मंगलवार, 16 अगस्त 2016

घी संक्रांति या घी—त्यार : घी नहीं खाया तो बनोगे घोंघा

घी संक्रांति का त्योहार हमें आलस त्यागने और कर्मठ बनने का संदेश देता है। 

      रक संहिता में कहा गया है कि ''घी- स्मरण शक्ति, बुद्धि, ऊर्जा, बलवीर्य, ओज बढ़ाता है। घी वसावर्धक है। यह वात, पित्त, बुखार और विषैले पदार्थों का नाशक है।'' इस शुरूआत का मतलब यह नहीं है कि आज मैं आपको दूध से बने दही और उसे मथकर तैयार किये गये मक्खन को धीमी आंच पर पिघलाकर तैयार होने वाले घी के गुणों के बारे में बताने जा रहा हूं। असल में मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि आज घी संक्रांति या घिया संक्रांद या घी—त्यार है। गढ़वाल में इसे आम भाषा में घिया संक्रांद और कुमांऊ में घी—त्यार कहते हैं। उत्तराखंड में लगभग हर जगह आज के दिन घी खाना जरूरी माना जाता है। इसके पीछे एक डर भी छिपा हुआ है और वह है अगले जन्म में गंडेल यानि घोंघा बनने का। पहाड़ों में यह बात प्रचलित है जो घी संक्रांति के दिन घी का सेवन नहीं करता वह अगले जन्म में गंडेल (घोंघा) बनता है। शायद यही वजह है कि नवजात बच्चों के सिर और पांव के तलुवों में भी घी लगाया जाता है। यहां तक उसकी जीभ में थोड़ा सा घी रखा जाता है। 
      उत्तराखंड में यूं तो प्रत्येक महीने की संक्रांति को कोई त्योहार मनाया जाता है। इनमें भाद्रपद यानि भादौ महीने की संक्रांति भी शामिल है। इस दिन सूर्य सिंह राशि में प्रवेश करता है और इसलिए इसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं। इस वर्ष आज यानि 16 अगस्त 2016 को सूर्य सिंह राशि में प्रवेश कर रहा है और सुधि ब्राह्मणजनों के अनुसार भाद्रपद संक्रांति का पुण्य काल दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से आरंभ होगा। उत्तराखंड में भाद्रपद संक्रांति को ही घी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इस दिन यहां हर परिवार जरूर घी का सेवन करता है। जिसके घर में दुधारू पशु नहीं होते गांव वाले उनके यहां दूध और घी पहुंचाते हैं। जब तक गांव में था तब तक मां पिताजी ने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि कम से कम घिया संक्रांद के दिन हमें घी खाने को जरूर मिले। 
      घी संक्रांति के अलावा कुछ क्षेत्रों विशेषकर कुमांऊ में ओलगी या ओलगिया का त्योहार भी मनाया जाता है जिसमें शिल्पकार अपनी बनायी चीजों को गांव के लोगों को देते हैं और इसके बदले उन्हें धन, अनाज मिलता है। यह प्रथा चंद्रवंशीय राजाओं के समय से पड़ी। तब राजाओं को कारीगर अपनी चीजों को भेंट में देते थे और इसके बदले उन्हें पुरस्कार मिलता था। जो दस्तकार या शिल्पकार नहीं होते थे वे साग सब्जी, फल, मिष्ठान, दूध, दही, घी राजदरबार में ले जाते थे। 
       घी संक्रांति प्रकृति और पशुधन से जुड़ा त्योहार है। बरसात में प्रकृति अपने यौवनावस्था में होती है और ऐसे में पशु भी आनंदित हो जाते हैं। उन्हें इस दौरान खूब हरी घास और चारा मिलता है। कहने का मतलब है कि आपका पशुधन उत्तम है। आपके पास दुधारू गाय भैंस हैं तभी आप घी का सेवन कर सकते हैं। घोंघा बनने का मतलब यह है कि अगर आप मेहनती नहीं हैं, आलसी हैं तो फिर आपकी फसल अच्छी नहीं होगी और आपका पशुधन उत्तम नहीं होगा। आप आलसी हैं और इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का अच्छी तरह से उपयोग नहीं कर पाते। यहां पर घोंघा आलस्य का प्रतीक है। जिसकी गति बेहद धीमी होती है और इस कारण बरसात में अक्सर रास्ते में पांवों के नीचे कुचला जाता है। 
     घी संक्रांति के दिन कई तरह के पकवान बनाये जाते हैं जिनमें दाल की भरवां रोटियां, खीर और गुंडला या गाबा (पिंडालू या पिनालू के पत्तों से बना) प्रमुख हैं। यह भी कहा जाता है कि इस दिन दाल की भरवां रोटियों के साथ घी का सेवन किया जाता है। तो फिर देर किस बात की आप भी सेवन करिये घी का और मनाईये घी संक्रांति। मैं तो जा रहा हूं घी के साथ रोटी खाने। तब तक के लिये नमस्कार। आपका धर्मेन्द्र पंत  

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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

सावन की याद, नेगी जी के गीतों के साथ

                   (श्री नरेंद्र सिंह नेगी के जन्मदिन पर 'घसेरी' की विशेष प्रस्तुति)


फोटो सौजन्य : आफिसियल ग्रुप आफ नरेंद्र सिंह नेगी
       ह बादल बहुत तेजी से पास आ रहा है। ऐसा लगता है कि उसके मन में मुझे आलिंगनबद्ध करने की तीव्र लालसा है। उसे मैं और मुझे वो दिख रहा है। यह जरूर मेरे पहाड़ का बादल होगा। हम भटके पहाड़ियों की खबर लेने वह भटकते हुए यहां पहुंच गया होगा। तभी तो वह मिलन के लिये इतना आतुर है। पता नहीं कब फूट पड़े और उसकी अश्रुधारा मुझे भिगो दे। आज मुझे यह बादल प्यारा सा लग रहा है। तब भी लगता था जब गांव के पास पहाड़ी पर यह चंचल चितचोर मुझ जैसे किशोरों का मन आह्लादित कर देता था और मां को व्याकुल। सावन का महीना पहाड़ की हर गृहिणी को अपने कामकाज को लेकर व्यथित कर देता है। इसलिए कई बार यह बादल उनके मन को नहीं भाता है। मां भी अपवाद नहीं थी। ऐसे में मेरी इच्छा हुई श्री नरेंद्र सिंह नेगी के उस गीत को सुनने की जो मुझे मेरे बचपन में लौटा देता है। जो मेरे कानों में मां के शब्दों की झंकार भी पैदा करता है। तब लगता था कि अगर मां के दो नहीं दस हाथ भी होते तो वह भी कम पड़ जाते। कपड़े, मोळ (गोबर), लकड़ियां, रजाई गद्दे, सूखने के लिये डाला गया अनाज सब को भीगने से बचाना है। बुबाजी (पिताजी), मैं, दीदी या भाई बाहर हैं तो उनकी भी चिंता होती और अगर वह स्वयं खेत में है तो खुद की नहीं घर की चिंता सताती। नेगी जी ने कितने सुंदर शब्दों में बारिश आने पर पहाड़ी जीवन की व्यथा को व्यक्त किया है और सबसे महत्वपूर्ण उसमें हास परिहास का भी पूरा पुट भरा है। आपने जरूर सुना होगा यह गीत .....
गरा रा रा ऐगे रे बरखा झुकि ऐगे,
गरा रा रा ऐगे रे बरखा झुकि ऐगे 
सरा रा रा डाण्यूं में कन कुयेड़ि छैगे 
गौं कि सतेड़ि कोदड़ि सार, गरा रा रा ऐ बरखा डाळ 
हौल छोड़ि भागि कका, काकि लुकि रे उड्यार
गरा रा रा घसैन्युं की छुलि रुझैगे .......

सावन में पहाड़ और वहां के गांव खिल उठते हैं। ऐसे में 'खुद' लगना स्वाभाविक है। फोटो सौजन्य : बिजेंद्र पंत 

       सावन में पहाड़ खिल उठते हैं। तब वे अपने पूरे यौवन पर होते हैं। गदेरों और झरनों के कोलाहल के बीच कोहरे की चादर। आखिर याद तो आएगी। 'खुद' तो लगेगी। इसलिए सावन को पहाड़ों में 'खुदेड़ महीना' कहा जाता है। विछोह की पीड़ा की व्याख्या करता है सावन यानि सौण। नेगी जी ने न सिर्फ सावन बल्कि बरसात के चारों महीनों की इस पीड़ा को अलग अलग अंदाज में पेश किया है। कभी वह ''गरा रा रा ऐगे रे बरखा झुकि ऐगे...'' वाले गीत में पूरी शरारत के साथ 'बोडी और ब्वाडा' की परेशानी के जरिये हम सबकी दुश्वारियों का वर्णन करते हैं तो दूसरी तरह उस विवाहिता के मन के अंदर झांकने के लिये विवश कर देते हैं जिसमें मायके के उसके उल्लास और उमंग से भरे दिन छिपे हैं। जिन्हें वह दर्द के जरिये इस तरह से बाहर निकालती है ... ''सौण का मैना ब्वे कनु  कै  रैणा, कुयेडी  लौंकाली, अंधेरी रात बरखा कु झमणाट, खुद तेरी लागालि''। यह दर्द का गीत है। ठंडे दर्द का गीत। सतत चलने वाले दर्द का गीत। इस गीत में ठिठुरन है। पहाड़ में अब भी कई महिलाएं इस दर्द को समझ रही होंगी लेकिन फिर भी उन्हें इसमें अपनत्व लग रहा होगा। आखिर यह उनके मन का गीत है। 
     क फिल्मी गीत है 'हाए हाए ये मजबूरी ये मौसम और ये दूरी तेरी दो टकिये की नौकरी मेरा लाखों का सावन जाए'। यह एक विरहिणी के मन की बात तो कहता है लेकिन चलताऊ अंदाज में। नेगी जी के गीतों में इसी वियोगिनी की दिल की आवाज कुछ इस तरह से निकलती है ..''हे बरखा चौमासी, बण घिरि कुयेड़ी, मन घिरि उदासी...। '' काम की मारामारी, तिस पर घना कोहरा और बारिश तथा साथ में अभावों की जिंदगी। इन सबके मिलन से पैदा होती है 'खुद'। कभी याद आती है मां की तो कभी अपने पिया की जो दूर परदेस में ड्यूटी पर तैनात है। जब 'खुद अपनी पराकाष्ठा' पर पहुंच जाती है तो फिर मन पिया के पास पहुंचने के लिये तड़प उठता है। मुझे लगता है कि पलायन के लिये हम पहाड़ियों की यह 'खुद' भी जिम्मेदार है। नेगी जी के कई गीतों में यह 'खुद' अपने अलग अलग रंग रूप में दिखायी देती है। सावन से पहले जब वह बारिश का आह्वान करते हुए गाते हैं, ''बरखा हे बरखा, तीस जिकुड़ि की बुझै जा, सुलगुदु बदन रूझै जा, झुणमुण झुणमुण कैकि ऐजा ...'' तो इसमें एक 'खुद' समायी हुई है जो अलग अंदाज में सामने आकर हमारी यादों के पिटारे को खोल देती है। 

नेगी जी का जन्म 12 अगस्त 1949 को पौड़ी गांव में हुआ था। जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं मेरे गढ़ रत्न, मेरे भारत रत्न, मेरे सुर सम्राट। आप अपनी गीत परंपरा का शतक पूरा करो। शुभकामनाएं।  फोटो सौजन्य : आफिसियल ग्रुप आफ नरेंद्र सिंह नेगी

        कहते हैं कि जहां न जाए रवि वहां जाए कवि और मैं कहता हूं कि हमारी सोच जहां पर खत्म हो जाती है नेगी जी के गीत हमें उससे आगे तक ले जाते हैं। वह प्रकृति के चितेरे हैं। वह सौंदर्य के पुजारी हैं। शब्द, शिल्प और भाषा में सूक्ष्म कल्पनाओं को पिरोकर उन्होंने हम पहाड़ियों की कोमल भावनाओं पर पंख लगाये हैं। वह मानवतावादी हैं, वह प्रगतिवादी हैं, वह हमारे सांस्कृतिक नायक हैं। वह पिछले 40 से भी अधिक वर्षों से गीत लिख रहे हैं और उन्हें अपनी आवाज दे रहे हैं। इन गीतों में पूरा एक युग समाया हुआ है। ये गीत हर उस व्यक्ति के गीत हैं जिसका पहाड़ से नाता रहा है। हमारी संस्कृति, हमारे समाज, हमारी परंपराओं, हमारी जीवन शैली का दूसरा रूप हैं नेगी जी के गीत। उनके अंतर्मन में पहाड़ बसा है और कंठ में कोयल। इसलिए आज अगर आज कोई एक व्यक्ति समग्र तौर पर पहाड़ का प्रतिनिधित्व करता है तो उस शख्स का नाम है नरेंद्र सिंह नेगी। आज नेगी जी का जन्मदिन है। उनका जन्म 12 अगस्त 1949 को पौड़ी गांव में हुआ था। जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं मेरे गढ़ रत्न, मेरे सुर सम्राट। आप अपनी गीत परंपरा का शतक पूरा करो। हम सब यही दुआएं करते हैं।
आपका धर्मेन्द्र पंत  

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शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

रिंगाल : कलम से लेकर कंडी तक

रिंगाल या रिंगलु
       रिंगाल या रिंगलु। उत्तराखंड के लगभग हर बच्चे से लेकर बड़े तक का रिंगाल से जरूर वास्ता पड़ता है। बचपन में रिंगाल की कलम से लिखना और घर में उससे बनी कई वस्तुओं का उपयोग जैसे सुपु, ड्वारा, कंडी, चटाई, डलिया आदि। बचपन में रिंगाल की कलम से लिखने का बहुत शौक था। हम मानते थे कि बांस से बनी कलम की तुलना में रिंगाल की कलम से अधिक अच्छी लिखावट बनती है। गांव में रिंगाल कम पाया जाता था लेकिन हम किसी भी तरह से रिंगाल ढूंढ ही लेते थे। जब बहुत छोटे थे तब पिताजी चाकू से छीलकर उसकी कलम बनाते थे। मैंने अपने गुरूजी (श्री पंचमदास जी) को भी कई बार स्कूल में बच्चों की कलम बनाते हुए देखा था। रिंगाल से मेरा पहला परिचय कलम ने ही करवाया था और कक्षा पांचवीं तक यह रिश्ता बना रहा। वैसे रिंगाल या बांस से बनी तमाम वस्तुएं हम हर रोज उपयोग करते थे। आज हम 'घसेरी' में इसी रिंगाल पर चर्चा करेंगे जो पहाड़ों में रोजगार का उत्तम साधन बन सकता है। 
          रिंगाल को बौना बांस भी कहा जाता है। बौना बांस मतलब बांस की छोटी प्रजाति। बांस के बारे में हम सभी जानते हैं कि यह बहुत लंबा होता है लेकिन #रिंगाल उसकी तुलना में काफी छोटा होता है। बांस जहां 25 से 30 मीटर तक लंबे होते हैं वहीं रिंगाल की लंबाई पांच से आठ मीटर तक होती है। बांस की तरह यह भी समूह में उगता है। यह मुख्य रूप से उन स्थानों पर उगता है जहां उसके लिये पानी और नमी की उचित व्यवस्था हो। यह विशेषकर 1000 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर उगता है। उत्तराखंड में कई स्थानों पर इसकी व्यावसायिक खेती भी होती है। उत्तराखंड में मुख्य रूप से पांच प्रकार के रिंगाल पाये जाते हैं। इनके पहाड़ी नाम हैं गोलू रिंगाल, देव रिंगाल, थाम, सरारू और भाटपुत्र। इनमें गोलू और देव रिंगाल सबसे अधिक मिलता है। गोलू रिंगाल का वानस्पतिक नाम DREPANOSTACHYUM FALCATUM जबकि देव रिंगाल का THAMNOCALAMUS PATHIFLORUS है। अमेरिका में ARUNDINERIA FALCATA प्रजाति का रिंगाल मिलता है जिसे उत्तराखंड में सरारू नाम से जाना जाता है। इनमें से गोलू रिंगाल अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर मिलता है जबकि देव रिंगाल निचले स्थानों यानि 1000 मीटर की ऊंचाई पर भी पाया जाता है। THAMNOCALAMUS JONSARENSIS यानि थाम भी अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर उगता है। इसे सभी रिंगाल में सबसे मजबूत और टिकाऊ माना जाता है। इसलिए इस रिंगाल की लाठियां बनायी जाती हैं।

बेहद उपयोगी होता है रिंगाल 


सुपु। अनाज से भूसे को अलग करने का उत्तम साधन। फोटो : रविकांत घिल्डियाल
    रिंगाल की कलम का पहले ही जिक्र किया जा चुका है। यह तो इस पौधे का छोटा सा उपयोग है। काश्तकार इससे कई अन्य उपयोगी वस्तुएं तैयार करते हैं। इनमें सुपा या सुपु (अनाज से भूसे को अलग करने के लिये), टोकरी, डोका या ड्वक (घास, चारा, कोदा, झंगोरा जैसे अनाज लाने के लिये), डलिया, बड़ी कंडी, हथकंडी, ड्वारा या नरेला (अनाज रखने के लिये), चटाई, फूलों को इकट्ठा करने के लिये बाल्टी, बक्सा, थाली, फूलदान, कलमदान, कूड़ादान, झाड़ू, ट्रे, पेस्टदान, टेबल लैंप, सोल्टा आदि प्रमुख हैं। घर में चावल साफ करने हैं या झंगोरा सुपु के बिना संभव नहीं हैं। जब चावल ओखली में कूटे जाते हैं तो सुपु की मदद से ही भूसे को अलग किया जाता है। घर में रोटी रखने के लिये अलग से टोकरी होती है जो मुख्य रूप से रिंगाल से ही तैयार की जाती हैं। कंडी से तो कई यादें जुड़ी हैं। खेतों में काम करने वाले के लिये कंडी में खाना रखकर ले जाया जाता है। गांव में 'पैणा' बांटने हैं तो वह भी कंडी में ही रखे जाते हैं। उत्तराखंड में 'दौण कंडी' का प्रचलन वर्षों से चला आ रहा है। कुमांऊ में डलिया को पवित्र माना जाता है। भिटौली त्योहार में मां डलिया में ही बेटी के लिये कपड़े और पकवान रखकर भेजती है। बेटी के घर बच्चा होने पर भी डलिया भेंट करने की परंपरा रही है। 
     कहने का मतलब है कि रिंगाल पहाड़ी लोगों के दैनिक जीवन का अहम अंग रहा है। रिंगाल की पत्तियां भी उपयोगी होती हैं। इनका उपयोग पशुओं के लिये चारे के रूप में किया जाता है। पशु इसकी पत्तियों को बड़े चाव से खाते हैं। खेतों में रिंगाल से बाड़ तैयार की जाती है और सूखने पर इसका उपयोग जलावन के लिये किया जाता है। यहां तक मिट्टी से बने घरों में छत बांस और रिंगाल के बिना तैयार नहीं की जा सकती है। रिंगाल बहुउपयोगी होने के बावजूद सरकारों से उसे शुरू से नजरअंदाज किया। इससे जुड़े कारीगरों को प्रोत्साहित करने की कोशिश नहीं की गयी जबकि यह रोजगार का अच्छा साधन हो सकता था। सरकार को स्थानीय लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये प्रयास करने चाहिए। रिंगाल उद्योग भी इनमें शामिल है। 
     बड़े भाई जितेंद्र मोहन पंत ने बहुत पहले एक कविता लिखी थी। उसमें एक पंक्ति थी 'फिर से तख्ती लिखने को करता है मन'। सच में ढेर सारी यादें जुड़ी हैं रिंगाल की कलम और इससे बनी वस्तुओं से। अभी तो मैं खुद को इन यादों के हवाले कर रहा हूं। आपका  धर्मेन्द्र पंत

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शनिवार, 23 जुलाई 2016

जब लगती थी 'गोठ' और होती थी 'गोठपुजाई'

गोठ। फोटो सौजन्य : नीलांबर नीलू पंत
     बात 1984 की है। दसवीं कक्षा में प्रवेश किया था मतलब अगले साल बोर्ड की परीक्षा देनी थी। इससे छह महीने पहले हालांकि मुझे एक और परीक्षा से गुजरना पड़ा था। उम्र 14 साल, छह महीने लेकिन मैंने गोठ या गोट  लगाने का फैसला किया था। वीरू (चचेरा भाई वीरेंद्र) का साथ था। गांव के दो लड़के शार्गिद बन गये। पिताजी मुझसे सहमत नहीं थे लेकिन सर्दियां शुरू होने पर गांव में अपने दूर के खेतों तक मोल़ (गोबर) मुझे पहुंचाना पड़ता। दीदी की उसी साल शादी हो गयी थी और उसके साथ रहते हुए मोल़ ढोलने (बोरी में भरकर गोबर खेतों तक पहुंचाना) या अन्य कामों में जितना ऐश करना था वह कर लिया था। भैजी के लिये लड़की की तलाश जारी थी और मां पर धीरे धीरे उम्र हावी हो रही थी। मतलब कम से कम इन सर्दियों में तो मुझे ही खेतों तक गोबर पहुंचाना होगा। दूर के खेतों तक गोबर पहुंचाने से बचने का एकमात्र रास्ता सितंबर . अक्तूबर में गोठ लगाना था और इसलिए मैं भावी मेहनत से बचने के लिये अपने फैसले पर अडिग था। 
      मैं अपनी इस कहानी को कुछ आगे बढ़ाने से पहले आपको गोठ के बारे में बता दूं। गोठ या गोट मतलब गोशाला। मैंने गोठ को लेकर फेसबुक के घसेरी ग्रुप में एक पोस्ट डाली थी। इस पर श्रीमती क्षिप्रा पांडेय शर्मा ने बताया कि कुमांऊ में मकान के नीचे के हिस्से को गोठ कहते हैं जबकि श्री विवेक ध्यानी ने कम शब्दों में गोठ को अच्छी तरह से परिभाषित कर दिया। उनके शब्दों में, ''गोट। जहां गावं के कुछ लोग अपने पशुओं को एक साथ अस्थायी तौर पर कुछ दिनों के लिए रखते हैं? '' नीलांबर नीलू पंत ने फोटो उपलब्ध करायी और बताया कि उन्होंने भी गोठ लगायी है और इसमें उन्हें बहुत आनंद आता था। हमारे लिये गोठ का मतलब था खेतों में टिन या कांस से बने पल्ला डालना जो आपके सिर के ऊपर छत का काम करे और फिर ​जहां तक आपका खेत हैं उसमें गाय, बैल, बछड़े, भेड़ बकरियां बांध कर रात भर उनकी रखवाली करना। ये पालतू पशु रात में जितना मूत्र या गोबर करते खेत को उतनी खाद मिलती और गुठेर (गोठ लगाने वाला) के दिल को सुकून। सीधा सा मतलब 'गोबर की पूर्ति के लिये खेतों में पशुओं को बांधना'। पहाड़ों में सितंबर . अक्तूबर में बहुत काम होता है। इस दौरान अमूमन अक्तूबर में गोठ लगायी जाती है। गढ़वाली के मशहूर कवि श्री दीनदयाल सुंद्रियाल 'शैलज' के शब्दों में  ''बांस व घास के पल्लों के नीचे, टांट (बांस से बनाया गया सुरक्षा चक्र) के पीछे भेड़ बकरियों की खुशबू वाली महकती रात और टप टप  बरसात की बूंदों की आवाज़ के आनंद के साथ साथ अचानक बाघ या किसी जंगली जानवर के आने के अंदेशे से उत्पन्न रोमांच वही महसूस कर सकता है जिसने गोठ मे रात बिताई हो।"

गांव में गाय बैलों को बांधने के लिये स्थायी कीला और रस्सी होता है। । गोट के लिये कीले लकड़ियों के बनाये जाते हैं। इनका निचला वाला हिस्सा नुकीला होता है। भीमल की टहनियों को कुछ दिन पानी में भिगोने के बाद उससे मिलने वाले स्योलू से रस्सियां तैयार की जाती थी। 
       गोठ भी दो तरह की होती थी। एक छोटी गोठ यानि एक या दो पल्ले डालना ताकि उसके अंदर दो चारपाई समा जाएं। इस तरह की गोठ में पशुओं के रूप में केवल गाय बैलों को ही रखा जाता था। दूसरी चार से छह पल्लों की बड़ी गोठ। इसमें भेड़ और बकरियां गोठ में रहती थी। तीन पल्ले जमीन से सीधे खड़े करके तीन पल्लों को उसके ऊपर बड़ी कुशलता से रखकर डंडों के सहारे उसे कुछ हद तक झोपड़ी का रूप दे देना। इसमें आगे और दोनों किनारों का हिस्सा खुला रहता था। दोनों किनारों पर एक . एक चारपाई डाल दी जाती थी और बीच में भेड़ बकरियां बांध दी जाती थी। बाकी पशु बाहर खुले में बांधे जाते थे। डर बाघ या सियार से होता था जो भेड़ बकरियों पर ज्यादा घात लगाये रहते थे। भेड़ बकरियों का गोबर ज्यादा उपजाऊ माना जाता है।
     मैंने छोटी तरह की गोठ लगाने की तैयारी की थी। मतलब हमारे पास दो पल्ले थे और भेड़ बकरियां हमारे पास नहीं थी। चार परिवारों के चार लड़के थे। इसका मतलब था कि अगर 28 दिन गोठ लगानी है तो प्रत्येक के खेत में सात दिन गोठ लगेगी। अगर किसी के खेत कम हैं तो वह अपना हिस्सा दूसरे को दे सकता था। गांव बड़ा था और इसलिए गुठेर हम ही नहीं थे। गांव के दूसरे लड़कों और वयस्कों ने भी हमारी तरह समूह बनाकर गोठ लगाने का फैसला किया था। गोठ के लिये सबसे पहला और मुश्किल काम था पशु जुटाना। आप अपने घरों से दुधारू पशुओं या छोटे बछड़ों को नहीं ले जा सकते थे। वैसे गोठ लगाने से पहले एक अदद सांड की तलाश भी होती थी। इससे अपने गांव सहित इधर उधर के गांवों से उन गायों के मिलने की संभावना बढ़ जाती थी जो दुधारू नहीं हों। अधिक पशु होने पर खेत को अधिक खाद मिलती थी लेकिन मेहनत भी उतनी की बढ़ जाती थी।
       जिसके खेत में गोठ लगती थी उसके लिये वह सुबह से लेकर अगले दिन सुबह तक की मेहनत का काम था। पहले उसे सुबह दूसरे के खेत से सभी पशुओं को चराने के लिये ले जाना पड़ता था। पल्ला, चारपाई और बिस्तर उसके खेत तक पहुंचाने में तो सुबह बाकी साथी मदद कर देते थे लेकिन कीला (बड़ी और मोटी खूँटी) और ज्यूड़ा (पशुओं को बांधने की रस्सियां) अपने खेत तक खुद पहुंचानी पड़ती थी। दिन भर गाय बैल चराने के बाद शाम को गोठ के पास पहुंचकर कीला गाड़ने पड़ते थे। कीला गाड़ने के लिये मुंगरू (मोटी लकड़ी से बना, जिसके आगे का हिस्सा मोटा होता है) होता था जिसका खास महत्व होता था। इसे रात को गोठ के पास खड़ा करके रखा जाता था। कहा जाता था कि मुंगरू रखने से भूत पिशाच गोठ में हमला नहीं करते थे। कीला गाड़ने के बाद जो कमजोर या छोटा पशु यानि बछड़ा है तो उसे गोठ (जहां पर पल्ले लगे होते थे) के पास बांधा जाता था जबकि बड़े और ताकतवर पशुओं को थोड़ा दूर। इनमें सांड भी शामिल होता था। सांड की प्रकृति और प्रवृति को देखकर उसे खुला भी छोड़ दिया जाता था। अब इंतजार होता था उस घड़ी का जब गांव से बाकी साथी खाना लेकर आते थे। पेट में चूहे कूद रहे होते थे और जब खाना मिल जाता था तो वह किसी अमृत से कम नहीं लगता था। कई बार गोठ में ही खाना बनाया जाता था। खिचड़ी से लेकर खीर तक। रोटी और सब्जी भी। इसके बाद यदि आसपास में दूसरी गोठ भी होती तो फिर कछड़ी (छोटी बैठक) जम जाती। कई बार कक​ड़ियों की भी चोरी होती और फिर रात में पेट भरा होने के बावजूद भी चाव से ककड़ी खायी जाती। ककड़ी चोरी के भी किस्से हैं। 

भेड़ बकरियों को बांधने के लिये अलग से रस्सी बनायी जाती है। इसे स्थानीय भाषा में तांद कहते हैं। एक तांद में सात आठ बकरियों को बांधा जाता है। गोठ में दो चारपाईयों को कुछ दूरी पर लगाने के बाद उनके बीच में तांद लगायी जाती है। 
      मैंने जब भी इस तरह से इंतजार किया तो अक्सर गोठ के अंदर ही दुबके रहकर पशुओं पर नजर रखता था। भूतों पर विश्वास नहीं करता था इसलिए भूतों से अधिक डर बाघ का रहता था। अगर आ गया तो फिर मेरी पैंट का गीली होना तय था। मेरे साथ ऐसी कोई घटना नहीं घटी लेकिन छोटे भाई बिजू (बिजेंद्र पंत) एक रोमांचक किस्सा सुनाया।  बिजेंद्र के शब्दों में,  ''मैंने 1991 में गोठ लगायी थी जिसमें हम चार पार्टनर थे। बड़ा उत्साह था। रात ढलने को आयी तो चार में से दो जने घर रोटी लाने चले गये और दो गोठ में रहे। रात को खाना खाकर सो गये। सब गहरी नींद में थे तभी रात एक बजे के आसपास अचानक पशुओं की हड़बड़ाहट से नींद खुली। देखा तो सभी पशु सहमे हुए थे। पशुओं की गिनती की तो एक बछड़ा कम निकला। जब तक खेत से दूर उसे ढूंढते तब तक बाघ अपना काम कर चुका था। इसके बाद जैसे तैसे सो गये लेकिन रात के तीन बजे के आसपास हमारा पल्ला हिलने लग गया। कानों में किल​कारियां गूंज रही थी। काटो तो खून नहीं वाली स्थिति थी। जैसे तैसे रात काटी। सुबह हमें बताया गया कि हमने मुंगरू सही नहीं रखा था गोठ के अंदर और इसलिए भूत वहां प्रवेश कर गया था। कहते हैं कि मुंगरू जरूरी होता है गोठ में रक्षा के लिये। इसके बाद हमें कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ। ''
        आखिर में उस दिन का इंतजार रहता था जब 'गोठपुजाई' या 'ग्वठपुजै' होती थी। किसी विशेष दिन गोठ समाप्त होती थी और उस दिन बाकायदा पूजा की जाती थी। मुंगरू को हमेशा देवता की तरह सम्मान दिया जाता था। उस पर पांव नहीं लगाये जाते और आखिरी दिन उसकी पूजा होती। उसे घी दूध से नहलाया जाता था। कई तरह के व्यंजन बनते। श्री दीनदयाल सुंद्रियाल शैलज के अनुसार, ''जब हम बहुत छोटे छोटे थे तो हमारे घर के सयाने गोठ से सुबह घर आते तो हमे गोठ की रोटी का बड़ा इंतज़ार रहता था। बिना किसी शाक सब्जी के बासी रोटी की मिठास का शायद सुबह सुबह की भूख तृप्त होने से संबद्ध होगा पर हमारे लिए तो गोठ की रोटी भगवान के प्रसाद जैसी चीज थी और हम छोटे भाई बहिनो मे इसके लिए लड़ाई भी हो जाती थी लेकिन असली उत्साह और उमंग का अवसर तब आता था जब चौमास समाप्त होने पर गोठ को घर आना होता तो "गोठपुजाई" एक  उत्सव की रात होती थी। उस दिन गोठ की रसोई मे ही सभी संबंधित परिवारों के लिए विविध व्यंजन पकते थे जिसमे दाल के भूड़े व खीर तो अवश्य बनती थी। ये दोनों चीजें मुझे आज भी बहुत प्रिय है।''
       तो ये थी गोठ की कहानी। आपमें से कई भाईयों ने गोठ जरूर लगायी होगी और आपके साथ भी कुछ रोचक किस्से घटित हुए होंगे। यहां टिप्पणी वाले कालम में जरूर साझा करें। आपके किस्सों का इंतजार रहेगा। आपका धर्मेन्द्र पंत 


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बुधवार, 6 जुलाई 2016

गढ़वाल में धर्मशाला जैसा स्टेडियम बन सकता है रांसी

धर्मशाला के एचपीसीए स्टेडियम जैसा खूबसूरत बनने की सारी संभावनाएं मौजूद हैं पौड़ी के रांसी मैदान में। 
     
    र्मशाला के एचपीसीए क्रिकेट स्टेडियम में जब पहली बार गया तो उसकी खूबसूरती ने वास्तव में मन मोह लिया। सामने हिमाच्छादित हिमालय और उसी की एक पहाड़ी पर निर्मित किया गया स्टेडियम। आसपास की भौगोलिक स्थितियों के अलावा मैदान की हरी घास और बेहद व्यवस्थित पवेलियन और रेस्टोरेंट। हिमाचल प्रदेश क्रिकेट संघ के अध्यक्ष, पूर्व में बीसीसीआई सचिव और अब बोर्ड के प्रमुख अनुराग ठाकुर के अच्छे प्रयासों का एक खूबसूरत नमूना।
        इस साल गर्मियों में जब पौड़ी के रांसी मैदान पर गया तो धर्मशाला की यादें ताजा हो गयी। पहाड़ी की चोटी पर स्थित मैदान जिसे प्रकृति से भरपूर रंग मिले हैं। दूर पहाड़ियों में अठखेलियां करते बादल और पास में देवदार जैसे वृक्षों की कतार और उनसे वातावरण में फैली शीतलता। वास्तव में रांसी का यह मैदान किसी का भी मन मोह सकता है। अंतर इतना है कि इसे पिछले कई वर्षों से कछुआ चाल से तैयार किया जा रहा है और चार दशक पहले नींव रखे जाने के बावजूद सुविधाओं के नाम पर यहां कुछ नहीं है। भाई गणेश खुगसाल 'गणी' के साथ जब रांसी मैदान गया तो पहला शब्द मुंह से यही निकला कि 'यह तो गढ़वाल में धर्मशाला जैसा मैदान बन सकता है।' बस रांसी को एक अनुराग ठाकुर की जरूरत है।

रांसी मैदान पर जब मैंने बल्ला थामा तो छोटे बेटे प्रदुल ने एक अच्छी फोटो भी क्लिक कर दी। बाद में गणी भैजी ने भी अपने क्रिकेट कौशल का अच्छा नमूना पेश किया।  

      रांसी मैदान पौड़ी के ऊपर लगभग 7000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। कहा जाता है कि यह एशिया में इतनी अधिक ऊंचाई पर स्थित अकेला स्टेडियम है। हेमवती नंदन बहुगुणा जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब 1974 में उन्होंने इस स्टेडियम की नींव रखी और इसके निर्माण के लिये 12 लाख रूपये मंजूर किये थे। मैदान का निर्माण होने के बाद यहां जिला और राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं का भी आयोजन हुआ। उत्तर प्रदेश सरकार ने हालांकि बाद में मैदान पर ध्यान नहीं दिया जिससे इसकी स्थिति बिगड़ने लगी। मेजर जनरल (सेवानिवृत) भुवन चंद्र खंडूड़ी जब केंद्र में परिवहन मंत्री थे तब उन्होंने अपने सांसद कोष और केंद्र से रांसी मैदान के नवीनीकरण के लिये पैसे दिये थे। इसके बाद उन्होंने उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनने पर भी स्टेडियम के विकास के लिये पांच करोड़ रूपये देने की घोषणा की थी। 

      रांसी मैदान पर अब भी निर्माण कार्य चल रहा है लेकिन उसकी गति बेहद धीमी है। देखकर लगता है कि जैसे किसी को भी इस मैदान की चिंता ही नहीं है। उत्तराखंड सरकार चाहे तो इसको एक बड़े मैदान और खूबसूरत स्टेडियम में बदल सकती है। इस तरह के स्टेडियम के निर्माण और उसमें सुविधाएं प्रदान करने से पर्यटकों को भी लुभाया जा सकता है। भारतीय क्रिकेट बोर्ड यानि बीसीसीआई इस खेल को गांवों में पहुंचाने की बात करता है ताकि अच्छी प्रतिभा उभरकर सामने आ सके। इसके लिये उसे रांसी जैसे मैदानों पर गौर करना होगा। रांसी को अभी एथलेटिक्स या फुटबाल स्टेडियम के तौर पर ​तैयार किया जा रहा है लेकिन इन खेलों के लिये पास में ही स्थित कंडोलिया का मैदान है जिसका नवीनीकरण किया जाना जरूरी है। 

रांसी स्टेडियम में दर्शकों के लिये अभी कुछ भी खास इंतजाम नहीं किये गये हैं। 
     ऐसा लगता है ​कि खूबसूरती तो रांसी के रग रग में भरी है लेकिन उसे सजाने संवारने की जरूरत है। उसे एचपीसीए स्टेडियम की तरह दुल्हन का रूप देने की जरूरत है। बीसीसीआई दस नखरे दिखा सकता है। वह पौड़ी में बड़ा होटल या हवाई पट्टी नहीं होने का बहाना बना सकता है लेकिन हमारी अपनी सरकार तो है। वह चाहे तो रांसी स्टेडियम के​ लिये आदर्श पिता साबित हो सकती है। उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा सकती है। काश कि ऐसा हो पाता। अभी तो मैं गणी भाई का आभार व्यक्त करना चाहूंगा जिन्होंने मुझे रांसी स्टेडियम के दर्शन कराये। मैं इस मैदान पर क्रिकेट खेल रहे उन तीन . चार युवाओं का आभार व्यक्त करना चाहूंगा जिन्होंने मुझे अपने साथ एक खिलाड़ी बनने का मौका दिया। मैं अब कह सकता हूं कि रांसी मैदान पर बल्ला मैंने भी घुमाया और मैंने भी गेंदबाजी की है। उम्मीद यही है कि एक दिन रांसी भी एचपीसीए जैसा खूबसूरत स्टेडियम बनेगा और तब मैं अपने पोते . पोतियों को बड़े शान से बताऊंगा कि 'इस मैदान पर तो मैंने भी क्रिकेट खेली है।' आपका धर्मेन्द्र पंत

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