मंगलवार, 26 मार्च 2019

बिन्देश्वर या बिनसर महादेव : कभी पांडवों ने की थी यहां पूजा

     उत्तराखंड देवभूमि है। यह असल में मंदिरों का गढ़ है जिसमें प्रत्येक मंदिर का अपना विशेष महत्व है। उत्तराखंड में ही केदार क्षेत्र में पांच शैव पीठ आते हैं — ताड़केश्वर महादेव, एकेश्वर महादेव, बिन्देश्वर महादेव, क्यूंकालेश्वर महादेव और किल्किलेश्वर महादेव। हम एकेश्वर महादेव और ताड़केश्वर महादेव की पहले चर्चा कर चुके हैं। आज बात करते हैं बिंदेश्वर महादेव की। इन पांचों शैव पीठ पर घसेरी के यूट्यूब चैनल पर वीडियो प्रेषित किया गया है जो लोगों को काफी पसंद आ रहा है।  
        बिनसर महादेव मंदिर पौड़ी गढ़वाल जिले के ही थलीसैण ब्लॉक की चौथाण पट्टी में स्थित है। यह थलीसैण से लगभग 22 किमी और जिला मुख्यालय पौड़ी से लगभग 114 किमी और कोटद्वार से लगभग 175 किमी दूर है। यह दूधातोली डांडा में स्थित यह मंदिर बांज, देवदार आदि के वृक्षों से घिरा है जिससे इसकी प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। बिनसर को भगवान शिव और माता पार्वती की पावन स्थली माना जाता है।
       गढ़वाली में बिनसर का मतलब सुबह की बेला होता है, लेकिन इसे बिन्देश्वर मंदिर भी कहते हैं। माना जाता है कि राजा पृथ्वी जिसे स्थानीय भाषा में राजा पिरथु कहते हैं, ने अपने पिता बिंदु की याद में बिनसर मंदिर का निर्माण करवाया था। इसी कारण इसे बिंदेश्वर महादेव कहा जाता है। मंदिर के निर्माण को लेकर हालांकि एकमत नहीं है। 
         कुछ पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय इस जंगल में बिताया था और तब उन्होंने यहां पर भैरवनाथ के मंदिर का निर्माण किया था। कहा जाता है कि केवल एक रात में उन्होंने मंदिर का निर्माण किया और पूजा अर्चना के बाद अज्ञातवास पर निकल गये थे। मंदिर के गर्भगृह में गणेश, हरगौरी और महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा भी स्थापित है। महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा पर नागरी लिपि अंकित है जिससे पता चलता है कि यह प्रतिमा नौवीं शताब्दी या उससे पहले स्थापित की गयी थी।
       बिनसर महादेव 2480 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर बैंकुंठ चर्तुदशी के अवसर पर मेला लगता है। गढ़वाल और कुमांऊ की सीमा के पास में स्थित होने के कारण मेले में दोनों मंडलों विशेषकर पौड़ी, अल्मोड़ा, चमोली और रूद्रप्रयाग जिलों के लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। यहां पर भी इस अवसर पर संतान प्राप्ति के लिये खड़रात्रि की जाती है। बोलो जय बिनसर महादेव। .... आपका धर्मेन्द्र पंत 

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

स्वस्थ जीवन और फिटनेस का मूलमंत्र बन गया है 'वीगन'

             क्या आप बता सकते हैं कि भारत का सबसे फिट खिलाड़ी कौन है? मुझसे पूछा जाएगा तो मैं झट से विराट कोहली का नाम लूंगा। कोहली ने फिटनेस के लिये जीवनशैली पूरी तरह से बदल दी है। वह शुद्ध शाकाहारी बन गये हैं। असल में वह वीगन (Vegan) बन चुके हैं। इसका मतलब है कि उन्होंने मांस ही नहीं बल्कि दुग्ध उत्पादों का भी त्याग कर दिया है। इससे उन्हें अधिक ऊर्जावान और फिट बनने में मदद मिली। कोहली की पहल पर भारतीय फुटबाल टीम के कप्तान सुनील छेत्री वीगन बने और उन्हें अपनी फिटनेस में सकारात्मक बदलाव नजर आये। सेरेना विलियम्स को तो आप जानते ही हैं। एक बच्चे की मां और 37 साल की सेरेना आज भी टेनिस कोर्ट पर अपने से आधी उम्र की युवा खिलाड़ियों के छक्के छुड़ाती हैं। सेेरेना भी शुद्ध शाकाहारी यानि वीगन हैं। इसकी प्रेरणा उन्हें अपनी बड़ी बहन वीनस विलियम्स से मिली। 
             फार्मूला वन में अभी चोटी के रेसिंग ड्राइवर लुई हैमिल्टन भी वीगन हैं। फुटबालर लियोनेल मेस्सी मांस या दुग्ध उत्पादों का सेवन नहीं करते क्योंकि वह खुद को फिट रखना चाहते है। उन्होंने  Nutritionist (पोषण विशेषज्ञ) की सलाह पर ऐसा किया और पाया कि इससे उनके शरीर में सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं। अर्जेंटीना के उनके साथी सर्जियो एगुएरा, कोलंबिया के सेबे​स्टियन पेरेज, इंग्लैंड के जर्मेन डेफो जैसे कई अन्य फुटबालर वीगन हैं। माइक टायसन का नाम तो आपने सुना ही होगा। कभी होलीफील्ड का कान चबाने वाला एक मुक्केबाज 2013 में वीगन बन गया था। उनका कहना है, ''वीगन बनने से मुझे स्वस्थ जिंदगी जीने का एक और मौका मिला।'' एक अन्य हैवीवेट मुक्केबाज डेविड हेय भी वीगन हैं। सूची बहुत लंबी जिसमें महान धावक कार्ल लुईस, आस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज पीटर सिडल, टीएनए विश्व चैंपियन पहलवान एस्टिन एरीज आदि आदि शामिल हैं। 
        अब भारतीयों की बात करते हैं। हमारी संस्कृति शाकाहार से जुड़ी है। हमारे रिषि मुनि वीगन हुआ करते थे। हिमालय में धुनि रमाये रखने वाला साधु वीगन होता है। कोई भी असली साधु वीगन होता है जिससे उन्हें विषम परिस्थितियों में भी खुद को स्वस्थ रखने में मदद मिलती है। भारत में पिछले दो दशकों से 'जिम' की नयी संस्कृति पैदा हुई जिसने भारतीयों के दिमाग में एक बात भरी कि अगर बॉडी—शॉडी बनानी है तो अंडे खाओ, मांस भक्षण करो, खूब प्रोटीन खाओ। यहां तक कि दूध में अंडा मिलाकर खाने का बेहद ही घृणित और विरोधाभासी भोजन करने की सलाह ये नासमझ जिम वाले देते हैं। इसके लिये वे प्रोटीनयुक्त पाउडर की सिफारिश भी करते हैं जिसमें शक्तिवर्धक दवाईयों की अधिकता होती है। अगर इस तरह के भोजन से ही ताकतवर बनना है तो जिम जाने की क्या जरूरत? विभिन्न जिम के इन नासमझ और अधकचरे ट्रेनर के चंगुल में फंसे तमाम लोगों को बता दूं कि जो तस्वीर मैंने यहां पर लगायी है वह बर्नी डुप्लेसिस की है जो शुद्ध शाकाहारी यानि वीगन हैं। वह बॉडी बिल्डर हैं और उन्हें 2014 में मिस्टर यूनीवर्स चुना गया था। इससे कई वर्ष पहले वह वीगन बन गये थे। आप गूगल में Alexander Dargatz, Patrik Baboumian, Dominick Thompson, Nimai Delgado, Samantha Shorkey, Anastasia Zinchenko, Karl Bruder, Victoria Lissack आदि के नाम सर्च कर लो। ये सभी बॉडी बिल्डर हैं और वीगन हैं। 
        वीगन बनने का मतलब है कि कोलस्ट्राल और हृदयगति से लेकर एकाग्रता और रात को अच्छी नींद सभी में सुधार। आप मांस, अंडे और दुग्ध उत्पाद छोड़ दीजिए और फिर देखिये सकारात्मक परिवर्तन। मैं बचपन से शुद्ध शाकाहारी हूं और दुग्ध उत्पादों ने कभी मुझे लुभाया नहीं। इसलिए कई बार वीगन बनने का मन किया। अब संकल्प ले लिया है। .... और हां कितने लोग मेरा अनुसरण कर रहे हैं?
आपका धर्मेन्द्र पंत

शनिवार, 12 जनवरी 2019

कुमांऊ की सेठाणी जसुली शौक्याणी की कहानी

         ह कहानी है एक ऐसी महिला की जिसने कुमांऊ और गढ़वाल में कई धर्मशालाओं का निर्माण करवाया था। आज भले ही ये धर्मशालाएं जीर्ण शीर्ण हो गयी हैं लेकिन कभी ये यात्रियों के लिये आश्रय स्थल हुआ करतीथी। यह महि​ला थी जसुली शौक्याणी। 
          आज से लगभग पौने दो सौ साल पहले कुमाऊं की दारमा घाटी के दांतू गांव में रहती थी अथाह धन सम्पदा की इकलौती मालकिन जसुली दताल यानि जसुली शौक्याणी। जसुली शौका समुदाय से संबंध रखती थी। दारमा और निकटवर्ती व्यांस-चौदांस की घाटियों में रहने वाले रंग या शौका समुदाय के लोगों का सदियों से तिब्बत के साथ व्यापार चलता रहता था। यही वजह थी कि उनकी गिनती पूरे कुमाऊं-गढ़वाल इलाके के सबसे संपन्न लोगों में होती थी। लेकिन कहते हैं कि धन सब कुछ नहीं होता। अथाह धनसम्पदा की इकलौती मालकिन जसुली अल्पायु में विधवा हो गयी। कुदरत का कहर यहीं पर नहीं थमा। उनके इकलौते पुत्र की भी असमय मृत्यु हो गयी। जसुली विधवा होने के बाद निःसन्तान भी हो गयी।
          अब आंसू, अकेलापन और हताशा जसुली के संगी बन गए थे। इस तरह की हताशा में किसी के मन में भी यह बात आएगी कि यह अथाह धनसंपति किस काम की। जसुली ने भी वृद्धावस्था में ऐसे ही एक दिन घोर हताशा में फैसला किया कि वह अपना सारा धन धौलीगंगा नदी में बहा देगी। इसे संयोग ही कहेंगे कि उसी दौरान उस दुर्गम इलाके से कुमाऊँ के कमिश्नर रहे अँगरेज़ अफसर हैनरी रैमजे का काफिला गुजर रहा था। रैमजे लंबे समय तक गढ़वाल—कुमांऊ के कमिश्नर रहे थे। उन्हें 1840 में कुमांऊ का सहायक कमिश्नर बनाया गया था। इसके बार उन्हें 1856 में गढ़वाल और कुमांऊ कमिश्नर बनाया गया था। उन्होंने 28 साल तक इस क्षेत्र में काम किया। रैमजे अपनी नेकदिली के लिये मशहूर थे और स्थानीय लोग उन्हें रामजी कहा करते थे। रैमजे ने बिनसर में अपने लिये बड़ा बंगला बनवाया था जिसे 'खाली' कहा जाता था क्योंकि रैमजे बहुत कम समय तक वहां रहे थे। 

जसुली शौक्याणी पर छोटी सी​ फिल्म


           इन्हीं रैमजे को जब जसुली के मंसूबों के बारे में पता चला तो वह तुरंत ही उनके पास पहुंचे। उन्होंने जसुली को समझाया कि धन को नदी में बहा देने के बजाय किसी जनोपयोगी काम में लगाना बेहतर होगा। अंग्रेज अफसर का विचार जसुली को जंच गया। कहा जाता है कि दारमा घाटी से वापस लौट रहे अँगरेज़ अफसर के पीछे-पीछे जसुली की अकूत लेकर बकरियों और खच्चरों का एक लंबा काफिला चला। रैमजे ने इस धन से कुमाऊँ, गढ़वाल और नेपाल-तिब्बत तक में व्यापारियों और तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए कई धर्मशालाओं का निर्माण करवाया। आज भी उत्तराखंड में जीर्ण शीर्ण अवस्था में जसुली और रैमजे जैसे नेकदिलों की निशानियां देखने को मिल जाती हैं। सरकार को इन धर्मशालाओं का संरक्षण करना चाहिए। ये पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं। आपका धर्मेन्द्र पंत 

मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

पहाड़ी कौथिगौं की शान जलेबी की कहानी

       लेबी। सुनकर आ गया न मुंह में पानी। जलेबी यूं तो आम भारतीय पकवान है जो उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक देश के हर राज्य में फैला हुआ है। यह अलग बात है कि उत्तर भारतीय इसके ज्यादा मुरीद हैं और तिस पर भी अगर उत्तराखंड की बात करें तो यहां लगने वाले कौथीग यानि मेलों की कल्पना तो जलेबी के बिना की ही नहीं जा सकती है। अगर आप पहाड़ी हैं तो आप जरूर कौथीग गये होंगे और आपने जलेबी का भी भरपूर आनंद लिया होगा। वही गोल गोल रसीली जलेबी, जो पहाड़ के कौथिगों की पहचान हैं। जलेबी बनते हुए तो आप देख ही रहे हैं लेकिन आज हम घसेरी में बात करेंगे जलेबी के इतिहास की। 
     आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जलेबी भारतीय पकवान नहीं है। भारतीयों का जलेबी से परिचय लगभग 550 साल पहले हुआ था। सच कहूं तो जलेबी का इतिहास और इसके भारत में आने की कहानी भी जलेबी की तरह गोलमोल है। एंग्लो इंडियन शब्दों के ऐतिहासिक शब्दकोष 'होबसन जोबसन' के अनुसार जलेबी शब्द अरबी के जुलाबिया या फारसी के जलिबिया से बना है। ईरान में इसे जुलाबिया कहते हैं। वहां दसवीं शताब्दी की पाक कला से जुड़ी कई किताबों में जुलाबिया का जिक्र है। कहा जाता है कि मध्यपूर्व से ही जलेबी भारत में पहुंची। मध्यपूर्व के देशों में जलेबी को जलाबिया कहा जाता है। इनमें भूमध्य सागर से लगा उत्तर अफ्रीकी देश ट्यूनीशिया भी शामिल है। लेबनान में जेलाबिया नाम की एक पेस्ट्री भी मिलती है। मध्यकाल की एक पुस्तक 'किताब—अल—तबीक' में जलाबिया नाम की मिठाई का जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है यह पश्चिम एशिया का मिष्ठान है।


        भारत में जलेबी का सबसे पहला जिक्र 1450 में जैन धर्म के संबंध में लिखी गयी एक पुस्तक में मिलता है। कई भारतीयों का मानना है कि जलेबी भारतीय मिष्ठान है। शरदचंद्र पेंढारकर ने बनजारे बहुरूपिये शब्द में जलेबी का प्राचीन भारतीय नाम कुंडलिका बताया है। संस्कृत में इसे सुधा कुंडलिका कहते हैं। रघुनाथकृत ‘भोज कुतूहल’ नामक ग्रंथ में जलेबी बनाने की विधि बतायी गयी है। कहा जाता है कि भारत में पहले जलेबी का नाम ‘जल-वल्लिका’ था।  संस्कृत भाषा में सन 1600 में एक किताब लिखी गयी थी जिसका नाम था 'गुण्यगुणाबोधिनी', इस किताब में भी जलेबी के बारे में बताया गया है। कहने का मतलब यह है कि जलेबी सिर्फ आपके मुंह में ही पानी नहीं आ रहा है असल में यह सदियों से लोगों के मुंह की लार टपका रही है। भारत में भी जगह के हिसाब से जलेबी के नाम में थोड़ा परिवर्तन आ जाता है। जैसे मराठी में जलेबी को जिलबी और बंगाली में जिलपी कहते हैं। जलेबी की तरह की ही एक मिठाई है इमरती। माना जाता है कि इसका पुराना नाम अमृती यानि अमृत के समान मीठा था लेकिन फारसी प्रभाव के कारण इसे इमरती कहा जाने लगा।
       पिताजी ने बचपन में दूध के साथ जलेबी खाना सिखाया था। वह आदत अब भी नहीं छूटी है। मैं तो जा रहा हूं दूध और जलेबी का आनंद लेने। आप भी आर्डर करिये एक किलो जलेबी और फिर बताईये कि आपको जुलाबिया पसंद है या जल वल्लिका या जलेबी।  आपका धर्मेन्द्र पंत  

रविवार, 11 नवंबर 2018

गुणों की खान है मीठा करेला (परमला, ककोड़ा)


           क्या आपको मीठा करेला की सब्जी पसंद है? अगर हां तो बहुत अच्छी बात है और अगर नहीं तो फिर मीठा करेला खाना शुरू कर दें। अगस्त से लेकर नवंबर तक पहाड़ों में कई अन्य तरकारियों की तरह बेल पर लगने वाला मीठा करेला वास्तव में गुणों की खान है। मीठा करेला को उत्तराखंड में कई नामों से जाना जाता है। इसे राम करेला भी कहते हैं। कहते हैं कि भगवान राम ने वनवास के दौरान इसकी सब्जी खायी थी। उन्हें यह बहुत पसंद था और इस कारण मीठा करेला को राम करेला भी कहते हैं। यह भी कहा जाता है कि यह कई बीमारियों में उपयोगी है और इसलिए इसका नाम राम करेला पड़ा।
        मीठा करेला को उत्तराखंड में कई नामों से जाना जाता है जैसे परमला, परबल, परमल, परला, मीठा करेला, राम करेला, गुजकरेला, गुजकरेल, ककोड़ा, काकोड़े, किंकोड़ा, घुनगड़ी, केकुरा आदि। नेपाल में इसे बडेला कहा जाता है। रामकरेला मुख्य रूप से दक्षिण अमेरिकी देशों की सब्जी है, लेकिन वहां इसका आकार थोड़ा बड़ा होता है। यह दक्षिण अमेरिका में एंडीज वाले इलाकों यानि पहाड़ी क्षेत्रों में ही पाया जाता है। वहां स्थानीय भाषाओं में इसे काइवा, अचोचा और पेपिनो कहते हैं। Caihua (Caigua), achuqcha और pepino. इसे slipper gourd, lady's slipper, sparrow gourd और stuffing cucumber भी कहा जाता है। देखा आपने आज जिसे परमला, कंकोड़ा या मीठा करेला कहते हैं असल में उसके ढेरों नाम हैं। इसका वानस्पतिक नाम साइक्लेन्थेरा पेडाटा (Cyclanthera pedata (L.) Schrad) है। मीठा करेला में हल्के कांटे से होते हैं और बचपन में हम इस पर दियासलाई या छोटी लकड़ी से पैर लगाकर खेला भी करते थे।

        मेरे यहां इसे परमला कहते हैं लेकिन मैं मीठा करेला कहकर ही अपनी बात आगे बढ़ाऊंगा। मीठा करेला पर जो शोध किये गये उनसे पता चलता है कि इसको खाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है क्योंकि इसमें एंटी आक्सीडेंट और खून को साफ करने वाले तत्व होते हैं। इसमें पर्याप्त मात्रा में आयरन होता है। इसके अलावा मीठा करेला में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर आदि भी पाये जाते हैं। 
       मीठा करेला के नाम के साथ करेला जरूर जुड़ा है लेकिन यह कड़वा नहीं बल्कि मीठा होता है। जब छोटा या यूं कहें कि नया होता है तो उसे कच्चा भी खाया जा सकता है लेकिन समय के साथ इसके अंदर काले रंग के बीज बन जाते हैं जिन्हें बाहर निकालकर इसकी सब्जी बनायी जाती है। इसको कच्चा खाने पर कुछ हद तक ककड़ी जैसा स्वाद ही आता है। सबसे अहम बात यह है कि मीठा करेला पर कीट और बीमारियों का प्रकोप नहीं होता है। इसलिए  बीज निकालकर इसे सुखा दिया जाता है जिन्हें पहाड़ी भाषाओं में सुग्सा या सुगुसु कहते हैं। इन सुक्सा को सुरक्षित रखकर अगले कुछ महीनों तक सब्जी बनायी जा सकती है।
    अब तो आप मना नहीं करोगे न मीठा करेला की सब्जी खाने से। खाना जरूर स्वादिष्ट होती है इसकी सब्जी। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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