गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

पहाड़ी जीवन का सार है 'वूं मा बोलि दे'

त्यारा खुटौं कि 
बिवयूं बिटि छड़कंद ल्वे
पर तू नि छोड़दि 
ढुंगा माटा को काम 
आखिर 
कै माटै बणीं छै तु ब्वे?
        क कवि, पत्रकार, समाजसेवी, उच्चकोटि के वक्ता, मंच संचालक, सलाहकार और इन सबसे बढ़कर गढ़वाल और गढ़वाली से अथाह प्रेम करने वाले शख्स की कलम जब  चलती है तो इसी तरह की कई मर्मस्पर्शी कविताएं प्रस्फुटित होती हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी गणेश खुगशाल 'गणी' पिछले तीन दशकों से हिन्दी और गढ़वाली में निरंतर लिख रहे हैं लेकिन अब पहली बार गढ़वाली में उनकी कविताओं का संग्रह 'वूं मा बोलि दे' के रूप में सामने आया है। दिल को छूने वाली, गांव गुठ्यार की याद दिलाने वाली और कई सवाल खड़े कर देने वाली ये कविताएं पहाड़ी जीवन का सार हैं। 
         कविताओं में डूबने पर हर मोड़ पर आपको अपनी मां, अपना गांव, अपना बचपन, अपने खेत, अपना खलिहान, अपना घर सब याद आ जाएंगे। महान गायक नरेंद्र सिंह नेगी के शब्दों में, ''गणि का ये ​कविता संग्रै मा घर—बण, गौं गुठ्यार, गौं—पचैत, खेती बाड़ि, थौल—तमसा, अजक्यालै राजनीति, कुछ मिट्ठी और कुछ तीती कवितौं को चित्रण, व्यंग्य, गुस्सा, ताना, लाड़, प्यार, भौं—कुछ छ। '' 
     नेगी जी ने ये शब्द 'वूं मा बोलि दे' का सार हैं। आखिर गणेश खुगशाल 'गणी' को नेगी जी से बेहतर भला कौन जानता है। एक कवि सम्मेलन के दौरान जब गणी ने मां पर लिखी अपनी कविता पढ़ी तो नेगी जी खुद को नहीं रोक पाये और उन्हें गले लगा दिया। यह लगभग 22 साल पुरानी बात है और तब से नरेंद्र सिंह नेगी और गणेश खुगशाल 'गणी' का साथ बना हुआ है। नेगी जी के कार्यक्रमों में मंच संचालक गणी भाई की मीठी बोली का कायल भला कौन नहीं होगा।
पिछले दिनों मुझे भी गणी भाई (बायें) से
भेंट 
करने का सौभाग्य मिला। 
      पौड़ी गढ़वाल की असवालस्यूं पट्टी के किनगोड़ी गांव में 22 अप्रैल 1968 को जन्में गणेश खुगशाल 'गणी' ने अपनी बाल्यवस्था और किशोरावस्था गांव में बितायी। बाद में उनकी कर्मस्थली मुख्यरूप से पौड़ी बनी लेकिन वह अब भी गांवों से जुड़े हुए हैं और इसलिये उनकी कविताओं में हर तरफ गढ़वाल के गांव, वहां का समाज, संस्कृति और समस्याएं नजर आती हैं। ''हमारि ब्वे, दादी अर काकि बोड्यूं की, जिकुड़ि भोरीन भुक्यूंन ....'' जैसी कई कविताओं में मां पिताजी आदि का ढेर सारा प्यार भरा है। इन कविताओं में गांवों से पलायन का दर्द दिखता है। शीर्षक कविता 'वूं मा बोलि दे' भी इससे अलग नहीं है। 'कूड़ि' कविता में वह मकान से लेकर घर के हर कोने और उससे जुड़ी हर सामग्री में जीवन भरते हैं। 'पोस्टर' से लेकर 'सिलिंडर' तक और 'भड्डू' से लेकर 'जांदिरि' तक को यह कविता संग्रह जीवंत बना देता है। 
      उत्तराखंड जब भी विपदा में पड़ा तो कवि मन भी विचलित हो उठा और इसलिए केदारनाथ की आपदा पर वह भगवान से पूछ बैठा, ''हे भगवान! तू इथगा रवेलु  ह्वेलु, कैन नि जाणि, बरखा दीणैं मा बि, नि मीलु वख पाणि, तेरी जात्रा यनि ह्वेली, कैल नि जाण ..''। 
    बचपन में मां अक्सर 'कुण्या बूढ़' का डर दिखाकर हमें सुला देती थी। आखिर कौन थी वह 'कुण्या बूढ़, जो अब नहीं डराती? कवि ने '' न कैल देखी, न कैल सूणी, झणि कब अफ्वी—अफ्वी, कै खटला मूड़ मोरिगे कुण्या बूढ़'' में इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश की है। राजनीति पर किये गये कटाक्षों में गणेश खुगशाल 'गणी' के अंदर छिपा पत्रकार सामने आता है। लेकिन वह इसके साथ घंटाघर को बचाये रखने का आग्रह भी सरकार से करते हैं क्योंकि देहरादून में रहने और वहां जाने वाले हर शख्स की यादें इस जगह से जुड़ी हुई हैं। 
    सरकारा।
    तेरी त पता नी क्या गौं छ
    पर मेरी हाथ ज्वड़ै इथु कि 
    तै देरादूणौं तू जो कुछ कैर
    पर बचै राखि घंटाघर । ..
 इस कविता संग्रह का प्र​काशन विनसर पब्लिशिंग कंपनी देहरादून ने किया है और इसका मूल्य 195 रूपये है।

                                                                      धर्मेन्द्र

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल




                                                   यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल
  विस्तृत स्वर्णिम भारत का भाल 
    यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।
      गिरि शिखरों से घिरा हुआ है
        तृण कुसुमों से हरा हुआ है
          विविध वृक्षों से भरा हुआ है
            जैसे शीशम, सेब और साल
              यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

गिरी गर्त से भानु चमकता
  मानो अग्निवृत दहकता
    बहुरंगी पुष्पाहार महकता
      ऐसा मनोहर प्रात:काल
        यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।
          शीतल हवा यहां है चलती
            निर्मल, निश्चल नदियां बहती
              सबको सहज बनने को कहती
                शीत विमल की ये हैं मिसाल
                  यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।




शुभ्र हिमालय झांक रहा है
  विश्व सत्य को आंक रहा है
    शांति प्रियता मांग रहा है
      जो भारत का ताज विशाल
        यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।
           बद्री केदार के मंदिर पावन
             उपवन यहां के हैं मनभावन
               मानो वर्ष पर्यंत हो सावन
                 यह प्रकृति की सुंदर चाल
                   यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

नहीं कलह और शोर यहां है
  नहीं लुटेरे चोर यहां हैं
    लगता निशदिन भोर यहां है
      शांति एकता का यह हाल
        यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।
          जगह जगह खुलते औषधालय
            नवनिर्मित हो रहे विद्यालय
              जागरूक गढ़वाली की लय
                भौतिक विकास करता गढ़वाल
                  यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

हो रहा अविद्या का जड़मर्दन
  फैले नव विहान का वर्जन
    नव शैलों का हो रहा सृजन
      गिरि चलें विकास की ले मशाल
        यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल
          विस्तृत स्वर्णिम भारत का भाल
             यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल ।।

              लेखक / कवि का परिचय

जितेंद्र मोहन पंत। जन्म 31 दिसंबर 1961 को गढ़वाल के स्योली गांव में। राजकीय महाविद्यालय चौबट्टाखाल से स्नातक। इसी दौरान पहाड़ और वहां के जीवन पर कई कविताएं लिखी। 'यह प्यारा ऊंचा गढ़वाल' नामक उपरोक्त कविता 1978 में लिखी गयी थी। बाद में सेना के शिक्षा विभाग कार्यरत रहे। 11 मई 1999 को 37 साल की उम्र में निधन। 


     
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शनिवार, 24 जनवरी 2015

गढ़वाल के राजा के लिये जब गंगा ने बदली धारा

                           
       पिछली पोस्ट में हमने रानी कर्णावती का जिक्र किया था। आज हम उनके पोते मेदिनीशाह के बारे में आपको एक रोचक जानकारी से अवगत कराएंगे। पृथ्वीपति शाह के पुत्र मेदिनीशाह 1667 के आसपास राजा बने थे। माना जाता है कि मेदिनीशाह की औरंगजेब से मित्रता हो गयी थी और इसलिए उन्हें अपनी दादी या पिता की तरह मुगलों से जंग नहीं लड़नी पड़ी थी।
       मेदिनीशाह को इसलिए अधिक याद किया जाता है क्योंकि कहा जाता है कि एक बार उनके लिये गंगा नदी ने भी अपनी धारा बदल दी थी। इसमें कितनी सच्चाई है कहा नहीं जा सकता। गढ़वाल के राजा को तब बदरीनाथ का अवतार भी माना जाता था और हो सकता हो कि राजा ने लोगों के सामने खुद को 'भगवान' साबित करने और अपने खिलाफ किसी भी तरह के विद्रोह को दबाने के लिये के लिये यह किस्सा गढ़कर फैला दिया हो, क्योंकि औरंगजेब से करीबी रिश्ते रखने और इस मुगल शासक के दरबार में जाकर कुछ समय उसकी राजधानी में बिताने के कारण तब हो सकता है कि मेदिनीशाह से जनता नाराज रही हो। यह भी हो सकता है कि राजा के पास तब ऐसे कुछ कुशल कारीगर रहे हों जिन्होंने रातों रात गंगा की धारा बदल दी हो। वास्तव में तब क्या हुआ था इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है। यह महज एक किस्सा है जिसके बारे में कहा जाता है कि मेदिनीशाह के राज्यकाल के दौरान इस तरह की घटना घटी थी।
हरिद्वार में नील धारा
     किस्सा इस तरह से है कि हरिद्वार में जब कुंभ मेला लगता था तो गढ़वाल का राजा हरी जी के कुंड में सबसे पहले स्नान करता था। उसके बाद ही बाकी राजाओं का नंबर आता था। जिस साल की यह घटना है उस साल कहा जाता है कि कई राजा हरिद्वार पहुंचे थे। उन सभी ने सभा करके तय किया कि पर्व दिन पर सबसे पहले गढ़वाल का राजा स्नान नहीं करेगा। सभी राजा इस पर सहमत हो गये। यहां तक कि गढ़वाल के राजा को किसी तरह की जबर्दस्ती करने पर जंग के लिये तैयार रहने की चेतावनी भी दी गयी। बाकी सभी राजा एकजुट थे और गढ़वाल का राजा अलग थलग पड़ गया। मेदिनीशाह ने कहा कि यह पुण्य क्षेत्र है और यहां कुंभ मेला जैसा महापर्व का आयोजन हो रहा है इसलिए रक्तपात सही नहीं है। अन्य राजा ही पहले स्नान कर सकते हैं। उन्होंने अन्य राजाओं के पास जो संदेश भेजा था उसमें आखिरी पंक्ति यह भी जोड़ी थी कि, ''यदि वास्तव में गंगा मेरी है और उसे मेरा मान सम्मान रखना होगा तो वह स्वयं मेरे पास आएगी। '' बाकी राजा इस पंक्ति का अर्थ नहीं समझ पाये। वे अगले दिन गढ़वाल के राजा से पहले कुंड में स्नान करने की तैयारियों में जुट गये।
      कहा जाता है कि गढ़वाल के राजा ने चंडी देवी के नीचे स्थित मैदान पर अपना डेरा डाला और मां गंगा की पूजा में लीन हो गये। बाकी राजा सुबह हरि जी के कुंड यानि हरि की पैड़ी में स्नान के लिये पहुंचे लेकिन वहां जाकर देखते हैं कि पानी ही नहीं है। मछलियां तड़प रही थी। गंगा ने अपना मार्ग बदल दिया था। वह गढ़वाल के राजा के डेरे के पास से बह रही थी। राजा मेदिनीशाह ने गंगा पूजन करने के बाद स्नान किया। जब अन्य राजाओं को पता चला तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्हें भी लगा कि गढ़वाल का राजा वास्तव में भगवान बदरीनाथ का अवतार हैं और इसलिए किसी अनहोनी से बचने के लिये सभी राजा तुरंत मेदिनीशाह के पास पहुंचे। उनसे माफी मांगी और फिर स्नान किया। उस रात गंगा ने जब अपना मार्ग बदला तो जो नयी धारा बनी उसे नील धारा कहा जाता है। इसके बाद यह तय हो गया कि किसी पर्व के समय गढ़वाल की राजा की उपस्थिति में वही सबसे पहले स्नान करेंगे। आज यह नील धारा पक्षी विहार के कारण अधिक प्रसिद्ध है।

 आपका धर्मेन्द्र पंत

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शनिवार, 17 जनवरी 2015

मुगल सैनिकों की नाक काटने वाली गढ़वाल की रानी कर्णावती

        
         भारतीय इतिहास में जब रानी कर्णावती का जिक्र आता है तो फिर मेवाड़ की उस रानी की चर्चा होती है जिसने मुगल बादशाह हुमांयूं के ​लिये राखी भेजी थी। इसलिए रानी कर्णावती का नाम रक्षाबंधन से अक्सर जोड़ दिया जाता है। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि इसके कई दशकों बाद भारत में एक और रानी कर्णावती हुई थी और यह गढ़वाल की रानी थी। इस रानी ने मुगलों की बाकायदा नाक कटवायी थी और इसलिए कुछ इतिहासकारों ने उनका जिक्र नाक क​टी रानी या नाक काटने वाली रानी के रूप में किया है। रानी कर्णावती ने गढ़वाल में अपने नाबालिग बेटे पृथ्वीपतिशाह के बदले तब शासन का कार्य संभाला था जबकि दिल्ली में मुगल सम्राट शाहजहां का राज था। शाहजहां के कार्यकाल पर बादशाहनामा या पादशाहनामा लिखने वाले अब्दुल हमीद लाहौरी ने भी गढ़वाल की इस रानी का जिक्र किया है। यहां तक कि नवाब शम्सुद्दौला खान ने 'मासिर अल उमरा' में उनका जिक्र किया है। इटली के लेखक निकोलाओ मानुची जब सत्रहवीं सदी में भारत आये थे तब उन्होंने शाहजहां के पुत्र औरंगजेब के समय मुगल दरबार में काम किया था। उन्होंने अपनी किताब 'स्टोरिया डो मोगोर' यानि 'मुगल इंडिया' में गढ़वाल की एक रानी के बारे में बताया है जिसने मुगल सैनिकों की नाट काटी थी। माना जाता है कि स्टोरिया डो मोगोर 1653 से 1708 के बीच लिखी गयी थी जबकि मुगलों ने 1640 के आसपास गढ़वाल पर हमला किया था। गढ़वाल के कुछ इतिहासकारों ने हालांकि पवांर वंश के राजाओं के कार्यों पर ही ज्यादा गौर किया और रानी कर्णावती के पराक्रम का जिक्र करना उचित नहीं समझा।
श्रीनगर गढ़वाल : यहीं से राजकाज चलाती थी रानी कर्णावती
       रानी कर्णावती के बारे में मैंने जितनी सामग्री जुटायी। उससे यह साफ हो जाता है कि वह पवांर वंश के राजा महिपतशाह की पत्नी थी। यह वही महिपतशाह थे जिनके शासन में रिखोला लोदी और माधोसिंह जैसे सेनापति हुए थे जिन्होंने तिब्बत के आक्रांताओं को छठी का दूध याद दिलाया था। माधोसिंह के बारे में गढ़वाल में काफी किस्से प्रचलित हैं। पहाड़ का सीना चीरकर अपने गांव मलेथा में पानी लाने की कहानी भला किस गढ़वाली को पता नहीं होगी। कहा जाता था कि माधोसिंह अपने बारे में कहा करते थे, ''एक सिंह वन ​का सिंह, एक सींग गाय का। तीसरा सिंह माधोसिंह, चौथा सिंह काहे का। '' इतिहास की किताबों से पता चलता है कि रिखोला लोदी और माधोसिंह जैसे सेनापतियों की मौत के बाद महिपतशाह भी जल्द स्वर्ग सिधार गये। कहा जाता है कि तब उनके पुत्र पृथ्वीपतिशाह केवल सात साल के थे। इसके 1635 के आसपास की घटना माना जाता है। राजगद्दी पर पृथ्वीपतिशाह ही बैठे लेकिन राजकाज उनकी मां रानी कर्णावती ने चलाया।
     इससे पहले जब महिपतशाह गढ़वाल के राजा थे तब 14 फरवरी 1628 को शाहजहां का राज्याभिषेक हुआ था। जब वह गद्दी पर बैठे तो देश के तमाम राजा आगरा पहुंचे थे। महिपतशाह नहीं गये। इसके दो कारण माने जाते हैं। पहला यह कि पहाड़ से आगरा तक जाना तब आसान नहीं था और दूसरा उन्हें मुगल शासन की अधीनता स्वीकार नहीं थी। कहा जाता है कि शाहजहां इससे चिढ़ गया था। इसके अलावा किसी ने मुगल शासकों को बताया कि गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में सोने की खदानें हैं। इस बीच महिपतशाह और उनके वीर सेनापति भी नहीं रहे। शाहजहां ने इसका फायदा उठाकर गढ़वाल पर आक्रमण करने का फैसला किया। उन्होंने अपने एक सेनापति नजाबत खान को यह जिम्मेदारी सौंपी। निकोलो मानुची ने अपनी किताब में शाहजहां के सेनापति या रानी का जिक्र नहीं किया है लेकिन उन्होंने लिखा है कि मुगल जनरल 30 हजार घुड़सवारों और पैदल सेना के साथ गढ़वाल की तरफ कूच कर गया था। गढ़वाल के राजा (यानि रानी कर्णावती) ने उन्हें अपनी सीमा में घुसने दिया लेकिन जब वे वर्तमान समय के लक्ष्मणझूला से आगे बढ़े तो उनके आगे और पीछे जाने के रास्ते रोक दिये गये। गंगा के किनारे और पहाड़ी रास्तों से अनभिज्ञ मुगल सैनिकों के पास खाने की सामग्री समाप्त होने लगी। उनके लिये रसद भेजने के सभी रास्ते भी बंद थे। 
          मुगल सेना कमजोर पड़ने लगी और ऐसे में सेनापति ने गढ़वाल के राजा के पास संधि का संदेश भेजा लेकिन उसे ठुकरा दिया गया। मुगल सेना की स्थिति बदतर हो गयी थी। रानी चाहती तो उसके सभी सैनिकों का खत्म कर देती लेकिन उन्होंने मुगलों को सजा देने का नायाब तरीका निकाला। रानी ने संदेश भिजवाया कि वह सैनिकों को जीवनदान देन सकती है लेकिन इसके लिये उन्हें अपनी नाक कटवानी होगी। सैनिकों को भी लगा कि नाक कट भी गयी तो क्या जिंदगी तो रहेगी। मुगल सैनिकों के हथियार छीन दिये गये थे और आखिर में उनके एक एक करके नाक काट दिये गये थे। कहा जाता है कि जिन सैनिकों की नाक का​टी गयी उनमें सेनापति नजाबत खान भी शामिल था। वह ​इससे काफी शर्मसार था और उसने मैदानों की तरफ लौटते समय अपनी जान दे दी थी। उस समय रानी कर्णाव​ती की सेना में एक अधिकारी दोस्त बेग हुआ करता था जिसने मुगल सेना को परास्त करने और उसके सैनिकों को नाक कटवाने की कड़ी सजा दिलाने में अहम भूमिका निभायी थी। यह 1640 के आसपास की घटना है।
           कुछ इतिहासकार रानी कर्णावती के बारे में इस तरह से बयां करते हैं कि वह अपने विरोधियों की नाक कटवाकर उन्हें कड़ा दंड देती थी। इनके अनुसार कांगड़ा आर्मी के कमांडर नजाबत खान की अगुवाई वाली मुगल सेना ने जब दून घाटी और चंडीघाटी (वर्तमान समय में लक्ष्मणझूला) को अपने कब्जे में कर दिया  तब रानी कर्णावती ने उसके पास संदेश भिजवाया कि वह मुगल शासक शाहजहां के लिये जल्द ही दस लाख रूपये उपहार के रूप में उसके पास भेज देगी। नजाबत खान लगभग एक महीने तक पैसे का इंतजार करता रहा। इस बीच गढ़वाल की सेना को उसके सभी रास्ते बंद करने का मौका मिल गया। मुगल सेना के पास खाद्य सामग्री की कमी पड़ गयी और इस बीच उसके सैनिक एक अज्ञात बुखार से पीड़ित होने लगे। गढ़वाली सेना ने पहले ही सभी रास्ते बंद कर दिये थे और उन्होंने मुगलों पर आक्रमण कर दिया। रानी के आदेश पर सैनिकों के नाक काट दिये गये। नजाबत खान जंगलों से होता हुआ मुरादाबाद तक पहुंचा था। कहा जाता है कि शाहजहां इस हार से काफी शर्मसार हुआ था। शाहजहां ने बाद में अरीज खान को गढ़वाल पर हमले के लिये भेजा था लेकिन वह भी दून घाटी से आगे नहीं बढ़ पाया था। बाद में शाहजहां के बेटे औरंगजेब ने भी गढ़वाल पर हमले की नाकाम कोशिश की थी।
    यह थी गढ़वाल की रानी कर्णावती की कहानी जो कुछ किस्सों और इतिहासकारों विशेषकर विदेश के इतिहासकारों की पुस्तकों से जुटायी गयी हो। इससे भी इतर कुछ किस्से हो सकते हैं। यदि आप जानकारी रखते हों तो कृपया जरूर शेयर करें। घसेरी को इंतजार रहेगा।
   
 आपका धर्मेन्द्र पंत

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शनिवार, 10 जनवरी 2015

मालवा का राजकुमार बना गढ़वाल का राजा कनकपाल

                                              धर्मेन्द्र मोहन पंत 
           ढ़वाल में सबसे लंबे समय तक पंवार वंश के राजाओं ने राज किया। इस राजघराने के पहले राजा कनकपाल थे लेकिन उन्होंने कब से कब तक राज किया। इसको लेकर इतिहास की तमाम किताबों में अलग अलग राय है। अंग्रेज इतिहासकार बैकेट ने गढ़वाल के राजाओं की जो सूची तैयार की उसके अनुसार कनकपाल सन 1159 में परगना चांदपुर आये थे। यह परगना उन्हें गढ़वाल के तत्कालीन राजा ने दहेज में दिया था। डा. पातिराम पंवार के अनुसार कनकपाल सन 688 यानि संवत 745 में मालवा से गढवाल आये थे। गढ़वाल के इतिहास पर गहन अध्ययन करने वाले भक्त दर्शन ने इसे ईस्वी सन 888 यानि संवत 945 माना है। पंडित हरिकृष्णा रतूड़ी ने अपनी दो किताबों में विरोधाभासी तिथियों का वर्णन किया है। अपनी किताब 'गढ़वाल दर्शन' में उन्होंने लिखा है कि कनकपाल 688 ईस्वी सन में गढ़वाल आये थे जबकि 'गढ़वाल का इ​तिहास में उन्होंने इसे 888 ईस्वी सन बताया है।  भक्त दर्शन का शोध अधिक विश्वसनीय माना जा सकता है क्योंकि उन्होंने अपनी किताब में पंवार वंश के 37वें राजा से लेकर सभी राजाओं के बारे में ​अच्छी जानकारी जुटायी थी।

अधिकतर का मत यही है कि राजा कनकपाल ने ईस्वी सन 888 यानि
संवत 945 से गढ़वाल पर राज किया था। 

               कुछ इतिहासकार पंवार वंश का सीधा संबंध पांडवों से जोड़ते हैं। कहा जाता है कि परीक्षित की चौदहवीं पीढ़ी के क्षेमराज दिल्ली के राजा बने लेकिन उनके मंत्री विसर्प ने राजा को मरवाकर खुद सिंहासन हासिल कर लिया था। राजा क्षेमराज की पत्नी तब गर्भवती थी। वह अपनी विश्वासपात्र दासी के साथ रात को महल से भाग गयी थी और कई कष्ट सहते हुए बद्रीकाश्रम पहुंचकर ऋषियों के शरण में आ गयी। रानी ने वहां एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम राजपाल रखा गया गया। तब उस क्षेत्र में कोई राजा नहीं था और ऋषियों ने राजपाल को शस्त्र और शास्त्र विद्या में निपुण बनाकर उसे क्षेत्र का राजा बना दिया। कहा जाता है कि राजपाल ने तब बद्रीनाथ की यात्रा पर आये किसी विक्रमसिंह नाम के राजा की मदद से कुमांऊ के राजा सुखवंत को परास्त किया था। राजपाल का पुत्र अनंगपाल था जिसकी केवल एक पुत्री थी। अनंगपाल ने अपनी बेटी के पुत्र पृथ्वीराज को अपना उत्तराधिकारी बनाया। इन्हीं पृथ्वीराज की पीढ़ी में भानुप्रताप हुआ था जो 52 गढों के राजाओं में सबसे शक्तिशाली था। बद्रीनाथ का राजा होने के कारण सभी उन्हें धार्मिक दृष्टि से भी ऊंचा मानते थे। भानुप्रताप की भी दो पुत्रियां थी जिनमें से बड़ी बेटी का विवाह उन्होंने कुमाऊं के राजा से किया जबकि दूसरी पुत्री की शादी राजा कनकपाल से की थी।
       राजा कनकपाल के गढ़वाल आगमन की कहानी भी रोचक है। वह मालवा के राजकुमार थे। उस समय उज्जैन और धार क्षेत्र में पंवार वंश का राज्य था। ब्रिटिश इतिहासकार हार्डविक के अनुसार कनकपाल वर्तमान गुजरात क्षेत्र से गढ़वाल आया था। उसका नाम तब भोगदंत था और वह  चांदपुर के राजा सोन पाल की सेना में भर्ती हुआ और बाद में सेनापति बन गया। राजा ने अपनी कन्या का विवाह उससे किया। भोगदंत बेहद वीर और साहसी था। उसने बाद में राजा को गद्दी से उतारा और स्वयं कनकपाल नाम से राजा बन गया था। एक और अंग्रेज इतिहासकार जीआरसी विलियम के अनुसार कनकपाल गुजरात से नहीं बल्कि मालवा से आया था और वह गढ़वाल पहुंचने से पहले सहारनपुर में बसा था। एक और किस्से के अनुसार कनकपाल धार के राजा वाकपति का छोटा भाई था लेकिन एक ब्रहमचारी साधु से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उसके मन में वैराग्य आ गया। जब उसके गुरू का निधन हो गया तो वह अपने कुछ मित्रों के साथ हरिद्वार पहुंचा। वह बद्रीनाथ धाम भी जाना चाहता था लेकिन पहाड़ों के कठिन रास्तों के कारण मित्रों ने उसे रोक दिया।
           एक पौराणिक ग्रंथ के अनुसार राजा भानुप्रताप को तब भगवान बद्रीनाथ ने सपने में कहा कि  वह धार नरेश को अपने यहां बुलायें और उनके साथ अपनी बेटी का विवाह कर दें। राजा भानुप्रताप ने ऐसा ही किया लेकिन कनकपाल तो वैरागी था। कहा जाता है कि जब कनकपाल ने राजकुमारी को देखा तो उन्हें देखते ही रह गया और उनके रूप लावण्य पर इतने मोहित हो गया कि उसने विवाह के लिये हां कर दी। भानुप्रताप जब वृ​द्ध हो गये तो वह अपने दामाद को राजपाट सौंपकर अपनी पत्नी सहित वानप्रस्थ पर चले गये थे। इस तरह से गढ़वाल में पंवार वंश की नींव पड़ी थी।
      किस्से और कहानियां भले ही अलग अलग हों लेकिन सभी एक बात से सहमत दिखते हैं और वह यह कि पंवार वंश का पहला राजा कनकपाल था। इसके अलावा इस पर भी सहमति दिखती है कि वह मालवा क्षेत्र से आया था जो कि वर्तमान समय के राज्यों मध्यप्रदेश के पश्चिम, गुजरात के पूर्व और राजस्थान के दक्षिण के हिस्से को मिलकर बनता है।
       गढ़वाल में पंवार वंश की शुरूआत का यह संक्षिप्त विवरण है। इससे इतर भी किस्से और कहानियां हो सकती है। यदि आपको इससे जुड़ा कोई भी पौराणिक तथ्य, किस्सा या कहानी पता हो तो कृपया जरूर शेयर करें।

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