शनिवार, 8 अप्रैल 2017

चुटकी में हुआ था एडमिशन और स्कूल में खाते थे बेंत

गांव का मेरा स्कूल। हमारे समय में इसके आसपास की जमीन बंजर थी लेकिन अब वनीकरण से जंगल उग आया है। कभी यह मिट्टी पत्थरों का बना था जिसमें बरसात में अक्सर पानी टपकता रहता था। अब उसकी जगह पक्की इमारत बना दी गयी है। 

     पिछले दिनों दिल्ली में एडमिशन को लेकर जबर्दस्त मारामारी रही। मैं किसी बड़ी कक्षा नहीं, नर्सरी, केजी कक्षाओं की बात कर रहा हूं। प्रत्येक माता पिता ने अपने बच्चे के लिये कई स्कूलों के फार्म भरे। जो भाग्यशाली थे उनका नंबर आ गया। अनायास ही खयाल आया कि स्कूल में मेरा एडमिशन कैसे हुआ होगा?  वह 1975 का साल था, क्योंकि तब मैं पांच साल का हो गया था। पिताजी सजग थे इसलिए वह स्वयं ही गांव के स्कूल यानि आधारिक विद्यालय स्योली में मेरा एडमिशन करवाने के लिये लेकर गये थे। गांव में प्रधान थे, मितभाषी थे और अपने जमाने के हाईस्कूल पास थे। सभी उनकी काफी इज्जत करते थे। मास्टर जी भी। इसलिए गुरूजी ने उनके लिये कुर्सी लगवायी और तब उन्होंने मेरा पूरा नाम लिखवाया, धर्मेन्द्र मोहन पंत। जन्मतिथि भी ज्यों की त्यों 31 मार्च 1970 क्योंकि उन्हें जन्मतिथि में घटत बढ़त पसंद नहीं थी। इसलिए हम सभी भाई बहनों (चचेरे भाई बहनों सहित) की जन्मतिथि वास्तविक है। मुझे 'कच्चा एक' में रखा गया था पढ़ने लिखने में ठीक ठाक था इसलिए कुछ महीनों बाद 'पक्का एक' में रख दिया गया था। नर्सरी, केजी जैसा भी कुछ होता है यह तो मुझे दिल्ली आने के बाद पता चला था। 
     यह तो रही मेरे एडमिशन की कहानी। मेरी पत्नी के एडमिशन की कहानी इसके ठीक उलट है। गांव के स्कूल में अध्यापिका उन्हीं के गांव की थी, इसलिए सब कुछ उन पर छोड़ दिया गया। घर का नाम शिक्षिका महोदया को याद था लेकिन शायद वह उन्हें अधूरा सा लगा। यही वजह थी कि उन्होंने अंजू के साथ लता जोड़कर नाम कर दिया अंजू लता। अब बात आयी जन्मतिथि की जिसे उन्होंने घर में पूछ लिया था, लेकिन रजिस्टर में लिखते समय उन्हें केवल तारीख याद रही। महीना और वर्ष दोनों भूल गयी। महिलाएं अपनी उम्र कम करके बताती हैं। इसमें कुछ कुछ सच्चाई भी है लेकिन अंजूलता जी एडमिशन के समय लगभग दो साल बड़ी हो गयी थी। गांव की मास्टरनी जी ने 14 दिसंबर 1973 को 14 फरवरी 1972 कर दिया था। जब तक 'महिलाओं की उम्र संबंधी कमजोरी' का असर अंजूलता जी पर दिखता तब तक वह दसवीं पास कर चुकी थी। ​शादी के बाद अपने नाम के साथ उग आयी लता को तो उन्होंने उखाड़ फेंक दिया लेकिन महारानी का जन्मदिन अब भी साल में दो बार आ जाता है। शुक्र है कि उन्हें 14 दिसंबर ही याद रहता है नहीं तो पत्नी के दो . दो जन्मदिन पर अपुन का तो दीवाला निकलना पक्का था। 
        ये दोनों ही सच्ची कहानियां हैं और इनका जिक्र मैंने यहां पर इसलिए किया क्योंकि हमारी तरह गांवों में रहने वाले कई बच्चों का एडमिशन इस तरह से हुआ होगा। कुछ का नाम बदला होगा तो कुछ की जन्मतिथि। तब नाम और जन्मतिथि दोनों के लिये प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं पड़ती थी। कुछ लोग दसवीं का फार्म भरते समय नाम और जन्मतिथि में सुधार कर देते हैं क्योंकि उसे प्रमाणिक माना गया है। हर किसी के स्कूल में प्रवेश लेने की अपनी अलग कहानी होगी। आप चाहो तो इसे यहां साझा यानि ​शेयर कर सकते हो। इसके लिये नीचे एक टिप्पणी वाला कालम बनाया गया है। बहरहाल आज एडमिशन के बहाने मेरी इच्छा अपने स्कूली दिनों को याद करने की है। स्कूलों के संबंध में 70 और 80 के दशक के हम पहाड़ी विद्यार्थियों की यादें लगभग एक जैसी हैं और इसलिए उम्मीद कर रहा हूं कि आपको इसमें कुछ अपनापन लगेगा। 
       मेरा स्कूल था तो मेरे गांव का ही लेकिन वह गांव से लगभग तीन किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर स्थित था। उबड़ खाबड़ रास्ता जिसके बीच में एक गदना (पहाड़ों में बहने वाली छोटी नदी) भी पड़ता था। बरसात के दिनों में उसे पार करना हमारे लिये हमेशा चुनौती होती थी। गदना पार करते ही खड़ी पहाड़ी लगती थी जिसे हम उछलते कूदते पार कर लेते थे। हमें शुरू से ही गुरूजनों को सम्मान देना सिखाया गया था और इसलिए उनका नाम तक जुबान पर नहीं लाते थे। उस कुर्सी पर मैं कभी नहीं बैठा जिस पर गुरूजी बैठते थे। हमारे लिये तो चटाईयां हुआ करती थी जो मिट्टी से बने कमरों में धूल से सनी रहती थी। स्कूल से छुट्टी के समय इन चटाईयों को बाहर मैदान में ले जाकर दो बच्चे दोनों तरफ से पकड़कर जोर जोर से झाड़ते थे तो धूल का बड़ा सा गुबार निकलता था जिससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि हमारे जांघिये या पैंट के पीछे वाले हिस्से की क्या स्थिति रहती होगी। आज बच्चे हर दिन नयी ड्रेस पहनकर स्कूल जाते हैं लेकिन हम एक पोशाक को हफ्ते दस दिन तक तो खींच ही लेते थे। मुझे याद है कि स्कूल की पोशाक हुआ करती थी खाकी पैंट या जांघिया और नीली कमीज। मां उसे इतवार के दिन धोती थी। 
        पिछले दो दशकों में पहाड़ी गांव पलायन से जूझ रहे हैं। गांव खाली हो गये और स्कूल भी। लेकिन जब हम पढ़ा करते थे तो गांव भी भरा था और स्कूल भी। हमारा गांव बड़ा है और फिर खरल और दणखंड के बच्चे भी हमारी स्कूल में ही पढ़ने के लिये आते थे। प्रार्थना के समय प्रत्येक कक्षा की अलग पंक्ति होती थी और एक पंक्ति में 12 से 15 बच्चे तो होते ही थे। आज सुना है कि गांवों के स्कूलों में कुल जमा दस बच्चे नहीं होते हैं। स्कूल का एक मानीटर होता था। पांचवीं के बच्चे को स्कूल का मानीटर बना दिया जाता था। गुरूजी के आने तक स्कूल में अनुशासन बनाये रखने का जिम्मा उसी का होता था। पांचवीं में यह जिम्मेदारी मैंने भी निभायी थी। हमारी स्कूल में दो शिक्षक थे और अपनी सुविधा के लिये हमने ही उनकी उम्र के हिसाब से उन्हें नाम दे दिया था, 'बड़ा गुरूजी' और 'छोटा गुरूजी'। बड़े गुरूजी कड़क थे, अनुशासन प्रिय थे और पढ़ाई में ढिलायी उन्हें कतई पसंद नहीं थी। इसलिए हर बच्चा दुआ करता था कि वह छुट्टी पर रहें। छोटे गुरूजी थोड़ा खेलकूद में भी विश्वास रखते थे इसलिए बच्चों को उनके साथ ज्यादा मजा आता था। 
     स्कूल दूर था इसलिए गुरूजी के चाय पानी की व्यवस्था भी बच्चों को ही करनी पड़ती थी। सभी के लिये निर्देश था कि वह अपने साथ एक लकड़ी लेकर जरूर आये। प्रार्थना के समय मानीटर जांच करता कि कौन लकड़ी लेकर आया है और कौन नहीं। जो नहीं लेकर आता उसे वह गुरूजी से सजा दिलवाता। पानी भी दूर से लाना पड़ता था। दो बच्चे एक लट्ठे के बीच में बाल्टी लटकाकर पानी भर लाते थे। इसके लिये बारी लगी हुई थी। दूध के लिये भी बारी लगती थी और हर शाम को बारी के अनुसार किसी एक बच्चे को दूध की बोतल सौंप दी जाती थी। दूध चाय बनाने के लिये। चाय पत्ती और चीनी की व्यवस्था गुरूजन खुद ही करते थे। चाय बनाने का जिम्मा लड़कियों का होता था। तब 12 — 13 साल की लड़की भी पांचवीं में पढ़ती थी और वे चूल्हे चौके में निपुण होती थी। मेरे साथ दो लड़कियां पढ़ती थी। पांचवीं के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दी और फिर कुछ साल बाद उनकी शादी भी हो गयी। अब वे नानी . दादी बन गयी होंगी। 
      बड़े गुरूजी स्कूल के पास में स्थित दूसरी पहाड़ी के रास्ते से आते थे। सब की नजर उस पहाड़ी पर होती थी और जैसे ही उनका सिर दिखता सारे बच्चे चौंकन्ने हो जाते थे। डर कहो या सम्मान लेकिन सभी बच्चों का व्यवहार एकदम से ऐसे बदलता था कि मानो गुरूजी के पास कोई दिव्य दृष्टि है जिससे वह यहां हमारी हरकतें देख लेंगे। बड़े गुरूजी दूसरे गांव से आते थे और अक्सर छोटे गुरूजी से पहले स्कूल में पहुंच जाते थे। इस बीच खुद को पढाई में तल्लीन दिखाने के लिये सामूहिक कविता पाठ भी शुरू हो जाता। सामूहिक कविता पाठ मतलब एक स्वर में सभी का किसी एक ​कविता को पढ़ना। मिट्टी और पत्थरों से बने मेरे स्कूल में एक बरामदा और दो कमरे थे जिनमें से एक कमरा बरसात में अक्सर टपकता रहता था। पांचवीं के बच्चे बरामदे में बैठते थे। एक कमरे में पहली और दूसरी तो दूसरे में तीसरी और चौथी के बच्चे बैठते थे। अब ऐसे में एक पंक्ति से आवाज उठ रही है, ''काली काली कूं कूं करती ..... '' तो दूसरी पंक्ति से स्वर गूंजता, ''यदि होता मैं किन्नर नरेश में .....''। हर कविता की अपनी लय होती थी और ऐसे में इस ​मधुर, मनमोहक माहौल का अंदाजा आप खुद ही लगा लीजिए। पांचवी कक्षा में परशुराम . लक्ष्मण संवाद था जिसे रामलीला के दिनों में बच्चे बड़े चाव से पढ़ते थे। गणित में पहले पहाड़े याद किये और बाद में चक्रवृद्धि ब्याज से लेकर​ भिन्न तक में अपनी बुद्धि खपायी। गणित पर गुरूजी का खास जोर होता था। पांचवीं तक अंग्रेजी नहीं होती थी। इस भाषा से मेरा पाला पहली बार छठी कक्षा में पड़ा था।


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      गुरूजी के स्कूल परिसर में प्रवेश करते ही सभी बच्चे हाथ जोड़कर खड़े हो जाते और गुरूजी के पास पहुंचते ही सभी के मुंह से निकलता 'गुरूजी प्रणाम।' गुरूजी जब तक बैठने के लिये नहीं कहते तब तक उसी मुद्रा में रहते। इसके बाद हाजिरी लगती थी। अपना नाम सुनते ही बच्चा जोर से एक रटा रटाया शब्द बोलता था, 'उपस्थित महोदय।' अगर आपको बीच में पेशाब लग गयी हो तो 'श्रीमान जी क्या मैं लघुशंका जा सकता हूं' बोलते थे। कई अवसरों पर चार पांच बार बोलने पर ही गुरूजी के कान तक आग्रह पहुंच पाता था और अनुमति मिलते ही हम स्कूल परिसर के बाहर निवृत होकर आ जाते थे। हाफटाइम के समय हम घर से लायी रोटी का सेवन करते। वह भी अपने कमरों में नहीं बल्कि स्कूल परिसर में स्थित खेतों में बैठकर। रोटी के साथ सब्जी या फिर किसी खास चीज का लूण होता था जैसे लया का लूण (सरसों को गरम करके उसे नमक के साथ पीसकर तैयार किया जाता है) आदि। 
         जवाब गलत देने या कोई शरारत करने पर मार पड़ती। गुरूजी के आगे हाथ करने पर सटाक से बेंत पड़ती  थी। हाथ लाल हो जाता लेकिन मजाल क्या कि कोई घर में बता दे। असल में पहाड़ों की अ​र्थव्यवस्था मनीआर्डर पर आधारित रही है। कम से कम से नब्बे के दशक तक तो स्थिति ऐसी ही थी। अधिकतर के पिताजी सेना, दिल्ली, देहरादून या इसी तरह के किसी शहर में काम करते थे और मां को चूल्हा चौका, गाय बछड़ों और खेती से इतनी फुरसत ही कहां मिलती कि वह अपने लाल के लाल हाथों को देख सके। इसके अलावा कोई अगर घर में कहता तो उल्टे मार पड़ती कि जरूर तूने कोई गलत काम किया होगा तभी मार पड़ी। मैं अपना काम समय पर करता था। पढ़ाई में अच्छा था और शरारतें नहीं करता था ​इसलिए मुझे मार कम पड़ी लेकिन कुछ ऐसे भी थे जिनका 'बेंत खाना' दिनचर्या में शामिल था। लड़कियों को मार नहीं पड़ती थी। 
           गर्मियों में सुबह आठ बजे से स्कूल लगता था तो सर्दियों में दस बजे से। जनवरी के पूरे महीने छुट्टी रहती थी और इसलिए हम बेसब्री से इस महीने का इंतजार करते थे। तब हमारा काम खेलने के अलावा कुछ नहीं होता था। बाकी महीनों में हमेशा स्कूल में उपस्थित रहते थे। स्कूल की छुट्टी कब होनी है इसके लिये कोई समय तय नहीं था। गुरूजी का मन किया तो वह समय से पहले स्कूल छोड़ दें या फिर 15 . 20 मिनट और बिठाकर रख दें। छुट्टी का समय करीब आने पर सभी की निगाह गुरूजी पर टिक जाती कि कब वह बच्चों को अपनी चटाई झाड़कर लाने और फिर मानीटर को घंटी बजाने का आदेश दें। फिर तो हम उतराई . चढ़ाई वाले रास्ते पर दौड़ लगाते। घर में जाते ही बस्ता या पाटि (लिखने के लिये लकड़ी की तख्ती) एक तरफ पटककर भरपेट भोजन करते और फिर गांव के बच्चों के साथ खेल में मशगूल हो जाते। 
      आधारिक विद्यालय स्योली से पांचवीं पास करने के बाद मैं छह से 12 तक राजकीय इंटर कालेज नौगांवखाल का छात्र रहा। राजकीय महाविद्यालय चौबट्टाखाल से स्नातक करने के बाद हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से ही राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर किया। इस बीच भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री भी ली जिसके दम पर आज मेरी आजीविका चल रही है। लेकिन सच कहूं तो सबसे अधिक गुदगुदाने वाली यादें प्राइमरी स्कूल से ही जुड़ी हैं। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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गुरुवार, 16 मार्च 2017

कुमांउनी परंपरा : देवर—भाभी और साली—जीजा को करते हैं टीका

और इस साल मैंने भी अपनी भाभीजी पर टीका लगाकर यह परंपरा निभायी। 

      रिष्ठ मीडियाकर्मी सुश्री क्षिप्रा पांडे शर्मा ने होली के एक दिन बाद अपने फेसबुक पेज पर एक पोस्ट डाली, ''कुँमाऊं का त्यौहार, होली का टीका, जिसमेंं साली-जीजा का, देवर-भाभी का टीका करते हैं। मुबारक हो मेरे देवरों को। साली-जीजा टचवुड।'' मैंने पहली बार इस तरह के त्योहार या परंपरा के बारे में सुना था इसलिए जिज्ञासा बढ़ना स्वाभाविक थी। इसलिए सबसे पहले सुश्री क्षिप्रा से ही इस पर विस्तार से बताने का आग्रह किया और फिर कुमांऊ के अपने मित्रों और कुमांउनी संस्कृति की गहरी जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों से भी बात की। निष्कर्ष यह निकला कि कुमांऊ के कुछ क्षेत्रों में इस तरह की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।  देश के कई क्षेत्रों में  होली के एक दिन बाद भैया दूज का त्योहार का मनाया जाता है। बृज में भी परंपरा सदियों से चली आ रही है। कुमांऊ की होली में बृज का ही पुट है और यह माना जा सकता है कि वहीं से कुमांऊ में होली के एक दिन बाद टीका लगाने की परंपरा भी शुरू हुई होगी। यह अलग बात है कि यहां कुछ जगहों पर इस स्वरूप बदल गया। देश में कुछ स्थानों पर भैया दूज साल में दो बार मनायी जाती है। पहली होली के तुरंत बाद और दूसरी दीवाली के बाद जो अधिक प्रचलित है। 
      सुश्री क्षिप्रा पांडे शर्मा  के अनुसार होली पर यह सारे गिले शिकवे दूर करने का स्वाभाविक तरीका है। उनके शब्दों में, ''ददा, प्रामाणिकता के साथ तो नहींं कह सकती, पर होली की समाप्ति नोंक -झोंक वाले रिश्ते की प्रगाढ़ता परिलक्षित करता है। सारे गिले-शिकवे दूर। मेरी बहन हर साल अपने जीजा जी को टीका करने जरूर आती है और मेरे चाचा लोग मम्मी को। ..... मैंने अपनी मम्मी से पूछा था और उन्होंने बताया कि जिन लोगों के साथ होली खेली जाती है उनसे ही टीका किया जाता है।'' 
      होली में अक्सर देवर—भाभी, जीजा—साली के बीच रंग गुलाल का खेल चलता है। इसमें किसी के रूठने की संभावना भी बनी रहती है और संभवत: इसलिए होली के एक दिन बाद टीका लगाने की परंपरा शुरू हो गयी। कुमांऊ में होली को लेकर एक गीत भी गाया जाता है, ''देवर संग भाभी खेले, जीजा के संग साली। कांव कांव कौआ बोले, होली है भई होली।। '' 
      कुमांउनी संस्कृति का गूढ़ ज्ञान रखने वाले श्री उदय टमटा ने कहा कि पहले होली के एक दिन बाद टीका के अलावा बलि प्रथा का भी प्रचलन था। मैंने विशेष तौर पर उनसे टीका लगाने के संबंध में बात की तो उन्होंने बताया, ''यह आपसी ​मेल​ मिलाप और संबंधों को सौहार्द बनाये रखने की ही एक पुरानी परंपरा है। बहुत पहले जानवरों की बलि भी दी जाती थी लेकिन अब परंपरा समाप्त हो चुकी है। अब आपस में टीका लगाते हैं और यह हर घर में होता है। ''
      कुमांउनी संस्कृति के जानकार तथा वरिष्ठ पत्रकार श्री विवेक जोशी और श्री शंकर सिंह ने बताया कि यह सिर्फ जीजा—साली या देवर—भाभी तक सीमित नहीं है बल्कि परिवार और अड़ोस पड़ोस में सभी का टीका किया जाता है। 
          मैं गढ़वाल में पला बढ़ा हूं और मैंने यह ऐसी कोई परंपरा अपने क्षेत्र में नहीं देखी। यहां तक कि हमारे ​यहां रक्षाबंधन का त्योहार बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन भैया दूज नहीं। फिर भी मैंने वरिष्ठ साहित्यकार, इतिहासकार और लेखक श्री भीष्म कुकरेती से इस बारे में जानकारी चाही तो उन्होंने बताया कि गढ़वाल क्षेत्र में होली के दिन ही टीका लगाने का प्रचलन है। उसके बाद किसी तरह का टीका नहीं लगाया जाता है। 
    वैसे यह अच्छी परंपरा है और इस तरह की सौहार्द और एकजुटता का संदेश देने वाली परंपराओं को आगे बढ़ाने और उन्हें संरक्षण देने की जरूरत है। इसके साथ ही मेरा आग्रह है कि अगर आप इस परंपरा के बारे में अधिक जानकारी रखते हैं तो कृपया जरूर साझा करें। आपका धर्मेन्द्र पंत 


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बुधवार, 8 मार्च 2017

उत्तराखंड की कुछ प्रसिद्ध महिलाएं

                             अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (आठ मार्च) पर विशेष


मुगलों की नाक काटने वाली रानी कर्णावती 

        भारतीय इतिहास में जब रानी कर्णावती का जिक्र आता है तो फिर मेवाड़ की उस रानी की चर्चा होती है जिसने मुगल बादशाह हुमांयूं के ​लिये राखी भेजी थी। इसलिए रानी कर्णावती का नाम रक्षाबंधन से अक्सर जोड़ दिया जाता है। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि इसके कई दशकों बाद भारत में एक और रानी कर्णावती हुई थी और यह गढ़वाल की रानी थी। इस रानी को मुगलों की नाक काटने के लिये जाना जाता है और इसलिए कुछ इतिहासकारों ने उनका जिक्र नाक क​टी रानी या नाक काटने वाली रानी के रूप में किया है। रानी कर्णावती ने गढ़वाल में अपने नाबालिग बेटे पृथ्वीपतिशाह के बदले तब शासन का कार्य संभाला था जबकि दिल्ली में मुगल सम्राट शाहजहां का राज था। रानी कर्णावती वह पवांर वंश के राजा महिपतशाह की पत्नी थी। जब महिपतशाह की मृत्यु हुई तो उनके पुत्र पृथ्वीपतिशाह केवल सात साल के थे। राजगद्दी पर पृथ्वीपतिशाह ही बैठे लेकिन राजकाज उनकी मां रानी कर्णावती ने चलाया। इस दौरान जब मुगलों ने गढ़वाल पर आक्रमण किया तो रानी कर्णावती ने उन्हें छठी का दूध याद दिलाया था। गढ़वाल की सेना ने मुगल सेना को हरा दिया था। मुगल सैनिकों के हथियार छीन दिये गये थे और आखिर में उनके एक एक करके नाक काट दिये गये थे। कहा जाता है कि जिन सैनिकों की नाक का​टी गयी उनमें सेनापति नजाबत खान भी शामिल था।  विस्तार से पढ़ने के लिये क्लिक करें "मुगल सैनिकों की नाक काटने वाली गढ़वाल की रानी कर्णावती"

युवा वीरांगना तीलू रौतेली 

          केवल 15 वर्ष की उम्र में रणभूमि में कूद कर सात साल तक अपने दुश्मन राजाओं को छठी का दूध याद दिलाने वाली गढ़वाल की वीरांगना थी 'तीलू रौतेली'। इस महान वीरांगना का जन्म कब हुआ। इसको लेकर कोई तिथि स्पष्ट नहीं है। गढ़वाल में आठ अगस्त को उनकी जयंती मनायी जाती है और यह माना जाता है कि उनका जन्म आठ अगस्त 1661 को हुआ था। उस समय गढ़वाल में पृथ्वीशाह का राज था। इसके विपरीत जिस कैंत्यूरी राजा धाम शाही की सेना के साथ तीलू रौतेली ने युद्ध किया था उसने इससे पहले गढ़वाल के राजा मानशाह पर आक्रमण किया था जिसके कारण तीलू रौतेली को अपने पिता, भाईयों और मंगेतर की जान गंवानी पड़ी थी। तीलू रौतेली ने इसका बदला चुकता करने की ठानी और आखिर में वह इसमें सफल रही। इस वीरांगना ने केवल 22 साल की उम्र में प्राण त्याग दिये थे लेकिन इतिहास में वह अपना नाम हमेशा के लिये अजय अमर कर गयी। विस्तार से पढ़ने के लिये क्लिक करें "तीलू रौतेली ..वर्षों पहले बन गयी थी लक्ष्मीबाई"

शराबबंदी की समर्थक टिंचरी माई 

        लीसैंण के मंज्यूड़ गांव में 1917 को जन्मी दीपा नौटियाल ने बचपन में ही अपने माता पिता को गंवा दिया था। चाचा ने बचपन में ही उनकी शादी सेना के जवान से कर दी जो युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गया। तब दीपा की उम्र 19 साल की थी। वह संन्यासिन बनी और बाद में पहाड़ लौटकर यहां की कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने लगी। उन्होंने पहाड़ में शराबबंदी के लिये आवाज उठायी। अंग्रेज अफसर से डरे बिना अपने गांव में टिंचरी यानि शराब की दुकान जला डाली। तभी से लोग उन्हें टिंचरी माई कहने लगे। उन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक कार्यों में समर्पित कर दिया था। उन्हें इच्छागिरी माई के नाम से भी जाना जाता है। टिंचरी माई ने 19 जून 1992 को अंतिम सांस ली थी। 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बिशनी देवी शाह 

        देश के स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड की महिलाओं का भी अहम योगदान रहा और इनमें बिशनी देवी शाह प्रमुख हैं। उनका जन्म 12 अक्तूबर 1902 को बागेश्वर में हुआ था और वह किशोरावस्था से ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ी थी और देश के आजाद होने तक इसमें सक्रिय रही। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भी अहम भूमिका निभायी थी। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े होने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इस महान स्वतंत्रता सेनानी का वर्ष 1974 में 73 वर्ष की उम्र में निधन हुआ। 

सुप्रसिद्ध लेखिका शिवानी 

     त्तराखंड की प्रसिद्ध उपन्यासकार शिवानी उर्फ गौरा पंत का जन्म 17 अक्तूबर 1923 को हुआ था।  उन्होेंने 12 साल की उम्र से लिखना शुरू किया और फिर 21 मार्च 2003 को अपने निधन तक लगातार लेखन से जुड़ी रही। उनकी लिखी कृतियों मे कृष्णकली, भैरवी, आमादेर शन्तिनिकेतन, विषकन्या चौदह फेरे, कृष्णकली, कालिंदी, अतिथि, पूतों वाली, चल खुसरों घर आपने, श्मशान चंपा, मायापुरी, कैंजा, गेंदा, भैरवी, स्वयंसिद्धा, विषकन्या, रति विलाप आदि प्रमुख हैं। हिंदी साहित्य जगत में शिवानी को ऐसी लेखिका के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने अपनी कृतियों में उत्तर भारत के कुमाऊं क्षेत्र के आसपास की लोक संस्कृति की झलक दिखायी और किरदारों का बहुत सुंदर तरीके से चरित्र चित्रण किया। हिंदी के अलावा उनकी संस्कृत, गुजराती, बंगाली, उर्दू तथा अंग्रेजी पर भी अच्छी पकड़ थी। 

चिपको की प्रणेता : गौरा देवी 

      गौरा देवी विश्व प्रसिद्ध चिपको आन्दोलन की जननी रही हैं। उनका जन्म 1925 में हुआ था। वह पहाड़ में जंगलों की अंधाधुंध कटाई का विरोध करने के लिये गौरा देवी अपनी साथियों के साथ पेड़ों से चिपक गयी थी। तब पहाड़ों में वन निगम के माध्यम से ठेकेदारों को पेड़ काटने का ठेका दिया जाता था। गौरा देवी को जब पता चला कि पहाड़ों में पेड़ काटने के ठेके दिये जा रहे हैं तो उन्होंने अपने गांव में महिला मंगलदल का गठन किया। गौरा देवी कहा करती थी कि वन हमारे भगवान हैं इन पर हमारे परिवार और हमारे मवेशी पूर्ण रूप से निर्भर हैं। उनका विवाह 11 वर्ष में हो गया था और 22 साल की उम्र में उनके पति का निधन हो गया था। उन्होंने इसके बाद अपने बेटे की पर​वरिश करने के साथ अपना जीवन गांव और जंगल की रक्षा के लिये समर्पित कर दिया था। उन्हें 1986 में पहले वृक्ष मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। पेड़ों की रक्षा के लिये अपना जीवन समर्पित करने वाली गौरा देवी ने चार जुलाई 1991 को अंतिम सांस ली।

जागर को नयी पहचान दी बसंती बिष्ट ने 

     त्तराखंड में देवी देवताओं के स्तुति गान यानि जागर गायन का काम मुख्य रूप से पुरूष करते हैं लेकिन श्रीमती बसंती बिष्ट ने न सिर्फ इस विधा से जुड़ी बल्कि उन्होंने देश विदेश में जागर गायन को पहचान भी दिलायी। वह मां भगवती नंदा के जागरों के गायन के मशहूर हैं। अपनी मां से जागर गायन सीखने वाली बसंती देवी को भारत सरकार ने लोक संगीत के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिये वर्ष 2017 में पदमश्री से सम्मानित किया। वह उत्तराखंड आंदोलन से भी जुड़ी रही और इस बीच वह अपने गीतों के जरिये इस आंदोलन को मजबूती देती रही। बसंती बिष्ट ने नंदा देवी की जागरों की एक पुस्तक ‘नंदा के जागर- सुफल ह्वे जाया तुम्हारी जात्रा’ भी लिखी है। 

भारत की पहली एवरेस्ट विजेता महिला बछेंद्री पाल 

       उत्तराखंड में साहसिक खेलों में अहम योगदान देने वाली महिलाओं की बात आती तो सुश्री चंद्रप्रभा ऐतवाल और फिर बछेंद्री पाल का नाम स्वाभाविक ही जुबान पर आ जाता है। ये दोनों ही पर्वतारोहण से जुड़ी थी। पिथौरागढ़ के धारचूला गांव में 24 दिसंबर 1941 को जन्मीं चंद्रप्रभा ने पर्वतारोहण की विभिन्न अभियानों की अगुवाई की और उन्हें पदमश्री और अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। बछेंद्री पाल ने पर्वतारोहण को नये आयाम तक पहुंचाया। 24 मई 1954 को उत्तरकाशी के नकुरी में जन्मी बछेंद्री पाल ने 23 मई 1984 को एवरेस्ट फतह किया था और ऐसा करने वाली वह भारत की पहली महिला पर्वतारोही बनी थी। उन्हें 1984 में पदमश्री और इसके दो साल बाद अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 
  
         उत्तराखंड की कई अन्य महिलाओं ने भी विभन्नि क्षेत्रों में विशिष्ट उपलब्धियां हासिल की। इनकी सूची काफी लंबी है जैसे कि उत्तराखंड की पहली महिला कुलपति प्रो. सुशीला डोभाल (1977 में पहली बार और 1984—85 में दूसरी बार गढ़वाल विश्वविद्यालय की कुलपति बनी थी), उत्तराखंड की पहली महिला आईएएस अधिकारी ज्योति राव पांडेय, भारत की पहली महिला मेजर जनरल माया टम्टा, बैडमिंटन में विशेष छाप छोड़ने वाली मधुमिता बिष्ट, भारतीय महिला क्रिकेट टीम की स्पिनर एकता बिष्ट आदि प्रमुख हैं। यहां पर कई नामों का जिक्र नहीं हो पाया। उम्मीद है कि घसेरी के पाठक टिप्पणी वाले कालम में इस कमी को पूरा करेंगे। आपका धर्मेन्द्र पंत 


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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी' : प्रेमचंद भी थे जिनके प्रशंसक

'' आपकी 'अधूरा चित्र' कहानी अगस्त की 'माधुरी' में देखी और मुग्ध हो गया। सैकड़ों बधाईयां। विषय इतना मनोवैज्ञानिक और उसे ऊपर से इतनी खूबी से निभाया गया है कि पूरा चित्र करूण और व्यथित कल्पना के साथ आंखों के आगे खिंच जाता है। अब आप गल्प लेखकों की पहली सतर में आ गये हैं। ''

--------  महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद का श्री रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी' को आठ सितंबर 1935 को लिखे गये पत्र के अंश।

     
    कहानीकार, उपन्यासकार, पत्रकार, प्रकाशक लेकिन दिल से पहाड़ी। उनकी कहानियों से कोई और नहीं बल्कि महान कथाकार प्रेमचंद भी प्रभावित थे। इसके बावजूद रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी' को हिन्दी साहित्य में वह स्थान नहीं मिला जिसके वह असल में हकदार थे। आखिर क्यों? अगर इस सवाल का जवाब ढूंढकर गलती में सुधार करने की कोशिश की जाती तो फिर देश के लाखों हिन्दी प्रेमी उस शख्स से अनजान नहीं रहते जिसने 1927 से कथा लेखन की शुरूआत करके एक समय अपनी विशिष्ट पहचान बना ली थी। पिछले दिनों नेशनल बुक ट्रस्ट के कार्यालय जाना हुआ तो तब वहां हिन्दी विभाग के संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी ने मेरा परिचय इस महान कथाकार से करवाया। उनकी कहानियों का संकलन हाथ में लेकर मैं उत्साहित था। मर्मस्पर्शी कहानियां जिनमें जीवन मूल्य, जीवन का कठोर यथार्थ समाहित है। जिनमें पहाड़ का संघर्ष भी दिखता है तो युद्ध के दु​ष्परिणामों की झलक भी मिलती है। कहानियों पर संक्षिप्त चर्चा बाद में करेंगे लेकिन पहले मैं आपका परिचय इस शख्सियत से करा देता हूं जिनका नाम है, रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी'।
     पौड़ी गढ़वाल के बड़ेथ गांव में एक अगस्त 1911 को जन्में रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी' के पिताजी का नाम गोविन्द प्रसाद और माताजी का नाम सूरजी देवी था। राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल होने के लिये 1927 में इण्टर करने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी। उसी वर्ष यानि 1927 में उनकी पहली कहानी कलकत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित पत्रिका 'सरोज' में छपी थी। इसके बाद अगले 50 वर्षों तक उनकी सृजन यात्रा चलती रही जिसमें उनके 19 कहानी संग्रह तथा तीन उपन्यास प्रकाशित हुए। पहाड़ी जी हिन्दी के अलावा गढ़वाली में भी समान रूप से लिखते थे। उत्तराखंड के ग्रामीण जीवन पर लिखने वाले वह पहले कथाकार थे। वह अंग्रेजी समाचार पत्रों 'स्टेट्समैन', 'टाइम्स आफ इंडिया', और 'अमृत बाजार पत्रिका' के संवाददाता भी रहे। वह 1940 में लखनऊ में आकाशवाणी से जुड़े। बाद में उन्होंने आजीविका के लिये प्रकाशन व्यवसाय भी अपनाया था। स्वतंत्रता आंदोलन में भी पहाड़ी जी ने सक्रिय भूमिका निभायी। वह 1926 से 1948 तक क्रांतिकारियों के संपर्क में रहे। इस दौरान भूमिगत रहकर ही उन्होंने क्रांतिकारियों की मदद की। बाद में वह वामपंथी आंदोलन में भी सक्रिय रहे। इलाहाबाद उनका कर्मक्षेत्र रहा, लेकिन पहाड़ की अस्मिता पर जोर देने के लिये ही उन्होंने ‘पहाड़ी’ उपनाम अपनाया। 30 अक्टूबर 1997 को उन्होंने अंतिम सांस ली थी।
     पहाड़ी जी के चर्चित कहानी संग्रहों में — अधूरा चित्र (1942), बया का घोंसला (1944), सफर (1945), बड़े भैजी (1945) नया रास्ता (1946), मौली (1946), छाया में (1947), शेषनाग की थाती (1947), कैदी और बुलबुल (1951), पहाड़ी की प्रेम कहानियां (1976) आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा उन्होंने तीन उपन्यास — निर्देशक (1944), सराय (1946) और चलचित्र (1948) भी लिखे। ये तीनों उपन्यास उन्होंने फिल्मों के लिये लिखे थे। इसके अलावा उन्होंने बच्चों के लिये भी कहानियां लिखी हैं।
     ब पहाड़ी जी की कहानियों की बात करें। नेशनल बुक ट्रस्ट में उनकी 18 कहानियों का संकलन प्रकाशित किया है। वरिष्ठ लेखक, भाषाविद, अनुवादक और चिंतक डा. गंगा प्रसाद विमल ने इन कहानियों को संकलित किया है। उनके शब्दों में, '' रमा प्रसाद घिल्डियाल को पर्वतीय होने के कारण सहज ही सृजनात्मक पीठिका के रूप में उपलब्ध था और उन्होंने उसी सूत्र के सहारे दरिद्र, दलित ओर स्त्री या अबला जैसे पक्षों को अपने सृजनात्मक कर्म के प्रमुख विषय चुने जो इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ में साहित्यिक विमर्श के परिपक्व व केंद्रीय विषय बने और एक तरह से प्रवृति सूचक सूत्रों के रूप में याद किये जाते हैं। ''
    असल में पहाड़ी जी यथार्थवादी लेखक थे। जब उनका जन्म हुआ तो उसके तुरंत बाद ही प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया। इसके बाद जब उन्होंने सबसे अधिक साहित्य सृजन​ किया तब दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था। इसकी स्पष्ट छाप उनकी कहानियों में देखने को मिल जाती है। संक्रांति, नागफांस, अतिथि, पतझड़, ब्रैंडकोट, नाता रिश्ता, चीन के आंचल में कुछ ऐसी ही कहानियां हैं जिनमें पहाड़ी जी यही संदेश देना चाहते हैं कि युद्ध से किसी का भला नहीं हो सकता है। बंगाल के अकाल के जीवंत वर्णन के लिये समालोचक उन्हें आज भी याद करते हैं। प्रेमचंद के साहित्य पर काम करने वाले लेखक और प्राध्यापक श्री कमल किशोर गोयनका के शब्दों में, ''पहाड़ी और उनकी पीढ़ी के लेखकों के लिए साहित्य और जीवन एक था, यश और धन-पद के लिए आज जैसा पागलपन न था और न साहित्य दक्षिण-वाम में बंटा हुआ था। ऐसा नहीं था कि सब कुछ पवित्र और शुद्ध था, किंतु साहित्य कर्म में पूरी ईमानदारी, तटस्थता और समर्थता थी। मेरे लिए पहाड़ी ऐसे ही लेखक थे जिन्होंने अपने साथ से पर्वतीय जीवन के नए द्वार खोले और पाठकों को मौलिक साहित्य प्रदान किया।''
     पहाड़ी जी ने स्त्री पुरूष संबंधों को बहुत ही अच्छी तरह से उकेरा है। अधूरा चित्र, सफर, सपने की दुनिया, निरूपमा, वह किसकी तस्वीर थी, रामू और भाभी, बया का घोंसला आदि में वह स्त्री पुरूष संबंधों की नई तरह से व्याख्या पेश करते हैं। जिस 'अधूरा चित्र' कहानी की प्रेमचंद ने भी सराहना की वह एक मार्मिक कथा है जिसमें विजातीय विवाह और प्रेमिका की असाध्य बीमारी का बहुत मर्मस्पर्शी शब्दों में वर्णन किया गया है। छोटा देवर, ब्रैंडकोट में पहाड़ की स्पष्ट झलक दिखती है। छोटा देवर में एक संवाद है, ''तेरी ब्वारी तो राणी बौराणी लग रही थी। मैं गिताड़ होता तो तुम पर गीत लिखता....''।
     अगर भाषा की बात करें तो कवि शमशेर बहादुर सिंह ने उनकी भाषा को 'कविता की व्यंजना लिये हुए' बताया है। उनके अनुसार, '' पहाड़ी ने नई भाषा का सृजन किया है। उनका वाक्य विन्यास तथा शैली एकदम ऐसे है जो कविता की सी व्यंजना लिये हुए है। ''
     'रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी' संकलित कहानियां' पुस्तक को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट) ने प्रकाशित किया है। इसकी कीमत 275 रूपये है और यह आनलाइन (http://www.nbtindia.gov.in/books_detail__19__indian-literature__2618__rama-prasad-ghildiyal-pahare.nbt) भी उपल​ब्ध है।

आपका धर्मेन्द्र पंत


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रविवार, 5 फ़रवरी 2017

जब मैं पहली बार बाराती बना .....

आजकल बारात के स्वागत के समय प्रवेश द्वार पर रिबन बांध दिया जाता है। पहले युवक मंगल दल के सदस्य स्वागत करते थे और स्वागत गीत गाने के साथ नारे लगाते थे। 

    भैजी ने जब ग्रेजुएशन करने के बाद नौकरी के लिये शहरों की तरफ रूख किया तो तब मैं 13 साल का था। भैजी के दूर परदेस में जाने से मन उदास था लेकिन उसका कोई कोना उल्लास से भी भरा था। अब गांव में किसी लड़के की शादी होने पर बारात में जाने का मौका मुझे मिलेगा क्योंकि बुबाजी (पिताजी) शादियों में केवल औपचारिकता के लिये शरीक होते थे। पहले भैजी ने बारात में जाने की जिम्मेदारी निभायी और स्वाभाविक था कि अब मेरी बारी थी। ऐसी जिम्मेदारी जिसे मैं खुशी खुशी लेने के लिये ही नहीं बल्कि छीनने के लिये तैयार बैठा था। मां—पिताजी को भी बता दिया था कि अब यह जिम्मेदारी मेरी है। आखिर कब तक मैं दूसरों को ही नमकीन, बिस्कुट और लड्डू का आनंद उठाते हुए देखता। गांव में लड़कियों की शादियों में आने वाले बारातियों को चाय के साथ नमकीन, बिस्कुट के स्वाद से मिलने वाले आनंद को अधिकतर समय मैंने केवल अहसास किया था। जिंदगी में एक अवसर आया था जब मैं पहली बार बाराती बना था। तब मैं 10-11 साल का था। गांव की एक शादी में पिताजी के अलावा भैजी को अलग से बाराती बनने का न्यौता दिया था। मैंने जिद पकड़ ली कि जब पिताजी को मिलने वाले न्यौते पर भैजी बाराती बनते हैं तो इस बारे मुझे मौका मिलना चाहिए। भैजी साथ में थे इसलिए मुझे अनुमति मिल गयी। नये कपड़े तो नहीं थे लेकिन मेरे पास तब जो सबसे सुंदर कपड़े थे उन्हें पहन लिया। मां ने बालों में तेल लगाकर, उन्हें कंघी से अच्छी तरह संवारकर तैयार कर दिया था। भैजी को हिदायत मिल चुकी थी कि वह मेरा ध्यान रखें। 
     बारात निकल पड़ी और मैं बड़ी शान से उसमें चल रहा था। ढोल दमौ की थाप पर कुछ लोग नाच रहे थे लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था कि गांव के प्रत्येक व्यक्ति की नजर मुझ पर ही है। ऐसे में थोड़ा इतरा कर चलना लाजिमी था। बारात गांव से निकल पड़ी और गांव के ठीक आगे खड़ी चढ़ाई (जिसे हम चांद की धार कहते थे) से होकर हमें पहाड़ी के दूसरी तरफ उतराई होते हुए दूर बसे एक गांव में जाना था। मैं भी बारात के आगे चलने वाले सफेद रंग के ध्वज के पीछे चलते हुए चढ़ाई चढ़ने लगा। यहां पर पहले मैं आपको बारात के साथ चलने वाले सफेद और लाल रंग के ध्वज के बारे में बता देता हूं। उत्तराखंड में प्रचलन है कि जब दूल्हा अपने घर से निकलकर दुल्हन के घर जाता है तो आगे सफेद रंग का ध्वज (निशाण) होता और पीछे लाल रंग का। यह प्रथा भी सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। निशाण का मतलब है निशान या फिर संकेत। इसका संदेश यह होता है कि हम आपकी पुत्री का वरण करने आये हैं और शांति के साथ विवाह संपन्न करवाना चाहते हैं। इसलिए सफेद ध्वज आगे रहता है। लाल रंग का ध्वज इस संदेश के साथ जाता था कि शादी के लिये वे युद्ध करने के लिये भी तैयार हैं। जब विवाह संपन्न हो जाता है तो फिर घर वापसी के समय लाल रंग का निशाण आगे और सफेद रंग का पीछे होता है। लाल रंग का ध्वज तब इसलिए आगे रखा जाता है जिसका मतलब यह होता है कि वे विजेता बनकर लौटे हैं और दुल्हन को साथ लेकर आ रहे हैं।

गांवों में आजकल दिन की शादियां होने लगी हैं। इसलिए शादियों की रंगत भी फीकी पड़ गयी है।

   त्साह से लबरेज होने के कारण मुझे चढ़ाई तो बहुत आसान लग रही थी। मां ने हिदायत दे रखी थी कि बारात के पीछे नहीं चलना है। जब भी गांव में बारात आती थी तो मां कहती थी कि उसके पीछे नहीं चलना चाहिए। इसके पीछे उनके अपने तर्क थे। कुछ डरावने किस्से भी। बारात के छामाखाल पहुंचने पर सड़क के दर्शन हो गये थे। यहां पर ढोल वादक ने अपनी कला का भरपूर प्रदर्शन किया तो मसकबाज और दमौ वादक ने उसका पूरा साथ दिया। युवा लड़के थिरकने लगे और उनसे कुछ दूरी पर मेरे भी पांव चलने लगे। अभी शमां बंधा ही था कि तभी सड़क में दूसरी तरफ से एक और बारात आती दिखायी दी। एक बुजुर्ग ने आवाज लगायी कि दूल्हे को छिपाओ। मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। हमें सड़क के नीचे वाले रास्ते पर निकलना था और हमारी बारात ने तुरंत वह रास्ता पकड़ लिया। दूल्हे को उनके कुछ दोस्त घेरे हुए थे ताकि दूसरे दूल्हे की नजर उस पर नहीं पड़े। पता चला कि कमोबेश यही स्थिति दूसरे दूल्हे की होगी। बाद में मां ने बताया कि दो दूल्हों या दुल्हनों का मिलन अशुभ माना जाता है।
    बारात जब दुल्हन के गांव में पहुंची तो सभी घराती स्वागत के लिये तैयार बैठे थे। उस समय आज के जमाने की तरह गेट पर रिबन बांधने का रिवाज नहीं था। गांव का युवक मंगल दल बारातियों का गीत और नारों से स्वागत करता था। गांव में अब भी यह प्रचलन है। युवक मंगल दल के दो सदस्य आगे कपड़े का बना बड़ा बैनर पकड़ते है जिस पर लिखा होता था 'अमुक गांव का युवक मंगल दल आपका स्वागत करता है।' बारात के इस स्वागत के लिये बाद में युवक मंगल दल के सदस्यों को कुछ इनाम भी मिलता है। हमारा भी स्वागत पूरे जोर शोर से किया गया। घराती गांव वाले लड़के गा रहे थे, ''स्वागत प्यारे, बंधु हमारे स्वागत हम सब करते हैं, दया करोगे, लाज रखोगे यही भरोसा रखते हैं .....'' बीच—बीच में नारे में लगा रहे थे जैसे ''हर्ष—हर्ष, जय—जय। बाल युवक मंगल दल आपका स्वागत करता है। वर—वधु की जोड़ी अमर रहे।'' स्वागत करने के बाद युवक मंगल दल के सदस्यों की ही जिम्मेदारी थी वे हमारी आवभगत करें। आवभगत का मतलब सभी बारातियों को पहले पानी के लिये पूछना और फिर उन तक चाय, नमकीन, बिस्कुट और कोई मिठाई पहुंचाना। पहले मिठाई का मतलब होता था लड्डू। मेरे मुंह में तो अभी से पानी आ रहा था।
    दुल्हन के घर के पास में बड़ी चांदनी (शामियाना) लगा रखी थी। उसके अंदर गांव के विभिन्न घरों से मांगकर कुर्सियां सजायी गयी थी। कुछ चारपाईयां लगी थी। नीचे दरियां बिछी हुई थी। सभी बच्चों को नीचे दरियों में बैठने का आदेश मिल चुका था। बड़े बुजुर्ग कुर्सियों या चारपाई पर विराजमान थे। पास में ही दूल्हे को मिलने वाला पलंग और उस पर चमचमाती चादर और रजाई रखी थी। दूल्हे के दोस्तों ने उस पर कब्जा जमा लिया था। गैस (पेट्रोमैक्स) की रोशनी से नहा रही थी चांदनी। उस समय गांवों में प्रचलन था कि बारात पहुंचने पर दुल्हन की सहेलियां मांगल गीत गाती और मजाकिया अंदाज में दूल्हे, उसकी तरफ के पंडित, उसके दोस्तों आदि को 'मांगल में ही गालियां' देकर छेड़ती। जैसे ..., ''अरे ब्योला तु बामण नि ले जाणू ....। हमरा गांऊ कुकर भुख्यूंच, ब्योला कु बबा उबर लुक्युंच ....। '' इनमें आग्रह भी होता था जैसे, ''छ्वटी बटै कि बड़ि बणाई सैंती पालि की, ये फूल थै रख्यां जवैं संभालि कि.....। '' इस दौरान बारात में आये युवा नौजवान भी लड़कियों से नैन मटका करने की कोशिश करते। उन्हें भी मांगल में ही गालियां पड़ती।
     मेरी नजर नमकीन बिस्कुट पर थी। उसे पहले बड़े बुजुर्गों में बांटा जा रहा था। मन में धुकधुकी लगी थी कि कहीं मेरी बारी आते आते नमकीन बिस्कुट खत्म नहीं हो जाए। जहां पर मैं बैठा था कि वहां पर भी अब दो युवक चाय, नमकीन—बिस्कुट से भरी कागज प्लेटें बांटने लगे थे। एक कांच में गिलास में भरकर चाय देता और दूसरा नमकीन से भरा पैकैट या प्लेट पकड़ाता। अब मुझे बाराती होने का असली आनंद मिलने वाला था। लेकिन यह किस्सा मेरे साथ ही घटने वाला था। बाराती बच्चों के बीच में मैं छूट गया। अब वे दूसरी तरफ बैठे बारातियों की आवभगत कर रहे थे। मेरे आंसू निकल पड़े। मेरी निगाहें भैजी को खोज रही थी। केवल उन्हीं से मैं अपनी व्यथा कह सकता था। भैजी पीछे बैठे थे। मैं तुरंत ही उनके पास चला गया और फिर सुबकने लगा। मैंने उन्हें कारण बताया तो उन्होंने ढाढस बंधाते हुए अपनी प्लेट मुझे दे दी। मैं तो नयी प्लेट लेने की जिद पर अड़ा था। पास में बैठे गांव के एक चाचाजी को जब माजरा पता चला तो उन्होंने स्वागतकर्मियों को हड़काया। अब तो तुरंत ही मेरे पास चाय और नमकीन बिस्कुट की प्लेट पहुंच गयी। अब तक हालांकि जिस आनंद की मैंने कल्पना की थी वह काफूर हो चुका था।
अठारह साल पहले भी बारात पहुंचने पर 
वरमाला का चलन शुरू हो गया था। मैंने भी ऐसा 
किया था। मेरी शादी का एक चित्र।
     कुछ देर बाद पंडित जी पिठाई लेकर आ गये और उनके साथ लिफाफों में बंद दक्षिणा। पंडित जी और लिफाफा पकड़ाने वाले दोनों से कोई चूक नहीं हुई। मैंने तुरंत लिफाफा खोला तो भैजी ने सनकाया (सनकाण यानि इशारा, संकेत करना) भी कि मैं अभी ऐसा नहीं करूं। लिफाफे के अंदर एक रूपये के चमचमाते नोट ने कुछ देर पहले के मेरे सारे अवसाद को खत्म कर दिया था। लिफाफा भैजी को सौंप दिया। रात का भोजन करने के बाद कुछ बाराती अपने लिये सोने की जगह तलाश करने लगे। बाकी बारातियों को अभी रात्रि मनोरंजन के लिये बुलाये गये जोकरों को देखना था। इच्छा तो मेरी भी थी लेकिन तभी मुझे नमकीन—बिस्कुट नहीं मिलने पर उस गांव के लड़कों को हड़काने वाले चाचाजी आ गये। उन्होंने बताया कि उन्हें सोने की जगह मिल गयी है। चारपाई एक है और मैं उनके साथ सो जाऊंगा। अभी हम लेटे ही थे कि कुछ और बाराती जगह की तलाश में पहुंच गये। चाचाजी ने चुपके से मेरे कान में कहा, ''चौड़े होकर सोजा नहीं तो इनमें से कोई हमारे साथ घुस जाएगा।'' मैंने तुरंत आदेश पर अमल किया। 
     सुबह रात का बचे खाने का ही नाश्ता किया, चाय पी और फिर उस गांव के लड़कों के साथ क्रिकेट खेलने लग गये। बाकी वेदी में चले गये क्योंकि वहां पर भी गांव की लड़कियों की गालियों से दूल्हे, उसके साथियों और अन्य की पूजा होने वाली थी। इस दौरान खूब मजाक और चुहलबाजी होती। मुझे तो वर्षों बाद पता चला कि इसका अलग आनंद है। हालांकि धीरे धीरे यह प्रथा खत्म होती गयी और अब शायद ही किसी गांव में बारात आने पर लड़कियां 'मांगल में मजाकिया गालियां' देती होंगी। दिन का खाना करने के बाद बारात जाने से पहले फिर से पिठाई लगी। फिर से एक रूपये की दक्षिणा मिली। दक्षिणा मिलते ही कुछ लोग गांव की तरफ कूच करने लगे। मैं भी उनके साथ हो लिया। मुझे दुल्हन का दहाड़ें मारकर रोना कभी अच्छा नहीं लगा और अब यहां भी यही होने वाला था। दूल्हे के साथ कुछ बाराती विशेषकर उसके साथी रह जाते। दुल्हन की सहेलियां गांव से दूर तक उसे छोड़ने के लिये आती और इस बीच भी खूब मजाक चलता था। भले ही मुझे तब इससे मतलब नहीं था। रास्ते में मुझे मेरे गांव की लड़कियां दिखी। वे दुल्हन को लेने आयी थी। मैं तो जल्द से जल्द घर पहुंचकर मां के सामने बारात के अपने पहले अनुभव को बयां करने के लिये बेताब था।
       इसके बाद मैं कई बार बाराती बना। तेरह साल की उम्र ही चाय पीनी छोड़ दी थी और कुछ वर्षों बाद नमकीन—बिस्कुट का मोह भी खत्म हो गया। पिछले कुछ वर्षों से तो बारात में मिलने वाली दक्षिणा का खुलकर विरोध भी कर रहा हूं। अब बाराती बनना औपचारिकता पूरी करने जैसा होता है। उसमें पहले जैसा आनंद और उत्साह नहीं बचा है। गांव में दिन की शादियां हो रही हैं और शहरों में तो यह दो तीन घंटे का खेल है। मेरी शादी भी शहर में हुई। दिल्ली से गुड़गांव गयी थी मेरी बारात। आज से ठीक 18 साल पहले पांच फरवरी 1999 को अंजू मेरी जीवनसंगिनी बनी थी। ऐसे में मैंने अपनी पहली बारात की कुछ यादें ताजा करने की कोशिश की। आपको कैसे लगी ब्लॉग के नीचे कमेंट वाले कालम में यह जरूर बतायें। आपका धर्मेन्द्र पंत


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