गुरुवार, 9 जुलाई 2015

झंगोरा : बनाओ खीर या सपोड़ो छांछ्या

     सुबह लेकर अखबार में पढ़ा की उत्तराखंड की झंगोरा की खीर राष्ट्रपति भवन के मेन्यू में शामिल कर ली गयी है। खुशी मिली और साथ में मुंह पानी भी आ गया। कुछ लोगों के लिये यह शब्द नया हो सकता है लेकिन मुझे नहीं लगता कि जो व्यक्ति कुछ दिन भी पहाड़ में रहा हो वह झंगोरा से अपरिचित हो। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान भी यह नारा अक्सर सुनने को मिल जाता था, '' मंडुवा . झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे।'' 
पौष्टिकता से भरपूर होता है झंगोरा
     उत्तराखंड में झंगोरा की खेती सदियों से की जा रही है और एक समय इसका उपयोग चावल के स्थान पर भात की तरह पकाकर खाने के लिये किया जाता था। चावल की बढ़ती पैठ के कारण दशकों पहले ही पहाड़ों में इसे दूसरे दर्जे के भोजन की सूची में धकेल दिया था। यह अलग बात है कि चावल की तुलना में झंगोरा अधिक पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक है और इसकी खेती के लिये उतनी मेहनत भी नहीं करनी पड़ती है जितनी की धान उगाने के लिये। उत्तराखंड में जिन खेतों की मिट्टी मुलायम और उपजाऊ होती है वहां धान बोया जाता है और जो खेत थोड़ा पथरीला हो वहां झंगोरा की खेती की जाती है। इसके धान के खेत के किनारे भी रोपा जाता है। एक समय आया जबकि उत्तराखंड के किसानों का इससे मोहभंग हो गया था लेकिन अब वे धीरे धीरे इसके गुणों से परिचित हो रहे हैं। इसलिए पहाड़ी खेतों के फिर से झंगोरा की तरह लहलहाने की उम्मीद की जा सकती है। यदि आप इस लेख को पढ़ रहे हों तो लोगों को झंगोरा उत्पादन के लिये प्रेरित कर सकते हैं। कई खेतों में झंगोरा के साथ कौणी भी बो दी जाती है। कौणी का दाना पीला होता है और मरीजों के लिये इसकी खिचड़ी काफी उपयोगी होती है।
     झंगोरा खरीफ ऋतु की फसल है क्योंकि पानी के लिये यह बरसात पर निर्भर रहती है। पहाड़ों में झंगोरा की खेती करने के लिये खेत को हल से जोता जाता है और इसमें झंगोरा छिड़क दिया जाता है। बरसात में इसकी निराई, गुड़ाई, रोपाई की जाती है। इधर बारिश हुई और गांवों के लोग खेतों में झंगोरा को व्यवस्थित तरीके से लगाने के लिये चले जाते हैं। वैसे इसकी बुवाई मार्च से मई तक कर दी जाती है और बरसात इसको नया जीवन देती है। सितंबर . अक्तूबर में कटाई का काम चलता है। इसकी लंबी बालियां मनमोहक होती हैं, जिन्हें मांडकर या कूटकर झंगोरा का एक एक दाना अलग कर दिया जाता है। तब यह भूरे रंग का होता है। इसके भूरे रंग के छिलके को निकालने के लिये ओखली (उरख्यालु) में कूटा जाता था जिसके अंदर का दाना सफेद होता है। इसी दाने का उपयोग खीर, खिचड़ी या चावल की तरह पकाने के लिये किया जाता है। पहाड़ी घरों में आज भी झंगोरा से छंछ्या बनाया जाता है जो वहां के लोगों में काफी लोक​​प्रिय है। 
      पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब अपने ग्रीष्मकालीन प्रवास पर नैनीताल जाते थे तो झंगोरा की खीर उनका पसंदीदा व्यंजन होता था। ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स और उनकी पत्नी कैमिला पार्कर जब नवंबर 2013 में भारत दौरे पर आये तो वे उत्तराखंड भी गये थे। वहां उन्हें झंगोरा की खीर परोसी गयी थी जिसकी उन्होंने काफी तारीफ की थी। यहां तक उन्होंने इसे बनाने की विधि भी पूछी थी। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को इस साल मई में उत्तराखंड प्रवास के दौरान राजभवन में झंगोरा की खीर परोसी गयी थी। यहीं से इस पहाड़ी व्यंजन का राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने का रास्ता साफ हुआ था। गढ़वाल मंडल विकास निगम पहले ही इसे अपने मेन्यू में शामिल कर चुका है।
     माना जाता है कि झंगोरा मध्य एशिया से भारत में पहुंचा और उत्तराखंड की जलवायु अनुकूल होने के कारण वहां इसने अपनी जड़ें मजबूत कर ली। भारत के कुछ प्राचीन ग्रंथों में भी इसका वर्णन मिलता है। चीन, अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों में भी इसकी खेती की जाती है। झंगोरा का वैज्ञानिक नाम इक्निकलोवा फ्रूमेन्टेसी है। हिन्दी में इसे सावक या श्याम का चावल कहते हैं। राष्ट्रीय पोषण संस्थान केे अनुसार झंगोरा में कच्चे फाइबर की मात्रा 9.8 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 65.5 ग्राम, प्रोटीन 6.2 ग्राम, वसा 2.2 ग्राम, खनिज 4.4 ग्राम, कैल्शियम 20 मिलीग्राम, लौह तत्व पांच मिलीग्राम और फास्फोरस 280 ग्राम पाया जाता है। 
     यह सभी जानते हैं कि खनिज और फास्फोरस शरीर के लिये बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। झंगोरा में चावल की तुलना में वसा, खनिज और लौह तत्व अधिक पाये जाते हैं। इसमें मौजूद कैल्शियम दातों और हड्डियों को मजबूत बनाता है। झंगोरा में फाइबर की मात्रा अधिक होने से यह मधुमेह के रोगियों के लिये उपयोगी भोजन है। झंगोरा खाने से शरीर में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। यही वजह है कि इस साल के शुरू में उत्तराखंड सरकार ने अस्पतालों में मरीजों को मिलने वाले भोजन में झंगोरा की खीर को शामिल करने का सराहनीय प्रयास किया। उम्मीद है कि इससे लोग भी झंगोरा की पौष्टिकता को समझेंगे और चावल की जगह इसको खाने में नहीं हिचकिचाएंगे। असलियत तो यह है कि जो चावल की जगह झंगोरा खा रहा है वह तन और मन से अधिक समृद्ध है। 

झंगोरा से बनने वाले भोज्य पदार्थ

     त्तराखंड में नवरात्रों या व्रत आदि के समय में भी झंगोरा का उपयोग किया जाता है लेकिन आम दिनों में इसे चावल की तरह पकाया जाता है या फिर इसकी खीर, खिचड़ी, छंछ्या या छछिंडु बनाया जाता है। झंगोरा की खीर भी चावल की खीर की तरह की बनायी जाती है। यदि आप 300 ग्राम के करीब झंगोरा लेते हैं तो उसमें 150 ग्राम चीनी और लगभग डेढ़ लीटर दूध मिलाया जाता है। झंगोरा को पहले 15 से 20 मिनट तक पानी में भिगो कर रख दो और इस बीच दूध को उबाल दो। उबले हुए दूध में झंगोरा मिला दो और अच्छी तरह से पकने तक इसमें करछी चलाते रहो। इसके बाद चीनी मिलाओ। स्वाद बढ़ाना है तो काजू, किसमिस, बादाम, चिरौंजी जैसे ड्राई फ्रूट भी मिला सकते हो। अब इसे आप गरमागर्म परोसो या ठंडा होकर खाओ, स्वाद लाजवाब होता है।
    जिस तरह से चावल को पकाते हैं झंगोरा को उस तरह से इसका भात पकाकर दाल के साथ खाया जाता है। इसके अलावा इसकी खिंचड़ी भी पकायी जाती है। छंछ्या के लिये छांछ में झंगोरा मिलाकर उसे पकाया जाता है। इसे नमकीन और मीठा दोनों तरह से बना सकते हैं। इसके अलावा अब झंगोरा की रोटी और उपमा भी बनाया जाने लगा है। आपका धर्मेन्द्र पंत (इनपुट ... निर्मला घिल्डियाल)

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शनिवार, 4 जुलाई 2015

चलो भैजी कौथिग जौंला

     चपन में जब कौथिग की बात आती थी तो मेरे लिये इसका मतलब अपने गांव की कुलदेवी नंदादेवी, पास में स्थित जणदादेवी, माध्योसैण या फिर ईसागर यानि एकेश्वर के कौथिग तक सीमित था। असल में तब ये कौथिग हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा हुआ करते थे और हम इनका बेसब्री से इंतजार करते थे। पहनने को नये कपड़े मिलते थे और इन कौथिग यानि मेलों में सीटी, बांसुरी खरीदने से लेकर जलेबी खाने और बर्फ की आईसक्रीम चूसने का मौका मिल जाता था। कोई दूर का रिश्तेदार मिल जाता तो जेब में दस . बीस पैसे या ज्यादा हुआ तो चवन्नी, अठन्नी डालकर चला जाता तो उसके लिये मन में इज्जत बढ़ जाती थी। नंदादेवी और जणदादेवी कौथिग के लिये हम पांच . दस पैसे इकट्ठा करके रखते थे। जेब में यदि चार . पांच रूपये होते तो कौथिग का आनंद दुगुना हो जाता था। यह 70 और 80 के दशक का किस्सा है जब मैं गांव की संस्कृति और समाज में अपना बचपन बिता रहा था। कौथिग आज भी होते हैं लेकिन दुनिया का डिजिटलीकरण होने के बाद मुझे नहीं लगता कि पहाड़ का आज का बच्चा इन मेलों को लेकर उतना ही उत्साहित होगा जितना कभी मैं या मेरी पीढ़ी के लोग या मेरे से पहले के बच्चे हुआ करते थे। कभी इन कौथिगों में जनसैलाब उमड़ पड़ता था। मैंने देखा है जणदादेवी और एकेश्वर में तिल रखने की जगह तक नहीं बचती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। कौथिग के दिन एकेश्वर के डांडों में लोगों की भीड़ अब महज कल्पना है।
जणदादेवी कौथिग का विहंगम दृश्य। फोटो .. श्री दीनदयाल सुंद्रियाल
     चपन में एक गीत भी सुना था 'गौचरा को मेला लग्यूं च भारी, मेला म अयीं ह्वेली दीदी, भुली स्याली ....'।  गौचर का मेला एक व्यावसायिक मेला था जिसकी शुरूआत 1943 में हुई थी लेकिन देवभूमि उत्तराखंड में अधिकतर मेले किसी देवस्थल से संबंध रखते हैं। किसी भी देवी या देवता के मंदिर के पास किसी नियत तिथि को कौथिग लगता है। इस तरह से कौथिग में धार्मिक कार्यों के अलावा लोगों को अपने सगे संबंधियों से मिलने और वर्ष भर की अपनी खट्टी मीठी यादों को साझा करने का मौका मिलता था। कोई बेटी अपने मां पिताजी, भाई बहन और गांव वालों से मिलने के लिये इन कौथिगों का बेसब्री से इंतजार करती थी। इसलिए अक्सर कौथिगों में शा​म को विछोह का एक मार्मिक दृश्य भी पैदा हो जाता था। किसी भाग्यशाली बेटी को कौथिग के ​बहाने अपने मायके एक दो दिन बिताने के लिये मिल जाते थे। उसके चेहरे की खुशी यहां पर शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती है। इस तरह की खुशी और पीड़ा की कल्पना आज की 'मोबाइल पीढ़ी' नहीं कर सकती है।
    कौथिग किसी धार्मिक स्थल पर ही लगने का मतलब था कि जाते ही सबसे पहले देवी या देवता को भेंट चढ़ाना। एक पैसे से लेकर दस पैसे तक। कोई सवा रूपया भी रख लेता था। हमें यही कहा जाता था कि जब तक भेंट नहीं चढ़ायी तब तक कौथिग में कुछ खाना पीना नहीं। एक गलत परंपरा भी इन कौथिगों से जुड़ी थी और वह थी पशुबलि देने की। अमूमन बकरों की बलि दी जाती थी। यदि 'अठवाण' होती तो भैंसे की बलि भी दी जाती। मेरे लिये बचपन यह कौथिगों का नकारात्मक पहलू रहा। इधर बकरे का सिर धड़ से अलग होता और दूसरी तरफ लोगों में उसके रक्त का टीका लगाने की होड़ मच जाती। खुशी इस बात की है कि धीरे धीरे लोगों में जागरूकता आयी है और अब कई कौथिगों में बलि प्रथा लगभग समाप्त हो गयी है। कौथिगों में ढोल, दमाउ, हुड़का, डौंर, रणसिंघा आदि बजाये जाते हैं। ढोल की थाप पर यूं कहें कि कौथिगों में पांडव नृत्य या​नि पंडौं पर तो अच्छे खासों के पांव थिरकने लगते थे। कुछ लोगों के शरीर में देवी देवताओं का प्रवेश भी इन कौथिगों का एक हिस्सा रहा है।
   कभी उत्तराखंड के हर गांव में कौथिग होता था। अमूमन इनकी शुरूआत बैशाखी के दिन से होती थी और सितंबर अक्तूबर तक इन सीजन रहता था। अब इनकी संख्या घट गयी है। इसके बावजूद कई कौथिग आज भी उत्तराखंड की पहचान है। इनमें गौचर मेला, श्रीनगर का बैकुंठ चतुर्दशी मेला, उत्तरकाशी का माघ मेला, कोटद्वार के कण्वाश्रम में लगने वाला बसंत पंचमी मेला, अल्मोड़ा का नंदादेवी मेला, बागेश्वर का उत्तरायणी मेला, लोहाघाट का देवीधूरा मेला, टनकपुर का पूर्णागिरी या कालसन मेला, भीमताल में लगने वाला हरेला मेला, काठगोदाम के पास जियारानी का मेला, मुंडणेश्वर का मेला आदि प्रमुख हैं। अकेले पौड़ी गढ़वाल में ही 50 से अधिक बड़े कौथिग लगते हैं। इनमें मुंडणेश्वर, एकेश्वर, जणदादेवी, सल्ट महादेव, अदालीखाल, बिनसर, देवलगढ़, कौड़िया लैंसडाउन का ज्यूनि सेरा का मेला, ताड़केश्वर, संगलाकोटी, देवराजखाल, गिंदी कौथिग, बुंगी कौथिग, नैनीडांडा, रिखणीखाल, बेदीखाल, बीरौंखाल, घंडियाल, नयार घाटी का सत्यवान साबित्री मेला, दीवा मेला, कांडई कौथिग, दनगल (सतपुली), कांडा, थैलीसैण, बैंजरों, लंगूरगढ़ी, डांडा नागराज का कौथिग आदि प्रमुख हैं।

गुरुवार, 18 जून 2015

महाभारत से संबंध रखता है भारत का आखिरी गांव


माणा को आखिरी गांव इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके बाद चीन सीमा तक कोई रिहायशी इलाका नहीं है।

       भारत के आखिरी गांव 'माणा' के बारे में बचपन से सुनता आया हूं। उसकी एक काल्पनिक तस्वीर भी मन में बना ली थी लेकिन इस बार उस गांव को देखने और समझने का मौका मिल ही गया जिसका सीधा संबंध महाभारत से जोड़ा जाता है। 'भारत का आखिरी गांव' से ऐसा आभास होता है जैसे कि इस गांव के तुरंत बाद ही पड़ोसी देश यानि चीन की सीमा लग जाएगी लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। माणा से चीन या तिब्बत की सीमा लगभग 43 किमी दूर है लेकिन यह भी सचाई है कि यह भारत का इस क्षेत्र में आखिरी गांव है। इसके बाद चीन की सीमा तक कोई भी रिहायशी इलाका नहीं है, क्योंकि आगे पहाड़ बेहद दुर्गम हैं जहां के बारे में कहा जाता है कि केवल कुछ साधुओं को ही यहां धुनी रमाये हुए देखा गया।
         माणा गांव राष्ट्रीय राजमार्ग 58 पर हिन्दुओं के तीर्थस्थल बद्रीनाथ से केवल तीन किलोमीटर की दूरी और 3118 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।  बद्रीनाथ की यात्रा पर जाने वाले जिस भी तीर्थ यात्री को माणा का महत्व पता है वह इस गांव में जरूर जाता है। ऐसे में यह पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण स्थान बन गया है। बद्रीनाथ की तरह माणा भी छह महीने तक बर्फ से ढका रहता है। यह कह सकते हैं कि अक्तूबर . नवंबर से मार्च तक माणा गांव जनशून्य हो जाता है और यहां केवल सेना के जवान ही दिखायी देते हैं। इस दौरान माणा गांव के लोग पांडुकेश्वर, जोशीमठ, चमोली और गोपेश्वर आदि को अपना ठिकाना बना लेते हैं। अप्रैल से लेकर सितंबर तक हालांकि यहां अच्छी चहल पहल रहती है। विशेषकर मई और जून माणा गांव जाने के लिये आदर्श समय है क्योंकि बरसात में बद्रीनाथ मार्ग के टूटने या भूस्खलन के कारण उसके बंद होने की संभावना बनी रहती है।  मैंने एक स्थानीय निवासी से पूछा कि छह महीने माणा और छह महीने अन्य स्थानों पर बिताने से बच्चों की पढ़ाई पर असर नहीं पड़ता तो उनका जवाब था, 'बच्चे छह महीने यहां और छह महीने पांडुकेश्वर में पढ़ते हैं। ऐसा वर्षों से चला आ रहा है।' पांडुकेश्वर जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच में पड़ता है। 

गांव के मकान और रास्ते में दुकान सजाकर ऊनी वस्त्र बेचती महिलाएं
        माणा में मर्छिया या भोटिया जनजाति के लोग रहते हैं जो मंगोल प्रजाति से संबंध रखते हैं। गर्म कपड़े तैयार करना, तुलसी से बनी स्थानीय चाय और दाल में पड़ने वाला खासा मसाला 'फरण' बेचना इन लोगों का मुख्य व्यवसाय है। माणा गांव में प्रवेश करते ही आपको बुनाई करती हुई महिलाएं दिख जाएंगी। वे स्वेटर, टोपी, मफलर, स्कार्फ, कारपेट, आसन, पाखी, पंखी, पट्टू आदि बड़ी कुशलता से बना लेती हैं। इन कपड़ों और अन्य सामान को बेचने के काम में भी महिलाओं की भूमिका अहम होती है। गर्मियों में यहां आलू की खेती भी की जाती है। पहले यहां के लोग तिब्बत के साथ व्यापार भी करते थे। यहां के घर भी पहाड़ों के अन्य गांवों के घरों की तरह मिट्टी, पत्थरों और टिन के बने हुए हैं। छोटे से घर जिनमें छह महीने ताला लगा रहता है। अब कुछ 'लेंटर वाले मकान' भी बनने लग गये हैं। इस तरह के यहां लगभग 150 घर होंगे। इनमें से प्रत्येक घर में अमूमन दो कमरे होते हैं जिनमें जरूरत पड़ने पर पर्यटकों को भी ठहराया जाता है। इन कमरों का एक दिन का किराया 500 से 1000 रूपये तक है। माणा गांव की कुल जनसंख्या लगभग 600 है। यहां के लोग तोल्छा भाषा बोलते हैं जो गढ़वाली के बहुत करीब है। इसलिए यह आसानी से समझ में आ जाती है। मुझे इससे आत्मीयता का अहसास भी हुआ, क्योंकि किसी मोड़ पर कोई न कोई यह जरूर पूछ लेता कि 'आप कौन से गांव के हो।

माणा और महाभारत 

कहा जाता है कि इसी गुफा में महाभारत की रचना की थी व्यास ने

    माणा महाभारत काल का गांव है। इसलिए कहा जा सकता है कि यह उत्तराखंड के सबसे प्राचीन गांवों में से एक है। कहा जाता है कि वेदव्यास ने माणा गांव में ही महाभारत की रचना की थी और पांडव स्वर्गारोहिणी इसी गांव से होकर गये थे। इन दोनों घटनाओं के कुछ चिन्ह अब भी यहां विद्यमान हैं। माणा गांव में व्यास गुफा और गणेश गुफा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार व्यास ने इसी गुफा में महाभारत का सृजन किया था। व्यास के आग्रह पर भगवान ब्रह्मा ने गणेश जी को महाभारत लिखने का काम सौंपा था। कहा जाता है कि तब गणेश ने व्यास के सामने शर्त रखी थी कि उन्हें बीच में रूकना नहीं होगा और लगातार बोलते रहना होगा। व्यास ने भी गणेश से कहा कि वह जो भी कहेंगे उसका अर्थ समझने के बाद ही उन्हें उसे लिखना होगा। इससे व्यास को समय मिल जाता था। यह भी कहा जाता है कि लगातार लिखते रहने से गणेश की कलम टूट गयी थी और उन्होंने तब अपनी सूंड का उपयोग कलम के रूप में किया था। व्यास गुफा लगभग सात वर्ग फीट की होगी जहां पर व्यास ने कई महीने बिताये थे। इससे थोड़ी दूर नीचे गणेश गुफा है जहां पर गणेश जी ने बैठकर महाभारत लिखी थी। माना जाता है कि ये गुफाएं 5000 से भी अधिक साल पुरानी हैं।
        माणा गांव से थोड़ी दूर पर सरस्वती नदी है। इस नदी पर पत्थर से बना पुल है। इसे भीमपुल कहते हैं। इसके बारे में कहा जाता है कि जब पांडव स्वर्गारोहिणी के लिये आगे बढ़ रहे थे तो द्रौपदी सरस्वती नदी को पार नहीं कर पायी। पांडवों ने इसके बाद सरस्वती से रास्ता देने का आग्रह किया लेकिन सरस्वती नहीं मानी। पांडवों में सबसे बलशाली भीम ने तब दो बड़े पत्थर लुढकाकर पुल बना दिया। भीम ने तब अपनी गदा जोर से सरस्वती नदी पर मारी थी जिससे यह विलुप्त हो गयी। यह नदी थोड़ा आगे बढ़कर अलकनंदा में मिलती है लेकिन ऐसा आभास होता है जैसे कि यह विलुप्त हो रही हो। इसके वि​लुप्त होने के पीछे एक और कहानी भी है। गणेश जब महाभारत लिख रहे थे तो सरस्वती बड़ा शोर करते हुए बह रही थी। गणेश ने उससे शोर कम करने को कहा लेकिन सरस्वती नहीं मानी। इससे क्रोधित होकर गणेश ने सरस्वती को विलुप्त होने का श्राप दे दिया था। इस तरह से यह नदी अपने उदगम से कुछ मीटर बहने के बाद ही विलुप्त हो जाती है लेकिन आज भी भीमपुल के पास वह पूरी गर्जना के साथ बहती है। कहा जाता है कि यह नदी आगे जाकर प्रयाग में गंगा और यमुना से मिलती है लेकिन वहां पर भी यह दिखती नहीं है। भीमपुल में संभलकर चलें तो बेहतर है क्योंकि इस पुल से नीचे गिरने का मतलब जान से हाथ धोना है। यहां पर अब भी सुरक्षा के पर्याप्त उपाय नहीं किये गये हैं। 

उदगम स्थल से कुछ दूरी पर जाकर विलुप्त भी हो जाती है सरस्वती नदी
      रस्वती नदी के तट पर ही सरस्वती का मंदिर और दो दुकाने हैं। इन पर लगे बोर्ड पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा भी गया है, 'हिन्दुस्तान की अंतिम दुकान'। यहां से आप सरस्वती नदी का पानी भी अपने साथ लेकर जा सकते हैं। नदी के दूसरे छोर यानि माणा गांव वाले छोर पर 'बर्फानी बाबा' भी बैठते हैं। पूरी तरह से राख से सने बाबा की फोटो लेने में पहले मुझे हिचकिचाहट हुई लेकिन बाद में उन्होंने छोटे बेटे प्रदुल को न सिर्फ आशीर्वाद दिया बल्कि उसके साथ फोटो भी खिंचवाई।
    पांडव स्वर्गारोहण के लिये जब सरस्वती नदी से आगे बढ़े तो उन्होंने एक एक करके देहत्याग करनी शुरू कर दी थी। सबसे पहले द्रौपदी ने देह त्याग की थी। केवल युद्धिष्ठर और उनके साथ एक कुत्ता ही सशरीर स्वर्ग गये थे। यह कुत्ता कोई और नहीं बल्कि धर्म था। पांडव शरीर छोड़ने से पहले जिस आखिरी स्थल पर रूके थे वह वसुधारा है। माणा से लगभग छह किमी दूर इस जगह पर पांडवों ने स्नान किया था। कहा जाता है कि जिसने पाप किये हों उस पर इसका पानी नहीं पड़ता है। यहां पर विष्णु गंगा या अलकनंदा 122 मीटर की ऊंचाई से नीचे गिरती है। बसुधारा का पानी भी गंगाजल की तरह लोग अपने घरों में रखते हैं। माणा से लगभग 18 किमी की दूरी पर सतोपंथ ताल भी है। कहा जाता है कि यहां किसी पवित्र दिन पर ​ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्नान करते हैं। यहां से नीलकंठ पर्वत भी देखा जा सकता है। बसुधारा और सतोपंथ ताल के बीच लक्ष्मीवन पड़ता है जिसने धानो ग्लेसियर के नाम से भी जाना जाता है।

माणा के अन्य आकर्षण : भारत की आखिरी दुकान और बाबा बर्फानी का आशीर्वाद

कैसे और कब जाएं माणा

    द्रीनाथ और माणा गांव का रास्ता एक ही है। कोटद्वार से सतपुली और पौड़ी होते हुए श्रीनगर या फिर हरिद्वार, रिषिकेश या देहरादून से देवप्रयाग होते हुए श्रीनगर पहुंचकर आगे का रास्ता तय होता है। श्रीनगर से आगे रूदप्रयाग, गौचर, कर्णप्रयाग, चमोली, पीपलकोटी और जोशीमठ रास्ते में पड़ते हैं। जोशीमठ से माणा गांव लगभग 46 किमी की दूरी पर है। अप्रैल से सितंबर के महीनों में ही माणा जाया जा सकता है। माणा गांव जाने के लिये बद्रीनाथ में रूकना बेहतर होता है जहां ठहरने और खाने पीने की अच्छी व्यवस्था है। 
(Photo by .. Dharmendra and Pranjal Pant)
                               
                                                                                                          धर्मेन्द्र पंत

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रविवार, 14 जून 2015

भारत में स्विट्जरलैंड का अहसास है औली

औली प्राकृतिक सुंदरता का गढ़ है। दूर से निहारता नंदादेवी पर्वत इसकी सुंदरता में चार चांद लगाता है। 

        मैंने स्विट्जरलैंड नहीं देखा है लेकिन उसके बारे में पढ़ा और सुना है। मैंने औली देखा है, उसे महसूस किया है, उसे जिया है। औली में सिर्फ दो दिन बिताने के बाद लग गया कि ऊंचे और मनोरम पर्वतों की गोद में बसा यह स्थान स्विट्जरलैंड के कुछ दर्शनीय स्थलों की बराबरी कर सकता है। इसके गोरसौं, ताली और चित्रकांठा बुग्याल को यदि सही तरह से व्यवस्थित और विकसित किया जाए तो स्विट्जरलैंड के रूतली घास के मैदान जिस तरह से पर्यटकों को अपनी तरफ खींचते हैं, उसी तरह से ये ये भी लोगों के लिये आकर्षण का केंद्र होंगे। असल में औली को अब तक स्कीइंग के लिये अधिक प्रचार मिला और जो लोग स्की का शौक नहीं रखते वह इस पर गौर नहीं करते। इस बीच 2011 में पहले सैफ शीतकालीन खेलों का आयोजन यहां होने से इस धारणा को बल मिला कि औली स्की प्रेमियों के लिये बना है। सचाई तो यह है कि औली ऊंची पहाड़ियों पर बसा खूबसूरत स्थल है। यदि आपको पहाड़ों और उसकी मनोहारी छटाओं का आनंद लेना है तो एक बार औली आइए।
       औली उत्तराखंड के चमोली जिले में लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मैं शुक्रगुजार हूं अपने मित्र विश्वनाथ बेंजवाल का जिन्होंने मुझे औली जाने के लिये उकसाया और फिर मेरी योजना को मूर्तरूप देने में अहम भूमिका निभायी। मैंने बचपन से लेकर आज तक हर दिन अपनी कुलदेवी मां नंदा की पूजा की, लेकिन औली आकर पहली बार मैंने नंदा देवी पर्वत के दर्शन किये। नंदा देवी पर्वत 7,816 मीटर ऊंचा है और दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वतों में 23वें स्थान पर है। नीलकंठ पर्वत, माणा पर्वत आदि का नजारा भी औली से देखा जा सकता है। औली स्कीइंग के लिये मशहूर है तो स्वाभाविक है कि यहां इस खेल के लिये तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा औली में 3000 मीटर की ऊंचाई पर कृत्रिम झील भी बनायी गयी है।
कृत्रिम झील
      औली से आगे चढ़ाई करने पर आते हैं बुग्याल। यह गढ़वाली शब्द है जिसका अर्थ है घास के मैदान। यहां आपको ढलान पर बुग्याल मिलेंगे और इसी वजह से औली स्कीइंग के लिये आदर्श जगह बन गयी। साल के अधिकतर समय में ये बुग्याल बर्फ से ढके रहते हैं लेकिन गर्मियों में इनका असली रूप निखर कर सामने आता है। इसलिए यदि आप औली में प्रकृति का आनंद उठाना चाहते हैं तो अप्रैल से जून में यहां जाइए। लगभग 5000 मीटर तक चढ़ाई करने के बाद भी आपका इन बुग्याल से मन नहीं भरेगा। इसके अलावा आप औली में रोपवे यानि गोंडोला का लुत्फ उठा सकते हैं। दुनिया के सबसे लंबे और सबसे ऊंचे रोपवे में से एक है जो लगभग चार किमी लंबा है। हवा में तैरती चेयर कार का ​अलग तरह का रोमांच पैदा करती है।

 औली का इतिहास

        त्तराखंड बनने से पहले तक औली एक सामान्य जगह थी ​लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसे विकसित किया गया है। औली को रामायण काल से भी जोड़ा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार लंका में युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण मूर्छित हो गये तो हनुमान को संजीवनी लेने के लिये कैलाश पर्वत आना पड़ा। इस बीच उन्होंने थोड़े समय के लिये औली में विश्राम किया। इसलिए यहां हनुमान का मंदिर भी बना हुआ है। इसके साथ ही कहा जाता है कि आठवीं सदी में शंकराचार्य भी आकर औली में रूके थे। बहरहाल अब औली को तीर्थ स्थल नहीं बल्कि पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है और इसका काफी श्रेय गढ़वाल मंडल विकास निगम को जाता है जिसने यहां खूबसूरत रिसार्ट बनाने के अलावा रोपवे, चेयरकार और स्कीइंग की सुविधा भी मुहैया करायी है।

                                                                                           कैसे और कब जाएं औली 

चार किमी लंबी रोपवे और लगभग 800 मीटर की चेयरकार रोमांचित करते हैं
       औली के लिये सबसे करीबी रेलवे स्टेशन रिषिकेश और एयरपोर्ट देहरादून में है। मैं हरिद्वार से औली के लिये चला था और इसलिए जब मुझे पता लगा कि वहां पहुंचने में लगभग दस घंटे का समय लग जाएगा तो एकबारगी मैं सकपका गया था। वजह छोटा बेटा प्रदुल था जो आठ साल का है। इसके अलावा मैंने कुछ वेबसाइट में पढ़ा था कि हरिद्वार से औली पहुंचने में लगभग पांच घंटे का समय लगता है। वास्तविकता एकदम से अलग थी। अगर आप अपनी गाड़ी से जा रहे हों तब भी रिषिकेश से औली तक पहुंचने में आठ से नौ घंटे का समय लग जाएगा क्योंकि पहाड़ी रास्ते पर आप एक निश्चित गति से ही गाड़ी चला सकते हो। बस से 10 से 11 घंटे का समय लगेगा। रिषिकेश से औली की दूरी लगभग 268 किमी है। रिषिकेश से देवप्रयाग, श्रीनगर (गढ़वाल), रूद्रप्रयाग, गौचर, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, चमोली, पीपलकोटी और जोशीमठ होते हुए औली पहुंचा जा सकता है। कोटद्वार से सतपुली, पौड़ी और श्रीनगर होकर भी औली जाया जा सकता है।  
       औली में कभी ऐसे हालात होते हैं कि तीन महीने तक बर्फ ही जमी रहती है। तब इसका तापमान शून्य भी नीचे चला जाता है। जून में स्थिति आदर्श होती है। तापमान दस से 15 डिग्री तक रहता है। गढ़वाल मंडल विकास निगम के औली स्थित रिसार्ट के मैनेजर मदन सिंह पंवार के शब्दों में, ''औली को असल में अब तक वैसा प्रचार नहीं मिला, जैसा मिलना चाहिए था। औली के बारे में लोगों को अपनी धारणा बदलने की जरूरत है। यहां नवंबर से मार्च तक चारों तरफ ​बर्फ ही बर्फ बिखरी होती है। यह स्कीइंग के लिये आदर्श स्थिति होती है लेकिन अगर आपने बुग्याल और इसकी अन्य जगहों का लुत्फ उठाना है तो अप्रैल से जून तक का समय आदर्श होता है। ''

रोपवे, चेयरकार और बुग्याल का आनंद 
बुग्याल के रास्ते में पड़ता है जंगल और मंदिर 

       जोशीमठ से औली तक रोपवे से जाया जा सकता है लेकिन मुझे यह महंगा सौदा लगा। अगर आपने गढ़वाल मंडल विकास निगम के औली स्थित स्की रिसार्ट में ठहरना है तो फिर रोपवे से जाना आपको और अधिक महंगा पड़ेगा। जोशीमठ से औली तक रोपवे में जाने से आप कई नजारों का लुत्फ उठा सकते हैं। इसके लिये प्रति व्यक्ति 750 रूपये का खर्च आता है। इसके बाद चेयर कार से स्की रिसार्ट में आना पड़ेगा जिसके लिये अलग से 300 रूपये चुकाने पड़ेंगे। गढ़वाली होने के कारण मुझे जोशीमठ में ही किसी ने सलाह दे दी कि मैं टैक्सी से औली तक जाऊं और फिर चेयरकार से ऊपर प्वाइंट नंबर आठ पर पहुंचकर ट्रेकिंग पर निकलूं। मुझे चंदन नेगी के रूप में भरोसेमंद ड्राइवर भी मिल गया जिसने मुझे 500 रूपये लेकर औली तक पहुंचाया। स्की रिसार्ट में ठहरने की बेहतरीन व्यवस्था है। उसके रेस्टोरेंट में आपको बढ़िया खाना भी मिल जाएगा। मेरे, अंजू, प्रांजल और प्रदुल चारों के लिये चेयरकार का सफर वास्तव में रोमांचक था। चेयरकार प्वाइंट आठ तक जाती है जबकि जोशीमठ से आप रोपवे से सीधे प्वाइंट दस तक जा सकते हो। इन दोनों प्वाइंट के बीच में कृत्रिम झील है। प्वाइंट दस की ऊंचाई 10,200 फीट यानि लगभग 3100 मीटर है। 
     
गोरसौं, ताली और चित्रकांठा बुग्याल मन मोह लेते हैं
           अपर टर्मिनल यानि प्वाइंट दस से ही गोरसौं बुग्याल के लिये सफर की शुरूआत हुई। इस बीच हमारी दोस्ती फरीदाबाद के रहने वाले राजदीप और उनके परिवार से हो गयी। वे क्लिप टोप क्लब रिसार्ट में ठहरे हुए थे जिसका एक रात का किराया 8000 से 12000 रूपये तक है। यह रिसार्ट अपर टर्मिनल प्वाइंट आठ के ठीक नीचे है। राजदीप वहां के भोजन से संतुष्ट नहीं लगे लेकिन उनके साथ से हमारा गौरसों और ताली बुग्याल तक का सफर और आनंददायक हो गया। प्रांजल की हरलीन और प्रदुल की मनन के साथ अच्छी दोस्ती हो गयी। प्वाइंट दस से कुछ दूर आगे बढ़ते ही जंगल लग जाता है लेकिन फिर भी हम बिना गाइड के आगे बढ़े। मुझे यह बता दिया गया था कि जंगल में पडियार देवता का मंदिर है तथा वापस लौटते समय उसकी स्थिति को ध्यान में रखना है। अगर आप औली आकर बुग्याल का आनंद उठाने के लिये जाओ तो आप भी पडियार देवता का मंदिर याद रखना। इसके बाद जंगल समाप्त होते ही बुग्याल शुरू हो जाते हैं। पहले गोरसौं, फिर ताली और बाद में चित्रकांठा। उत्तराखंड में कई तरह के बुग्याल हैं और प्रत्येक अपनी विशेषता है। औली के बुग्याल के साथ भी यही दिक्कत है कि उनका रखरखाव बहुत अच्छी तरह से नहीं किया जा रहा है। स्थानीय लोग अब भी उनका इस्तेमाल चरागाह के रूप में करते हैं। असल में अब तक पर्यटन के तौर पर इन बुग्याल का इस्तेमाल करने के बारे में सोचा ही नहीं गया है। औली के पर्यटन में बुग्याल अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं। प्रकृति का ध्यान रखते हुए इन्हें पर्यटन के रूप में विकसित किया जा सकता है। ऐसे में अप्रैल से जून तक भी पर्यटक औली आ सकते हैं।

                                                                                                                         धर्मेन्द्र पंत 


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रविवार, 17 मई 2015

आओ चलें नीलांग घाटी

      हते हैं कि अगर आपने पहाड़ और पठार के मिलन का खूबसूरत नजारा देखना है तो नीलांग घाटी जाइये। यदि आपकी किस्मत अच्छी रही तो यहां आपको कस्तूरी ​मृग और हिमालयी नीली भेड़ यानि भराल भी दिख जाएगा। हिम तेंदुआ भी आपको अपने दर्शन देकर कृतार्थ कर सकता है। यहां से आपको तिब्बत के  पठार की झलक भी देखने को मिल जाएगी। पर्यावरण के लिहाज से तो यह उत्तम जगह है ही। कभी तिब्बतियों और उत्तराखंड की भोटिया जाति के लिये ऐतिहासिक व्यापारिक मार्ग रही नीलांग घाटी जाने के लिये अब तक सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि चीन की सीमा के करीब होने के कारण भारत सरकार ने यहां जाने पर रोक लगा रखी थी। भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था। केवल सेना और भारत तिब्बत सीमा पुलिस के जवान ही यहां दिखते थे लेकिन अब नीलांग घाटी को आम जनता के लिये भी खोल दिया गया है। यदि आप विदेशी हैं तो आपको सरकार के अगले आदेश तक इंतजार करना पड़ेगा। विदेशी पर्यटकों के लिये यह स्थान अब भी प्रतिबंधित है। 
नीलांग घाटी में लकड़ी से बना पुराना व्यापारिक मार्ग.... 
यह फोटो सर्वे आफ इंडिया से लिया गया था लेकिन एक मित्र ने 
लिखा है कि उनके बड़े भाई  तिलक सोनी ने इसे कैमरे में कैद किया था।
     नीलांग घाटी लगभग 11,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है और पर्यटन के लिहाज से यह बेहद अहम स्थान है। यही वजह है कि उत्तराखंड सरकार ने 53 साल बाद इसे खोलने का फैसला किया। उत्तराखंड के वन मंत्री दिनेश अग्रवाल के शब्दों में, '' नीलांग घाटी को खोल देने से राज्य को न सिर्फ अतिरिक्त राजस्व मिलेगा बल्कि इससे स्थानीय लोगों के लिये रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। साथ ही पर्यटकों को खूबसूरत जगह देखने को मिलेगी। ''  यह घाटी गंगोत्री राष्ट्रीय पार्क का ही हिस्सा है और यहां केवल दिन के समय जाया जा सकता है। अभी एक दिन में केवल छह जीप को ही नीलांग घाटी तक जाने की अनुमति मिली है। इस तरह से एक दिन में तीन दर्जन पर्यटक ही इस सुरम्य घाटी का आनंद उठा पाएंगे।

नीलांग घाटी का इतिहास

     भारत . चीन युद्ध से पहले नीलांग घाटी सीमा पार व्यापार के हिसाब से महत्वपूर्ण जगह थी। यह रेशम के व्यापारियों का मुख्य मार्ग हुआ करता था। हजारों साल पहले व्यापारी जिन मार्गों और पुलों का उपयोग किया करते थे, उनमें से कुछ भी यहां मौजूद हैं। इनमें जाह्नवी नदी के किनारे बना पुल भी शामिल है। इसी क्षेत्र में लाल देवता का मंदिर भी है। कहा जाता है कि भोटिया लोग तिब्बत जाने से पहले इस मंदिर में पूजा करते थे।
     माना जाता था कि एक समय नीलांग घाटी में तिब्बती घुसपैठियों का दबदबा था। यहां के स्थानों के नामों से भी इसकी पुष्टि होती है। नीलांग घाटी को भी तिब्बती लोग 'चोनशा' कहा करते थे। इसमें नीलांग और जादुंग नाम के दो गांव पड़ते थे। एक अंग्रेज ए गेर्राड ने 1820 में इसे 'चुनसाखागो' जबकि 1850 के दशक के आसपास इस क्षेत्र के चप्पे चप्पे से वाकिफ रहे एफ विल्सन ने 'चुंगसा खागा' नाम से उल्लखित किया है। नीले पहाड़ों के कारण स्थानीय लोग इसे नीलांग नाम से जानते थे। एक अन्य अग्रेंज जे बी फ्रेजर ने सबसे पहले इस क्षेत्र में जाने का प्रयास किया था। वह गंगोत्री तक गये थे लेकिन उन्होंने इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति से लोगों को परिचित कराया था। उन्होंने नीलांग यानि चोनशा और उस क्षेत्र के 'जाध भोटिया' निवासियों के बारे में लिखा था। रिकार्डों के अनुसार 'सर्वे आफ इंडिया' के कैप्टेन जान हडसन और लेफ्टिनेंट जेम्स हरबर्ट पहले यूरोपीय थे जो गोमुख तक गये थे। वे 31 मई 1817 को वहां पहुंचे थे। लेफ्टिनेंट हरबर्ट दो साल बाद फिर से इस क्षेत्र के बारे में पता करने के लिये निकले थे और आखिर में 13 सितंबर 1817 को नीलांग पहुंचने में सफल रहे थे। 
     विल्सन को 1850 के आसपास टेहरी के राजा ने इस क्षेत्र को बसाने की जिम्मेदारी भी सौंपी थी। कहते हैं कि अंग्रेजों को डर था कि रूसी सेना इस मार्ग से आक्रमण कर सकती है और इसलिए विल्सन वहां जासूसी का काम भी करते थे। वह किसी भी विदेशी के वहां पहुंचने पर उसकी पूरी जानकारी ब्रिटिश सरकार को देते थे। विल्सन ने इस क्षेत्र में कई पुल बनाये थे तथा हर्सिल और नीलांग के बीच मार्ग तैयार करवाया था। उन्होंने यहां के अनुभवों पर एक किताब 'माउंटेनियर' भी लिखी थी। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण से जुड़े सी एल ​ग्रीसबाक ने 1882 और 1883 में नीलांग घाटी का दौरा करके यहां के विस्तृत अध्ययन किया था। उन्होंने 'जियोलोजी आफ द सेंट्रल हिमालय' में लिखा है कि जब वह नीलांग गये तब वहां के स्थानीय निवासियों जाध और तिब्बती लोगों के बीच रिश्ते अच्छे नहीं थे। 1930 के दशक में इस पूरे क्षेत्र का मानचित्र तैयार कर दिया गया था।  ब्रिटिश खोजकर्ता जे बी औडेन (महान कवि विस्टन ह्यूज औडेन के छोटे भाई) 1939 में भागीरथी की सहायक नदियों की खोज करते हुए नीलांग घाटी तक पहुंच गये थे। उन्होंने बाद में यहां का मानचित्र तैयार करवाने में अहम भूमिका निभायी।
    नीलांग घाटी से जुड़ी एक दिलचस्प घटना भी है। आस्ट्रिया के दो पर्वतारोही हेनरिच हेरर और पीटर आफशेनेटर दुनिया की नौंवी सबसे ऊंची चोटी नांगा पर्वत पर चढ़ाई करने के लिये भारत आये थे लेकिन तभी 1939 में दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। ब्रिटिश सरकार ने इन दोनों पर्वतारोहियों को देहरादून में कैद रखा। परिजनों ने भी उनका साथ नहीं दिया और यहां तक कि हेरर की गर्भवती पत्नी इंग्रिड ने आस्ट्रिया से ही उनके लिये तलाक के कागज भेज दिये थे। हेरर और आफशेनेटर 1944 में जेल से भागने में कामयाब रहे। वे छिपते छुपाते नीलांग घाटी होकर तिब्बत पहुंच गये। हेरर वहां दलाई लामा के गुरू भी रहे। बाद में उन्होंने जेल से छूटने और फिर हिमालय के कठिन रास्तों, नीलांग घाटी आदि से होते हुए तिब्बत तक पहुंचने और वहां बिताये गये दिनों पर एक किताब लिखी जिसका नाम था, 'सेवन एयर्स इन तिब्बत'। बाद में 1997 में इसी नाम से एक फिल्म भी बनी थी।

कैसे जाएं नीलांग घाटी

   नीलांग घाटी के पर्यटकों के लिये खुल जाने के बाद यह सवाल सभी के मन में कुलबुलाएगा कि आखिर यहां कैसे पहुंचा जा सकता है। आपको दिल्ली से गंगोत्री तक जाने का ही मार्ग पकड़ना है। दिल्ली से इसके लिये दो रास्ते हैं। पहला हरिद्वार से नरेंद्रनगर, टेहरी, धरासू, उत्तरकाशी, भटवाड़ी, गंगनानी और हर्सिल से होकर जाता है। देहरादून से मंसूरी, चंबा और टेहरी होते हुए भी नीलांग घाटी तक पहुंचा जा सकता है। भैरवगढ़ी से नीलांग घाटी 25 किमी दूरी पर स्थित है। भैरवगढ़ी से वन विभाग से पंजीकृत सफारी जिप्सी पर्यटकों को घाटी तक पहुंचाएगी। एक जिप्सी में केवल छह व्यक्ति ही बैठ सकते हैं।
(नोट : मैं अभी तक नीलांग घाटी नहीं गया हूं। मैंने विभिन्न स्रोतों से यह जानकारी जुटायी है। आप इसे समृद्ध कर सकते हैं। कृपया नीलांग घाटी के बारे में किसी भी तरह की जानकारी नीचे टिप्पणी वाले कालम में जरूर साझा करें। आपकी टिप्पणियों का तहेदिल से स्वागत है।)
  
आपका धर्मेन्द्र पंत

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