैं कि ये भाषाएं हैं या बोलियां। मेरा मानना है कि अगर एक बोली का अपना शब्द भंडार है, वह खुद को अलग तरह से व्यक्त करती है तो उसे भाषा बोलने में गुरेज क्या। कई लोगों को मानना है कि उत्तराखंड की भाषाओं की अपनी लिपि नहीं है तो मेरा इस पर जवाब होता है कि अंग्रेजी की भी अपनी लिपि नहीं है। वह रोमन लिपि में लिखी जाती है तो क्या आप उसे भी भाषा नहीं मानोगे। मराठी की देवनागरी लिपि है और हमारे उत्तराखंड की भाषाओं जो साहित्य​ लिखा गया उसमें ​देवनागरी का ही उपयोग किया गया। इस विषय पर आगे कभी लंबी चर्चा हो सकती है। फिलहाल 'घसेरी' के साथ चलिए भाषाओं को लेकर उत्तराखंड की सैर करने।

कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी 


    हम सभी जानते हैं कि उत्तराखंड में दो मंडल हैं गढ़वाल और कुमांऊ। इन दोनों की अपनी अलग अलग भाषाएं हैं। इनसे जुड़े क्षेत्रों की अन्य भाषाएं इनसे प्रभावित हो सकती हैं लेकिन अध्ययन के दौरान 'घसेरी' ने पाया कि उनकी शब्दावली और वाक्य विन्यास में काफी अंतर पाया जाता है। वैसे साथ में चेतावनी भी ​है कि यूनेस्को ने उत्तराखंड की सभी भाषाओं को संकटग्रस्त भाषाओं की श्रेणी में शामिल किया है। इसको संकट में हम ही डाल रहे हैं इसलिए सावधान हो जाइये। गढ़वाली और कुमांउनी यहां की दो मुख्य भाषाएं हैं इसलिए पहले इन्हीं के बारे में जान लेते हैं।



गढ़वाली : गढ़वाल मंडल के सातों​ जिले पौड़ी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, देहरादून और हरिद्वार गढ़वाली भाषी लोगों के मुख्य क्षेत्र हैं। कुमांऊ के रामनगर क्षेत्र में गढ़वाली का असर देखा जाता है। माना जाता है कि गढ़वाली आर्य भाषाओं के साथ ही विकसित हुई लेकिन 11—12वीं सदी में इसने अपना अलग स्वरूप धारण कर लिया था। इस पर हिन्दी के अलावा मराठी, फारसी, गुजराती, बांग्ला, पंजाबी आदि का भी प्रभाव रहा है लेकिन गढ़वाली का अपना शब्द भंडार है जो काफी विकसित है और हिन्दी जैसी भाषा को भी अपने शब्द भंडार से समृद्ध करने की क्षमता रखती है। ग्रियर्सन ने गढ़वाली के कई रूप जैसे श्रीनगरी, नागपुरिया, बधाणी, सलाणी, टिहरियाली, राठी, दसौल्या, मांझ कुमैया आदि बताये थे। बाद में कुछ साहित्यकारों ने मार्च्छा, तोल्छा, जौनसारी का भी गढ़वाली का ही एक रूप माना। गढ़वाली भाषाविद डा. गोविंद चातक ने श्रीनगर और उसके आसपास बोली जाने वाली भाषा को आदर्श गढ़वाली कहा था। वैसे भी कहा गया है, ''कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी। ''
कुमांउनी : कुमांऊ मंडल के छह जिलों नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत और उधमसिंह नगर में कुमांउनी बोली जाती है। वैसे इनमें से लगभग हर जिले में कुमांउनी का स्वरूप थोड़ा बदल जाता है। गढ़वाल और कुमांऊ के सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग दोनों भाषाओं को बोल और समझ लेते हैं। कुमाउंनी की कुल दस उप बोलियां हैं जिन्हें पूर्वी और पश्चिमी दो वर्गों में बांटा गया है। पूर्वी कुमाउंनी मेंकुमैया, सोर्याली, अस्कोटी तथा सीराली जबकि पश्चिमी कुमाउंनी में खसपर्जिया, चौगर्खिया, गंगोली, दनपुरिया, पछाईं और रोचोभैंसी शामिल हैं। कुमांऊ क्षेत्र में ही भोटिया, राजी, थारू और बोक्सा जनजातियां भी रहती हैं जिनकी अपनी बोलियां हैं। पुराने साहित्यकारों ने इसे 'पर्वतीय' या 'कुर्माचली' भाषा कहा है।
जौनसारी : गढ़वाल मंडल के देहरादून जिले के पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्र को जौनसार भाबर कहा जाता है। यहां की मुख्य भाषा है जौनसारी। यह भाषा मुख्य रूप से तीन तहसीलों चकराता, कालसी और त्यूनी में बोली जाती है। इस क्षेत्र की सीमाएं टिहरी ओर उत्तरकाशी से लगी हुई हैं और इसलिए इन जिलों के कुछ हिस्सों में भी जौनसारी बोली जाती है। जार्ज ग्रियर्सन ने इसे पश्चिमी पहाड़ी की बोली कहा था। कहने का मतलब है कि इसे उन्होंने हिमाचल प्रदेश की बोलियों के ज्यादा करीब बताया था। इसमें पंजाबी, संस्कृ​त, प्राकृत और पाली के कई शब्द मिलते हैं।
जौनपुरी: यह ​टिहरी जिले के जौनपुर विकासखंड में बोली जाती है। इसमें दसजुला, पालीगाड़, सिलवाड़, इडवालस्यूं, लालूर, छःजुला, सकलाना पट्टियां इस क्षेत्र में आती हैं। टिहरी रियासत के दौरान यह काफी पिछड़ा क्षेत्र रहा लेकिन इससे यहां की अलग संस्कृति और भाषा भी विकसित हो गयी। यह जनजातीय क्षेत्र है। डा. चातक के अनुसार यमुना के उदगम के पास रहने के कारण इन्हें यामुन जाति कहा जाता था। कभी इस क्षेत्र को यामुनपुरी भी कहा जाता था जो बाद में जौनपुरी बन गया।
रवांल्टी :  उत्तरकाशी जिले के पश्चिमी क्षेत्र को रवांई कहा जाता है। यमुना और टौंस नदियों की घाटियों तक फैला यह वह क्षेत्र है जहां गढ़वाल के 52 गढ़ों में से एक राईगढ़ स्थित था। इसी से इसका नाम भी रवांई पड़ा। इस क्षेत्र की भाषा गढ़वाली या आसपास के अन्य क्षेत्रों से भिन्न है। इस भाषा को रवांल्टी कहा जाता है। डा. चातक ने पचास के दशक में 'गढ़वाली की उप बोली रवांल्टी, उसके लोकगीत' विषय पर ही आगरा विश्वविद्यालय से पीएचडी की थी। वर्तमान समय में भाषा विद और कवि महावीर ​रवांल्टा इस भाषा के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
जाड़ : उत्तरकाशी जिले के जाड़ गंगा घाटी में निवास करने वाली जाड़ जनजाति की भाषा भी उनके नाम पर जाड़ भाषा कहलाती है। उत्तरकाशी के जादोंग, निलांग, हर्षिल, धराली, भटवाणी, डुंडा, बगोरी आदि में इस भाषा के लोग मिल जाएंगे। जाड़ भोटिया जनजाति का ही एक अंग है जिनका तिब्बत के साथ लंबे समय तक व्यापार रहा। इसलिए शुरू में इसे तिब्बत की 'यू मी' लिपि में भी लिखा जाता था। अभी इस बोली पर काफी खतरा मंडरा रहा है।
बंगाणी : उत्तरकाशी जिले के मोरी तहसील के अंतर्गत पड़ने वाले क्षेत्र को बंगाण कहा जाता है। इस क्षेत्र में तीन पट्टियां— मासमोर, पिंगल तथा कोठीगाड़ आती हैं जिनमें बंगाणी बोली जाती है। यूनेस्को ने इसे उन भाषाओं में शामिल किया है जिन पर सबसे अधिक खतरा मंडरा रहा है।
मार्च्छा : गढ़वाल मंडल के चमोली जिले की नीति और माणा घाटियों में रहने वाली भोटिया जनजाति मार्च्छा और तोल्छा भाषा बोलती है। इस भाषा में तिब्बती के कई शब्द मिलते हैं। नीति घाटी में नीति, गमसाली और बाम्पा शामिल हैं जबकि माणा घाटी में माणा, इन्द्रधारा, गजकोटी, ज्याबगड़, बेनाकुली और पिनोला आते हैं।
जोहारी : यह भी भोटिया जनजाति की एक भाषा है ​जो पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी क्षेत्र में बोली जाती है। इन लोगों का भी तिब्बत के साथ लंबे समय तक व्यापार रहा इसलिए जोहारी में भी तिब्बती शब्द पाये जाते हैं।
थारू : उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के तराई क्षेत्रों, नेपाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षेत्राों में ​थारू जनजाति के लोग रहते हैं। कुमांऊ मंडल में यह जनजाति मुख्य रूप से उधमसिंह नगर के खटीमा और सितारगंज विकास खंडो में रहती है। इस जनजाति के लोगों की अपनी अलग भाषा है जिसे उनके नाम पर ही थारू भाषा कहा जाता है। यह कन्नौजी, ब्रजभाषा तथा खड़ी बोली का मिश्रित रूप है।
बुक्साणी : कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक तराई की पट्टी में निवास करने वाली जनजाति की भाषा है बुक्साणी। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से काशीपुर, बाजपुर, गदरपुर, रामनगर, डोईवाला, सहसपुर, बहादराबाद, दुगड्डा, कोटद्वार आदि शामिल हैं।
रंग ल्वू : कुमांऊ में मुख्य रूप से पिथौरागढ़ की धारचुला तहसील के दारमा, व्यास और चौंदास पट्टियों में रंग ल्वू भाषा बोली जाती है। इसे तिब्बती—बर्मी भाषा का अंग माना जाता है जिसे प्राचीन समय से किरात जाति के लोग बोला करते थे। दारमा घाटी में इसे रङ ल्वू, चौंदास में बुम्बा ल्वू और ब्यास घाटी में ब्यूंखू ल्वू के नाम से जाना जाता है।
राजी : राजी कुमांऊ के जंगलों में रहने वाली जनजाति थी। यह खानाबदोश जनजाति थी जिसने पिछले कुछ समय से स्थायी निवास बना लिये हैं। नेपाल की सीमा से सटे उत्तराखंड के पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जिलों में इस जनजाति के लोग रहते हैं। यह भाषा तेजी से खत्म होती जा रही है।
         मने शुरुआत 'मां' से की थी तो अब जान लें कि उत्तराखंड की भाषाओं में मां के लिये क्या बोला जाता है। वैसे यहां की भाषाओं में अब मां आम प्रचलित है लेकिन पहले ब्वे, बोई या ईजा भी बोला जाता था। मां के लिये उत्तराखंड की भाषाओं के शब्द ....
गढ़वाली ... ब्वे, अम्मा, बोई। कुमांउनी, जोहारी, रंग ल्वू ... ईजा, अम्मा। जाड़ ... आं। बंगाणी ... इजै। रवांल्टी ... बुई, ईजा। जौनपुरी ... बोई। जौनसारी ... ईजी। थारू ... अय्या। राजी ... ईजलुअ, इहा। मार्च्छा ... आमा।
         उत्तराखंड की भाषाओं पर आगे भी आपको महत्वपूर्ण जानकारी देने की कोशिश करूंगा। फिलहाल इतना ही। कैसा लगा यह आलेख जरूर बताएं। आपका अपना धर्मेन्द्र पंत। 

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सोमवार, 18 अप्रैल 2016

सम्मान के साथ दीजिए न्यौता (न्यूतु)

खुद निमंत्रण पत्र दीजिए और साथ में ले जाईये अरसा। 
        शादियों का मौसम चल रहा है। पहाड़ों में भी हर तरफ ढोल दमौ या बैंड बाजाओं की धुनें सुनाई दे रही हैं। मेरे पास भी शादी के कई न्यौते आ रखे हैं। हम इसे वैसे 'न्यूतु' कहते हैं। इसी से न्यूतेर बना है। न्यूतेर मतलब वे लोग जिन्हें आमंत्रित किया गया है। न्यूतु देने की हमारी एक खास परंपरा होती थी लेकिन आजकल बहुत कम लोग उसको अपना रहे हैं। इससे कभी कभी मन कसैला भी हो जाता है। लोगों ने एक बहुत सरल तरीका अपना लिया है। कार्ड छपवा दिये और फिर किसी करीबी रिश्तेदार के पास उन्हें पहुंचा दिया कि फलां फलां को कार्ड पहुंचा देना। उनके पास एक फोन करने की भी फुरसत नहीं हैं। अब जिसके पास कार्ड हैं उसे जरूर फोन करना पड़ता है। कुछ इस तरह '' आपका कार्ड मेरे पास आया है। मेरे पास समय नहीं है। लेकिन याद रख लेना फलां तारीख को शादी है और आपके लिये कार्ड आया है। '' न्यौता देने का अजीब तरीका है यह। प्रौद्योगिकी के विकास के साथ अब व्हाट्सएप पर न्यौते दिये जा रहे हैं। बस हो गयी जिम्मेदारी खत्म। जरा सोचिये कि आप जिस व्यक्ति को न्यौता देने उसके घर तक नहीं जा सकते हो उससे कैसे उम्मीद करते हो कि वह आपके घर शादी में आएगा। यदि वह आपके घर तक पहुंचता है तो यह उसका एहसान मानिये। शादी कोई खेल नहीं है, ऐसा तो सभी लोग कहते हैं तो फिर इसके हर पक्ष को गंभीरता से लीजिए और न्यूतु इसमें सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। 
         यदि आप किसी तीसरे व्यक्ति के हाथ निमंत्रण पत्र भेजते हैं तो फिर हो सकता है कि वह व्यक्ति शादी में नहीं आये। मैंने कुछ वर्ष पहले तय किया था कि ऐसे लोगों के यहां शादियों में नहीं जाऊंगा जिन्हें न्यौता देने का सलीका भी नहीं है लेकिन मजबूरी या गांव गुठ्यार के लोगों से मिलने की लालसा में कई बार चला जाता हूं। वाट्सएप के निमंत्रण पर भी ऐसी संभावना बनी रहती है कि क्या पता वह 'न्यूतेर' नहीं आये। यह आपकी हैसियत पर भी निर्भर करता है कि न्यूतेर आपके बेमन से दिये गये न्यौते को स्वीकार करता है या नहीं। बेमन इसलिए क्योंकि भारतीय परंपरा में न्यौता देने के तरीके ऐसे नहीं होते हैं जिनका मैंने ऊपर जिक्र किया है। आदर्श स्थिति तो यह है कि आप स्वयं न्यौता देने जाएं। आपके बेटे या बेटी की शादी एक ही दिन होनी है। इस अवसर को यादगार बनाने के लिये अपने सगे संबंधियों, रिश्तेदारों को प्यार और मनुहार करके बुलाये। कार्ड आपने कितना भी धांसू छपवा दिया हो, उसमें भले ही कितनी सजावट क्यों नहीं कर दी हो, उससे वीडियो ही क्यों न चिपका दिया हो, यदि वह पूरे हर्ष और उल्लास के साथ उसे पाने वाले के पास नहीं पहुंचा तो फिर आपके इस दिखावे का कोई मतलब नहीं बनता है। तुलसीदास तो बहुत पहले कह गये थे, ''आवत ही हरसै नहीं, नयनन नहीं सनेह, तुलसी तहाँ न जाइये, चाहे कंचन बरसे मेह।'' मैं इस मामले में तुलसीदास का पूरी श्रद्धा से अनुकरण करता हूं। आप घर जाकर प्यार और मनुहार करके बुलाएंगे तो वे आपके बच्चों को आशीर्वाद देने के लिये जरूर आएंगे। वे आपके काम में हाथ भी बंटाएंगे और यह सब कुछ आपके न्यौता देने के तरीके पर निर्भर करेगा। 

'डाली' बनाईये, अरसा का 'न्यूतु' दीजिए 

       मैं तो पहाड़ी बंधुओं से अपील करूंगा कि वे न्यौता देने में अपनी परंपरा को अपनाये। हमारे लिये वह न्यूतु बन जाता है। आप दिल्ली में रहते हैं या मुंबई में या किसी अन्य शहर या गांव में अरसा या अर्सा बनाकर न्यूतु भेजिए। हम एक कार्ड और कुछ लड्डुओं के कारण अपने रीति रिवाज और परंपराओं को ही भूल गये हैं। पहाड़ों में न्यूतु अरसा, भूड़ा, पूड़ी और स्वालों का दिया जाता था। इसे गढ़वाली में 'डाली या डली' कहा जाता है। शादी से कुछ दिन पहले डाली बनती है और फिर से इसे सभी रिश्तेदारों के पास पहुंचा दिया जाता है। हमारे यहां वर्षों से शादियों में अरसा, पूड़ी से ही न्यौता दिया जाता रहा है। डाली वाले दिन गांव वाले न्यौता देने के लिये इधर उधर गांवों में जाने में सहयोग करते थे। इसे 'डाली द्यूणु यानि देना' कहते हैं। गांवों में कई को डाली नहीं दी जाती थी या उन्हें न्यौता नहीं ​जाता था। यदि आपकी डाली में अरसा भी शामिल हैं तो इसका मतलब है कि आपको शादी के लिये न्यौता दिया गया है। कुछ लोगों को सिर्फ पूड़ी और भूड़ा दे दिया जाता था मतलब आपको नहीं न्यौता गया है। न कोई सवाल न कोई जवाब। इतना महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है न्यौता देने में अरसा। कुछ लोगों को अलग से न्यौता दिया जाता था। इनमें पंडित जी, मंगलेर, औजी, सुहागन नारी, पांच कन्या आदि शामिल होती थी। इनमें से पंडित जी को आज भी याद किया जाता है लेकिन उन्हें भी न्यौता देने का तरीका बदल गया है। ​बहाना बनाना आसान होता है उनका समाधान भी है। आप अपने बेटे या बेटी की शादी में 15 से 20 दिन पहले 'डाली' तैयार करवा दीजिए और फिर जाईये अपने रिश्तेदारों के घर अरसा की डाली लेकर। अधिकतर आपके इस प्रयास की सराहना करेंगे। आप कार्ड भी छपवाईये लेकिन उसे स्वयं लेकर जाईये। यदि प्रत्येक को आप चार अरसा भी देते हैं तो इसे कहेंगे सोने पे सुहागा। दिल्ली में लोग कार्ड देने में भी आलस्य बरतते हैं तो अरसा उन पर भारी पड़ जाएगा लेकिन प्रयास तो करने होंगे। यह हमारी सभ्यता है, हमारी संस्कृति है, हमारी परंपरा है। 
     आजकल कुछ लोग एक सवाल उठाते हैं अरसा कैसे बनता है। मैं पहले भी घसेरी में अरसा के बारे में जानकारी दे चुका हूं। अरसा बनाने की विधि के लिये आप ''दोण और कंडी से होती है (थी) बेटी की विदाई'' पर क्लिक करिये। इससे आपको पता चल जाएगा कि अरसा कैसे बनाया जाता है। बस मेरी इतनी प्रार्थना है कि यदि आप शादी . ब्याह में किसी को आमंत्रित करते हैं तो उसे सम्मा​न से न्यौता दीजिए। हमारी संस्कृति कहती है, 'अतिथि देवो भव:। इसलिए अतिथि को आदर सत्कार के साथ आमंत्रित करिये। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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