शनिवार, 21 मई 2016

काफल खाओ, जवां बन जाओ

आयुर्वेद में कायफल और संस्कृत में कटफल कहा जाता है काफल को जो अच्छा एंटी-आक्सीडेंट भी है। 
       र पहाड़ी व्यक्ति ने काफल जरूर खाये होंगे और उनसे जुड़ी एक कहानी भी सुनी होगी। उत्तराखंड में हर जगह यह कहानी प्रचलित है। इसको प्रस्तुत करने का तरीका भले ही अलग हो लेकिन उसका सार एक है। वही 'काफल पाको, मिल नी चाखो' वाली कहानी। आपको याद तो आ गयी होगी। चलो एक बार मैं फिर से सुना देता हूं। 
     किसी गांव में एक गरीब विधवा महिला रहती थी जो खेती करके या खेतों में मेहनत मजदूरी करके अपना और अपनी छोटी बेटी का पेट पालती थी। एक बार वह जंगल गयी और वहां से टोकरी भर के काफल ले आयी। उसे खेतों में काम करने जाना था, इसलिए उसने अपनी बेटी से कहा कि वह काफल का ध्यान रखे लेकिन साथ ही सख्त हिदायत भी दे दी कि वह उन्हें खाये नहीं। जब वह खेतों से काम करके आ जाएगी तो दोनों मिलकर खाएंगे। लाल, काले रसीले काफल देखकर बेटी का मन बहुत ललचा रहा था लेकिन उसने खुद पर काबू रखा। मां थक हार कर आयी तो बेटी ने आते ही कहा मां भूख लगी क्या अब हम काफल खा लें। मां ने टोकरी की तरफ देखा तो पाया कि टोकरी पहले की तरह भरी हुई नहीं थी। वह थकी और भूखी थी और उसने तुरंत बेटी से कहा, ''तूने काफल खाये'। बेटी ने कहा, 'नहीं मां मैंने नहीं खाये। मैंने तो काफल चखे भी नहीं। ' मां को गुस्सा आ गया कि बेटी काफल भी खा गयी और झूठ भी बोल रही है। उसने आव देखा न ताव बेटी को जोर से थप्पड़ मारा। वह नीचे गिर गयी और उसका सिर पत्थर से लग गया। भूखी और प्यासी नन्हीं सी जान ने वहीं पर दम तोड़ दिया। महिला बदहवास हो गयी कि उसने सिर्फ काफल के लिये अपनी बेटी मार दी। उसने काफल बाहर रख दिये। रात को जब ओस पड़ी तो उसने देखा कि काफल की टोकरी तो भरी हुई है। तब उसे समझ में आया कि दिन में धूप से काफल भी सिकुड़ गये थे। बेटी ने सच में काफल नहीं खाये थे। बेटी के गम में उसने भी दम तोड़ दिया। कहते हैं कि ये दोनों मां बेटी पक्षी बन गये। आज भी चैत के महीने में पहाड़ों में एक चिड़िया कुछ इस तरह से बोलती है, 'काफल पाको, मिल नी चाखो' (काफल पके हैं, लेकिन मैंने नहीं चखे)। इसके जवाब में एक दूसरी चिड़ियां कुछ इस तरह से क्रंदन करती है, 'पुर पुतई पूर पूर' (पूरे हैं बेटी पूरे हैं)। 
   यह कहानी बेहद मार्मिक है जो हमें सीख देती है कि जल्दबाजी या ताव में कभी कोई काम नहीं करना चाहिए। यदि गुस्से को काबू कर लिया तो कई काम बिगड़ने से बच जाते हैं। आईए अब बात करते हैं कि इस कहानी केंद्र बिंदु काफल के बारे में ....

देवताओं का फल है काफल 


      काफल बेहद लोक​​प्रिय, औषधीय गुणों से भरपूर लेकिन बहुत जल्दी खराब होने वाला पहाड़ी फल है जो मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नेपाल में पाया जाता है। यह असल में एक जंगली फल है जिसकी खेती नहीं की जाती है। इसको आयुर्वेद में कायफल और संस्कृत में कटफल कहा जाता है। पहाड़ों में ऊंचाई वाले स्थानों पर पाये जाने वाले काफल का पेड़ का अमूमन 10-15 मीटर ऊंचा होता है। इसका फल छोटा बेर जैसा होता है जिसके अंदर गुठली भी होती है। काफल चैत्र और बैशाख के महीने में होता है। उत्तराखंड के एक मशहूर गीत के बोल भी हैं, ''बेडू पाको बारामासा, ओ नरैणी काफल पाको चैता, मेरी छैला।'' यानि बेडू हर महीने पकता है लेकिन काफल चैत के महीन में ही पकता है। अप्रैल से लेकर जून तक पहाड़ों में लोग जंगलों से काफल लेकर सड़कों के किनारे इसे बेचते हैं। पर्यटकों को खासा लुभाता है यह फल। हिमाचल प्रदेश में इसे काला भौरा और पूर्वोत्तर के राज्यों में सोहफी के नाम से भी जानाता जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम माइरिका इस्कुलाटा है। 
     काफल शुरू में हरा होता है जबकि बाद में लाल तो कुछ कुछ काल, मटमैले और बैंगनी से बन जाते हैं। जब यह हरा होता है तो इसका स्वाद खट्टा जबकि पकने पर मीठा होता है। कुमाऊँनी भाषा के पहले कवि गुमानी पंत ने इसे स्वर्ग से धरती पर आया फल बताया है। उन्होंने काफल की व्यथा का वर्णन इस तरह से किया है, ''खाणा लायक इंद्र का, हम छियां भूलोक आई पणां। पृथ्वी में लग यो पहाड़, हमारी थाती रची देव लै। एसो चित्त विचारी काफल सबै राता भया क्रोध लै। कोई बड़ा—खुड़ा शरम लै काला धुमैला भया। '' (हम स्वर्ग लोक में इंद्र देवता के खाने योग्य थे और अब धरती पर आ गए। पृथ्वी में ईश्वर ने पहाड़ों पर हमारा स्थान बनाया। इस पर विचार करते हुए काफल गुस्से से लाल तो कुछ बड़े बूढ़े शर्म से काले या मटमैले हो गये।) काफल गुच्छों में लगता है। कच्चे काफलों की चटनी बनायी जाती है जो बहुत स्वादिष्ट होती है। 
   काफल अभी उत्तराखंड में आय का अच्छा स्रोत बन गया है। गर्मियों में सड़कों के किनारे या बाजारों में ग्रामीण टोकरियों में लेकर यह फल बेचते हैं। कहते हैं कि मैदानों में रहने वाले पर्यटक ने एक बार किसी ग्रामीण से पूछा कि 'ये काफल है भइया?' तो उसे जवाब मिला, 'हां काफल है भैया'। पर्यटक गुस्से से तिलमिला गया। मेरा मजाक उड़ा रहा है। बाद में उसे समझाया गया कि असल में फल का नाम ही काफल है। पर्यटकों को यह वैसे काफी पसंद आता है। 

काफल खाओगे तो रहोगे जवान 


    काफल औषधीय गुणों से भरपूर है। कहा जाता है कि काफल खाने वाला व्यक्ति हमेशा जवान रहता है। इसका कारण इसमें एंटी-आक्सीडेंट गुणों का पाया जाना है। इसके इन गुणों से यह तनाव कम करने, स्ट्रोक और कैंसर से बचाने में सहायक होता है। यह पेट की कई बीमारियों का निदान करता है और लू लगने से बचाता है। यदि आपको भूख नहीं लगती है तो काफल खाईये। आयुर्वेद के अनुसार यह भूख की अचूक दवा है। मधुमेह के रोगियों के लिये भी यह उपयोगी है।  काफल में फायटोकेमिकल पोलीफेनोल पाया जाता है जो विषाणुरोधी होता है। यह सूजन कम करने में लाभकारी होता है। काफल रसीला फल है लेकिन इसमें रस की मात्रा 40 प्रतिशत ही होती है। इसमें विटामिन सी, खनिज लवण, प्रोटीन, फास्फोरस, पोटेशियम, कैल्शियम, आयरन और मैग्निशीयम होता है। 
    आयुर्वेद के अनुसार काफल के फल ही नहीं बल्कि छाल भी बेहद उपयोगी होती है। इसकी छाल में मायरीसीटीन, मायीसीट्रिन और ग्लाइकोसाईड पाया जाता है। इसकी छाल चबाने से दांतों के दर्द में राहत मिलती है। यही नहीं काफल की छाल को उबालकर तैयार द्रव्य में अदरक और दालचीनी मिलाकर उससे अस्थमा, डायरिया, टाइफाइड जैसी बीमारियों का इलाज भी किया जाता है। पेट गैस की समस्या दूर करने के लिये भी इसकी छाल का उपयोग किया जाता है। इसकी छाल का पेस्ट बनाकर घाव पर लगाने से वह जल्दी ठीक होता है। जोड़ों के दर्द में भी इसे उपयोगी माना जाता है। काफल की छाल को पीसकर उसका पाउडर तैयार किया जाता है जो जुकाम, गले की बीमारी और खांसी में उपयोगी होता है। काफल का फूल से भी कान दर्द, लकवा और डायरिया के लिये औ​षधि तैयार की जाती थी। 
   काफल खाना है तो पहाड़ जाना ही पड़ेगा क्योंकि मैंने पहले भी लिखा था कि इसे लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है। मेरे गांव के जंगल के शुरू में ही काफल का बड़ा सा पेड़ था। हमारे गांव स्योली का शायद ही कोई शख्स होगा जिसने उस पेड़ के काफल नहीं खाये होंगे। मैंने तो खूब खाये हैं। आपने भी पहाड़ में रहते हुए काफल खाये होंगे। तो बताईये काफल से जुड़ी अपनी कहानी। अभी मैं तो चला काफल खाने, बाद में किसी और विषय पर बात करते हैं। आपका पहाड़ी भाई धर्मेन्द्र पंत 

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रविवार, 8 मई 2016

उत्तराखंड में बोली जाती हैं 13 भाषाएं

कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी। यह कहावत उत्तराखंड पर अक्षरश: लागू होती है। 

   दुनिया आज 'मदर्स डे' मना रही है। मां के लिये भी एक दिन तय कर दिया है, मुझे यह जंचता नहीं है। मां हर दिन याद आती है और हर दिन मां के लिये होता है। पहाड़ों में मां को मां के अलावा ब्वे, बोई, ईजा, आमा कई तरह से पुकारा जाता है। इस पर बाद में चर्चा करेंगे। अभी तो आपसे मैं एक सवाल करता हूं कि उत्तराखंड में कितनी भाषाएं बोली जाती हैं? मैंने यह सवाल कई पहाड़ियों से किया तो उनमें से अधिकतर का जवाब होता था तीन यानि गढ़वाली, कुमांउनी और जौनसारी। आज 'घसेरी' आपको उत्तराखंड की तमाम भाषाओं से अवगत कराने की कोशिश करेगी।
       उत्तराखंड में कुल 13 भाषाएं बोली जाती हैं। यह 'घसेरी' नहीं बल्कि भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण का निष्कर्ष है। उत्तराखंड की भाषाओं को लेकर सबसे पहले सर्वेक्षण करने वाले जार्ज ग्रियर्सन ने भी इनमें से अधिकतर भाषाओं की जानकारी दी थी। ग्रियर्सन ने 1908 से लेकर 1927 तक यह सर्वेक्षण करवाया था। इसके बाद उत्तराखंड की भाषाओं को लेकर कई अध्ययन किये गये। हाल में 'पंखुड़ी' नामक संस्था ने भी इन भाषाओं पर काम किया। यह सभी काम 13 भाषाओं पर ही केंद्रित रहा। इनमें गढ़वाली, कुमांउनी, जौनसारी, जौनपुरी, जोहारी, रवांल्टी, बंगाड़ी, मार्च्छा, राजी, जाड़, रंग ल्वू, बुक्साणी और थारू शामिल हैं। इस पर मतभेद हो सकते हैं कि ये भाषाएं हैं या बोलियां। मेरा मानना है कि अगर एक बोली का अपना शब्द भंडार है, वह खुद को अलग तरह से व्यक्त करती है तो उसे भाषा बोलने में गुरेज क्या। कई लोगों को मानना है कि उत्तराखंड की भाषाओं की अपनी लिपि नहीं है तो मेरा इस पर जवाब होता है कि अंग्रेजी की भी अपनी लिपि नहीं है। वह रोमन लिपि में लिखी जाती है तो क्या आप उसे भी भाषा नहीं मानोगे। मराठी की देवनागरी लिपि है और हमारे उत्तराखंड की भाषाओं जो साहित्य​ लिखा गया उसमें ​देवनागरी का ही उपयोग किया गया। इस विषय पर आगे कभी लंबी चर्चा हो सकती है। फिलहाल 'घसेरी' के साथ चलिए भाषाओं को लेकर उत्तराखंड की सैर करने।

कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी 


    हम सभी जानते हैं कि उत्तराखंड में दो मंडल हैं गढ़वाल और कुमांऊ। इन दोनों की अपनी अलग अलग भाषाएं हैं। इनसे जुड़े क्षेत्रों की अन्य भाषाएं इनसे प्रभावित हो सकती हैं लेकिन अध्ययन के दौरान 'घसेरी' ने पाया कि उनकी शब्दावली और वाक्य विन्यास में काफी अंतर पाया जाता है। वैसे साथ में चेतावनी भी ​है कि यूनेस्को ने उत्तराखंड की सभी भाषाओं को संकटग्रस्त भाषाओं की श्रेणी में शामिल किया है। इसको संकट में हम ही डाल रहे हैं इसलिए सावधान हो जाइये। गढ़वाली और कुमांउनी यहां की दो मुख्य भाषाएं हैं इसलिए पहले इन्हीं के बारे में जान लेते हैं।



गढ़वाली : गढ़वाल मंडल के सातों​ जिले पौड़ी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, देहरादून और हरिद्वार गढ़वाली भाषी लोगों के मुख्य क्षेत्र हैं। कुमांऊ के रामनगर क्षेत्र में गढ़वाली का असर देखा जाता है। माना जाता है कि गढ़वाली आर्य भाषाओं के साथ ही विकसित हुई लेकिन 11—12वीं सदी में इसने अपना अलग स्वरूप धारण कर लिया था। इस पर हिन्दी के अलावा मराठी, फारसी, गुजराती, बांग्ला, पंजाबी आदि का भी प्रभाव रहा है लेकिन गढ़वाली का अपना शब्द भंडार है जो काफी विकसित है और हिन्दी जैसी भाषा को भी अपने शब्द भंडार से समृद्ध करने की क्षमता रखती है। ग्रियर्सन ने गढ़वाली के कई रूप जैसे श्रीनगरी, नागपुरिया, बधाणी, सलाणी, टिहरियाली, राठी, दसौल्या, मांझ कुमैया आदि बताये थे। बाद में कुछ साहित्यकारों ने मार्च्छा, तोल्छा, जौनसारी का भी गढ़वाली का ही एक रूप माना। गढ़वाली भाषाविद डा. गोविंद चातक ने श्रीनगर और उसके आसपास बोली जाने वाली भाषा को आदर्श गढ़वाली कहा था। वैसे भी कहा गया है, ''कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी। ''
कुमांउनी : कुमांऊ मंडल के छह जिलों नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत और उधमसिंह नगर में कुमांउनी बोली जाती है। वैसे इनमें से लगभग हर जिले में कुमांउनी का स्वरूप थोड़ा बदल जाता है। गढ़वाल और कुमांऊ के सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग दोनों भाषाओं को बोल और समझ लेते हैं। कुमाउंनी की कुल दस उप बोलियां हैं जिन्हें पूर्वी और पश्चिमी दो वर्गों में बांटा गया है। पूर्वी कुमाउंनी मेंकुमैया, सोर्याली, अस्कोटी तथा सीराली जबकि पश्चिमी कुमाउंनी में खसपर्जिया, चौगर्खिया, गंगोली, दनपुरिया, पछाईं और रोचोभैंसी शामिल हैं। कुमांऊ क्षेत्र में ही भोटिया, राजी, थारू और बोक्सा जनजातियां भी रहती हैं जिनकी अपनी बोलियां हैं। पुराने साहित्यकारों ने इसे 'पर्वतीय' या 'कुर्माचली' भाषा कहा है।
जौनसारी : गढ़वाल मंडल के देहरादून जिले के पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्र को जौनसार भाबर कहा जाता है। यहां की मुख्य भाषा है जौनसारी। यह भाषा मुख्य रूप से तीन तहसीलों चकराता, कालसी और त्यूनी में बोली जाती है। इस क्षेत्र की सीमाएं टिहरी ओर उत्तरकाशी से लगी हुई हैं और इसलिए इन जिलों के कुछ हिस्सों में भी जौनसारी बोली जाती है। जार्ज ग्रियर्सन ने इसे पश्चिमी पहाड़ी की बोली कहा था। कहने का मतलब है कि इसे उन्होंने हिमाचल प्रदेश की बोलियों के ज्यादा करीब बताया था। इसमें पंजाबी, संस्कृ​त, प्राकृत और पाली के कई शब्द मिलते हैं।
जौनपुरी: यह ​टिहरी जिले के जौनपुर विकासखंड में बोली जाती है। इसमें दसजुला, पालीगाड़, सिलवाड़, इडवालस्यूं, लालूर, छःजुला, सकलाना पट्टियां इस क्षेत्र में आती हैं। टिहरी रियासत के दौरान यह काफी पिछड़ा क्षेत्र रहा लेकिन इससे यहां की अलग संस्कृति और भाषा भी विकसित हो गयी। यह जनजातीय क्षेत्र है। डा. चातक के अनुसार यमुना के उदगम के पास रहने के कारण इन्हें यामुन जाति कहा जाता था। कभी इस क्षेत्र को यामुनपुरी भी कहा जाता था जो बाद में जौनपुरी बन गया।
रवांल्टी :  उत्तरकाशी जिले के पश्चिमी क्षेत्र को रवांई कहा जाता है। यमुना और टौंस नदियों की घाटियों तक फैला यह वह क्षेत्र है जहां गढ़वाल के 52 गढ़ों में से एक राईगढ़ स्थित था। इसी से इसका नाम भी रवांई पड़ा। इस क्षेत्र की भाषा गढ़वाली या आसपास के अन्य क्षेत्रों से भिन्न है। इस भाषा को रवांल्टी कहा जाता है। डा. चातक ने पचास के दशक में 'गढ़वाली की उप बोली रवांल्टी, उसके लोकगीत' विषय पर ही आगरा विश्वविद्यालय से पीएचडी की थी। वर्तमान समय में भाषा विद और कवि महावीर ​रवांल्टा इस भाषा के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
जाड़ : उत्तरकाशी जिले के जाड़ गंगा घाटी में निवास करने वाली जाड़ जनजाति की भाषा भी उनके नाम पर जाड़ भाषा कहलाती है। उत्तरकाशी के जादोंग, निलांग, हर्षिल, धराली, भटवाणी, डुंडा, बगोरी आदि में इस भाषा के लोग मिल जाएंगे। जाड़ भोटिया जनजाति का ही एक अंग है जिनका तिब्बत के साथ लंबे समय तक व्यापार रहा। इसलिए शुरू में इसे तिब्बत की 'यू मी' लिपि में भी लिखा जाता था। अभी इस बोली पर काफी खतरा मंडरा रहा है।
बंगाणी : उत्तरकाशी जिले के मोरी तहसील के अंतर्गत पड़ने वाले क्षेत्र को बंगाण कहा जाता है। इस क्षेत्र में तीन पट्टियां— मासमोर, पिंगल तथा कोठीगाड़ आती हैं जिनमें बंगाणी बोली जाती है। यूनेस्को ने इसे उन भाषाओं में शामिल किया है जिन पर सबसे अधिक खतरा मंडरा रहा है।
मार्च्छा : गढ़वाल मंडल के चमोली जिले की नीति और माणा घाटियों में रहने वाली भोटिया जनजाति मार्च्छा और तोल्छा भाषा बोलती है। इस भाषा में तिब्बती के कई शब्द मिलते हैं। नीति घाटी में नीति, गमसाली और बाम्पा शामिल हैं जबकि माणा घाटी में माणा, इन्द्रधारा, गजकोटी, ज्याबगड़, बेनाकुली और पिनोला आते हैं।
जोहारी : यह भी भोटिया जनजाति की एक भाषा है ​जो पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी क्षेत्र में बोली जाती है। इन लोगों का भी तिब्बत के साथ लंबे समय तक व्यापार रहा इसलिए जोहारी में भी तिब्बती शब्द पाये जाते हैं।
थारू : उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के तराई क्षेत्रों, नेपाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षेत्राों में ​थारू जनजाति के लोग रहते हैं। कुमांऊ मंडल में यह जनजाति मुख्य रूप से उधमसिंह नगर के खटीमा और सितारगंज विकास खंडो में रहती है। इस जनजाति के लोगों की अपनी अलग भाषा है जिसे उनके नाम पर ही थारू भाषा कहा जाता है। यह कन्नौजी, ब्रजभाषा तथा खड़ी बोली का मिश्रित रूप है।
बुक्साणी : कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक तराई की पट्टी में निवास करने वाली जनजाति की भाषा है बुक्साणी। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से काशीपुर, बाजपुर, गदरपुर, रामनगर, डोईवाला, सहसपुर, बहादराबाद, दुगड्डा, कोटद्वार आदि शामिल हैं।
रंग ल्वू : कुमांऊ में मुख्य रूप से पिथौरागढ़ की धारचुला तहसील के दारमा, व्यास और चौंदास पट्टियों में रंग ल्वू भाषा बोली जाती है। इसे तिब्बती—बर्मी भाषा का अंग माना जाता है जिसे प्राचीन समय से किरात जाति के लोग बोला करते थे। दारमा घाटी में इसे रङ ल्वू, चौंदास में बुम्बा ल्वू और ब्यास घाटी में ब्यूंखू ल्वू के नाम से जाना जाता है।
राजी : राजी कुमांऊ के जंगलों में रहने वाली जनजाति थी। यह खानाबदोश जनजाति थी जिसने पिछले कुछ समय से स्थायी निवास बना लिये हैं। नेपाल की सीमा से सटे उत्तराखंड के पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जिलों में इस जनजाति के लोग रहते हैं। यह भाषा तेजी से खत्म होती जा रही है।
         मने शुरुआत 'मां' से की थी तो अब जान लें कि उत्तराखंड की भाषाओं में मां के लिये क्या बोला जाता है। वैसे यहां की भाषाओं में अब मां आम प्रचलित है लेकिन पहले ब्वे, बोई या ईजा भी बोला जाता था। मां के लिये उत्तराखंड की भाषाओं के शब्द ....
गढ़वाली ... ब्वे, अम्मा, बोई। कुमांउनी, जोहारी, रंग ल्वू ... ईजा, अम्मा। जाड़ ... आं। बंगाणी ... इजै। रवांल्टी ... बुई, ईजा। जौनपुरी ... बोई। जौनसारी ... ईजी। थारू ... अय्या। राजी ... ईजलुअ, इहा। मार्च्छा ... आमा।
         उत्तराखंड की भाषाओं पर आगे भी आपको महत्वपूर्ण जानकारी देने की कोशिश करूंगा। फिलहाल इतना ही। कैसा लगा यह आलेख जरूर बताएं। आपका अपना धर्मेन्द्र पंत। 

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सोमवार, 18 अप्रैल 2016

सम्मान के साथ दीजिए न्यौता (न्यूतु)

खुद निमंत्रण पत्र दीजिए और साथ में ले जाईये अरसा। 
        शादियों का मौसम चल रहा है। पहाड़ों में भी हर तरफ ढोल दमौ या बैंड बाजाओं की धुनें सुनाई दे रही हैं। मेरे पास भी शादी के कई न्यौते आ रखे हैं। हम इसे वैसे 'न्यूतु' कहते हैं। इसी से न्यूतेर बना है। न्यूतेर मतलब वे लोग जिन्हें आमंत्रित किया गया है। न्यूतु देने की हमारी एक खास परंपरा होती थी लेकिन आजकल बहुत कम लोग उसको अपना रहे हैं। इससे कभी कभी मन कसैला भी हो जाता है। लोगों ने एक बहुत सरल तरीका अपना लिया है। कार्ड छपवा दिये और फिर किसी करीबी रिश्तेदार के पास उन्हें पहुंचा दिया कि फलां फलां को कार्ड पहुंचा देना। उनके पास एक फोन करने की भी फुरसत नहीं हैं। अब जिसके पास कार्ड हैं उसे जरूर फोन करना पड़ता है। कुछ इस तरह '' आपका कार्ड मेरे पास आया है। मेरे पास समय नहीं है। लेकिन याद रख लेना फलां तारीख को शादी है और आपके लिये कार्ड आया है। '' न्यौता देने का अजीब तरीका है यह। प्रौद्योगिकी के विकास के साथ अब व्हाट्सएप पर न्यौते दिये जा रहे हैं। बस हो गयी जिम्मेदारी खत्म। जरा सोचिये कि आप जिस व्यक्ति को न्यौता देने उसके घर तक नहीं जा सकते हो उससे कैसे उम्मीद करते हो कि वह आपके घर शादी में आएगा। यदि वह आपके घर तक पहुंचता है तो यह उसका एहसान मानिये। शादी कोई खेल नहीं है, ऐसा तो सभी लोग कहते हैं तो फिर इसके हर पक्ष को गंभीरता से लीजिए और न्यूतु इसमें सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। 
         यदि आप किसी तीसरे व्यक्ति के हाथ निमंत्रण पत्र भेजते हैं तो फिर हो सकता है कि वह व्यक्ति शादी में नहीं आये। मैंने कुछ वर्ष पहले तय किया था कि ऐसे लोगों के यहां शादियों में नहीं जाऊंगा जिन्हें न्यौता देने का सलीका भी नहीं है लेकिन मजबूरी या गांव गुठ्यार के लोगों से मिलने की लालसा में कई बार चला जाता हूं। वाट्सएप के निमंत्रण पर भी ऐसी संभावना बनी रहती है कि क्या पता वह 'न्यूतेर' नहीं आये। यह आपकी हैसियत पर भी निर्भर करता है कि न्यूतेर आपके बेमन से दिये गये न्यौते को स्वीकार करता है या नहीं। बेमन इसलिए क्योंकि भारतीय परंपरा में न्यौता देने के तरीके ऐसे नहीं होते हैं जिनका मैंने ऊपर जिक्र किया है। आदर्श स्थिति तो यह है कि आप स्वयं न्यौता देने जाएं। आपके बेटे या बेटी की शादी एक ही दिन होनी है। इस अवसर को यादगार बनाने के लिये अपने सगे संबंधियों, रिश्तेदारों को प्यार और मनुहार करके बुलाये। कार्ड आपने कितना भी धांसू छपवा दिया हो, उसमें भले ही कितनी सजावट क्यों नहीं कर दी हो, उससे वीडियो ही क्यों न चिपका दिया हो, यदि वह पूरे हर्ष और उल्लास के साथ उसे पाने वाले के पास नहीं पहुंचा तो फिर आपके इस दिखावे का कोई मतलब नहीं बनता है। तुलसीदास तो बहुत पहले कह गये थे, ''आवत ही हरसै नहीं, नयनन नहीं सनेह, तुलसी तहाँ न जाइये, चाहे कंचन बरसे मेह।'' मैं इस मामले में तुलसीदास का पूरी श्रद्धा से अनुकरण करता हूं। आप घर जाकर प्यार और मनुहार करके बुलाएंगे तो वे आपके बच्चों को आशीर्वाद देने के लिये जरूर आएंगे। वे आपके काम में हाथ भी बंटाएंगे और यह सब कुछ आपके न्यौता देने के तरीके पर निर्भर करेगा। 

'डाली' बनाईये, अरसा का 'न्यूतु' दीजिए 

       मैं तो पहाड़ी बंधुओं से अपील करूंगा कि वे न्यौता देने में अपनी परंपरा को अपनाये। हमारे लिये वह न्यूतु बन जाता है। आप दिल्ली में रहते हैं या मुंबई में या किसी अन्य शहर या गांव में अरसा या अर्सा बनाकर न्यूतु भेजिए। हम एक कार्ड और कुछ लड्डुओं के कारण अपने रीति रिवाज और परंपराओं को ही भूल गये हैं। पहाड़ों में न्यूतु अरसा, भूड़ा, पूड़ी और स्वालों का दिया जाता था। इसे गढ़वाली में 'डाली या डली' कहा जाता है। शादी से कुछ दिन पहले डाली बनती है और फिर से इसे सभी रिश्तेदारों के पास पहुंचा दिया जाता है। हमारे यहां वर्षों से शादियों में अरसा, पूड़ी से ही न्यौता दिया जाता रहा है। डाली वाले दिन गांव वाले न्यौता देने के लिये इधर उधर गांवों में जाने में सहयोग करते थे। इसे 'डाली द्यूणु यानि देना' कहते हैं। गांवों में कई को डाली नहीं दी जाती थी या उन्हें न्यौता नहीं ​जाता था। यदि आपकी डाली में अरसा भी शामिल हैं तो इसका मतलब है कि आपको शादी के लिये न्यौता दिया गया है। कुछ लोगों को सिर्फ पूड़ी और भूड़ा दे दिया जाता था मतलब आपको नहीं न्यौता गया है। न कोई सवाल न कोई जवाब। इतना महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है न्यौता देने में अरसा। कुछ लोगों को अलग से न्यौता दिया जाता था। इनमें पंडित जी, मंगलेर, औजी, सुहागन नारी, पांच कन्या आदि शामिल होती थी। इनमें से पंडित जी को आज भी याद किया जाता है लेकिन उन्हें भी न्यौता देने का तरीका बदल गया है। ​बहाना बनाना आसान होता है उनका समाधान भी है। आप अपने बेटे या बेटी की शादी में 15 से 20 दिन पहले 'डाली' तैयार करवा दीजिए और फिर जाईये अपने रिश्तेदारों के घर अरसा की डाली लेकर। अधिकतर आपके इस प्रयास की सराहना करेंगे। आप कार्ड भी छपवाईये लेकिन उसे स्वयं लेकर जाईये। यदि प्रत्येक को आप चार अरसा भी देते हैं तो इसे कहेंगे सोने पे सुहागा। दिल्ली में लोग कार्ड देने में भी आलस्य बरतते हैं तो अरसा उन पर भारी पड़ जाएगा लेकिन प्रयास तो करने होंगे। यह हमारी सभ्यता है, हमारी संस्कृति है, हमारी परंपरा है। 
     आजकल कुछ लोग एक सवाल उठाते हैं अरसा कैसे बनता है। मैं पहले भी घसेरी में अरसा के बारे में जानकारी दे चुका हूं। अरसा बनाने की विधि के लिये आप ''दोण और कंडी से होती है (थी) बेटी की विदाई'' पर क्लिक करिये। इससे आपको पता चल जाएगा कि अरसा कैसे बनाया जाता है। बस मेरी इतनी प्रार्थना है कि यदि आप शादी . ब्याह में किसी को आमंत्रित करते हैं तो उसे सम्मा​न से न्यौता दीजिए। हमारी संस्कृति कहती है, 'अतिथि देवो भव:। इसलिए अतिथि को आदर सत्कार के साथ आमंत्रित करिये। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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रविवार, 3 अप्रैल 2016

मनमोहक ही नहीं औषधि भी है बुरांश

बसंत में पहाड़ों में बुरांश की निराली छटा बरबस ही आकर्षित कर देती है। 
     आज सुबह दीदी ने व्हाट्सएप पर फूलों से लद बुरांश के पेड़ की तस्वीर भेजी तो गांवों में बिताये दिनों की याद ताजा हो गयी। जब चौबट्टाखाल से स्नातक कर रहा था तो वहां से लगभग दस किमी दूर स्थित अपने गांव पैदल ही आता था। महाविद्यालय से निकलते ही भूख लगने लगती थी लेकिन बसंत ऋतु में चिंता नहीं होती थी। जंगल से गुजर रही सड़क के रास्ते आगे आने पर बायीं तरफ बुरांश का बड़ा सा पेड़ था। उसमें से एक अच्छा सा बुरांश का फूल तोड़ा और फिर उसकी एक एक पंखुड़ी को चबाते हुए नौगांवखाल तक का रास्ता कट जाता था। इससे आगे के लिये भी पर्याप्त ऊर्जा मिल जाती थी। तब मैं इतना ही जानता था कि बुरांश स्वास्थ्य के अच्छा होता है लेकिन यह पता नहीं था कि वास्तव में यह तो गुणों की खान है। फूल की सुंदरता पेड़ पर होती है लेकिन अपने औषधीय गुणों के कारण शायद बुरांश की किस्मत में खिलने के बाद चटनी, शरबत, जूस आदि के रूप में परिवर्तित होकर लोगों के जीवन में उमंग और उल्लास भरना है। 
       अगर आपको बुरांश की सुंदर छटा देखनी है तो आजकल पहाड़ों में चले जाईये। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, नेपाल से लेकर अरूणाचल प्रदेश तक आपको लाल चटख रंग का यह फूल स्वागत में पलक पांवड़े बिछाये हुए दिखेगा। उत्तराखंड की विभिन्न भाषाओं और बोलियों के कवियों गी​तकारों ही नहीं बल्कि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' से लेकर श्रीकांत वर्मा तक कई कवि इससे प्रभावित थे। सुमित्रानंदन पंत ने कुमांउनी में बुरांश के बारे में लिखा है। उनके शब्दों में ''जंगल में जो स्थान बुरांश का है वह किसी अन्य चीज का नहीं। '' गढ़वाली के सुप्रसिद्ध गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने बसंत को लेकर कई गीत रचे हैं और स्वाभाविक है कि बुरांश के बिना पहाड़ों में बसंत का गुणगान करना मुश्किल है। एक जगह पर वह लिखते हैं, 'डांडयूं खिलणा होला बुरांशी का फूल, पाख्युं हैंसणी होली फ्योंली मुलमुल'। इस तरह से अन्य गी​तकारों ने भी बुरांश को अपने गीतों में बहुत अधिक तवज्जो दी है। कवि महेशानंद गौड़ 'चंद्रा' का यह गीत काफी प्रसिद्ध है, ''चल रूपा बुरांश क, फूल ​बणि जौला, छमछम हीट छींछाड़ियूं को पाणी पेई औला।'' कुमांउनी में कई गीतों में बुरांश का वर्णन है। जैसे कि ''पारा भीडा बुरूंशी फूली छौ मैं ज कूंछू मेरी हीरू अरै छौ।'' या ''बुरांश दादू तू बड़ा उतालू रे औरू फूल तू फूलण नी देन्दो।''
        बुरांश बसंत ऋतु में जंगलों में खिलने वाला फूल है। यह 1500 से 3500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित स्थानों पर पाया जाता है। इसका पेड़ सामान्यत: 10 से 15 मीटर तक लंबा होता है। नगालैंड के कोहिमा के माउंट जाफू में 1993 में बुरांश का 108 फुट लंबा पेड़ पाया गया था जो गिनीज बुक आफ रिकार्ड में दर्ज है। बुरांश के अलावा इसे बुरूंश, लाली गुरांस (विशेषकर नेपाल में), बुरास, बराह, इरास आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम 'रोडोडेंड्रन आरबोरियम' है जो लाल, गुलाबी और सफेद रंग का होता है। इनमें लाल रंग का बुरांश औषधीय गुणों से भरपूर होता है। यह उत्तराखंड का राज्य वृक्ष, हिमाचल प्रदेश और नगालैंड का राज्य पुष्प और नेपाल का राष्ट्रीय पुष्प है। 

बुरांश के औषधीय गुण  


     रिष्ठ पत्रकार अरूण जैन ने एक किस्सा सुनाया। उन्हें पहाड़ों में घूमने का शौक है। उनके शब्दों में, ''एक बार पहाड़ों में काफी चलने के बाद मैं बहुत थकान महसूस कर रहा था। तब किसी ने मुझे बुरांश का शरबत पिलाया था। मैंने पहली बार यह शरबत पिया था। पीने में तो सामान्य सा लगा लेकिन इसके बाद मेरी थकान रफूचक्कर हो गयी। मेरी स्फूर्ति लौट आयी थी। मुझे लगा कि मैंने शरबत नहीं अमृत पिया। '' वास्तव में किसी अमृत से कम नहीं है बुरांश और उससे बना शरबत। उत्तराखंड में तो इसके शरबत से मेहमानों का स्वागत किया जाता है। यह शरीर में ताजगी लाता है और थकान दूर करने में सहायक होता है। इसकी चटनी भी बनायी जाती है। इसकी पत्तियों की खाद बनायी जाती है। इनको जलाने से कीड़े मकौड़े नहीं आते हैं। 
     बुरांश पोटेशियम, कैल्शियम, आयरन, विटामिन सी से भरपूर होता है। अध्ययनों के अनुसार में क्यूरेसिटिन, रियुटिन और कोमारिक अम्ल जैसे सक्रिय जैविक यौगिक भी बुरांश के फूल में पाये जाते हैं। ये तीनों सेब में भी पाये जाते हैं और इनकी मौजूदगी के कारण ही कहा जाता है कि 'रोज एक सेब खाने का मतलब बीमारियों से दूर रहना।' विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि फ्लैवोनोइड क्वेरसेटिन, फेनोलिक्स, सैपोनिन्स, टैनिन आदि औषधीय तत्वों से भरपूर फाइटोकेमिकल्स पाये जाते हैं। 
     आपने गांवों में देखा होगा कि कुछ बीमारियों में बुरांश की पत्तियों और उसके फूल का उपयोग किया जाता है। मसलन सिरदर्द या हाथ पांव में जलन होने पर इसकी पत्तियों का लेप लगाना, घावों पर पंखुड़ियों को पीस कर लगाना, पेट की जलन दूर करने के लिये बुरांश का शरबत पीना या इसकी पंखुड़ियों का चबा चबा कर खाना। गांवों में एलर्जी, अस्थमा और मौसम बदलने पर होने वाली बीमारियों से बचने के लिये लोग इसकी पंखुड़ियों का सेवन करते थे। नेपाल में लोग वर्षों से मधुमेह के रोग के लिये इसका उपयोग करते रहे हैं और जो नवीनतम शोध बुरांश पर किये गये हैं उनके अनुसार हृदय रोगियों और मधुमेह के रोगियों के लिये बेहद उपयोगी है। टाइप एक और टाइप दो के डायबिटीज के रोगी भी इसका उपयोग कर सकते हैं। उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में भी यह अपनी भूमिका निभाता है। कोलेस्ट्राल को नियंत्रित करने में इसकी भूमिका होती है। दिल के लिये इसका शरबत या जूस काफी उपयोगी होता है। इसका नियमित सेवन करने से दिल का दौरा पड़ने की संभावना कम हो जाती है। यह यकृत यानि लीवर के रोगों को भी दूर करने की क्षमता रखता है। बुरांश में लौहतत्व होते हैं और इसलिए हीमोग्लोबिन की कमी दूर करने में भी यह सहायक होता है। 
    बुरांश गुर्दा यानि किडनी और पेशाब की जलन को दूर करने में सहायक होता है। यहां तक कि यदि मुंह में छाले हैं तो इसकी पंखुड़ियों को चबाने से राहत मिलती है। इसकी पंखुड़ियों और पत्तियों से पाउडर बनाया जाता है जिनका सेवन करने से डायरिया में राहत मिलती है। पेचिस में इसका सेवन उपयोगी होता है क्योंकि इसमें फ्लैवोनोइड्स, टैनिस, स्टेरोल आदि फाइटोकैमिकल्स पाये जाते हैं। बुरांश के कुछ गुण कैंसर जैसी बीमारी नहीं होने देते हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट पाये जाते हैं जिससे यह शरीर के खराब तत्वों का नष्ट करता है। कहने का मतलब है कि यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण इसका जूस पीने से त्वचा में भी निखार आता है। बुरांश के फूल से चेहरे पर लगाने के लिये लेप (फेसपैक) भी तैयार किया जाता है। यह लेप फूलों के पाउडर और शहद को मिलाकर तैयार किया जाता है।
    कहने का मतलब है कि बुरांश का जूस बेफिक्र होकर ​पियें लेकिन बहुत अधिक मात्रा में नहीं क्योकि अति तो किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती है। बुरांश का पेड़ दिखे तो एक फूल लेकर उसकी पंखुड़ियों को चबाकर खाने से आपको लाभ ही मिलेगा। इसका महत्व समझें और फूलों को बर्बाद नहीं करें। यदि इसका उपयोग नहीं करना है तो उसे पेड़ पर ही रहने दें। उम्मीद है विभिन्न स्रोतों से  बुरांश के बारे में ली गयी यह जानकारी आपको उपयोगी लगी होगी। बुरांश को लेकर अपने अनुभव जरूर साझा करें। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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शनिवार, 19 मार्च 2016

गांव की मेरी होली और होली गीत

 हम होली वाले देवें आशीष, गावें बजावें जी देवें आशीष..... घसेरी के पाठकों को होली की शुभकामनाएं। 


       मां ने हां कर दी थी लेकिन पिताजी को मनाना टेढी खीर था। उन्हें घर . घर जाकर होली खेलना और चंदा मांगना पसंद नहीं था। आखिर मां का सहारा लिया और पिताजी भी मान गये। उम्र यही नौ दस साल रही होगी। मेरे दोस्त भी मेरी तरह उत्साह और उमंग से भरे थे। सबसे पहले तैयार करनी थी ढोलकी। मैं खुद ही एक ढोलकी तैयार करने में जुट गया। उसमें भी मां की मदद ली। एक बेलनाकार बड़ा सा डब्बा (मां उसे एक किलो का डब्बा बोलती थी) मिल गया। उसका मुंह तो खुला ही था, दूसरी तरफ का हिस्सा काटकर पूरा खोखला बना दिया। इसके बाद व्यवस्था की गयी मजबूत से प्लास्टिक की। पहले बरसात में महिलाएं खेतों में काम करने के लिये सिर पर प्लास्टिक  डालकर ले जाती थी जो निराई . गुड़ाई करते समय उनकी पीठ को भी बचाता था। ऐसा ही एक पुराना प्लास्टिक मिल गया। लचीली लकड़ी ली और उसे डब्बे के गोलाकार आकार के बराबर काटकर उसके दोनों छोर बांध दिये। इससे वह गोल हो गया। अब उस पर ऊपर से प्लास्टिक को रखकर उसे लकड़ी के साथ अच्छी तरह से सील दिया। इसे पुड़की कहते हैं। अब दोनों पुड़ियों को कसकर रस्सी से जोड़ दिया। बीच में एक रस्सी गले में डालने के लिये भी लगा दी और बन गयी ढोलकी। मेरे कुछ दोस्तों ने भी अपनी ढोलकी बना दी थी। 
       होली खेलने के लिये तैयारियां शुरू हो गयी थी। मेरा गांव स्योली काफी बड़ा है और तब तो सभी गांववासी गांव में ही बसते थे। मतलब पलायन की हवा चंद लोगों पर ही लगी थी। भरा पूरा गांव था। स्वाभाविक था की होली की भी दो तीन टोलियां बन जाती थी और उस समय भी ऐसा हुआ। बड़े लड़के तो अलग खेल ही रहे थे छोटे बच्चों की भी तैल्या ख्वाल और मैल्या ख्वाल की दो टोलियां बन गयी थी। झगड़ा होने पर डर ढोलकी का ही रहता था क्योंकि ऐसी स्थिति में विरोधी दल सबसे पहले उसे फोड़ने की कोशिश करता। एक पुराने कपड़े से झंडा भी तैयार कर दिया था। झंडा पकड़ने वाला (उसे हम जोकर बोलते थे और इसके लिये आखिर में उसे कुछ अलग से पैसे मिल जाते थे) भी तैयार कर दिया था। 
      यह तो पहले ही पता था कि फलां दिन से होली खेलनी है। सात दिन होली खेलनी थी और इसलिए यह भी तय कर दिया कि किस दिन किन . किन घरों में जाना है। सातवीं रात होलिका दहन करना था। हमने भी बड़े लड़कों को देखकर पयां की टहनी पर (पहाड़ों में पयां का पेड़ हर जगह नहीं पाया जाता है इसलिए उसके बजाय मेलु या चीड़ के पेड़ का इस्तेमाल किया जाता है) एक चीर बांध दी। वहीं पर पेड़ की पूजा की और होली के गीत गाये। इस तरह से हम होल्यार (होली खेलने वाली बच्चों की टोली) बन गये थे। मां को कुछ होली गीत याद थे जो उन्होंने मुझे सिखा दिये थे। अगले दिन तो हमारे उत्साह का कोई ठिकाना ही नहीं था। हम फिर से पयां के पेड़ के पास इकट्ठा हुए, वहां पर पूजा की और फिर टहनी काटकर पहले से ही तय किये गये स्थान पर स्थापित कर दिया। यहां पर पत्थरों से छोटी कूड़ी बनायी जिसके अंदर एक दिया समा सके। यह भी पहले ही तय कर दिया था कि किस दिन किस के घर से तेल आएगा। 

गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी की संगीतमय होली। दोनों फोटो "सतपुली एकेश्वर फेसबुक पेज" से ली गयी हैं।

होली गीत खोलो किवाड़ से देवें आशीष तक 


    शाम को दिया जलाया और सबसे पहले 'कूड़ी' का पूजन करने के बाद हम निकल गये गांव में होली खेलने। एक ढोलकी बजाता तो बाकी ताली। प्रत्येक घर के चौक में घूम घूमकर होली खेलते और कुछ देर बाद एक लड़का घर वालों को तिलक लगाने के लिये जाता। उसके साथ दूसरा बंदा भी होता था जिसके पास थैला होता। पैसे मिले तो जेब में और चावल या गिंदणी (गुड़) मिला तो थैले में। हमें पता था कि प्रत्येक नये घर में पहुंचने पर शुरुआत किस होली गीत से करनी है। आपने भी गाया होगा ''खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर, दर्शन दीज्यो माई अंबे झुलसी रहो जी। जगमग जोत जले दिन राती, दर्शन दीज्यो माई अंबे झुलसी रहो जी। '' इसके बाद हर घर में कुछ नया होली गीत गाने की कोशिश की। कई गीत सही आते भी नहीं थे लेकिन बच्चे थे इसलिए टूटे फूटे गीत भी चलते थे। जब बड़े हो गये तब जरूर लय में और सही होली गायी।  कोई एक बंदिश गाता यानि भाग लगाता और बाकी उसके सुर में सुर मिलाते। होली के गीतों में स्थानीय पुट होने के साथ देवी देवताओं, कृष्ण लीला और प्रकृति का वर्णन होता। जैसे '' हर हर पीपल पात जय देवी आदि भवानी, कहां तेरो जनम निवास जय देवी आदि भवानी ....।'' या फिर '' को जन खेल घड़िया हिंडोला, को जन डोला झुकाये रहे हर फूलों से मथुरा छायी रहे। कृष्ण जी खेलें घड़िया हिंडोला, राधा जी डोला झुकाये रहे हर फूलों से ...।'' हम सभी बच्चों को वैसे कुछ गीत काफी रटे हुए थे। जैसे कि '' चम्पा चमेली के नौ दस फूला ..। '' और '' मत मारो मोहन लाला पिचकारी, काहेे को तेरा रंग बनो है काहे की तेरी पिचकारी, मत मारो ....। '' इसी तरह से ''झुकी आयो शहर में व्योपारी, इस व्योपारी को भूख लगी है, खाना खिला दे नथवाली ...''  बाद में पता चला कि यह कुमांऊ में बैठकी होली का अपभ्रंश था। (कुमांऊ में बैठकी होली काफी प्रसिद्ध है लेकिन गढ़वाल में भी कई जगह बैठकी होली का प्रचलन था और इसमें भी वही गीत होते थे कुमांऊ में गाये जाते हैं। इनमें से कुछ गीत बचपन में हमारे होठों पर भी चढ़े हुए थे जैसे 'मथुरा में खेले एक घड़ी, काहे के हाथ में डमरू बिराजे, काहे के हाथ में लाल छड़ी ...' या ' जल कैसे भरूं जमुना गहरी, ठाडे भरूं राजाराम देखत है बैठी भरूं भीगे चुनरी...। ')
      होली गीत गाते हुए एक नजर उस लड़के पर भी होती थी जो दान मांगने गया हो। जैसे ही पता चला कि होली का दान कहें या इनाम मिल गया है तो फिर आशीर्वाद देने के लिये एक गीत हुआ करता था '' हम होली वाले देवें आशीष, गावें बजावें जी देवें आशीष। बामण जीवें लाखों बरस, बामणि जीवें लाखों बरस, जी रयां पुत्र अमर रयां नाती....। '' अब घर की स्थिति देखकर आशीष आगे बढ़ाया जाता था। यदि लड़का बड़ा हो रहा है तो '' ह्वे जयां तुमरो नौनु बिवोण्या (आपका बेटा शादी के लायक बन जाए) '' यदि शादीशुदा है और बच्चे नहीं हैं तो फिर '' ह्वे जयां तुमरो नाती खिलौण्या (आपके घर में पोते का जन्म हो)। साथ में ही यह भी जतला दिया जाता था कि हमें देने से उन्हें फायदा ही फायदा होगा। कुछ इस तरह से '' जो हम द्यालू, वैथै शिव द्यालु '' या फिर  ''जौंला द्याया होली कु दान, वूं थै द्यालु श्री भगवान '' और कुछ इस तरह भी '' होली कु दान स्वर्ग समान।''
     दान में क्या मिलते थे 10, 25, 50 पैसे या फिर ज्यादा हुआ तो एक रूपया। कोई दो रूपया दे देता तो हमारी नजर में वह महीनों तक सम्मानीय रहता। मुझे याद है कि जब पहली बार मैंने होली खेली थी तो हमारे पास 21 रूपये और कुछ पैसे हुए थे। थोड़ा चावल और गिंदणी भी थी। सात दिन की कमाई। इनमें से कुछ पैसों के रंग लेकर आ गये थे। सातवीं रात को होली खेलने के बाद हम उस घर में जमा हो गये जिसके पास में कूड़ी थी। कूड़ी के आसपास दिन से ही खूब लकड़ियां, घास इकट्ठा कर दिया था। रात ढलते ही होलिका दहन कर दिया। मस्ती के साथ साथ चिल्ला चिल्लाकर गा रहे थे '' होली फुकेगे प्रह्लाद बचिगे''। अगले दिन सुबह उठकर रंग और गुलाल का खेल। पिताजी ने मेरे लिये बांस की पिचकारी बनायी थी जो वर्षो तक चली थी। दूर तक पानी फेंकती थी। जब बच्चे थे तो अपने आपस में रंग गुलाल लगाते और पानी फेंकते लेकिन जब बड़े हुए तो हम भी गांव की भाभियों के साथ होली खेलते थे। भाभियां भी देवरों को छकाने में माहिर हुआ करती थी। सुबह जल्दी उठकर खेतों में काम करने चली जाती थी। इनमें से कुछ रंग और पानी की मार से बच जाती थी तो कुछ फिर भी भिगो दी जाती थी। 
      रंग गुलाल का खेल होने के बाद मां ने गर्म पानी से खूब रगड़कर नहलाया। कुछ रंग फिर भी रह गया था। धूप सेंकी और फिर सारे लड़के इकट्ठे हो गये। जो चावल और गिंदणी मिले थे उसका बढ़िया सा मीठा भात (खुक्सा) बनाया। जो कमाई हुई थी उससे नौगांवखाल जाकर खाने की अन्य चीजें भी खरीदकर ले आये। तब 20 रूपये में काफी सामान आ जाता था। किसी बड़े की मदद से खाना तैयार हुआ, उसे छककर खाया और इस तरह से संपन्न हो गयी थी मेरी पहली होली। जब हम बड़े हुए थे तो हमारे पास बाकायदा एक अदद ढोलकी हुआ करती थी। हारमोनियम थी। बांसुरी वादक था और एक बार तो हम अपने गांव से बाहर दूसरे गांव भी होली खेलने गये थे। 

कुमांऊ की बैठकी होली


     यदि हम उत्तराखंड की होली की बात करें तो पहले यहां विशेषकर कुमांऊ में बैठकी होली खेली जाती थी। शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस होली के बारे में कहा जाता है कि उसकी शुरुआत 1860 के आसपास रामपुर के उस्ताद अमानत उल्ला खां ने किया था। बैठकी होली के गायन की शुरुआत पौष मास के पहले रविवार से शुरू हो जाती है। इसके अलग अलग चरण होते हैं। यह होली रंगों से नहीं रागों से खेली जाती है क्योंकि इसमें आपको दादरा, ठुमरी, राग धमार, राग श्याम कल्याण, राग भैरवी सभी सुनने को मिल जाएंगे। बैठकी होली की शुरुआत आध्यात्मिक और भक्त्मिय होली गायन से होती है। बाद के चरणों में कृष्ण, राधा और गोपियों के बीच हास परिहास, प्रेमी . प्रेमियों की तकरार, देवर भाभी से जुड़े गीतों तक पहुंच जाती है। इन गीतों की विशेषता यह है कि ये ब्रज भाषा में होते हैं। 
    आपने भी अपने गांवों में कभी न कभी होली खेली होगी। कैसी थी आपकी होली जरूर बतायें। घसेरी के सभी पाठकों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं। आपका धर्मेन्द्र पंत 

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