बुधवार, 8 मार्च 2017

उत्तराखंड की कुछ प्रसिद्ध महिलाएं

                             अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (आठ मार्च) पर विशेष


मुगलों की नाक काटने वाली रानी कर्णावती 

        भारतीय इतिहास में जब रानी कर्णावती का जिक्र आता है तो फिर मेवाड़ की उस रानी की चर्चा होती है जिसने मुगल बादशाह हुमांयूं के ​लिये राखी भेजी थी। इसलिए रानी कर्णावती का नाम रक्षाबंधन से अक्सर जोड़ दिया जाता है। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि इसके कई दशकों बाद भारत में एक और रानी कर्णावती हुई थी और यह गढ़वाल की रानी थी। इस रानी को मुगलों की नाक काटने के लिये जाना जाता है और इसलिए कुछ इतिहासकारों ने उनका जिक्र नाक क​टी रानी या नाक काटने वाली रानी के रूप में किया है। रानी कर्णावती ने गढ़वाल में अपने नाबालिग बेटे पृथ्वीपतिशाह के बदले तब शासन का कार्य संभाला था जबकि दिल्ली में मुगल सम्राट शाहजहां का राज था। रानी कर्णावती वह पवांर वंश के राजा महिपतशाह की पत्नी थी। जब महिपतशाह की मृत्यु हुई तो उनके पुत्र पृथ्वीपतिशाह केवल सात साल के थे। राजगद्दी पर पृथ्वीपतिशाह ही बैठे लेकिन राजकाज उनकी मां रानी कर्णावती ने चलाया। इस दौरान जब मुगलों ने गढ़वाल पर आक्रमण किया तो रानी कर्णावती ने उन्हें छठी का दूध याद दिलाया था। गढ़वाल की सेना ने मुगल सेना को हरा दिया था। मुगल सैनिकों के हथियार छीन दिये गये थे और आखिर में उनके एक एक करके नाक काट दिये गये थे। कहा जाता है कि जिन सैनिकों की नाक का​टी गयी उनमें सेनापति नजाबत खान भी शामिल था।  विस्तार से पढ़ने के लिये क्लिक करें "मुगल सैनिकों की नाक काटने वाली गढ़वाल की रानी कर्णावती"

युवा वीरांगना तीलू रौतेली 

          केवल 15 वर्ष की उम्र में रणभूमि में कूद कर सात साल तक अपने दुश्मन राजाओं को छठी का दूध याद दिलाने वाली गढ़वाल की वीरांगना थी 'तीलू रौतेली'। इस महान वीरांगना का जन्म कब हुआ। इसको लेकर कोई तिथि स्पष्ट नहीं है। गढ़वाल में आठ अगस्त को उनकी जयंती मनायी जाती है और यह माना जाता है कि उनका जन्म आठ अगस्त 1661 को हुआ था। उस समय गढ़वाल में पृथ्वीशाह का राज था। इसके विपरीत जिस कैंत्यूरी राजा धाम शाही की सेना के साथ तीलू रौतेली ने युद्ध किया था उसने इससे पहले गढ़वाल के राजा मानशाह पर आक्रमण किया था जिसके कारण तीलू रौतेली को अपने पिता, भाईयों और मंगेतर की जान गंवानी पड़ी थी। तीलू रौतेली ने इसका बदला चुकता करने की ठानी और आखिर में वह इसमें सफल रही। इस वीरांगना ने केवल 22 साल की उम्र में प्राण त्याग दिये थे लेकिन इतिहास में वह अपना नाम हमेशा के लिये अजय अमर कर गयी। विस्तार से पढ़ने के लिये क्लिक करें "तीलू रौतेली ..वर्षों पहले बन गयी थी लक्ष्मीबाई"

शराबबंदी की समर्थक टिंचरी माई 

        लीसैंण के मंज्यूड़ गांव में 1917 को जन्मी दीपा नौटियाल ने बचपन में ही अपने माता पिता को गंवा दिया था। चाचा ने बचपन में ही उनकी शादी सेना के जवान से कर दी जो युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गया। तब दीपा की उम्र 19 साल की थी। वह संन्यासिन बनी और बाद में पहाड़ लौटकर यहां की कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने लगी। उन्होंने पहाड़ में शराबबंदी के लिये आवाज उठायी। अंग्रेज अफसर से डरे बिना अपने गांव में टिंचरी यानि शराब की दुकान जला डाली। तभी से लोग उन्हें टिंचरी माई कहने लगे। उन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक कार्यों में समर्पित कर दिया था। उन्हें इच्छागिरी माई के नाम से भी जाना जाता है। टिंचरी माई ने 19 जून 1992 को अंतिम सांस ली थी। 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बिशनी देवी शाह 

        देश के स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड की महिलाओं का भी अहम योगदान रहा और इनमें बिशनी देवी शाह प्रमुख हैं। उनका जन्म 12 अक्तूबर 1902 को बागेश्वर में हुआ था और वह किशोरावस्था से ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ी थी और देश के आजाद होने तक इसमें सक्रिय रही। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भी अहम भूमिका निभायी थी। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े होने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इस महान स्वतंत्रता सेनानी का वर्ष 1974 में 73 वर्ष की उम्र में निधन हुआ। 

सुप्रसिद्ध लेखिका शिवानी 

     त्तराखंड की प्रसिद्ध उपन्यासकार शिवानी उर्फ गौरा पंत का जन्म 17 अक्तूबर 1923 को हुआ था।  उन्होेंने 12 साल की उम्र से लिखना शुरू किया और फिर 21 मार्च 2003 को अपने निधन तक लगातार लेखन से जुड़ी रही। उनकी लिखी कृतियों मे कृष्णकली, भैरवी, आमादेर शन्तिनिकेतन, विषकन्या चौदह फेरे, कृष्णकली, कालिंदी, अतिथि, पूतों वाली, चल खुसरों घर आपने, श्मशान चंपा, मायापुरी, कैंजा, गेंदा, भैरवी, स्वयंसिद्धा, विषकन्या, रति विलाप आदि प्रमुख हैं। हिंदी साहित्य जगत में शिवानी को ऐसी लेखिका के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने अपनी कृतियों में उत्तर भारत के कुमाऊं क्षेत्र के आसपास की लोक संस्कृति की झलक दिखायी और किरदारों का बहुत सुंदर तरीके से चरित्र चित्रण किया। हिंदी के अलावा उनकी संस्कृत, गुजराती, बंगाली, उर्दू तथा अंग्रेजी पर भी अच्छी पकड़ थी। 

चिपको की प्रणेता : गौरा देवी 

      गौरा देवी विश्व प्रसिद्ध चिपको आन्दोलन की जननी रही हैं। उनका जन्म 1925 में हुआ था। वह पहाड़ में जंगलों की अंधाधुंध कटाई का विरोध करने के लिये गौरा देवी अपनी साथियों के साथ पेड़ों से चिपक गयी थी। तब पहाड़ों में वन निगम के माध्यम से ठेकेदारों को पेड़ काटने का ठेका दिया जाता था। गौरा देवी को जब पता चला कि पहाड़ों में पेड़ काटने के ठेके दिये जा रहे हैं तो उन्होंने अपने गांव में महिला मंगलदल का गठन किया। गौरा देवी कहा करती थी कि वन हमारे भगवान हैं इन पर हमारे परिवार और हमारे मवेशी पूर्ण रूप से निर्भर हैं। उनका विवाह 11 वर्ष में हो गया था और 22 साल की उम्र में उनके पति का निधन हो गया था। उन्होंने इसके बाद अपने बेटे की पर​वरिश करने के साथ अपना जीवन गांव और जंगल की रक्षा के लिये समर्पित कर दिया था। उन्हें 1986 में पहले वृक्ष मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। पेड़ों की रक्षा के लिये अपना जीवन समर्पित करने वाली गौरा देवी ने चार जुलाई 1991 को अंतिम सांस ली।

जागर को नयी पहचान दी बसंती बिष्ट ने 

     त्तराखंड में देवी देवताओं के स्तुति गान यानि जागर गायन का काम मुख्य रूप से पुरूष करते हैं लेकिन श्रीमती बसंती बिष्ट ने न सिर्फ इस विधा से जुड़ी बल्कि उन्होंने देश विदेश में जागर गायन को पहचान भी दिलायी। वह मां भगवती नंदा के जागरों के गायन के मशहूर हैं। अपनी मां से जागर गायन सीखने वाली बसंती देवी को भारत सरकार ने लोक संगीत के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिये वर्ष 2017 में पदमश्री से सम्मानित किया। वह उत्तराखंड आंदोलन से भी जुड़ी रही और इस बीच वह अपने गीतों के जरिये इस आंदोलन को मजबूती देती रही। बसंती बिष्ट ने नंदा देवी की जागरों की एक पुस्तक ‘नंदा के जागर- सुफल ह्वे जाया तुम्हारी जात्रा’ भी लिखी है। 

भारत की पहली एवरेस्ट विजेता महिला बछेंद्री पाल 

       उत्तराखंड में साहसिक खेलों में अहम योगदान देने वाली महिलाओं की बात आती तो सुश्री चंद्रप्रभा ऐतवाल और फिर बछेंद्री पाल का नाम स्वाभाविक ही जुबान पर आ जाता है। ये दोनों ही पर्वतारोहण से जुड़ी थी। पिथौरागढ़ के धारचूला गांव में 24 दिसंबर 1941 को जन्मीं चंद्रप्रभा ने पर्वतारोहण की विभिन्न अभियानों की अगुवाई की और उन्हें पदमश्री और अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। बछेंद्री पाल ने पर्वतारोहण को नये आयाम तक पहुंचाया। 24 मई 1954 को उत्तरकाशी के नकुरी में जन्मी बछेंद्री पाल ने 23 मई 1984 को एवरेस्ट फतह किया था और ऐसा करने वाली वह भारत की पहली महिला पर्वतारोही बनी थी। उन्हें 1984 में पदमश्री और इसके दो साल बाद अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 
  
         उत्तराखंड की कई अन्य महिलाओं ने भी विभन्नि क्षेत्रों में विशिष्ट उपलब्धियां हासिल की। इनकी सूची काफी लंबी है जैसे कि उत्तराखंड की पहली महिला कुलपति प्रो. सुशीला डोभाल (1977 में पहली बार और 1984—85 में दूसरी बार गढ़वाल विश्वविद्यालय की कुलपति बनी थी), उत्तराखंड की पहली महिला आईएएस अधिकारी ज्योति राव पांडेय, भारत की पहली महिला मेजर जनरल माया टम्टा, बैडमिंटन में विशेष छाप छोड़ने वाली मधुमिता बिष्ट, भारतीय महिला क्रिकेट टीम की स्पिनर एकता बिष्ट आदि प्रमुख हैं। यहां पर कई नामों का जिक्र नहीं हो पाया। उम्मीद है कि घसेरी के पाठक टिप्पणी वाले कालम में इस कमी को पूरा करेंगे। आपका धर्मेन्द्र पंत 


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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी' : प्रेमचंद भी थे जिनके प्रशंसक

'' आपकी 'अधूरा चित्र' कहानी अगस्त की 'माधुरी' में देखी और मुग्ध हो गया। सैकड़ों बधाईयां। विषय इतना मनोवैज्ञानिक और उसे ऊपर से इतनी खूबी से निभाया गया है कि पूरा चित्र करूण और व्यथित कल्पना के साथ आंखों के आगे खिंच जाता है। अब आप गल्प लेखकों की पहली सतर में आ गये हैं। ''

--------  महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद का श्री रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी' को आठ सितंबर 1935 को लिखे गये पत्र के अंश।

     
    कहानीकार, उपन्यासकार, पत्रकार, प्रकाशक लेकिन दिल से पहाड़ी। उनकी कहानियों से कोई और नहीं बल्कि महान कथाकार प्रेमचंद भी प्रभावित थे। इसके बावजूद रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी' को हिन्दी साहित्य में वह स्थान नहीं मिला जिसके वह असल में हकदार थे। आखिर क्यों? अगर इस सवाल का जवाब ढूंढकर गलती में सुधार करने की कोशिश की जाती तो फिर देश के लाखों हिन्दी प्रेमी उस शख्स से अनजान नहीं रहते जिसने 1927 से कथा लेखन की शुरूआत करके एक समय अपनी विशिष्ट पहचान बना ली थी। पिछले दिनों नेशनल बुक ट्रस्ट के कार्यालय जाना हुआ तो तब वहां हिन्दी विभाग के संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी ने मेरा परिचय इस महान कथाकार से करवाया। उनकी कहानियों का संकलन हाथ में लेकर मैं उत्साहित था। मर्मस्पर्शी कहानियां जिनमें जीवन मूल्य, जीवन का कठोर यथार्थ समाहित है। जिनमें पहाड़ का संघर्ष भी दिखता है तो युद्ध के दु​ष्परिणामों की झलक भी मिलती है। कहानियों पर संक्षिप्त चर्चा बाद में करेंगे लेकिन पहले मैं आपका परिचय इस शख्सियत से करा देता हूं जिनका नाम है, रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी'।
     पौड़ी गढ़वाल के बड़ेथ गांव में एक अगस्त 1911 को जन्में रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी' के पिताजी का नाम गोविन्द प्रसाद और माताजी का नाम सूरजी देवी था। राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल होने के लिये 1927 में इण्टर करने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी। उसी वर्ष यानि 1927 में उनकी पहली कहानी कलकत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित पत्रिका 'सरोज' में छपी थी। इसके बाद अगले 50 वर्षों तक उनकी सृजन यात्रा चलती रही जिसमें उनके 19 कहानी संग्रह तथा तीन उपन्यास प्रकाशित हुए। पहाड़ी जी हिन्दी के अलावा गढ़वाली में भी समान रूप से लिखते थे। उत्तराखंड के ग्रामीण जीवन पर लिखने वाले वह पहले कथाकार थे। वह अंग्रेजी समाचार पत्रों 'स्टेट्समैन', 'टाइम्स आफ इंडिया', और 'अमृत बाजार पत्रिका' के संवाददाता भी रहे। वह 1940 में लखनऊ में आकाशवाणी से जुड़े। बाद में उन्होंने आजीविका के लिये प्रकाशन व्यवसाय भी अपनाया था। स्वतंत्रता आंदोलन में भी पहाड़ी जी ने सक्रिय भूमिका निभायी। वह 1926 से 1948 तक क्रांतिकारियों के संपर्क में रहे। इस दौरान भूमिगत रहकर ही उन्होंने क्रांतिकारियों की मदद की। बाद में वह वामपंथी आंदोलन में भी सक्रिय रहे। इलाहाबाद उनका कर्मक्षेत्र रहा, लेकिन पहाड़ की अस्मिता पर जोर देने के लिये ही उन्होंने ‘पहाड़ी’ उपनाम अपनाया। 30 अक्टूबर 1997 को उन्होंने अंतिम सांस ली थी।
     पहाड़ी जी के चर्चित कहानी संग्रहों में — अधूरा चित्र (1942), बया का घोंसला (1944), सफर (1945), बड़े भैजी (1945) नया रास्ता (1946), मौली (1946), छाया में (1947), शेषनाग की थाती (1947), कैदी और बुलबुल (1951), पहाड़ी की प्रेम कहानियां (1976) आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा उन्होंने तीन उपन्यास — निर्देशक (1944), सराय (1946) और चलचित्र (1948) भी लिखे। ये तीनों उपन्यास उन्होंने फिल्मों के लिये लिखे थे। इसके अलावा उन्होंने बच्चों के लिये भी कहानियां लिखी हैं।
     ब पहाड़ी जी की कहानियों की बात करें। नेशनल बुक ट्रस्ट में उनकी 18 कहानियों का संकलन प्रकाशित किया है। वरिष्ठ लेखक, भाषाविद, अनुवादक और चिंतक डा. गंगा प्रसाद विमल ने इन कहानियों को संकलित किया है। उनके शब्दों में, '' रमा प्रसाद घिल्डियाल को पर्वतीय होने के कारण सहज ही सृजनात्मक पीठिका के रूप में उपलब्ध था और उन्होंने उसी सूत्र के सहारे दरिद्र, दलित ओर स्त्री या अबला जैसे पक्षों को अपने सृजनात्मक कर्म के प्रमुख विषय चुने जो इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ में साहित्यिक विमर्श के परिपक्व व केंद्रीय विषय बने और एक तरह से प्रवृति सूचक सूत्रों के रूप में याद किये जाते हैं। ''
    असल में पहाड़ी जी यथार्थवादी लेखक थे। जब उनका जन्म हुआ तो उसके तुरंत बाद ही प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया। इसके बाद जब उन्होंने सबसे अधिक साहित्य सृजन​ किया तब दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था। इसकी स्पष्ट छाप उनकी कहानियों में देखने को मिल जाती है। संक्रांति, नागफांस, अतिथि, पतझड़, ब्रैंडकोट, नाता रिश्ता, चीन के आंचल में कुछ ऐसी ही कहानियां हैं जिनमें पहाड़ी जी यही संदेश देना चाहते हैं कि युद्ध से किसी का भला नहीं हो सकता है। बंगाल के अकाल के जीवंत वर्णन के लिये समालोचक उन्हें आज भी याद करते हैं। प्रेमचंद के साहित्य पर काम करने वाले लेखक और प्राध्यापक श्री कमल किशोर गोयनका के शब्दों में, ''पहाड़ी और उनकी पीढ़ी के लेखकों के लिए साहित्य और जीवन एक था, यश और धन-पद के लिए आज जैसा पागलपन न था और न साहित्य दक्षिण-वाम में बंटा हुआ था। ऐसा नहीं था कि सब कुछ पवित्र और शुद्ध था, किंतु साहित्य कर्म में पूरी ईमानदारी, तटस्थता और समर्थता थी। मेरे लिए पहाड़ी ऐसे ही लेखक थे जिन्होंने अपने साथ से पर्वतीय जीवन के नए द्वार खोले और पाठकों को मौलिक साहित्य प्रदान किया।''
     पहाड़ी जी ने स्त्री पुरूष संबंधों को बहुत ही अच्छी तरह से उकेरा है। अधूरा चित्र, सफर, सपने की दुनिया, निरूपमा, वह किसकी तस्वीर थी, रामू और भाभी, बया का घोंसला आदि में वह स्त्री पुरूष संबंधों की नई तरह से व्याख्या पेश करते हैं। जिस 'अधूरा चित्र' कहानी की प्रेमचंद ने भी सराहना की वह एक मार्मिक कथा है जिसमें विजातीय विवाह और प्रेमिका की असाध्य बीमारी का बहुत मर्मस्पर्शी शब्दों में वर्णन किया गया है। छोटा देवर, ब्रैंडकोट में पहाड़ की स्पष्ट झलक दिखती है। छोटा देवर में एक संवाद है, ''तेरी ब्वारी तो राणी बौराणी लग रही थी। मैं गिताड़ होता तो तुम पर गीत लिखता....''।
     अगर भाषा की बात करें तो कवि शमशेर बहादुर सिंह ने उनकी भाषा को 'कविता की व्यंजना लिये हुए' बताया है। उनके अनुसार, '' पहाड़ी ने नई भाषा का सृजन किया है। उनका वाक्य विन्यास तथा शैली एकदम ऐसे है जो कविता की सी व्यंजना लिये हुए है। ''
     'रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी' संकलित कहानियां' पुस्तक को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट) ने प्रकाशित किया है। इसकी कीमत 275 रूपये है और यह आनलाइन (http://www.nbtindia.gov.in/books_detail__19__indian-literature__2618__rama-prasad-ghildiyal-pahare.nbt) भी उपल​ब्ध है।

आपका धर्मेन्द्र पंत


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रविवार, 5 फ़रवरी 2017

जब मैं पहली बार बाराती बना .....

आजकल बारात के स्वागत के समय प्रवेश द्वार पर रिबन बांध दिया जाता है। पहले युवक मंगल दल के सदस्य स्वागत करते थे और स्वागत गीत गाने के साथ नारे लगाते थे। 

    भैजी ने जब ग्रेजुएशन करने के बाद नौकरी के लिये शहरों की तरफ रूख किया तो तब मैं 13 साल का था। भैजी के दूर परदेस में जाने से मन उदास था लेकिन उसका कोई कोना उल्लास से भी भरा था। अब गांव में किसी लड़के की शादी होने पर बारात में जाने का मौका मुझे मिलेगा क्योंकि बुबाजी (पिताजी) शादियों में केवल औपचारिकता के लिये शरीक होते थे। पहले भैजी ने बारात में जाने की जिम्मेदारी निभायी और स्वाभाविक था कि अब मेरी बारी थी। ऐसी जिम्मेदारी जिसे मैं खुशी खुशी लेने के लिये ही नहीं बल्कि छीनने के लिये तैयार बैठा था। मां—पिताजी को भी बता दिया था कि अब यह जिम्मेदारी मेरी है। आखिर कब तक मैं दूसरों को ही नमकीन, बिस्कुट और लड्डू का आनंद उठाते हुए देखता। गांव में लड़कियों की शादियों में आने वाले बारातियों को चाय के साथ नमकीन, बिस्कुट के स्वाद से मिलने वाले आनंद को अधिकतर समय मैंने केवल अहसास किया था। जिंदगी में एक अवसर आया था जब मैं पहली बार बाराती बना था। तब मैं 10-11 साल का था। गांव की एक शादी में पिताजी के अलावा भैजी को अलग से बाराती बनने का न्यौता दिया था। मैंने जिद पकड़ ली कि जब पिताजी को मिलने वाले न्यौते पर भैजी बाराती बनते हैं तो इस बारे मुझे मौका मिलना चाहिए। भैजी साथ में थे इसलिए मुझे अनुमति मिल गयी। नये कपड़े तो नहीं थे लेकिन मेरे पास तब जो सबसे सुंदर कपड़े थे उन्हें पहन लिया। मां ने बालों में तेल लगाकर, उन्हें कंघी से अच्छी तरह संवारकर तैयार कर दिया था। भैजी को हिदायत मिल चुकी थी कि वह मेरा ध्यान रखें। 
     बारात निकल पड़ी और मैं बड़ी शान से उसमें चल रहा था। ढोल दमौ की थाप पर कुछ लोग नाच रहे थे लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था कि गांव के प्रत्येक व्यक्ति की नजर मुझ पर ही है। ऐसे में थोड़ा इतरा कर चलना लाजिमी था। बारात गांव से निकल पड़ी और गांव के ठीक आगे खड़ी चढ़ाई (जिसे हम चांद की धार कहते थे) से होकर हमें पहाड़ी के दूसरी तरफ उतराई होते हुए दूर बसे एक गांव में जाना था। मैं भी बारात के आगे चलने वाले सफेद रंग के ध्वज के पीछे चलते हुए चढ़ाई चढ़ने लगा। यहां पर पहले मैं आपको बारात के साथ चलने वाले सफेद और लाल रंग के ध्वज के बारे में बता देता हूं। उत्तराखंड में प्रचलन है कि जब दूल्हा अपने घर से निकलकर दुल्हन के घर जाता है तो आगे सफेद रंग का ध्वज (निशाण) होता और पीछे लाल रंग का। यह प्रथा भी सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। निशाण का मतलब है निशान या फिर संकेत। इसका संदेश यह होता है कि हम आपकी पुत्री का वरण करने आये हैं और शांति के साथ विवाह संपन्न करवाना चाहते हैं। इसलिए सफेद ध्वज आगे रहता है। लाल रंग का ध्वज इस संदेश के साथ जाता था कि शादी के लिये वे युद्ध करने के लिये भी तैयार हैं। जब विवाह संपन्न हो जाता है तो फिर घर वापसी के समय लाल रंग का निशाण आगे और सफेद रंग का पीछे होता है। लाल रंग का ध्वज तब इसलिए आगे रखा जाता है जिसका मतलब यह होता है कि वे विजेता बनकर लौटे हैं और दुल्हन को साथ लेकर आ रहे हैं।

गांवों में आजकल दिन की शादियां होने लगी हैं। इसलिए शादियों की रंगत भी फीकी पड़ गयी है।

   त्साह से लबरेज होने के कारण मुझे चढ़ाई तो बहुत आसान लग रही थी। मां ने हिदायत दे रखी थी कि बारात के पीछे नहीं चलना है। जब भी गांव में बारात आती थी तो मां कहती थी कि उसके पीछे नहीं चलना चाहिए। इसके पीछे उनके अपने तर्क थे। कुछ डरावने किस्से भी। बारात के छामाखाल पहुंचने पर सड़क के दर्शन हो गये थे। यहां पर ढोल वादक ने अपनी कला का भरपूर प्रदर्शन किया तो मसकबाज और दमौ वादक ने उसका पूरा साथ दिया। युवा लड़के थिरकने लगे और उनसे कुछ दूरी पर मेरे भी पांव चलने लगे। अभी शमां बंधा ही था कि तभी सड़क में दूसरी तरफ से एक और बारात आती दिखायी दी। एक बुजुर्ग ने आवाज लगायी कि दूल्हे को छिपाओ। मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। हमें सड़क के नीचे वाले रास्ते पर निकलना था और हमारी बारात ने तुरंत वह रास्ता पकड़ लिया। दूल्हे को उनके कुछ दोस्त घेरे हुए थे ताकि दूसरे दूल्हे की नजर उस पर नहीं पड़े। पता चला कि कमोबेश यही स्थिति दूसरे दूल्हे की होगी। बाद में मां ने बताया कि दो दूल्हों या दुल्हनों का मिलन अशुभ माना जाता है।
    बारात जब दुल्हन के गांव में पहुंची तो सभी घराती स्वागत के लिये तैयार बैठे थे। उस समय आज के जमाने की तरह गेट पर रिबन बांधने का रिवाज नहीं था। गांव का युवक मंगल दल बारातियों का गीत और नारों से स्वागत करता था। गांव में अब भी यह प्रचलन है। युवक मंगल दल के दो सदस्य आगे कपड़े का बना बड़ा बैनर पकड़ते है जिस पर लिखा होता था 'अमुक गांव का युवक मंगल दल आपका स्वागत करता है।' बारात के इस स्वागत के लिये बाद में युवक मंगल दल के सदस्यों को कुछ इनाम भी मिलता है। हमारा भी स्वागत पूरे जोर शोर से किया गया। घराती गांव वाले लड़के गा रहे थे, ''स्वागत प्यारे, बंधु हमारे स्वागत हम सब करते हैं, दया करोगे, लाज रखोगे यही भरोसा रखते हैं .....'' बीच—बीच में नारे में लगा रहे थे जैसे ''हर्ष—हर्ष, जय—जय। बाल युवक मंगल दल आपका स्वागत करता है। वर—वधु की जोड़ी अमर रहे।'' स्वागत करने के बाद युवक मंगल दल के सदस्यों की ही जिम्मेदारी थी वे हमारी आवभगत करें। आवभगत का मतलब सभी बारातियों को पहले पानी के लिये पूछना और फिर उन तक चाय, नमकीन, बिस्कुट और कोई मिठाई पहुंचाना। पहले मिठाई का मतलब होता था लड्डू। मेरे मुंह में तो अभी से पानी आ रहा था।
    दुल्हन के घर के पास में बड़ी चांदनी (शामियाना) लगा रखी थी। उसके अंदर गांव के विभिन्न घरों से मांगकर कुर्सियां सजायी गयी थी। कुछ चारपाईयां लगी थी। नीचे दरियां बिछी हुई थी। सभी बच्चों को नीचे दरियों में बैठने का आदेश मिल चुका था। बड़े बुजुर्ग कुर्सियों या चारपाई पर विराजमान थे। पास में ही दूल्हे को मिलने वाला पलंग और उस पर चमचमाती चादर और रजाई रखी थी। दूल्हे के दोस्तों ने उस पर कब्जा जमा लिया था। गैस (पेट्रोमैक्स) की रोशनी से नहा रही थी चांदनी। उस समय गांवों में प्रचलन था कि बारात पहुंचने पर दुल्हन की सहेलियां मांगल गीत गाती और मजाकिया अंदाज में दूल्हे, उसकी तरफ के पंडित, उसके दोस्तों आदि को 'मांगल में ही गालियां' देकर छेड़ती। जैसे ..., ''अरे ब्योला तु बामण नि ले जाणू ....। हमरा गांऊ कुकर भुख्यूंच, ब्योला कु बबा उबर लुक्युंच ....। '' इनमें आग्रह भी होता था जैसे, ''छ्वटी बटै कि बड़ि बणाई सैंती पालि की, ये फूल थै रख्यां जवैं संभालि कि.....। '' इस दौरान बारात में आये युवा नौजवान भी लड़कियों से नैन मटका करने की कोशिश करते। उन्हें भी मांगल में ही गालियां पड़ती।
     मेरी नजर नमकीन बिस्कुट पर थी। उसे पहले बड़े बुजुर्गों में बांटा जा रहा था। मन में धुकधुकी लगी थी कि कहीं मेरी बारी आते आते नमकीन बिस्कुट खत्म नहीं हो जाए। जहां पर मैं बैठा था कि वहां पर भी अब दो युवक चाय, नमकीन—बिस्कुट से भरी कागज प्लेटें बांटने लगे थे। एक कांच में गिलास में भरकर चाय देता और दूसरा नमकीन से भरा पैकैट या प्लेट पकड़ाता। अब मुझे बाराती होने का असली आनंद मिलने वाला था। लेकिन यह किस्सा मेरे साथ ही घटने वाला था। बाराती बच्चों के बीच में मैं छूट गया। अब वे दूसरी तरफ बैठे बारातियों की आवभगत कर रहे थे। मेरे आंसू निकल पड़े। मेरी निगाहें भैजी को खोज रही थी। केवल उन्हीं से मैं अपनी व्यथा कह सकता था। भैजी पीछे बैठे थे। मैं तुरंत ही उनके पास चला गया और फिर सुबकने लगा। मैंने उन्हें कारण बताया तो उन्होंने ढाढस बंधाते हुए अपनी प्लेट मुझे दे दी। मैं तो नयी प्लेट लेने की जिद पर अड़ा था। पास में बैठे गांव के एक चाचाजी को जब माजरा पता चला तो उन्होंने स्वागतकर्मियों को हड़काया। अब तो तुरंत ही मेरे पास चाय और नमकीन बिस्कुट की प्लेट पहुंच गयी। अब तक हालांकि जिस आनंद की मैंने कल्पना की थी वह काफूर हो चुका था।
अठारह साल पहले भी बारात पहुंचने पर 
वरमाला का चलन शुरू हो गया था। मैंने भी ऐसा 
किया था। मेरी शादी का एक चित्र।
     कुछ देर बाद पंडित जी पिठाई लेकर आ गये और उनके साथ लिफाफों में बंद दक्षिणा। पंडित जी और लिफाफा पकड़ाने वाले दोनों से कोई चूक नहीं हुई। मैंने तुरंत लिफाफा खोला तो भैजी ने सनकाया (सनकाण यानि इशारा, संकेत करना) भी कि मैं अभी ऐसा नहीं करूं। लिफाफे के अंदर एक रूपये के चमचमाते नोट ने कुछ देर पहले के मेरे सारे अवसाद को खत्म कर दिया था। लिफाफा भैजी को सौंप दिया। रात का भोजन करने के बाद कुछ बाराती अपने लिये सोने की जगह तलाश करने लगे। बाकी बारातियों को अभी रात्रि मनोरंजन के लिये बुलाये गये जोकरों को देखना था। इच्छा तो मेरी भी थी लेकिन तभी मुझे नमकीन—बिस्कुट नहीं मिलने पर उस गांव के लड़कों को हड़काने वाले चाचाजी आ गये। उन्होंने बताया कि उन्हें सोने की जगह मिल गयी है। चारपाई एक है और मैं उनके साथ सो जाऊंगा। अभी हम लेटे ही थे कि कुछ और बाराती जगह की तलाश में पहुंच गये। चाचाजी ने चुपके से मेरे कान में कहा, ''चौड़े होकर सोजा नहीं तो इनमें से कोई हमारे साथ घुस जाएगा।'' मैंने तुरंत आदेश पर अमल किया। 
     सुबह रात का बचे खाने का ही नाश्ता किया, चाय पी और फिर उस गांव के लड़कों के साथ क्रिकेट खेलने लग गये। बाकी वेदी में चले गये क्योंकि वहां पर भी गांव की लड़कियों की गालियों से दूल्हे, उसके साथियों और अन्य की पूजा होने वाली थी। इस दौरान खूब मजाक और चुहलबाजी होती। मुझे तो वर्षों बाद पता चला कि इसका अलग आनंद है। हालांकि धीरे धीरे यह प्रथा खत्म होती गयी और अब शायद ही किसी गांव में बारात आने पर लड़कियां 'मांगल में मजाकिया गालियां' देती होंगी। दिन का खाना करने के बाद बारात जाने से पहले फिर से पिठाई लगी। फिर से एक रूपये की दक्षिणा मिली। दक्षिणा मिलते ही कुछ लोग गांव की तरफ कूच करने लगे। मैं भी उनके साथ हो लिया। मुझे दुल्हन का दहाड़ें मारकर रोना कभी अच्छा नहीं लगा और अब यहां भी यही होने वाला था। दूल्हे के साथ कुछ बाराती विशेषकर उसके साथी रह जाते। दुल्हन की सहेलियां गांव से दूर तक उसे छोड़ने के लिये आती और इस बीच भी खूब मजाक चलता था। भले ही मुझे तब इससे मतलब नहीं था। रास्ते में मुझे मेरे गांव की लड़कियां दिखी। वे दुल्हन को लेने आयी थी। मैं तो जल्द से जल्द घर पहुंचकर मां के सामने बारात के अपने पहले अनुभव को बयां करने के लिये बेताब था।
       इसके बाद मैं कई बार बाराती बना। तेरह साल की उम्र ही चाय पीनी छोड़ दी थी और कुछ वर्षों बाद नमकीन—बिस्कुट का मोह भी खत्म हो गया। पिछले कुछ वर्षों से तो बारात में मिलने वाली दक्षिणा का खुलकर विरोध भी कर रहा हूं। अब बाराती बनना औपचारिकता पूरी करने जैसा होता है। उसमें पहले जैसा आनंद और उत्साह नहीं बचा है। गांव में दिन की शादियां हो रही हैं और शहरों में तो यह दो तीन घंटे का खेल है। मेरी शादी भी शहर में हुई। दिल्ली से गुड़गांव गयी थी मेरी बारात। आज से ठीक 18 साल पहले पांच फरवरी 1999 को अंजू मेरी जीवनसंगिनी बनी थी। ऐसे में मैंने अपनी पहली बारात की कुछ यादें ताजा करने की कोशिश की। आपको कैसे लगी ब्लॉग के नीचे कमेंट वाले कालम में यह जरूर बतायें। आपका धर्मेन्द्र पंत


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शनिवार, 14 जनवरी 2017

आओ मनायें उतरैणी—मकरैणी और घुघुतिया

    चपन से एक गीत सुनता आया हूं, ''मकरैणी कौथीग ऐगे ओ ददाजी, मीकू क्या.क्या लेल्या ओ ददाजी'' इस गीत में पोता या पोती अपने दादाजी से कहता या कहती है कि मकरसक्रांति का मेला लग रहा है वह उसके लिये क्या क्या लेकर आएंगे।'' जब गांव में था तब मकरैणी यानि मकरसंक्रांति का मतलब सुबह लेकर नहाना और फिर दिन में कहीं घूमने जाना होता ​था। कड़ाके की ठंड में सुबह लेकर चार बजे गांव के पंदेरा (झरना) में नहाना भी किसी किले को फतह करने से कम नहीं होता था। गांव के कुछ लोग ही यह साहस दिखा पाते थे। 
       पूरे भारत वर्ष में सूर्य के मकर रेखा पर प्रवेश के दिन मकर संक्रांति धूमधाम के साथ मनायी जाती है। उत्तराखंड में इस दिन कई स्थानों पर उत्तरायणी और घुघुतिया त्योहार मनाया जाता है। गिंदी मेला भी इसी दिन लगता है। उत्तरायणी के दिन यहां कई स्थानों पर नदियों के पास में मेले लगते हैं। स्थानीय भाषा में इन्हें 'मकरैणी कौथीग' कहा जाता है। इस वजह से उत्तराखंड में इसे उतरैणी—मकरैणी त्योहार के नाम से भी जाना जाता है। उत्तराखंड में तीर्थराज बागेश्वर में लगने वाला उतरैणी मेले का विशेष महत्व है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव के एक गण चंडीस ने शिव और पार्वती के लिये इसकी स्थापना की। इसको दूसरा काशी भी माना जाता है। यहां पर चंद राजाओं के समय से ही माघ मेले का आयोजन होता रहा है। 
       इसी तरह से उत्तरकाशी का माघ मेला भी प्रसिद्ध है जो सात दिन तक चलता है। हर साल इस मेले का शुभारंभ पाटा संग्राली गांवों से कंडार देवता और अन्य देवी देवताओं की डोलियां उत्तरकाशी पहुंचने पर होता है। मकर संक्रांति के दिन सभी डोलियों को मणिकर्णिका घाट पर विसर्जित किया जाता है और तब यह बड़ा मेला लगता है।  

 कुमांऊ में मनाया जाता है घुघुतिया


     कुमांऊ में मकरसंक्रांति के दिन घुघुतिया त्योहार मनाया जाता है। इसे पुष्यूडिया पूजन भी कहते हैं। बागेश्वर में हालांकि इसका चलन नहीं है। घुघुतिया त्योहार के दिन आटे के घुघुत बनाकर उन्हें तेल में तलकर तैयार किया जाता और फिर मकरसंक्रांति के दिन इन्हें कौवे को खिलाया जाता है। बच्चे गले में घुघुत की माला पहनते हैं और फिर कौवे को आवाज लगाते हैं। इस त्योहार के प्रचलन को लेकर एक कहानी है। कहा जाता है कि यहां के राजा का एक मंत्री था जिसका नाम घुघुतिया था। उसने राजा को मारकर खुद सिंहासन पर बैठने का षडयंत्र रचा। एक कौवे को उसके षडयंत्र का पता चल गया और उसने राजा को इस बारे में जानकारी दे दी। राजा ने अपने इस धूर्त मंत्री घुघुतिया को मृत्युदंड दिया और राज्य के लोगों से मकर संक्रांति के दिन कौवे को पकवान खिलाने का आदेश दिया।
       इस पकवान को मंत्री के नाम पर घुघुत नाम दिया गया। एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार कुमांऊ में चंद वंश के राजा कल्याण चंद को भगवान बागनाथ की तपस्या करने के बाद पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होंने निर्भय चंद रखा। रानी उसे प्यार से घुघुतिया कहती थी। राजा के मंत्री ने हालांकि षडयंत्र करके घुघुतिया को उठा दिया। इस बीच एक कौए ने घुघुतिया के गले में पड़ी मोतियों की माला लेकर राजमहल में छोड़ दी। इससे राजकुमार का सुराग मिला। रानी ने कौए को कई तरह के पकवान खाने के लिये दिये। तभी से घुघुतिया त्योहार प्रचलन में आया।

गिंदी मेला : रग्बी का पुराना रूप 


      ढ़वाल में मकर संक्रांति को खिचड़ी संक्रांति भी कहते हैं और इस दिन खिचड़ी बनाकर खाने का चलन है। मकरसंक्रांति के अवसर पर ही उत्तराखंड में गढ़वाल के कुछ हिस्सों विशेषकर मनियारस्यूं, कटघर, थलनदी, डाडामंडी आदि क्षेत्रों में गिंदी मेला का आयोजन किया जाता है जो वीरता, दृढता, इच्छाशिक्त और प्रतिस्पर्धा से जुड़ा है। विभिन्न गांवों के लोग एक स्थान पर एकत्रित होकर गिंदी मेला का आयोजन करते हैं। गिंदी मतलब गेंद। यह खेल में दो गांवों या पट्टियों के बीच खेला जाता है। गिंदी के खेल को रग्बी का करीबी माना जा सकता है क्योंकि इसमें भी गेंद को पकड़ने के लिये कई व्यक्ति एक साथ उस पर झपटते हैं। आखिर जो भी पहले गेंद को नियत स्थान तक ले जाता है उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है। पहले गेंद चमड़े की बनायी जाती थी जिस पर कंगन भी लगे होते थे। इस अवसर पर देवी देवताओं का भी पूजन होता है। ढोल दमाऊ की थाप पर पांडव नृत्य की भी धूम रहती है। 
      उत्तरकाशी और देहरादून जिलों के जौनसार, रवांई और जौनपुरा क्षेत्रों में माघ के महीने में ही मरोज त्योहार मनाया जाता है। इस त्योहार में सामूहिक दावत होती तथा स्थानीय लोकगीतों और लोकनृत्यों की धूम रहती है। इस अवसर पर मेहमानों को मांसाहारी भोजन परोसा जाता है। इसके तीसरे दिन मकरसंक्रांति मनायी जाती है।
    घसेरी के सभी पाठकों को मकरैणी, उत्तरायणी और घुघुतिया त्योहार की हार्दिक शुभकामनाएं। आपका धर्मेंद्र पंत 

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बुधवार, 7 दिसंबर 2016

मिक्सी रानी से पिछड़ रहा है किचन का राजा सिलौटा यानि सिलबट्टा

सिलबट्टा यानि सिलौटा, सिल्वाटु : पहाड़ी रसोईघरों का अभिन्न अंग। स्वाद और स्वास्थ्य के लिये भी जरूरी है सिलौटा का उपयोग।
                                                                                                                                                        फोटो : रविकांत घिल्डियाल
          सिलोटु, सिल्वाटु, सिळवाटू, सिलौटा, सिलोटी या सिलबट्टा। मसालों को पीसने की इस पारंपरिक 'मशीन' से आप सभी परिचित होंगे। अब भी  गांवों में इसका उपयोग किया जाता है। सिलबट्टा यानि पत्थर का ऐसा छोटा चोकौर या लंबा टुकड़ा जिससे मसाला आदि पीसा जाता है।  सिल और पीसने का लोढ़ा। जो बड़ी सिल होती है उसे सिलौटा और जो छोटी सिल होती है उसे सिलोटी कहा जाता है। सिल और बट्टा होते अलग अलग हैं लेकिन एक के बिना दूसरे का कोई वजूद नहीं है। सिल जमीन पर रखा पत्थर जिस पर बट्टे से अनाज पीसा जाता है। मिस्र की पुरानी सभ्यताओं में जो सिल मिला था वह बीच में थोड़ा दबा हुआ है। आज भी सिल का बीच का हिस्सा मामूली गहरा होता है। बट्टे को दोनों हाथों से पकड़कर और घुटनों के बल बैठकर सिल पर अनाज या मसाले पीसे जाते हैं।
       सिलोटु में पीसे गये मसालों से सब्जी का स्वाद ही बदल जाता है और यह भोजन स्वास्थ्य के लिये भी उत्तम होता है। लेकिन आजकल पिसे हुए मसालों का जमाना है या फिर सिलबट्टे की जगह मिक्सी ने ले ली है। सिलोटु घर के किसी कोने में दु​बका हुआ है। वही सिलबट्टा जो हजारों वर्षों से भारत ही नहीं मिस्र तक की सभ्यताओं का अहम अंग रहा है। आयुर्वेद पुरोधा वाग्भट्ट ने अपने चौथे सिद्धांत से हमें सिलोटा के महत्व का पता चल जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, ''कोई भी कार्य यदि अधिक गति से किया जाता है तो उससे वात (शरीर के भीतर की वह वायु जिसके विकार से अनेक रोग होते हैं) उत्पन्न होता है।'' कहने का मतलब है कि यदि हम किसी खाद्य सामग्री को बहुत तेजी से पीसकर तैयार करते हैं तो उसके सेवन से वात पैदा होता है। भारत में वैसे भी 70 प्रतिशत रोग वातजनित हैं। रसोई में जो भी प्रक्रियाएं अपनायी जाएं वे गतिमान और सूक्ष्म नहीं होनी चाहिए। अगर आटा धीरे धीरे पिसा हुआ होता है यानि उसे घर में पीसा जाता है तो वह कई गुणों से भरपूर होता है लेकिन चक्की में आटा बहुत तेजी से पीसा जाता है। यही सूत्र मसालों पर भी लागू होता है और इसलिए सिलबट्टा में पीसे गये मसालों को अधिक गुणकारी माना जाता है। असल में घर की चक्की और सिलबट्टा  के उपयोग से भोजन का स्वाद बढ़ने के साथ स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है और इनके उपयोग करने वाले का भी समुचित व्यायाम हो जाता है। लेकिन अब बिजली से चलने वाली चक्की और मिक्सी के प्रयोग से भोजन का स्वाद कम हो गया और भोजन भी पौष्टिकता से भरपूर नहीं है। लोग मिक्सी से भोजन की पौष्टिकता पर पड़ रहे कुप्रभावों से भी अवगत हैं लेकिन इसके बावजूद दौड़ती भागती जिंदगी में मिक्सी रानी का पूरा दबदबा है। उसके सामने सिलबट्टा 'बेचारा' बन गया है जबकि गुणों के मामले में वह बादशाह है।
      टे की चक्की ने तो पहाड़ी गांवों में भी बहुत पहले प्रवेश कर दिया था लेकिन सिलोटा यानि सिलबट्टा का ठाठ बाट बने रहे। सिलबट्टा को रखने की एक निय​त जगह होती थी जिसे हमेशा साफ सुथरा रखा जाता था। सिलबट्टा को इस्तेमाल से पहले और बाद में अच्छी तरह से धोया और पोछा जाता था और बाद में दीवार के सहारे से शान से खड़ा कर दिया जाता था। वरिष्ठ पत्रकार और उत्तराखंड़ी परंपरों के जानकार श्री विवेक जोशी के शब्दों में, ''आधुनिक मिक्सर की इस दादी के कभी बड़े राजसी ठाठ थे। इनकी नियत जगह होती, इनको इस्तेमाल से पहले और बाद में धो पोछकर दीवार के सहारे टिका दिया जाता। कुछ तो धूप आरती भी करते। समझा जाता था कि घर की खुशहाली के लिये यह सगुन है। हो भी क्यों ना..सेहत का राज इससे जुड़ा था। एक कहानी है..एक दादी के मरने के बाद कुछ ना मिला सिवाय एक संदूक के। लालची बहुओं ने खोला तो उसमें था 'सिलबट्टा '। दादी का संदेश साफ था लेकिन बहुओं ने उसे फेंक दिया और संदूक को चारपाई के नीचे रख दिया। तब से यही होता आ रहा है..सेहत फेंक दी गयी और कलह को चारपाई के नीचे जगह मिल गयी।''
     मसालों से लेकर लूण (नमक) पीसने, आलू या मूली की थेंच्वाणि (आलू, मूली या अन्य तरकारी को कुचलकर बनायी गयी रसदार सब्जी), दाल पीसने या दाल और किसी अन्य अनाज को दुदळो करने, दाल के पकोड़े (भूड़ा) बनाने आदि के लिये सिलबट्टा का उपयोग किया जाता है। सिलबट्टे पर बनायी गयी चटनी जैसा स्वाद मिक्सी की चटनी में कभी नहीं आ सकता है। 

सिलबट्टे पर पिसे मसालों की महक से चेहरे पर खिल उठती है मुस्कान : फोटो रविकांत घिल्डियाल

सिलबट्टा के उपयोग के फायदे


-- सिलबट्टा पत्थर से बनता है। पत्थर में कई बार के खनिज भी होते हैं और इसलिए सिलबट्टा में मसाले पीसने से ये खनिज भी उनमें शामिल होते रहते हैं जिससे न सिर्फ स्वाद में वृद्धि होती है बल्कि यह स्वास्थ्य के लिये भी उत्तम होता है।
-- सिलबट्टे में मसाले पीसते वक्त व्यायाम होता है उससे पेट बाहर नही निकलता। इससे विशेषकर इससे यूटेरस की बहुत अच्छी कसरत हो जाती है। महिलाएं पहले हर रोज सिलबट्टे का उपयोग करती थी और इससे तब बच्चे की सिजेरियन डिलीवरी की जरूरत नहीं पडती थी। मतलब सिलबट्टे का उपयोग किया तो जच्चा बच्चा दोनों स्वस्थ।
-- सिलबट्टा आदि में सब कुछ धीरे धीरे पिसता है तथा अनाज या मसाला जरूरत से ज्यादा सूक्ष्म भी नहीं होता है। इससे वात संबंधी रोग नहीं होते हैं। मिक्सी आदि में न केवल तेजी से पिसाई होती है बल्कि वह अतिसूक्ष्म भी हो जाता है। इस तरह से वह वातकारक है।
-- सिलबट्टा का उपयोग करने से मिक्सी की जरूरत नहीं पड़ेगी जिससे बिजली का खर्च भी कम होगा।

सिलबट्टा का धार्मिक महत्व 


   सिलबट्टा सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं है बल्कि उसका धार्मिक महत्व भी है। गांवों में हर किसी के घर में सिलबट्टा होता है। श्री विवेक जोशी ने बताया, ''जिसके घर विवाह होता है वह एक सिल जरूर खरीदता है। पाणीग्रहण के समय "शिला रोहण" के लिए सिलबट्टा गरीब से गरीब व्यक्ति खरीदता है। इसे पार्वती का प्रतीक माना जाता है और यह बेटी की सखी के रूप में उसके साथ ससुराल जाता है।'' 
   विभिन्न तरह के यज्ञों में भी सिलबट्टा के उपयोग की बात सामने आती है। इसे दषद उपल नाम से जाना जाता है। यज्ञ में अन्न सिद्ध करने के जिन साधनों का वर्णन है उनमें सूप, चलनी, ओखली, मूसल आदि के साथ सिलबट्टा भी शामिल है। 
   पहाड़ों में यह भी मान्यता है कि सिल और बट्टा एक साथ बेचा और खरीदा नहीं जाता है। बट्टे को शिव का और सिल को पार्वती का स्वरूप माना जाता है। इन दोनों को जन्म देने वाला "शिल्पकार" इनका पिता समान होता है और  इसलिए वह दोनों को एक साथ नहीं देता। पहले दोनों में किसी एक को लेना पड़ता था फ़िर कुछ दिन बाद इसकी जोड़ी पूरी करनी पड़ती है। यह भी कहा जाता है कि दीपावली पूजन के बाद चूने या गेरू में रूई भिगोकर चक्की, चूल्हा, सिलबट्टा और सूप पर तिलक करना चाहिए। उत्तराखंड के कुमांऊ संभाग में ग्वल या गोलू देवता की कहानी भी सिलबट्टा से जुड़ी है। 
    'घसेरी' का आपसे अनुरोध है कि घर में मसाले आदि पीसने के लिये अधिक से अधिक सिलौटा का उपयोग करने की कोशिश करिये। थोड़ा समय जरूर लगेगा लेकिन फायदे भी तो अनेक हैं। उम्मीद है कि हमारे गांव घरों में सिलौटा, सिलोटु या सिलोटी अपना स्थान बरकरार रखेगी। आपका धर्मेन्द्र पंत


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