बुधवार, 7 दिसंबर 2016

मिक्सी रानी से पिछड़ रहा है किचन का राजा सिलौटा यानि सिलबट्टा

सिलबट्टा यानि सिलौटा, सिल्वाटु : पहाड़ी रसोईघरों का अभिन्न अंग। स्वाद और स्वास्थ्य के लिये भी जरूरी है सिलौटा का उपयोग।
                                                                                                                                                        फोटो : रविकांत घिल्डियाल
          सिलोटु, सिल्वाटु, सिळवाटू, सिलौटा, सिलोटी या सिलबट्टा। मसालों को पीसने की इस पारंपरिक 'मशीन' से आप सभी परिचित होंगे। अब भी  गांवों में इसका उपयोग किया जाता है। सिलबट्टा यानि पत्थर का ऐसा छोटा चोकौर या लंबा टुकड़ा जिससे मसाला आदि पीसा जाता है।  सिल और पीसने का लोढ़ा। जो बड़ी सिल होती है उसे सिलौटा और जो छोटी सिल होती है उसे सिलोटी कहा जाता है। सिल और बट्टा होते अलग अलग हैं लेकिन एक के बिना दूसरे का कोई वजूद नहीं है। सिल जमीन पर रखा पत्थर जिस पर बट्टे से अनाज पीसा जाता है। मिस्र की पुरानी सभ्यताओं में जो सिल मिला था वह बीच में थोड़ा दबा हुआ है। आज भी सिल का बीच का हिस्सा मामूली गहरा होता है। बट्टे को दोनों हाथों से पकड़कर और घुटनों के बल बैठकर सिल पर अनाज या मसाले पीसे जाते हैं।
       सिलोटु में पीसे गये मसालों से सब्जी का स्वाद ही बदल जाता है और यह भोजन स्वास्थ्य के लिये भी उत्तम होता है। लेकिन आजकल पिसे हुए मसालों का जमाना है या फिर सिलबट्टे की जगह मिक्सी ने ले ली है। सिलोटु घर के किसी कोने में दु​बका हुआ है। वही सिलबट्टा जो हजारों वर्षों से भारत ही नहीं मिस्र तक की सभ्यताओं का अहम अंग रहा है। आयुर्वेद पुरोधा वाग्भट्ट ने अपने चौथे सिद्धांत से हमें सिलोटा के महत्व का पता चल जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, ''कोई भी कार्य यदि अधिक गति से किया जाता है तो उससे वात (शरीर के भीतर की वह वायु जिसके विकार से अनेक रोग होते हैं) उत्पन्न होता है।'' कहने का मतलब है कि यदि हम किसी खाद्य सामग्री को बहुत तेजी से पीसकर तैयार करते हैं तो उसके सेवन से वात पैदा होता है। भारत में वैसे भी 70 प्रतिशत रोग वातजनित हैं। रसोई में जो भी प्रक्रियाएं अपनायी जाएं वे गतिमान और सूक्ष्म नहीं होनी चाहिए। अगर आटा धीरे धीरे पिसा हुआ होता है यानि उसे घर में पीसा जाता है तो वह कई गुणों से भरपूर होता है लेकिन चक्की में आटा बहुत तेजी से पीसा जाता है। यही सूत्र मसालों पर भी लागू होता है और इसलिए सिलबट्टा में पीसे गये मसालों को अधिक गुणकारी माना जाता है। असल में घर की चक्की और सिलबट्टा  के उपयोग से भोजन का स्वाद बढ़ने के साथ स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है और इनके उपयोग करने वाले का भी समुचित व्यायाम हो जाता है। लेकिन अब बिजली से चलने वाली चक्की और मिक्सी के प्रयोग से भोजन का स्वाद कम हो गया और भोजन भी पौष्टिकता से भरपूर नहीं है। लोग मिक्सी से भोजन की पौष्टिकता पर पड़ रहे कुप्रभावों से भी अवगत हैं लेकिन इसके बावजूद दौड़ती भागती जिंदगी में मिक्सी रानी का पूरा दबदबा है। उसके सामने सिलबट्टा 'बेचारा' बन गया है जबकि गुणों के मामले में वह बादशाह है।
      टे की चक्की ने तो पहाड़ी गांवों में भी बहुत पहले प्रवेश कर दिया था लेकिन सिलोटा यानि सिलबट्टा का ठाठ बाट बने रहे। सिलबट्टा को रखने की एक निय​त जगह होती थी जिसे हमेशा साफ सुथरा रखा जाता था। सिलबट्टा को इस्तेमाल से पहले और बाद में अच्छी तरह से धोया और पोछा जाता था और बाद में दीवार के सहारे से शान से खड़ा कर दिया जाता था। वरिष्ठ पत्रकार और उत्तराखंड़ी परंपरों के जानकार श्री विवेक जोशी के शब्दों में, ''आधुनिक मिक्सर की इस दादी के कभी बड़े राजसी ठाठ थे। इनकी नियत जगह होती, इनको इस्तेमाल से पहले और बाद में धो पोछकर दीवार के सहारे टिका दिया जाता। कुछ तो धूप आरती भी करते। समझा जाता था कि घर की खुशहाली के लिये यह सगुन है। हो भी क्यों ना..सेहत का राज इससे जुड़ा था। एक कहानी है..एक दादी के मरने के बाद कुछ ना मिला सिवाय एक संदूक के। लालची बहुओं ने खोला तो उसमें था 'सिलबट्टा '। दादी का संदेश साफ था लेकिन बहुओं ने उसे फेंक दिया और संदूक को चारपाई के नीचे रख दिया। तब से यही होता आ रहा है..सेहत फेंक दी गयी और कलह को चारपाई के नीचे जगह मिल गयी।''
     मसालों से लेकर लूण (नमक) पीसने, आलू या मूली की थेंच्वाणि (आलू, मूली या अन्य तरकारी को कुचलकर बनायी गयी रसदार सब्जी), दाल पीसने या दाल और किसी अन्य अनाज को दुदळो करने, दाल के पकोड़े (भूड़ा) बनाने आदि के लिये सिलबट्टा का उपयोग किया जाता है। सिलबट्टे पर बनायी गयी चटनी जैसा स्वाद मिक्सी की चटनी में कभी नहीं आ सकता है। 

सिलबट्टे पर पिसे मसालों की महक से चेहरे पर खिल उठती है मुस्कान : फोटो रविकांत घिल्डियाल

सिलबट्टा के उपयोग के फायदे


-- सिलबट्टा पत्थर से बनता है। पत्थर में कई बार के खनिज भी होते हैं और इसलिए सिलबट्टा में मसाले पीसने से ये खनिज भी उनमें शामिल होते रहते हैं जिससे न सिर्फ स्वाद में वृद्धि होती है बल्कि यह स्वास्थ्य के लिये भी उत्तम होता है।
-- सिलबट्टे में मसाले पीसते वक्त व्यायाम होता है उससे पेट बाहर नही निकलता। इससे विशेषकर इससे यूटेरस की बहुत अच्छी कसरत हो जाती है। महिलाएं पहले हर रोज सिलबट्टे का उपयोग करती थी और इससे तब बच्चे की सिजेरियन डिलीवरी की जरूरत नहीं पडती थी। मतलब सिलबट्टे का उपयोग किया तो जच्चा बच्चा दोनों स्वस्थ।
-- सिलबट्टा आदि में सब कुछ धीरे धीरे पिसता है तथा अनाज या मसाला जरूरत से ज्यादा सूक्ष्म भी नहीं होता है। इससे वात संबंधी रोग नहीं होते हैं। मिक्सी आदि में न केवल तेजी से पिसाई होती है बल्कि वह अतिसूक्ष्म भी हो जाता है। इस तरह से वह वातकारक है।
-- सिलबट्टा का उपयोग करने से मिक्सी की जरूरत नहीं पड़ेगी जिससे बिजली का खर्च भी कम होगा।

सिलबट्टा का धार्मिक महत्व 


   सिलबट्टा सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं है बल्कि उसका धार्मिक महत्व भी है। गांवों में हर किसी के घर में सिलबट्टा होता है। श्री विवेक जोशी ने बताया, ''जिसके घर विवाह होता है वह एक सिल जरूर खरीदता है। पाणीग्रहण के समय "शिला रोहण" के लिए सिलबट्टा गरीब से गरीब व्यक्ति खरीदता है। इसे पार्वती का प्रतीक माना जाता है और यह बेटी की सखी के रूप में उसके साथ ससुराल जाता है।'' 
   विभिन्न तरह के यज्ञों में भी सिलबट्टा के उपयोग की बात सामने आती है। इसे दषद उपल नाम से जाना जाता है। यज्ञ में अन्न सिद्ध करने के जिन साधनों का वर्णन है उनमें सूप, चलनी, ओखली, मूसल आदि के साथ सिलबट्टा भी शामिल है। 
   पहाड़ों में यह भी मान्यता है कि सिल और बट्टा एक साथ बेचा और खरीदा नहीं जाता है। बट्टे को शिव का और सिल को पार्वती का स्वरूप माना जाता है। इन दोनों को जन्म देने वाला "शिल्पकार" इनका पिता समान होता है और  इसलिए वह दोनों को एक साथ नहीं देता। पहले दोनों में किसी एक को लेना पड़ता था फ़िर कुछ दिन बाद इसकी जोड़ी पूरी करनी पड़ती है। यह भी कहा जाता है कि दीपावली पूजन के बाद चूने या गेरू में रूई भिगोकर चक्की, चूल्हा, सिलबट्टा और सूप पर तिलक करना चाहिए। उत्तराखंड के कुमांऊ संभाग में ग्वल या गोलू देवता की कहानी भी सिलबट्टा से जुड़ी है। 
    'घसेरी' का आपसे अनुरोध है कि घर में मसाले आदि पीसने के लिये अधिक से अधिक सिलौटा का उपयोग करने की कोशिश करिये। थोड़ा समय जरूर लगेगा लेकिन फायदे भी तो अनेक हैं। उम्मीद है कि हमारे गांव घरों में सिलौटा, सिलोटु या सिलोटी अपना स्थान बरकरार रखेगी। आपका धर्मेन्द्र पंत


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सोमवार, 7 नवंबर 2016

जब मुझे दिल्ली से वापस पहाड़ भेजने आया था 'देवदूत'

                                                                                                                 
       ह नब्बे के दशक के शुरूआती वर्षों की एक मायूस शाम थी। नौकरी अब जरूरत बन गयी थी। दिन भर की तलाश के बाद वापस ठिकाने पर लौटने के लिये बस की एक सीट पर सिमटा था मैं। भीड़ तब भी थी और जाम भी। करोलबाग की लाल बत्ती पर हर दुपहिया और चौपहिया सवार अपना वाहन आगे निकालने  की जुगत में दिख रहा था। सबको घर पहुंचने की जल्दबाजी थी। मुझे नहीं। दुपहिया वाहन पर बैठा एक नवविवाहित जोड़ा चुहलबाजी कर रहा था। कौतुहल भी जागा और ईर्ष्या भी हुई।
      ''क्या अभी पढ़ रहे हो?''
      ''जी, नहीं। ''
      पास में बैठे बुजुर्ग ने तंद्रा तोड़ दी थी। सवाल का जवाब हां भी था और न भी। हर पहाड़ी युवा की तरह बीए करने के बाद मैं भी दिल्ली की गलियों में भटकने के लिये आ गया था। कुछ तो दसवीं और 12वीं करने के बाद ही दिल्ली का रूख कर गये थे।  मैं अब प्राइवेट छात्र के रूप में एमए कर रहा था।
''अच्छा तो अब नौकरी कर रहे हो?'' बुजुर्ग का अगला सवाल था।
       ''नहीं तलाश रहा हूं। '' जब पहली बार पहाड़ से बाहर निकला था तो भैजी ने सिखाया था कि किसी भी अनजान व्यक्ति को अपने बारे में नहीं बताना इसलिए स्वर हल्का सा तल्ख हो गया था।
      ''बेटा कहां के रहने वाले हो आप?'' इस बार उनके शब्दों में जिज्ञासा के साथ स्नेह भी था।
     ''पौड़ी ....गढ़वाल।'' मैं अब भी उनमें दिलचस्पी नहीं ले रहा था, इसलिए टालू रवैया अपनाया।
     ''पहाड़ तो इतने सुंदर हैं। फिर दिल्ली क्यों आ गये।'' अब इसका क्या जवाब देता वह तो मैं पहले ही दे चुका था। लेकिन सेवानिवृति की जिंदगी जी रहे वह बुजुर्ग मुझसे मुखातिब होकर बोले जा रहे थे।
      ''आपको वहीं कोई रोजगार तलाश करना चाहिए। दिल्ली में कुछ नहीं रखा है। बेटा मैं अपने अनुभव से बोल रहा हूं यहां तो दो वक्त की रोटी तो मिल जाएगी लेकिन चैन कभी नहीं मिलेगा। ''
       वह धाराप्रवाह बोले जा रहे थे और मेरी खीझ बढ़ती जा रही थी। अब इन्हें कैसे समझाऊं की घर की आर्थिक स्थिति कैसी है और मां पिताजी ने मुझे किस उम्मीद से दिल्ली भेजा है? कुछ बातें वह सही भी कह रहे थे। दिल्ली आने पर कुछ दिन तक आंखों में जलन रही लेकिन अब एक महीना हो चुका था और आंखें अभ्यस्त हो गयी थी।
    ''बेटा ऐसा नहीं हो सकता कि पहाड़ में रोजगार की कमी होगी। बस उसे तलाश करने की जरूरत है। मैं पहाड़ का नहीं हूं लेकिन आप वहां के रहने वाले हो और आपको यह अच्छी तरह से पता होगा कि वहां कैसे ​बेहतर तरीके से जिंदगी जी सकती है। आपको दिल्ली का मोह छोड़ देना चाहिए। ''
     मेरी खीझ अब बढ़ गयी थी और आखिर में साहस करके मैं सीधे शब्दों में उनसे पूछ ही बैठा, ''क्या आप मुझे कहीं नौकरी दिला सकते हो। ''
    मेरे सवाल से शायद उन्हें निराशा हुई। वह थोड़ी देर मौन रहे और मैंने सोचा चलो बला टली। पटेल नगर आने वाला था। उन्होंने अपने झोले से डायरी निकाली। मेरी उम्मीद जाग गयी। शायद ये मेरा कुछ काम कर देंगे। उन्होंने डायरी का निचला हिस्सा फाड़कर उस पर अपना फोन नंबर लिखा और मुझे थमाया।
     ''बेटा मेरी इतनी हैसियत नहीं है कि मैं आपको नौकरी दिला पाऊं लेकिन ये मेरा नंबर है। मेरे सुझाव पर गौर करना और अगर आपको लगे कि दिल्ली छोड़कर वापस पहाड़ लौट जाना चाहिए तो मुझे जरूर फोन करना। मैं मदद करूंगा। ''
    वह कागज की पर्ची मेरे हाथ में थमाकर सीट से उठ गये। मैंने कुछ देर तक उन्हें देखा और फिर मुंह फेर लिया। पर्ची अब भी हाथ में थी। उन बुजुर्ग के बस से उतरते ही पर्ची तार तारकर होकर खिड़की से बाहर लहरा रही थी।
    ''फोन करूंगा तो फिर बुढ़ा यही बड़बड़ाएगा कि पहाड़ लौट जा, पहाड़ लौट जा। कैसे चला जाऊं वापस पहाड़। क्या करूंगा वहां? कुछ भी तो नहीं रखा है वहां। सरकारी नौकरी के नाम पर अगर मिल गयी तो मास्टरी करो और क्या है? बुढ़े को कुछ पता नहीं चला आया भाषण देने।''
      वो दिन और आज की दोपहर। घर से दफ्तर आने को बस में बैठा हूं। ज्यादा कुछ नहीं बदला है लेकिन हवा दमघोंटू है। सांस लेना मुश्किल और आंखें चरमरा रही हैं। पता है वह बुजुर्ग और उनके लिखे फोन नंबर की पर्ची के पुर्जे अब कहीं नहीं मिलेंगे लेकिन आज उनकी सलाह पर गौर करना चाहता हूं।
  धर्मेन्द्र पंत 


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सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

बीसीसीआई सदस्य हैं झारखंड और छत्तीसगढ़, फिर उत्तराखंड क्यों नहीं?

   वंबर 2000 में तीन नये राज्यों का गठन हुआ था। छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड। उत्तराखंड नौ नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर भारत का 27वां राज्य बना था। उत्तरप्रदेश तब भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड यानि बीसीसीआई से मान्यता प्राप्त सदस्य था और इसलिए उत्तराखंड को मान्यता नहीं दी गयी। यही स्थिति एक नवंबर 2000 को अस्तित्व में आये छत्तीसगढ़ की थी जो मध्यप्रदेश से अलग हुआ था। झारखंड का मामला भिन्न था। जब झारखंड राज्य बना था तब बीसीसीआई अध्यक्ष एसी मुथैया ने बिहार क्रिकेट संघ को मान्यता दी थी लेकिन  इसके कुछ महीने बाद जगमोहन डालमिया बोर्ड अध्यक्ष बन गये और उन्होंने बिहार की मान्यता समाप्त करके झारखंड राज्य क्रिकेट संघ को बीसीसीआई का सदस्य बना दिया। झारखंड की टीम नवंबर 2004 से रणजी ट्राफी में भी खेल रही है। छत्तीसगढ़ भी एसोसिएट सदस्य बन गया और 2016 में उसे पूर्ण सदस्य की मान्यता मिल गयी। छत्तीसगढ़ की टीम इस साल से रणजी ट्राफी में भी खेल रही है। 
       अब 15 दिन के अंदर अस्तित्व में आने वाले तीन राज्यों में से केवल उत्तराखंड ही बच गया है जिसे कि बीसीसीआई से मान्यता नहीं मिली है। उत्तराखंड की तरफ से प्रयास भी किये गये लेकिन इस पहाड़ी राज्य से एक नहीं पांच संघ थे ... उत्तराखंड क्रिकेट संघ, यूनाईटेड क्रिकेट संघ, अभिमन्यु क्रिकेट संघ, उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन और क्रिकेट एसोसिएशन आॅफ उत्तरांचल। हर कोई चाहता था कि उसके संघ को मान्यता मिले। कई संघ होने के कारण बीसीसीआई ने भी दिलचस्पी नहीं दिखायी और उत्तराखंड क्रिकेट की स्थिति बिहार जैसी हो गयी। बिहार में भी तीन क्रिकेट संस्थाओं में आपस में धींगामुश्ती चल रही है। बीसीसीआई से मान्यता हासिल करने की खातिर जनवरी 2015 में उत्तराखंड क्रिकेट संघ, अभिमन्यु क्रिकेट संघ और यूनाईटेड क्रिकेट संघ ने एक मंच पर आने का फैसला किया। इस बैठक में उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन और क्रिकेट एसोसिएशन आॅफ उत्तरांचल (उत्तराखंड) ने हिस्सा नहीं लिया। बीसीसीआई ने बिहार और उत्तराखंड को मान्यता देने के लिये अगस्त 2015 में एक तदर्थ समिति बनायी। पंजाब क्रिकेट संघ के एम पी पांडोव उत्तराखंड के लिये बने पैनल के अध्यक्ष थे। उत्तराखंड में इसके बाद भी उत्तराखंड क्रिकेट संघ यानि यूसीए और क्रिकेट एसोसिएशन आफ उत्तराखंड में आपस में ठनी रही और राज्य के क्रिकेटरों को दूसरे राज्यों विशेषकर दिल्ली से खेलने के लिये मजबूर होना पड़ा। 
       उच्चतम न्यायालय के कड़े रूख और न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिये बीसीसीआई पर हर तरह से दबाव बनाने के बाद अब उत्तराखंड को मान्यता मिलने की उम्मीद फिर से बन गयी है। लोढ़ा समिति की सिफारिशों के अनुसार प्रत्येक राज्य को बीसीसीआई में एक मत का अधिकार होना चाहिए। ऐसे में उत्तराखंड का दावा मजबूत बनता है। अभी तक महाराष्ट्र और गुजरात में तीन . तीन क्रिकेट संघ हैं और वहां के खिलाड़ियों को न सिर्फ रणजी बल्कि अच्छे प्रदर्शन के दम पर राष्ट्रीय टीम में भी जगह बनाने का भरपूर मौका मिलता है। उत्तराखंड, बिहार तथा पूर्वोत्तर में असम और त्रिपुरा को छोड़कर बाकी राज्यों में क्रिकेट संघ को मान्यता नहीं है। पूर्वोत्तर के राज्यों का क्रिकेट से ज्यादा लगाव नहीं है लेकिन उत्तराखंड और बिहार के खिलाड़ी दूसरे राज्यों से खेलने के लिये मजबूर हैं। 
      उत्तराखंड के क्रिकेटरों ने राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी छाप छोड़ी है। महेंद्र सिंह धोनी के नाम से भले ही कौन परिचित नहीें होगा। वह कुमांऊ के रहने वाले हैं लेकिन उनकी परवरिश झारखंड में हुई। वह पहले बिहार और फिर झारखंड की तरफ से खेले। वह खुद को झारखंड का ही मानते हैं। भारतीय टीम में शामिल एक अन्य खिलाड़ी मनीष पांडे कर्नाटक की तरफ से खेलते हैं लेकिन उनका जन्म नैनीताल में हुआ और बचपन भी यहीं बीता था। 
       दिल्ली की रणजी टीम में उत्तराखंड के कई खिलाड़ी खेलते रहे हैं। एक समय में एन एस नेगी और कुलदीप रावत दिल्ली का टीम का हिस्सा थे। दिल्ली की वर्तमान टीम में खेलने वाले उन्मुक्त चंद, रिषभ पंत, पवन सुयाल और पवन नेगी सभी उत्तराखंड से संबंध रखते हैं। उन्मुक्त ने वर्तमान रणजी सत्र के पहले दो मैचों में दिल्ली टीम की कप्तानी भी की थी। रिषभ बेहतरीन विकेटकीपर बल्लेबाज हैं और इस 18 वर्षीय खिलाड़ी को भारतीय क्रिकेट का अगला उभरता सितारा माना जा रहा है। महाराष्ट्र के खिलाफ उन्होंने तिहरा शतक भी जमाया था। वह उस भारत अंडर . 19 टीम के भी सदस्य थे जो जूनियर विश्व कप में खेली थी। पवन सुयाल बहुत अच्छे तेज गेंदबाज हैं तथा आईपीएल में मुंबई इंडियन्स की तरफ से खेलते हैं। पवन नेगी बायें हाथ का स्पिनर होने के साथ निचले क्रम के अच्छे बल्लेबाज भी है। वह भारत की तरफ से एक टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच भी खेल चुके हैं। नेगी आईपीएल में चेन्नई सुपरकिंग्स और दिल्ली डेयरडेविल्स की तरफ से खेलते रहे हैं। 
       जम्मू कश्मीर के विकेटकीपर बल्लेबाज पुनीत बिष्ट भी उत्तराखंड के हैं। वह पहले दिल्ली की तरफ से खेलते थे लेकिन इस सत्र में जम्मू कश्मीर की तरफ से खेल रहे हैं। हिमाचल प्रदेश की टीम में रोबिन बिष्ट हैं जो पहले राजस्थान की तरफ से खेलते थे। उन्होंने 2011.12 सत्र में रणजी ट्राफी में सर्वाधिक रन बनाये थे और तब महान सुनील गावस्कर ने भी उनकी तारीफ की थी। रोबिन उत्तराखंड के रहने वाले हैं। उनके छोटे भाई चेतन बिष्ट अब भी राजस्थान के विकेटकीपर बल्लेबाज हैं। राजस्थान की रणजी टीम में ही युवा बल्लेबाज सिद्धांत डोभाल शामिल हैं। सिद्धांत के पिता संजय डोभाल दिल्ली के नामी कोच हैं और द्वारका में अपनी क्रिकेट अकादमी भी चलाते हैं। राजस्थान की टीम में ही कभी नवीन नेगी विकेटकीपर बल्लेबाज हुआ करते थे। उत्तरप्रदेश से दिग्विजय सिंह रावत ने छह प्रथम श्रेणी मैच खेले थे। वे भी उत्तराखंड के हैं। उत्तराखंड के कई युवा क्रिकेटर भी विभिन्न राज्यों की जूनियर टीमों में खेल रहे हैं। इनमें दिल्ली की टीम के सदस्य अनुज रावत और मयंक रावत प्रमुख हैं। 
       पंजाब के पूर्व तेज गेंदबाज अमित उनियाल पौड़ी जिले के सांगुड़ा गांव के रहने वाले हैं। वह पंजाब की तरफ से 28 रणजी मैच खेलने के अलावा राजस्थान रायल्स के लिये आईपीएल में भी खेले थे। अमित अब चंडीगढ़ में कोचिंग अकादमी चलाते हैं। पिछले दिनों भारतीय टीम में जगह बनाने वाले तेज गेंदबाज बरिंदर सरां  उन्हीं के शिष्य हैं।  क्रिकेट पर बाकी चर्चा फिर कभी। आपका धर्मेन्द्र पंत 
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शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

जौनसार के दो गांवों के बीच होता है अद्भुत 'गागली युद्ध'

       त्तराखंड के गढ़वाल मंडल का एक क्षेत्र है जौनसार जहां जौनसारी भाषा बोली जाती है। यह पूरा क्षेत्र भी उत्तराखंड के तमाम अन्य क्षेत्रों की तरह अपनी अनूठी परंपराओं के लिये विख्यात है। मसलन जब देश भर में दशहरा पूरे धूमधाम से मनाया जाता है तब यहां पाइंता पर्व मनाया जाता है और इस दौरान जौनसार बावर के दो गांवों उत्पाल्टा और कुरोली के बीच युद्ध होता है जिसे 'गागली युद्ध' कहा जाता है। अरबी के पत्तों और डंठलों से होने वाले इस अनोखे युद्ध को देखने के लिये दूरदराज के गांवों के लोग भी आते हैं तथा शुरूआत से लेकर अंत तक इसमें संघर्ष के साथ मनोरंजन का पुट भरा रहता है।

गागली युद्ध का यह वीडियो श्री जितेंद्र लखेड़ा ने उपलब्ध कराया है

        दशहरे के दिन पूरे भारत में रावण दहन किया जाता है लेकिन यहां ऐसी कोई परंपरा नहीं है। पिछले 200 से भी अधिक वर्षों से इस अवसर पर उत्पाल्टा व कुरोली गांवों के बीच दशहरे के दिन गागली युद्ध होता है। ढोल—नगाड़ों की थाप, रणसिंघा की रणभेरी समान ध्वनि के बीच दोनों गांवों के लोग देवधार के जंगल में पहुंचते हैं जहां उनके बीच अरबी के डंठलों और पत्तों से युद्ध होता है। जौनसारी भाषा में अरबी को गागली कहते हैं और इसलिए इसे 'गागली युद्ध' कहा जाता है। युद्ध के लिये एक महीने पहले से ही तैयारी कर ली जाती है। अरबी के डंठलों को काटकर सुखाया जाता है। युद्ध के दिन दोनों पक्ष अपने शौर्य का भरपूर प्रदर्शन करते हैं। हंसी ठिठोली भी चलती है। लगभग एक घंटे के युद्ध के बाद दोनों पक्ष आपस में गले मिलते हैं। एक दूसरे को पाइंता पर्व की बधाई देते हैं और फिर उत्पाल्टा गांव के सार्वजनिक स्थल पर तांदी, हारूल, रासो जैसे नृत्यों से समां बांधा जाता है। इन नृत्यों में दोनों गांव के बच्चों से लेकर महिलाएं और पुरूष सभी हिस्सा लेते हैं। इसके साथ ही लोग अपने स्थानीय देवताओं महासू, चालदा, शिलगुर, विजट, परशुराम आदि के मंदिरों में पूजा करते हैं। उत्पाल्टा और कुरोली के अलावा अन्य गांवों के लोग भी इस दिन पाइंता पर्व मनाते हैं और अपने इन इष्टदेवों के मंदिरों में जाकर परिवार की खुशहाली के लिये कामना करते हैं। 

पश्चाताप के लिये होता है 'गागली युद्ध'


      गागली युद्ध से एक कहानी जुड़ी है। स्थानीय किवदंतियों के अनुसार रानी और मुन्नी नाम की दो बहनें थी। दोनों ही एक साथ कुएं या तालाब में पानी भरने के लिये जाती थी। एक दिन रानी की पानी भरते समय कुएं में गिरने से मौत हो गयी। मुन्नी तुरंत ही घर पहुंची और उसने गांव वालों को सारी घटना विस्तार से बता दी। गांव वालों ने मुन्नी पर ही आरोप लगा दिया कि उसने रानी को धक्का देकर कुंए में फेंका। मुन्नी की किसी से नहीं सुनी। उसे दोषी मान लिया गया। वह पहले ही अपनी सहेली की मौत से सदमे में थी और गांव वालों के आरोपों से दुखी होकर उसने भी कुएं में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी। ग्रामीणों को बाद में अपनी गलती का अहसास हुआ। अब पछतावा करने के अलावा कुछ नहीं बचा था। उन्हें रानी और मुन्नी के श्राप का डर सताने लगा। ऐसे में वे महासू देवता की शरण में गये। देवता ने उन्हें दशहरे के दिन दोनों बहनों की मूर्तियां बनाकर कुएं में विसर्जित करने की सलाह दी। तब से ही पश्चाताप के रूप में गागली युद्ध होता है। इससे दो दिन पहले रानी और मुन्नी की मूर्तियां तैयार करके उनकी पूजा होती है और पाइंता यानि दशहरे के दिन उन्हें कुएं में विसर्जित कर दिया जाता है। 
       उत्तराखंड का हर क्षेत्र ऐसी ही दिलचस्प कहानियों और प​रपंराओं से समृद्ध है। 'घसेरी' के पाठकों से गुजारिश है कि ऐसी परंपराओं को आम लोगों तक पहुंचाने के लिये अपना सहयोग करें। आप घसेरी के लिये इन विषयों पर लिख सकते हैं। यदि गागली युद्ध के बारे में अधिक जानकारी या चित्र हों तो उन्हें भी भेज सकते हैं। पहाड़ से जुड़ा ऐसे किसी विषय पर लिखकर आप मुझे चित्र सहित dmpant@gmail.com पर मेल कर सकते हैं। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

विनती

                       ... जितेंद्र मोहन पंत ...

     
          नंदा देवी त्वसे विनती च मेरी
          आज शरणम अयूं छौं मी तेरी 
          मेरी मनोकामना पूरी कैरी
          नंदा देवी त्वेसे विनती च मेरी। 

                  भारत का लोग मां जागरूक ह्वेन
                  मिलिकै देश थै एैथर बढ़ैन
                  इनु मंत्र मां आज यूं फर फेरी
                  नंदा देवी त्वेसे विनती च मेरी। 

          जात पांत हमसे दूर मां रावू
          हिन्दू . मुस्लिम थै भाई बणावू
          सबु की जात मां भारतीय कैरी 
          नंदा देवी त्वेसे विनती च मेरी

                 भेदभाव थै मां जड़ से ​मिटै दे
                 विकास का बीज मां देश म ब्वे दे
                 तू इतनी कृपा मां हम पर कैरी 
                  नंदा देवी त्वेसे विनती च मेरी। 

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 कवि का परिचय
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जितेंद्र मोहन पंत। जन्म 31 दिसंबर 1961 को गढ़वाल के स्योली गांव में। राजकीय महाविद्यालय चौबट्टाखाल से स्नातक। इसी दौरान 1978 से 1982 तक पहाड़ और वहां के जीवन पर कई कविताएं लिखी। यह विनती भी सत्तर के दशक के आखिरी दौर में लिखी थी। बाद में सेना के शिक्षा विभाग कार्यरत रहे। 11 मई 1999 को 37 साल की उम्र में निधन। 
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