शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

खिचड़ी के बहाने गिंजड़ी की याद

    खिचड़ी भी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन सकती है यह लोकतांत्रिक देश भारत में ही संभव है। लेकिन भला हो खिचड़ी का जिसके बहाने मुझे गिंजड़ी की याद आ गयी। गिंजड़ी ही नहीं बाड़ी, पल्यो, छछिन्डु सब जेहन में घूम गये। बचपन में कभी न कभी इनका स्वाद जरूर लिया है। खिचड़ी को पौष्टिकता से भरपूर गिंजड़ी बनाना तो कोई हम पहाड़ियों से सीखे। हमें 'बाड़ी खैंडणा' भी आता है और 'पल्यो सपोड़ना' भी। हमारी नयी पीढ़ी जरूर इनसे अनभिज्ञ है इसलिए आज मैं उनका अपनी 'घसेरी' के जरिये '​गिंजड़ी' और ' बाड़ि या बाड़ी' से परिचय करवा रहा हूं। 
      भारत में खिचड़ी क्षेत्र के हिसाब से अलग अलग तरीके से बनायी जाती है और इसलिए गिंजड़ी भी खि​चड़ी का ही एक रूप है। गढ़वाल में गिंजड़ी को गिंजड़ु, गिंजड़ू, गिंजड़ो आदि नामों से भी जाना जाता है। यह सदियों से पहाड़ के व्यंजनों में शामिल है। बेहद पौष्टिक है और खिचड़ी के भी गुण इसमें समाये होते हैं। गिंजड़ी मैंने बचपन में खायी थी। मां बनाती थी क्योंकि दादी ने अपने बच्चों को गिंजड़ी काफी खिलायी थी और मैंने पिताजी को कई बार मां से कहते सुना कि 'आज गिंजड़ी या फिर बाड़ी खाने का मन कर रहा है।' कई बार हमें न चाहते हुए गिंजड़ी या बाड़ी खानी पड़ी लेकिन ऐसे मौके बहुत कम आये। अब जरूर मन करता है कि काश वे मौके बार बार आते। 


     बहरहाल अब बात इस पर करते हैं कि गिंजड़ी कैसे बनायी जाती है। इसको बनाना भी खिचड़ी की तरह आसान है। बस अंतर यह है कि खिचड़ी के लिये चावल की जरूरत होती है और गिंजड़ी झंगोरा (झंगोरा के बारे में पढ़ने के लिये क्लिक करें — झंगोरा : बनाओ खीर या सपोड़ो छांछ्या) से बनायी जाती है। गिंजड़ी को झंगोरा के साथ काले भट और इसी तरह की अन्य पहाड़ी दालों को मिलाकर बनाया जाता है। खिचड़ी सूखी भी हो सकती है लेकिन गिंजड़ी सूखी हो तो फिर मजा नहीं। मैंने चाचाजी श्री हरिराम पंत से जब गिंजड़ी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि बजरू (बाजरा) की ब​हुत अच्छी गिंजड़ी बनती है। सुना है कि एक बार सरकार ने पहाड़ों में अन्न के नाम पर बाजरा का खूब वितरण किया था और शायद तभी से वहां के लोगों ने इससे गिंजड़ी बनाना सीखा होगा। बाजरा को उरख्यालु (ओखली) में कूट कर उसका बाहर का छिलका बा​हर निकाल दिया जाता है और ​अंदर वाले दानों के साथ दालें मिलाकर गिंजड़ी तैयार कर दी जाती है। वैसे चावल और विभिन्न तरह की दालों को एक साथ मिलाकर बने पकवान को भी गिंजड़ी या गिंजोड़ो कहा जाता है। 

बाड़ी खैंडणू


      ये तो रही बात गिंजड़ी की लेकिन मैंने पहले कहा था कि आपका आज 'बाड़ी' से भी परिचय कराऊंगा तो अब बात की जाए इस विशेष पहाड़ी व्यंजन की। बाड़ी मंडुआ के आटे (चूनो या चूनू) से तैयार किया जाता है और इसे खास तौर पर मसफ्वड़ी (काली दाल पीस बनाया जाने वाला व्यंजन) के साथ खाया जाता है। बाड़ी बनाने के लिये पहले पानी उबाला जाता है। इसके ऊपर शुरू में थोड़ा सा चूनो डाल दिया जाता है जिसे 'छापड़' कहते हैं। जब पानी खौलने लग जाए तो उसमें मंडुआ का आटा डाला जाता है। ​फिर इसे लगातार 'दबळु' (लकड़ी का बना एक विशेष तरह का गोलाकार वस्तु) से घुमाया जाता है। इसी को गढ़वाल में 'बाड़ी खैंडणू' यानि बाड़ी घोटना कहा जाता है। चाचाजी ने बताया कि दादी कहती थी कि बाड़ी तब तक घोटना चाहिए जब तक उसमें गैस के बुलबुले नहीं फूट जाएं। छोटी चाचीजी श्रीमती मनोरमा पंत को बाड़ी खाने का बहुत शौक है और वह दिल्ली में रहकर भी बाड़ी बनाती है और दबळु की जगह पर बेलन का उपयोग करती हैं। कुछ लोग मीठा बाड़ी भी बनाते हैं। अंतर इतना है कि इसे गुड़ के खौलते पानी में मंडुवे का आटा डालकर तैयार किया जाता है। इसे मंडुवे के आटे का हलवा भी कहा जाता है।
     ये तो थी गिंजड़ी और बाड़ी की बात। कैसा लगा आपको इसका स्वाद। बताना जरूर। गिंजड़ी और बा​ड़ी खाने के लिये तो 'घसेरी' आपका मेहमान बनने के लिये भी तैयार है। 'घसेरी' से अपना प्यार बनाये रखिये। आपका धर्मेन्द्र पंत  

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गुरुवार, 28 सितंबर 2017

गढ़वाली शादियों में गीत—गाली

पहाड़ी शादियों में मुख्य तौर पर बारात पहुंचने, धूलि अर्घ, गोत्राचार और बेदि के समय मांगल गीत के साथ गाली गीत भी गाये जाते हैं।  
     पिछले दिनों  मैंने फेसबुक पर गाली को लेकर एक पोस्ट लिखी थी। गाली क्यों दी जाती है कई टिप्पणियां मिली थी। इनमें से एक टिप्पणी मेरे मित्र प्रकाश पांथरी की थी। उन्होंने लिखा था, ''यह निर्भर करता है कि गाली को किस तरह से लिया जाए .... शादियों में भी हमने वधु पक्ष की तरफ से वर पक्ष का गालियों से स्वागत करते हुए देखा है। यह परंपरा है हमारे यहां। धर्मी (धर्मेन्द्र) समझ गया न मैं क्या बात कर रहा हूं।'' 
     प्रकाश की इस टिप्पणी ने वास्तव में पुराने दिनों की यादें ताजा कर दी। यह सत्तर और अस्सी के दशक की बात है जब लड़की की शादी में गांव की उसकी सहेलियां वर पक्ष के लोगों को गाली (गढ़वाली में गाळि) देती थी। ऐसी गाली जिसको सुनकर वर पक्ष के लोगों के चेहरों पर गुस्सा नहीं बल्कि मुस्कान तैर जाती। प्यार और छेड़खानी से भरी चुटीली गालियां जो गीत के रूप में दी जाती हैं। स्वर एक लय में बहता है, जिसमें शरारत और हास्य छिपा होता है। गढ़वाली से लेकर हिन्दी में गालियां देने का प्रचलन रहा है, लेकिन अधिकतर गालियां स्थानीय भाषा में ही होती हैं। दूल्हे से लेकर, दूल्हे के पिता, वर पक्ष के पंडित, दूल्हे के साथियों हर किसी के लिये शादी की विभिन्न परंपराओं के अनुसार दी जानी वाली गालियां। क्रोध में दी गयी गालियों में प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाया जाता है लेकिन शादी में दी जाने वाली गालियां उमंग और अनुराग में दी जाती हैं तथा यह आपकी आपसी घनिष्ठता और प्रेम की प्रतीक होती हैं। दूल्हा और दुल्हन पक्ष एक दूसरे से अमूमन अजनबी होते थे और एक समय इस अजनबीपन को दूर करने में अहम भूमिका निभाती थी गालियां। उत्तराखंड ही नहीं पूरे भारतवर्ष में बैशाखी और विजयादशमी के दिन बहुत शादियां होती हैं। मतलब अब शादियों का मौसम आ गया है तो फिर देर किस बात की। आज 'घसेरी' में चर्चा करते हैं गढ़वाल की शादियों में जाने वाली प्यार से भरी गालियों की। 
       उत्तराखंड ही नहीं भारत वर्ष के कई प्रांतों में शादियों में मजाक में गालियां देने की परंपरा है। हर जगह महिलाएं ही गाली देती हैं। एक तरह से वह इन गालियों के जरिये अपने मन की भड़ास भी निकालती हैं। शादियों में मजाक में गालियां देने की परंपरा तो सदियों पुरानी है। यहां तक कि भगवान राम जब बारात लेकर मिथिला गये तो वहां सीता की सहेलियों और अन्य महिलाओं ने दूल्हे राम से भी चुहलबाजी की थी। कुछ इस तरह से 'दशरथ गोरा, कौशल्या गोरी, फिर आप काले क्यों हो गये .....।' मिथिलांचल में अब भी शादियों में गाली देने परंपरा है। वहां अक्सर निशाने पर समधी यानि दूल्हे का पिता होता है। मसलन 'चटनी चूरी, चटनी पूरी, चटनी है लंगूर की। खाने वाला समधी मेरा, सूरत है लंगूर की।'' 


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      अब मैं फिर से गढ़वाल की शादियों में दी जाने वाली गालियों की बात आगे बढ़ाता हूं। दूल्हे के लिये सालियों की गालियां तो बारात के स्वागत से ही शुरू हो जाती हैं। कहा भी जाता है कि साली की गाली हमेशा मीठी होती है तो फिर बुरा किसे लगेगा। बारात आने पर विवाह की पहली परंपरा धूळि अर्घ यानि धूलि अर्ग्य होता है जिसमें वधू का पिता वर और वर पक्ष के ब्राह्मण का आदर सत्कार करता है। यहां पर दूल्हा, दूल्हे का पिता और उसके पक्ष का पंडित इन गाली गीतों में निशाने पर होते हैं। वैसे इस तरह की गालियां विवाह प्रक्रिया के किसी भी मौके पर जैसे कि धूलि अर्घ, गोत्राचार, बेदि (विवाह मंडप) के समय दी जाती हैं। हम यहां पर सबसे पहले दूल्हे के पिता और बामण को दी जाने वाली गालियों पर गौर करते हैं। 
     अगर दूल्हे के पिता नजर नहीं आ रहे हों या वर पक्ष का पंडित पहुंचने में देरी कर रहा हो तो फिर गालियों से उनका पूजन होने में देर नहीं लगती। 
      हमारा गांऊ कुकर भुक्युं च, ब्यौला कु बुबा कुणेठु लुक्यूंच
      हमारा गांऊ कुकर भुक्युं च, ब्यौला कु बामण उबुर लुक्यूंच
                     या
      हमारा गौं म माचिस कु डब्बा, ब्यौला कु बामण ब्यौला कु बबा। 
अगर दूल्हे के पिता ने अनसुनी कर दी तो फिर गाली गीत गाने वाली महिलाएं कहां चुप बैठने वाली होती हैं। 
      हमारा गौं मा डाळ बैठो गूणी, 
      ब्यौला क बुबा टक्क लगैकि सूणी। 
    और अगर दूल्हे के पिता ने मजाक में भी मुंह खोल दिया तो फिर तब भी बेचारे की खैर नहीं। कुछ इस तरह ....
        हमर गौ मा खिनो कु खांभ, ब्यौला का बुबा थ्वरड़ो सि रांभ। 
     मूंछ को मर्द की शान माना जाता है और अगर दूल्हे के पिता के मूंछ नहीं तो इसके लिये भी उन्हें चिढ़ाया जाता है। एक बानगी देखिये। 
     हमारा गौं मा आयु च घाम, ब्यौला का बुबा का जूंगा नी जाम। 
     जमणो को जामी छयो जाम, ब्यौला की फूफून मुछ्यालून डाम।। 
    वर पक्ष की तरफ से विवाह संपन्न कराने वाले पंडित जी ने थोड़ी चूक या ज्यादा होशियारी दिखायी कि उसे वहीं पर टोक दिया जाता है। कुछ इस तरह से .... 
      छि भै ब्यौला तु बामण नि ले जाणु रे.....। 
    इस बीच वधू पक्ष के गांव के लड़कों का काम होता है कि वे बारातियों का आदर सत्कार करें। दूल्हे के दोस्त भी इन गालियों का जवाब अपनी तरफ से देने की भी कोशिश करते हैं, लेकिन लड़कियों के सामने उनकी क्या बिसात। लड़कों का मुंह खुला कि लड़कियां इस तरह से तैयार कि लड़कों की चाय की चुस्की मुंह में अटक के रह जाए ..... 
       आलू काटे, बैंगन काटे, आलू की तरकारी जी
       हमर भयूं न चाय बणायी कुकुरू न सड़काई जी।
      इस बीच दुल्हन की सहेलियां दू्ल्हे की बहनों का नाम जानने की भी कोशिश करती थी ताकि वे दीदी भुलि कहने के बजाय नाम लेकर दूल्हे का गाली दे सकें। अब तो महिलाएं भी शादियों में जाती हैं लेकिन पहले ऐसा कम देखने को मिलता था। स्वाभाविक है समय के साथ गालियों का स्वरूप भी बदला है। अब इस गाली को ही देखिये.... 
         हमारा गौं म बसि जाली कुकड़ी, ब्यौला की भुलि लगणि छ मकड़ी। 
     अब तो गांवों में भी दिन दिन की शादियां होने लगी हैं। वरमाला का चलन चल पड़ा है इसलिये धूलि अर्घ को ज्यादा समय नहीं दिया जाता। बेदि भी आनन फानन में ही निबटा दी जाती है। पहले रात घिरने पर बारात दुल्हन के घर पहुंचती थी। बारातियों का आदर सत्कार होता था और फिर रात भर महफिल जमती थी। अधिकतर रात में ही या सुबह की बेला में गोत्राचार संपन्न होता था और फिर दिन में दस बजे के बाद किसी भी समय बेदि। यह इस पर निर्भर करता था कि बारात कितने दूर से आयी है। अनुराग और उमंग से भरी इन गालियों का असली समां तो बेदि में बंधता था। 
      बेदि में ही सात फेरे भी होते हैं। इस बीच सहेलियां दुल्हन का पूरा हौसला बनाये रखती हैं। 
         शाबाश दगड्या हार न जैई,
          तै ब्यौला का ल्याचा लगैई । 
       दूल्हे का यहां पर गालियों में काफी पूजन होता है। जब वह फेरे ले रहा होता है तो उसे इस तरह से चिढ़ाया जाता है। 
       फ्यारा ​फिरीलो भुलि का दगड़
        फ्यारा ​फिरीलो दीदी का दगड़ । 
                और 
        हमारि दगड्या त देखि कमाल,
         फुुंडु सरक ब्यौला, लाळु संभाल। 
      दूल्हे और दुल्हन को इस बीच कई तरह की रस्में निभायी जाती हैं। एक दूसरे को जूठन खिलाने, अंगूठा पकड़ने, कंगड़ तोड़ने से लेकर दुल्हन के भाई का सुफु में खील डालने तक। इन सभी अवसरों के लिये भी गालियां हैं। अब कंगड़ तोड़ने वाली रस्म को ही लीजिए। इस रस्म में दूल्हे और दुल्हन को एक दूसरे के कंगड़ तोड़ने पड़ते हैं। दुल्हन नहीं तोड़ पाये तो काेई बात नहीं। उसे कैंची सौंप दी जाती थी लेकिन दूल्हे के लिये तो यह नाक का सवाल बन जाता है। आखिर यह उसकी मर्दानगी का सवाल होता है। इसलिए वधु पक्ष वाले दुल्हन के कंगड़ को काफी मोटा और मजबूत बना देते हैं। पहले तो कुछ शादियों में यह भी देखने को मिला जबकि कंगड़ के बीच में लोहे का तार लगा दिया गया। इसके हालांकि दुष्परिणाम भी देखने को मिले। बहरहाल हम कंगड़ तोड़ने के समय दी जाने वाली गालियों की बात करते हैं। 
      दूल्हा जब कंगड़ तोड़ने की कोशिश करता है तो दुल्हन की सहेलियां उसे उकसाती भी हैं और चिढ़ाती भी हैं। 
         तोड़ ब्यौला कंगड़—मंगड़, तेरि भुलि त्वेकु मंगड़ 
         तोड़ ब्यौला कंगड़—मंगड़, तेरि दीदी त्वेकु मंगड़ ।
      बात यहीं पर नहीं रूकती। दूल्हे को वे चुनौती देती हैं और कहती हैं कि अगर कंगड़ नहीं तोड़ पाये तो फिर उसे खाली हाथ ही घर जाना पड़ेगा। 
        तोड़ ब्यौला ब्यौली कु कंगड़, तेरि दीदी त्वेकु मंगड़
        तोड़ि नि सकिलु तेरि हार, वापिस जैलु खालि घार। 
     और इन सबके बीच दुल्हन की मां की तरफ से दूल्हे और उसके पिता से एक आग्रह भी होता है। दुल्हन की मां के इन उदगार को भी गांव की लड़कियां ही बयां करती हैं। 
      छ्वटी बटै कि बड़ि बणाई सैंती पालि की, ईं नौनी थै रख्यां म्यरा समधि संभालि कि,
      छ्वटी बटै कि बड़ि काई सैंती पालि की, ये फूल थै रख्यां म्यरा जवैं संभालि कि ।। 
    उत्तराखंड में जगह चाहे गढ़वाल हो, कुमांऊ या जौनसार विवाह के अवसर पर गाये जाने वाले गाली गीतों की परंपरा काफी पुरानी है। कभी कभी कुछ लोगों ने इसका विरोध किया लेकिन यह हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं और अगर यह हास्य, प्रेम, अनुराग से जुड़ी हैं तो इनमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती। अगर आपको भी इस तरह के कुछ गीत याद हैं तो जरूर साझा करें। 
आपका धर्मेन्द्र पंत
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शनिवार, 5 अगस्त 2017

लोकभाषाओं को लेकर मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को खुला खत

माननीय मुख्यमंत्री जी,
     पिछले दिनों के आपके दो ट्वीट पढ़ने को मिले और तभी से मेरा मन था कि आपके साथ इस विषय पर संवाद करूं। मैं पौड़ी गढ़वाल जिले के स्योली गांव का मूल निवासी हूं लेकिन फिलहाल नयी दिल्ली में बसा हुआ हूं। पेशे से पत्रकार हूं और वर्तमान में समाचार एजेंसी पीटीआई भाषा में कार्यरत हूं। यह मेरा संक्षिप्त परिचय है। महोदय, आपने दोनों ट्वीट में स्थानीय बोली या भाषा में लोगों से संवाद करने की बात की है। मुझे आपके ट्वीट से महान नेल्सन मंडेला का कथन याद आ गया। उन्होंने कहा था, ‘‘अगर आप किसी व्यक्ति से उस भाषा में बात करते हैं जिसे वह समझता है तो वह उसके केवल दिमाग तक जाएगी लेकिन यदि आप उस से उसकी भाषा में बात करते हैं तो वह उसके दिल तक जाएगी।’’ स्वाभाविक है कि जब स्थानीय भाषा में लोगों से बात करेंगे तो वह उनके दिलों तक जाएगी। 
    आपके ट्वीट से यह भी स्पष्ट होता है कि आप स्थानीय लोकभाषाओं पर मंडरा रहे खतरे को लेकर चिंतित हैं। असल में जिस तरह से गढ़वाली, कुमांउनी, जौनसारी आदि उत्तराखंड की तमाम भाषाओं को बोलने वाले लोगों की संख्या में कमी आ रही है तो चिंताग्रस्त होना स्वाभाविक है और मुझे खुशी है कि आप इसके प्रति गंभीर हैं। 
     भैजी मुझे लगता है कि इस संदर्भ में सबसे पहले हमें अपनी लोकभाषाओं के बारे में जानना और फिर उन पर मंडरा रहे खतरों के कारणों का पता लगाना जरूरी है। विश्व भर में स्थानीय भाषाओं पर मंडरा रहे खतरे से यूनेस्को से लेकर भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण तक में चिंता जतायी है। भारत में 1961 की जनगणना में 1652 भाषाओं का जिक्र किया गया है लेकिन 2001 की जनगणना में केवल 122 भाषाओं के बारे में ही बताया गया है। आज ही मैंने एक हिन्दी दैनिक में खबर पढ़ी कि देश की 400 भाषाएं अगले 50 वर्षों में खत्म हो जाएंगी और अचानक ही दिमाग में अपने उत्तराखंड की भाषाएं तैरने लगी। 


      रावत जी आपने एक पुरानी कहावत सुनी होगी ‘‘कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बाणी।’’ उत्तराखंड में यह अक्षरशः लागू होती है। यहां भाषाओं की भरमार है लेकिन देश भर की 800 से अधिक भाषाओं पर सर्वे करने वाली सरकारी संस्था ‘पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इंडियन लैंग्वेज’ यानि पीएलएसआईएल ने इसमें उत्तराखंड की 13 भाषाओं को स्थान दिया था। ‘भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण’ में भी इन 13 भाषाओं को ही रखा गया है। इन भाषाओं में गढ़वाली, कुमांउनी, जौनसारी, जौनपुरी, रवांल्टी, बंगाणी, जाड़, जोहारी, बुक्साणी, राजी, मार्च्छा, थारू और रंघल्वू शामिल हैं। यूनेस्को ने एक सारणी तैयार की थी जिसमें विश्व की उन सभी भाषाओं को शामिल किया था जो असुरक्षित हैं या जिन पर खतरा मंडरा रहा है। उत्तराखंड की दो प्रमुख भाषाओं गढ़वाली और कुमांउनी को इसमें ‘असुरक्षित’ वर्ग में रखा गया था। जौनसारी और जाड़ जैसी भाषाएं ‘संकटग्रस्त’ जबकि बंगाणी ‘अत्याधिक संकटग्रस्त’ की श्रेणी में आ गयी। अगर वर्तमान स्थिति नहीं बदली तो हो सकता है कि आने वाले 10—12 वर्षों में ही बंगाणी लोकभाषा खत्म हो जाए। भोटान्तिक भाषाएं जैसे जोहारी, मार्च्छा व तोल्छा, जाड़ आदि ‘संकटग्रस्त‘ बन गयी हैं। राजी तो लगभग खत्म होने के कगार पर है। गढ़वाली और कुमांउनी उत्तराखंड की प्रमुख भाषाएं हैं लेकिन इन दोनों पर हिन्दी और अंग्रेजी पूरी तरह से हावी हैं। ऐसे में बाकी भाषाओं की स्थिति अधिक दयनीय बन गयी है। 
     यूनेस्को के अनुसार, ‘‘यदि किसी भाषा को तीन पीढ़ी के लोग बोलते हैं तो वह सुरक्षित है, यदि दो पीढि़यां बोल रही हैं तो वह संकट में है और यदि केवल एक पीढ़ी बोल रही है तो उस भाषा पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।’’ इस कसौटी पर अगर हम उत्तराखंड की भाषाओं को रखते हैं तो स्थिति गंभीर है और अपनी अगली पीढ़ी को अगर अब भी हमने अपनी भाषाओं के प्रति जागरूक नहीं किया तो फिर आगे हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाएंगे। 
    भैजी सबसे बड़ा सवाल यह है कि उत्तराखंड की लोकभाषाएं अगर ''संकटग्रस्त'' बनीं तो क्यों? आपको याद होगा ​कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन का मुख्य मुद्दा था ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी’ को पहाड़ में रोकना है लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। उत्तराखंड राज्य के गठन से पहले ही पहाड़ के गांव खाली होने शुरू हो गये थे। उत्तराखंड की भाषाएं आज अगर संकट से गुजर रही हैं तो उसका सबसे बड़ा कारण है पलायन है। सबसे पहले आपको पलायन रोकने और शहरों में बस चुके पहाड़ियों को गांवों की तरफ आकर्षित करने के लिये ठोस कदम उठाने होंगे। पलायन के पीछे रोजगार बड़ा कारण है और सचाई यह है कि अब तक उत्तराखंड में स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने के सरकार की तरफ से कोई विशेष प्रयास नहीं किये गये। बेहतर शिक्षा और चिकित्सा का अभाव भी एक कारण है जिसके लिये लोग दिल्ली, देहरादून, मुंबई जैसे शहरों में बस गये तथा नयी पीढ़ी के लिये गढ़वाली, कुमांउनी, जौनसारी आदि अपनी भाषा पीछे छूट गयी। लोगों के दिमाग में यह बात बैठ गयी है कि यदि हम अपने बच्चों को अपनी भाषा सिखाते हैं तो वे पिछड़ जाएंगे। इसके लिये अब आपको खुद अपनी भाषाओं का 'ब्रांड एंबेसडर' बनना होगा। आपको लोगों को अपने घरों में स्थानीय भाषा में बात करने के लिये प्रेरित करना होगा। जैसा कि आपने अपने ट्वीट में कहा है, अगर आप उस पर पूरी तरह से अमल करते हैं तो लोगों को भी इससे प्रेरणा मिलेगी। लोगों के दिमाग में यह बात बिठानी होगी कि अपनी भाषा में बात करना हीन भावना नहीं बल्कि सम्मान की बात है। यह संदेश घर घर तक पहुंचाने में आप अहम भूमिका निभा सकते हैं। 
    मुख्यमंत्री जी उम्मीद है कि आपको यह पत्र उबाऊ नहीं लग रहा होगा। लेकिन भैजी यह गंभीर विषय है क्योंकि जब भाषा जिंदा रहती है तो उसके साथ भूगोल, इतिहास, संस्कृति, सरोकार, कृषि, बागवानी, पशुपालन, परंपराएं, पूरी संस्कृति और सामाजिक सरोकार भी जिंदा रहते हैं। भाषा बदलने के कारण पहाड़ की संस्कृति और परंपराएं भी प्रभावित हो रही हैं। 
    उत्तराखंड की भाषाओं को बचाने के लिये कहा जा रहा है कि इसे पाठ्यक्रम में शामिल कर देना चाहिए। मैं भी इस कदम का समर्थक हूं। यूनेस्को की महानिदेशक इरिना बुकोवा का कहना है कि ‘‘अच्छी शिक्षा के लिये मातृभाषा जरूरी अवयव है जो असल में महिलाओं ओर पुरुषों के साथ उनके समाज को भी मजबूत बनाने की नींव है।’’ पिछले साल मैंने अपने ब्लॉग में उत्तराखंड की भाषाओं पर लिखा था तो सवाल उठे थे कि क्या इन लोकभाषाओं को भाषा कहना सही होगा क्योंकि यह भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं हैं और इसकी लिपि भी नहीं है। मैंने तब पीपुल्स लिंगुइस्टिक सर्वे के संयोजक गणेश देवी के एक बयान का सहारा लिया था। उन्होंने कहा था, ‘‘जिसकी लिपि नहीं है उसे बोली कहने का रिवाज है। इस तरह से तो अंग्रेजी की भी लिपि नहीं है। उसे रोमन में लिखा जाता है। किसी भी लिपि का उपयोग दुनिया की किसी भी भाषा के लिये हो सकता है। जो भाषा प्रिंटिंग टेक्नोलोजी में नहीं आयी, वह तो तकनीकी इतिहास का हिस्सा है न कि भाषा का अंगभूत अंग। इसलिए मैं इन्हें भाषा ही कहूंगा।’’ संविधान भी हमें इन भाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने की छूट देता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350ए में प्राथमिक स्तर पर अपनी भाषा में शिक्षा की सुविधा देने की बात की गयी है। 
    भैजी एक बड़ा सवाल यह भी है कि उत्तराखंड की भाषाओं को यदि पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है तो उन्हें किस तरह से समायोजित किया जाए क्योंकि 13 भाषाओं के अलग अलग नहीं रखा जा सकता है। मुझे इसका एक सरल उपाय लगता है कि तीन मुख्य भाषाओं गढ़वाली, कुमांउनी और जौनसारी को उनके क्षेत्रों के हिसाब से पाठ्यक्रम में शामिल करके उनके ज्यादा करीबी भाषाओं के कुछ अध्याय उसमें शामिल किये जा सकते हैं। पाठ्यक्रम में वहां की संस्कृति, वहां के लोक गीतों, मुहावरों, लोक कथाओं, लोकोक्तियों, किवदंतियों, पहेलियों आदि को शामिल किया जा सकता है। कहने का मतलब है कि पाठ्यक्रम रोचक होना चाहिए। 
    रावत साहब अगर भाषा पाठ्यक्रम का हिस्सा बनती है तो वह रोजगार भी पैदा करेगी। अगर उत्तराखंड की भाषाओं को आप किसी तरह से रोजगार से जोड़ने में सफल रहते हैं तो नयी पीढ़ी खुद ही इन भाषाओं को सीखने का प्रयास करेगी। अभी उत्तराखंड की भाषाओं का सबसे कमजोर पक्ष यही है कि वे रोजगार की भाषाएं नहीं हैं। उनका आर्थिक पक्ष बेहद कमजोर है। हमें अपनी भाषाओं को नयी तकनीकी से भी जोड़ना होगा। हमें स्थानीय भाषाओं की उन विभिन्न पत्र पत्रिकाओं को सहयोग देना होगा जिनमें से अधिकतर आर्थिक संकट के कारण दम तोड़ रही हैं या किसी तरह खींचतान के जिनका प्रकाशन किया जा रहा है। 
   भैजी आखिर में मैं यही कहूंगा कि प्रत्येक भाषा का एक संपूर्ण इतिहास और भूगोल होता है। जब एक भाषा खत्म होती है तो उसे बोलने वाले पूरे समूह का ज्ञान भी लुप्त हो जाता है। इस संपूर्ण ज्ञान को बचाने की जिम्मेदारी अब आपके मजबूत कंधों पर है। हम सब आपके साथ हैं। हमारा सहयोग हमेशा आपके साथ बना रहेगा। शुभकामनाओं सहित। 
                 आपका भुला 
                धर्मेन्द्र पंत 
                एक पलायक पहाड़ी 
           ‘‘दशा और दिशा : उत्तराखंड की लोकभाषाएं’’ के लेखक


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सोमवार, 17 जुलाई 2017

सावधान! दबाव में बिखर न जाए कहीं बच्चा

इसमें पहली तस्वीर वरिष्ठ खेल पत्रकार श्री संजीव मिश्रा और दूसरी तस्वीर उत्तराखंड शिक्षा विभाग में कार्यरत श्री कैलाश थपलियाल के फेसबुक पेज से ली गयी है। इन पर गौर करिये, मनन करिये।  

      पिछले दिनों फेसबुक पर दो तस्वीरें देखी जिनसे मन विचलित हो गया। पहली तस्वीर वरिष्ठ खेल पत्रकार और ​मेरे मित्र संजीव मिश्रा ने पोस्ट की थी। यह उनके घर के शौचालय की तस्वीर थी जिस पर उनके बेटे ने त्रिकोणमिति के सूत्र चस्पा कर रखे थे। संजीव ने अपनी पोस्ट के साथ लिखा था, ''सुबह वाशरूम में ट्रिग्नोमैट्रिक टेबल व फाॅर्मूले चिपके देख चौंक गया। हमारे एजुकेशन सिस्टम ने बच्चों को यहां भी फ्री नहीं छोड़ा। पढ़ाई के इस बोझ को कितना जायज माना जाए?'' बेहद गंभीर सवाल जो हमारी शिक्षा व्यवस्था पर करारी चोट करता है। 
    दूसरी तस्वीर मित्र कैलाश थपलियाल ने पोस्ट की थी। पौड़ी गढ़वाल के जयहरीखाल में बस का इंतजार करते बच्चे लेकिन हाथों में किताब लिये कुछ याद करते हुए। कैलाश भाई ने बेहद सटीक शब्दों में पूरी व्यवस्था पर कटाक्ष भी किया था, ''आखिर किस दिशा में जा रही है हमारी आज की शिक्षा। कल जयहरीखाल में अपनी स्कूल की गाड़ी का इंतजार करते हुए परीक्षा रूपी भय से रट्टू तोता बन रहे इन बच्चों को देखकर यही लग रहा है कि आज के समाज में परीक्षा से इतना भय क्यों? जबाब भी आखिर अपुन के ही पास अंतर्मन में ही मौजूद था। कुकुरमुत्तों की तरह उग चुके प्राइवेट स्कूलों ने बच्चों की अच्छे नंबर लाने की प्रतिस्पर्धा को उनके माता-पिता और अभिभावकों के मान-सम्मान से जोड़ दिया है। माता-पिता की बच्चों से अधिक अपेक्षाओं के कारण बच्चों के कोमल दिमाग और शरीर एक असहनीय बोझ से दब कर बच्चों को मानसिक तनाव की ओर ले जा रहे हैं.......।''
   अगर आपने इन तस्वीरों को गौर से देख लिया है तो इन पर विचार करिये। खुद को टटोलिये और खुद से पूछिये कि क्या आपके बच्चे भी इस पीड़ा से गुजर रहे हैं। क्योंकि अन्य देशों की तुलना में भारत में माता पिता बच्चों पर अच्छे अंक लाने का अधिक दबाव बनाते हैं। यहां हर कोई चाहता है कि उसका बच्चा आलराउंडर बने। ऐसे में सफलता हासिल करने के बजाय बच्चे के मनोमस्तिष्क पर पड़ने वाले दबाव से वह नाकामी की तरफ बढ़ने लगता है। बच्चे पर दबाव बनाने से वह कभी पढ़ाई के प्रति प्रेरित नहीं होगा बल्कि वह उससे जी चुराएगा। उनके अंदर असफलता का डर भर जाएगा और ऐसी स्थिति में उसके नाकाम होने की संभावना बढ़ जाएगी। यह मत भूलिये कि भारत में आत्महत्या के दस प्रमुख कारणों में परीक्षा में असफलता भी शामिल है। नाकामी का खौफ बच्चे को खतरनाक कदम उठाने के लिये प्रेरित कर सकता है। 

बच्चे को नकारात्मक और बीमार बनाता है  दबाव 


    अगर आप का बच्चा पढ़ाई से जी चुरा रहा है या खेलने और अन्य कार्यों में भी उसका मन नहीं लग रहा है तो आपको सतर्क होने की जरूरत है। ऐसे में बच्चे के दिमाग में नकारात्मक भाव उत्पन्न हो सकते हैं और उसका व्यवहार आक्रामक हो सकता है। इस स्थिति में बच्चे की भावनाओं, उसकी मनोदशा को समझना जरूरी होता है। अगर आप बच्चे पर चिल्लाने या दबाव बनाने से सकारात्मक परिणाम की उम्मीद कर रहे हैं तो फिर आप गलत हैं। बच्चों से अच्छा परिणाम हासिल करने का यही तरीका है कि उन पर दबाव बनाने के बजाय उन्हें प्रोत्साहित किया जाए। दुनिया भर में सैकड़ों शोध इस विषय पर किये गये और सबका एक ही परिणाम था कि बच्चों पर दबाव डालने से उन पर नकारात्मक असर पड़ता है जो उनके संपूर्ण विकास में सबसे बड़ा बाधक बनता है। कई बच्चे विलक्षण होते हैं लेकिन उम्र बढ़ने के साथ वे खुद को नहीं संभाल पाते और जैसी उम्मीद उनसे बचपन में की जाती है, वे उस पर खरा नहीं उतर पाते हैं। 
      इसका एक बड़ा कारण बच्चे का अपना बचपन नहीं जी पाना भी है। इसलिए आप खुद से एक सवाल करिये कि क्या आपका बच्चा बचपन का वैसा आनंद ले रहा है जैसा कभी आपने लिया था? इस सवाल पर मनन करिये। याद करिये अपने बचपन को। मेरी अपनी पत्नी से कई बार बहस हो जाती है क्योंकि मुझे लगता है कि वह बच्चों पर अनावश्यक दबाव बना रही है। इससे वह खुद भी तनाव में आ जाती है। मैं तब उन्हें अपना बचपन याद करने के लिये कहता हूं। इस पर भी उनके अपने तर्क होते हैं। समय जरूर बदल गया है, लेकिन बचपन जैसे पहले था वैसा आज भी है और हमें अपने बच्चों से उस बचपन को छीनने का कोई अधिकार नहीं है। .... लेकिन अफसोस कि आज बच्चों से बचपन छीना जा रहा है। किशोरावस्था का पहला चरण 13 साल की उम्र होती है लेकिन अगर आपका बच्चा 10 या 11 साल की उम्र में एक किशोर जैसा व्यवहार करता है तो इस पर ​इतराने की जरूरत नहीं है। यह चिंता का विषय है। तब आप यह क्यों भूल जाते हो कि वह जल्द ही वयस्क और प्रौढ़ भी होगा।  
     बच्चे उच्च रक्तचाप का शिकार भी हो रहे हैं। अभी कुछ अध्ययनों से पता चला है कि 11 से 12 साल के बच्चे भी उच्च रक्तचाप की समस्या से ग्रसित हो रहे हैं जो सोचनीय विषय है। विभिन्न तरह के गैजेट जैसे मोबाइल, कंप्यूटर और खान पान जैसे फास्ट फूड पहले ​ही बच्चे को बीमार बना रहे हैं। इस पर जब पढ़ाई के दबाव का तड़का लगता है तो फिर बच्चे का बीमार होना स्वाभाविक है। इसलिए खुद विचार करिये कि कहीं आप अपने बच्चे को बीमार तो नहीं बना रहे हो। 
     मैंने अपने बड़े बेटे प्रांजल को 12वीं परीक्षा के दौरान दबाव में देखा है। इसके बाद मैंने उसके दिमाग से अंकों का भूत निकाला। मैं अपने बेटे की सीमाएं जानता हूं लेकिन अंकों के दबाव में मैंने उसका आत्मविश्वास नहीं मरने दिया जिस पर वास्तव में मुझे भी नाज है। इसके बाद वह जहां भी इंटरव्यू के लिये गया तो साक्षात्कारकर्ता ने उसके आत्मविश्वास और सहज स्वीकार्यता की भावना की तारीफ की। अब वह एक अच्छे संस्थान में एडमिशन भी लेने जा रहा है। जब वह परीक्षा के तनाव में था तो मैंने उसे समझाया कि ''हमारी जिंदगी में परीक्षा का उतना ही महत्व है जितना एक बड़े से कमरे रखे गये छोटे से फूलदान का। फूल खिल रहे हैं तो अच्छा लगेगा लेकिन अगर फूलदान टूट भी गया तो ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। बस बिखरे टुकड़ों को समेटकर उन्हें भूतकाल के हवाले करना है। जल्द ही नया फूलदान उसकी जगह ले लेगा। जिंदगी परीक्षा से कई ज्यादा महत्वपूर्ण है।'' इसलिए बच्चों पर अंकों का दबाव न बनायें। मैं फिर से स्वेट मार्टेन के इस कथन को दोहरा रहा हूं कि 'प्रत्येक व्यक्ति के अंदर विशिष्ट प्रतिभा छिपी होती है, बस जरूरत है उसे पहचानने की। जिसने उसे पहचान लिया उसने जग जीत लिया।'' आपके बच्चे के अंदर भी ऐसी कोई प्रतिभा छिपी होगी। उसे पहचानने में उसकी मदद करिये। 

आपका धर्मेन्द्र पंत 
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रविवार, 18 जून 2017

आओ फिर से बोलें 'ब्वे, बुबाजी'

बुबाजी और उनकी गोद में मेरा बड़ा बेटा प्रांजल 
         सुबह लेकर उठते ही बड़े बेटे प्रांजल ने हमेशा की तरह पांव छुए लेकिन आज उनके मुंह से 'हैप्पी फादर्स डे' सुनने को भी मिला। मैंने मुस्करा कर उसे गले लगा दिया। मेरी निजी राय है कि फादर्स डे और मदर्स डे ये अंग्रेजों के चोंचले हैं और भारतीय संस्कृति में इसके लिये कोई जगह नहीं। मां और पिताजी के लिये एक दिन नियत नहीं किया जा सकता है। हमारे यहां तो हर दिन मां और पिताजी को नमन किया जाता है। अचानक ही मुझे सवाल सूझा। मैंने बेटे से पूछा, 'बेटा गढ़वाली में पापा के लिये क्या कहते हैं?'' प्रांजल ने थोड़ी देर अपना दिमाग दौड़ाया और फिर सही जवाब दिया। 'बोजी'। मैं फिर से मुस्कराया। मेरी दादी ने हम सभी भाई बहनों को सिखा रखा था कि बुबाजी बोलना है और जब हमारे साथी पिताजी बोलने लग गये थे तब हम बुबाजी ही बोलते थे। जल्दी में बोलने में बुबाजी 'बोजी' बन जाते थे। प्रांजल ने अपने पहले चार साल दादाजी के साथ बिताये थे और बचपन में अक्सर मेरे मुंह से बुबाजी के लिये संबोधन में निकला यह शब्द उसे याद रहा। 
      गढ़वाली में पिताजी के लिये कई संबोधन हैं जैसे बुबा, बुबाजी, बबा, बाबा, बबाजि। मुझे गर्व है कि मैंने अपनी पूरी उम्र बुबाजी या बोजी का ही उपयोग किया। मां के लिये भी कई बार 'ब्वे' बोलता था। कुछ बात करने के लिये 'हे ब्वे' बोलने का सुखद अहसास 'मम्मी' कहने में आ पाएगा, मेरे लिये अच्छी तरह से बयां करना मुश्किल है। मां और मांजि में भी मुझे अपनत्व लगता है। इसका यह भी कारण हो सकता है क्योंकि मैंने हमेशा मां, मांजि या ब्वे का ही उपयोग किया। ठीक उसी तरह जैसे मुझे पिताजी में नहीं बुबाजी या बोजी में अपनापन लगता है। 
         मुझे गढ़वाली कवि, गीतकार श्री दीनदयाल सुंद्रियाल 'शैलज' के एक गीत की पंक्तियां याद आ रही हैं, ''ब्वे, बाब क्वी नि बुदु अब त मम्मी पापा जी, अंग्रेजी कि आग लगिं च तुम भि आग तापा जी।''  मदर्स डे और फादर्स डे इसी अंग्रेजी और अंग्रेजीयत की देन है। बहरहाल बात उत्तराखंड की करते हैं। भारतीय भाषा सर्वेक्षण के अनुसार उत्तराखंड में कुल 13 लोकभाषाएं बोली जाती हैं। इनमें से कुछ भाषाओं में मां और पिताजी के लिये संबोधन यहां पर दिये गये हैं। उम्मीद है कि आप अपनी बोली के अनुसार भविष्य में इनका उपयोग करेंगे।

        उत्तराखंड की विभिन्न लोक भाषाओं में मां और पिताजी के लिये संबोधन के शब्द 

मां 

गढ़वाली : ब्वे, बई, बोई, मांजि, मां, मयेड़, मातण 
कुमांउनी :  इज, जिया, अम्मा
जौनसारी : ईजी 
जाड़ : आॅ
बंगाणी : इजै 
रंवाल्टी : बुई, ईजा 
जौनपुरी : बोई 
थारू : अय्या
राजी : ईजलुअ, इहा 
मार्च्छा : आमा 
जोहारी, रंग ल्वू : ईजा, अम्मा

पिता 

गढ़वाली : बुबा, बोजी, बब, बबा, बाबा, बाबजि, पिताजि 
कुमांउनी : बाज्यू, बाब, बब, बौज्यू, बाबू 
जौनसारी : बाबा 
जाड़ : अबा, आवा
बंगाणी : बाबा 
रंवाल्टी : बा, बूबा, बाबा 
जौनपुरी : बबा 
थारू : दउवा, बाबा 
राजी : दैआ, बैबा 
मार्च्छा : अप्पा 

          इसके अलावा हो सकता है कि मां पिताजी के लिये कुछ स्थानों पर अन्य तरह के भी संबोधन हों। आप आप ब्लॉग में इसे समृद्ध कर सकते हैं। आपका धर्मेन्द्र पंत 


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