गुरुवार, 22 सितंबर 2016

पौड़ी और अल्मोड़ा से हो रहा है सबसे अधिक पलायन

चार्ट एक ... पौड़ी गढ़वाल से पलायन की कहानी बयां कर रहे हैं आंकड़े

      पिछले दिनों में मन में यह सवाल उठा था कि आखिर उत्तराखंड से सबसे अधिक पलायन किस जिले से हो रहा है। इसका जवाब ढूंढने के लिये 2001 और 2011 की जनगणना के आंकड़ों का सहारा लिया तो कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आये। पता चला कि जहां भारत जनसंख्या विस्फोट की तरफ बढ़ रहा है वहीं उत्तराखंड के दो जिलों पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा की जनसंख्या इन दस वर्षों में घटी है। इन आंकड़ों पर खुश होने की जरूरत नहीं है। असल में यह पलायन के दुष्परिणाम हैं। इससे यह भी साबित होता है कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पलायन तेजी से हुआ है और इसमें पौड़ी गढ़वाल सबसे आगे हैं।
     जनगणना के आंकड़ों पर गौर करें तो पौड़ी जिले की जनसंख्या 2001 में 697,078 थी जो 2011 में घटकर 687,271 रह गयी। यानि 1.41 प्रतिशत कम हो गयी। (देखिये चार्ट एक) आंकड़े भले ही कुछ साल पुराने हैं लेकिन यह एक कड़वा सच बयां करते है। कमोबेश आज की स्थिति और खराब होगी। पलायन नहीं रूकेगा तो आगे स्थिति और भयावह हो सकती है। गढवाल में पलायन की शुरूआत नब्बे के दशक में हो गयी थी। यही वजह थी कि 1991 से 2001 के बीच भी पौड़ी जिले में केवल 3.87 प्रतिशत वृद्धि ही दर्ज की गयी जबकि बाकी जिलों में यह इससे अधिक थी। वर्ष 2001 से 2011 के बीच गढ़वाल मंडल के बाकी जिलों जैसे चमोली, उत्तरकाशी, रूद्रप्रयाण, टेहरी गढ़वाल आदि में जनसंख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गयी। टेहरी गढ़वाल में हालांकि 2.35 प्रतिशत, चमोली में 5.74 प्रतिशत, रूद्रप्रयाग में 6.53 प्रतिशत और उत्तरकाशी में 11.89 प्रतिशत वृद्धि हुई लेकिन इन दस वर्षों में देहरादून की जनसंख्या 32.33 और हरिद्वार की जनसंख्या में 30.63 प्रतिशत बढ़ी है। इन आंकड़ों की कहानी कुछ अलग तरह से श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी ने अपने एक गीत 'सब्बि धाणि देहरादूण हुणी खाणी देहरादूण' में भी बयां की है।

चार्ट दो ... उत्तराखंड की जनसंख्या तो बढ़ी है लेकिन पौड़ी गढ़वाल की घटी है। 

      गर कुमांऊ मंडल की बात करें तो अल्मोड़ा जिले की स्थिति दयनीय है। अल्मोड़ा की जनसंख्या 2001 में 630,567 थी जो 2011 में घटकर 622,506 रह गयी। मतलब इसमें 1.28 प्रतिशत की कमी आयी है। बागेश्वर और पिथौरागढ़ की जनसंख्या में भी खास बढ़ोतरी दर्ज नहीं की गयी। यह क्रमश: 4.18 और 4.58 प्रतिशत थी। चंपावत की जनसंख्या 15.63 प्रतिशत बढ़ी है लेकिन उधमसिंह नगर और नैनीताल ने कुमांऊ के दूसरे जिले को लोगों को भी आकर्षित किया। यही वजह है कि 2001 से लेकर 2011 तक नैनीताल की जनसंख्या में 25.13 प्रतिशत और उधमसिंह नगर की जनसंख्या में 33.45 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गयी।
     जब उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की मांग की जा रही थी तब 'पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी' रोकने के नारा खूब जोर शोर से चला था। राज्य गठन के बाद स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ती चली गयी। इसका परिणाम है कि आज गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं। राज्य सरकार पलायन को रोकने में पूरी तरह से नाकाम रही है। अब भी अगर सार्थक कदम उठाये जाते हैं तो सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। आपका धर्मेन्द्र पंत 


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शनिवार, 3 सितंबर 2016

मेरे गांव का कौथीग : कभी होती थी उमंग और रौनक

गांव की कुलदेवी नंदादेवी का मंदिर। फोटो : नीलांबर पंत 
       त्तराखंड में कौथीग यानि मेलों का चलन वर्षों से चला आ रहा है। यहां एक नहीं बल्कि सैकड़ों कौथीग का आयोजन होता है। वर्ष में एक बार होने वाले इन कौथीग का दिन तय होता है। कौथीग विशेषरूप से किसी धार्मिक स्थल पर ही लगते हैं। गढ़वाल में बैशाख का महीना एक तरह से कौथीग के लिये समर्पित है। इस महीने सबसे अधिक कौथीग लगते हैं लेकिन कई जगहों पर इसके बाद भी कौथीग का आयोजन होता रहता है।  (पढ़ें चलो भैजी कौथिग जौंला)मैं आज यहां पर अपने गांव के कौथीग का जिक्र करूंगा। मेरा गांव स्योली है जो पौड़ी गढ़वाल के चौंदकोट इलाके में पट्टी गुराडस्यूं में आता है। नंदादेवी हमारी कुलदेवी है जिसका मंदिर गांव के ऊपर धार (पहाड़ी का सबसे ऊंचा हिस्सा, शिखर) में है। इसी स्थान पर हर साल तीन सितंबर को कौथीग लगता है। बचपन से हम लोगों के मुंह पर चढ़ा था 'नंदौं कौथीग' यानि नंदा देवी में लगने वाला मेला। मेरे गांव के आसपास ईगासर (एकेश्वर) और जणदादेवी के कौथीग भी लगते हैं लेकिन हमारे लिये नंदा के कौथीग का खास महत्व था। यदि आप गांव में हैं तो नंदा कौथीग में जाना अनिवार्य माना जाता है। जिनका 'अबाजु' (जिस घर में किसी की मृत्यु हुई हो वार्षिक श्राद्ध तक उनके यहां बाजा नहीं बजता और वे किसी तरह के थौळ कौथीग में भी नहीं आते) उनको छोड़कर सभी लोग नंदादेवी के कौथीग जाते हैं।

गांव से नंदादेवी मंदिर की तरफ आती जात्रा और मंदिर के अंदर का दृश्य। फोटो : राकेश पंत 

             बचपन में तो हम महीने भर पहले से कौथीग के बारे में सोचना और उसको लेकर योजनाएं बनानी शुरू कर देते थे। जो सबसे नयी पोशाक (भले ही वह साल भर पुरानी क्यों न हो) होती थी कौथीग के लिये उसे अच्छी तरह से तैयार करते थे। कभी कभी ऐसा भी होता था कि कौथीग के लिये नये कपड़े भी बन जाते थे। कौथीग हो और नये कपड़े हों तो उस खुशी को यहां शब्दों में बयां करना मुश्किल है। जब प्राइमरी में पढ़ते थे तो हमारे स्कूल से नंदादेवी का मंदिर दिख जाता था। दूर से ही सही लेकिन हम वहां की हलचल का आकलन लगा लेते थे। गुरूजी भी हमारी उत्सुकता समझते थे और इसलिए उस दिन जल्दी छुट्टी कर देते थे। जब राजकीय इंटर कालेज नौगांवखाल गये तो परिस्थिति बदल गयी। यहां समय पर ही छुट्टी होनी थी और तब ऐसे भी मौके आते थे जबकि हम स्कूल ड्रेस में ही कौथीग चले जाते थे। या तो फिर जल्दी घर पहुंचकर नये कपड़े पहने और फिर मिनटों में लगभग एक . डेढ़ किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़कर कौथीग पहुंच जाते थे। हमें कौथीग के लिये एक रूपया मिलता था। अगर पिताजी के बजट में संभव हुआ तो कभी कभी दो रूपये भी हाथ में आ जाते। कभी कभार तो अठन्नी चवन्नी से भी काम चलाना पड़ता था। पैसा हालांकि उत्साह कम नहीं करता था। मुझे याद है कि बचपन में मैंने एक बार मां के सामने बांसुरी खरीदने की जिद कर ली थी। मां पहले मनाती रही लेकिन आखिर में उन्हें मेरी जिद के आगे झुकना पड़ा। उनके पास जो थोड़े बहुत पैसे रहे होंगे उनसे मेरी बांसुरी आ गयी। मैं तो खुश था कृष्ण कन्हैया बनकर लेकिन यह मुझे वर्षों बाद अहसास हुआ था कि मेरी बांसुरी के लिये शायद मां ने तब अपनी ​'टिकुली बिंदुली' का त्याग किया होगा। मां ऐसी ही होती हैं।

इस चित्र से मेरे गांव, मेरे प्राइमरी स्कूल और नंदादेवी मंदिर की स्थिति का पता लगाया जा सकता है जिसका जिक्र यहां किया गया है। 

        नंदादेवी कौथीग की तैयारी गांव में भी एक दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। नंदादेवी का एक मंदिर गांव में चौंर (चौंरा, चौपाल) में भी है। वहां पर पूजन के बाद शाम को नंदादेवी की जात्रा (हम जात बोलते थे) निकलती है।  ढोल, दमाउ, हुड़का, डौंर, रणसिंघा आदि वाद्ययंत्रों चारों तरफ गूंजती आवाज से पता चल जाता था कि जात्रा अभी कहां पर है। रात गहराने तक शिखर पर स्थित #नंदादेवी मंदिर में पूजन होता है और फिर वापस घर लौट आते हैं। गांव से लेकर इधर उधर के दुकानदार भी एक दिन पहले से तैयारी शुरू कर देते थे इसलिए मंदिर के पास रात भर रौनक रहती थी। अगले दिन भी दोपहर के बाद गांव से जात्रा निकलती है और उसके पहुंचने पर ही असली कौथीग शुरू माना जाता है। कौथीग जाने पर सबसे पहला काम होता है मंदिर में भेंट चढ़ाना। जब तक भेंट नहीं चढ़ाई तब तक मेले से कुछ नहीं खाना। एक रूपया जेब में हो तो पांच या दस पैसे भेंट में चढ़ा दिये और बाकी बचे पैसों से कुछ खा पी लिया। शाम को घर लौटते वक्त सभी की जुबान पर कौथीग के किस्से होते। इसके बाद इंतजार शुरू हो जाता अगले साल के तीन सितंबर का।

कौथीग की रंगत होते हैं ढोल दमौ और डौंर थाली। फोटो सौजन्य :  राकेश पंत, विपित पंत

       नंदादेवी कौथीग में मुझे बचपन से ही बकरों की बलि देना अखरता था। कोई परिवार मनौती रखता और फिर बकरे की बलि देता। बकरा कट जाता तो उसके खून की तिलक सब अपने माथे पर लगाते। बड़ा अजीब प्रचलन। मैं बचपन से इसका विरोध करता रहा। शायद यह विरोध स्वाभाविक था क्योंकि जब से मैंने इसका विरोध किया तब वास्तव में परिपक्व नहीं था। मेरे परिवार ने भी कम से कम मेरे जन्म के बाद कभी किसी बकरे की बलि नहीं दी। सुनने में आया है कि अब भी कुछ परिवार बकरे की बलि देते हैं। शिक्षित लोग ऐसा कर रहे हैं। अफसोस। शायद वे मां दुर्गा, जिसका एक रूप नंदा देवी है, को समझ ही नहीं पाये। (पढ़ें देवभूमि में बलि प्रथा : बोलो ना बाबा ना)


कौथीग की असली रंगत होती हैं जलेबी। फोटो सौजन्य : राकेश पंत, नीलांबर पंत। 

       ढ़वाल की अर्थव्यवस्था एक समय मनीआर्डर आधारित थी। पहले तो नौकरी के लिये दिल्ली, देहरादून, मुंबई की तरफ निकले भाई बंधु नंदादेवी के #कौथीग के लिये अपनी छुट्टियों को विशेष रूप से बचाकर रखते थे। अब कौथीग की रौनक पहले की तरह नहीं रही। अब न तो दुकानें सजती हैं और ना ही कोई छुट्टियां लेकर जाता है। मुझे खुद याद नहीं है कि मैं आखिरी बार कब नंदा देवी कौथीग गया था। असल में गढ़वाल से पलायन करने वाले हम जैसे 'भगोड़ों' के कारण ही कौथीगों की रौनक कम हुई है।
    बहरहाल आज मेरे गांव में नंदा देवी का कौथीग है। मैं दिल्ली में बैठकर ही इस कौथीग से बचपन से जुड़ी यादों को ताजा कर रहा हूं। आप भी जरूर बताईये अपने गांव या क्षेत्र के कौथीगों के बारे में। जय नंदादेवी। आपका धर्मेन्द्र पंत 


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मंगलवार, 16 अगस्त 2016

घी संक्रांति या घी—त्यार : घी नहीं खाया तो बनोगे घोंघा

घी संक्रांति का त्योहार हमें आलस त्यागने और कर्मठ बनने का संदेश देता है। 

      रक संहिता में कहा गया है कि ''घी- स्मरण शक्ति, बुद्धि, ऊर्जा, बलवीर्य, ओज बढ़ाता है। घी वसावर्धक है। यह वात, पित्त, बुखार और विषैले पदार्थों का नाशक है।'' इस शुरूआत का मतलब यह नहीं है कि आज मैं आपको दूध से बने दही और उसे मथकर तैयार किये गये मक्खन को धीमी आंच पर पिघलाकर तैयार होने वाले घी के गुणों के बारे में बताने जा रहा हूं। असल में मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि आज घी संक्रांति या घिया संक्रांद या घी—त्यार है। गढ़वाल में इसे आम भाषा में घिया संक्रांद और कुमांऊ में घी—त्यार कहते हैं। उत्तराखंड में लगभग हर जगह आज के दिन घी खाना जरूरी माना जाता है। इसके पीछे एक डर भी छिपा हुआ है और वह है अगले जन्म में गंडेल यानि घोंघा बनने का। पहाड़ों में यह बात प्रचलित है जो घी संक्रांति के दिन घी का सेवन नहीं करता वह अगले जन्म में गंडेल (घोंघा) बनता है। शायद यही वजह है कि नवजात बच्चों के सिर और पांव के तलुवों में भी घी लगाया जाता है। यहां तक उसकी जीभ में थोड़ा सा घी रखा जाता है। 
      उत्तराखंड में यूं तो प्रत्येक महीने की संक्रांति को कोई त्योहार मनाया जाता है। इनमें भाद्रपद यानि भादौ महीने की संक्रांति भी शामिल है। इस दिन सूर्य सिंह राशि में प्रवेश करता है और इसलिए इसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं। इस वर्ष आज यानि 16 अगस्त 2016 को सूर्य सिंह राशि में प्रवेश कर रहा है और सुधि ब्राह्मणजनों के अनुसार भाद्रपद संक्रांति का पुण्य काल दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से आरंभ होगा। उत्तराखंड में भाद्रपद संक्रांति को ही घी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इस दिन यहां हर परिवार जरूर घी का सेवन करता है। जिसके घर में दुधारू पशु नहीं होते गांव वाले उनके यहां दूध और घी पहुंचाते हैं। जब तक गांव में था तब तक मां पिताजी ने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि कम से कम घिया संक्रांद के दिन हमें घी खाने को जरूर मिले। 
      घी संक्रांति के अलावा कुछ क्षेत्रों विशेषकर कुमांऊ में ओलगी या ओलगिया का त्योहार भी मनाया जाता है जिसमें शिल्पकार अपनी बनायी चीजों को गांव के लोगों को देते हैं और इसके बदले उन्हें धन, अनाज मिलता है। यह प्रथा चंद्रवंशीय राजाओं के समय से पड़ी। तब राजाओं को कारीगर अपनी चीजों को भेंट में देते थे और इसके बदले उन्हें पुरस्कार मिलता था। जो दस्तकार या शिल्पकार नहीं होते थे वे साग सब्जी, फल, मिष्ठान, दूध, दही, घी राजदरबार में ले जाते थे। 
       घी संक्रांति प्रकृति और पशुधन से जुड़ा त्योहार है। बरसात में प्रकृति अपने यौवनावस्था में होती है और ऐसे में पशु भी आनंदित हो जाते हैं। उन्हें इस दौरान खूब हरी घास और चारा मिलता है। कहने का मतलब है कि आपका पशुधन उत्तम है। आपके पास दुधारू गाय भैंस हैं तभी आप घी का सेवन कर सकते हैं। घोंघा बनने का मतलब यह है कि अगर आप मेहनती नहीं हैं, आलसी हैं तो फिर आपकी फसल अच्छी नहीं होगी और आपका पशुधन उत्तम नहीं होगा। आप आलसी हैं और इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का अच्छी तरह से उपयोग नहीं कर पाते। यहां पर घोंघा आलस्य का प्रतीक है। जिसकी गति बेहद धीमी होती है और इस कारण बरसात में अक्सर रास्ते में पांवों के नीचे कुचला जाता है। 
     घी संक्रांति के दिन कई तरह के पकवान बनाये जाते हैं जिनमें दाल की भरवां रोटियां, खीर और गुंडला या गाबा (पिंडालू या पिनालू के पत्तों से बना) प्रमुख हैं। यह भी कहा जाता है कि इस दिन दाल की भरवां रोटियों के साथ घी का सेवन किया जाता है। तो फिर देर किस बात की आप भी सेवन करिये घी का और मनाईये घी संक्रांति। मैं तो जा रहा हूं घी के साथ रोटी खाने। तब तक के लिये नमस्कार। आपका धर्मेन्द्र पंत  

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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

सावन की याद, नेगी जी के गीतों के साथ

                   (श्री नरेंद्र सिंह नेगी के जन्मदिन पर 'घसेरी' की विशेष प्रस्तुति)


फोटो सौजन्य : आफिसियल ग्रुप आफ नरेंद्र सिंह नेगी
       ह बादल बहुत तेजी से पास आ रहा है। ऐसा लगता है कि उसके मन में मुझे आलिंगनबद्ध करने की तीव्र लालसा है। उसे मैं और मुझे वो दिख रहा है। यह जरूर मेरे पहाड़ का बादल होगा। हम भटके पहाड़ियों की खबर लेने वह भटकते हुए यहां पहुंच गया होगा। तभी तो वह मिलन के लिये इतना आतुर है। पता नहीं कब फूट पड़े और उसकी अश्रुधारा मुझे भिगो दे। आज मुझे यह बादल प्यारा सा लग रहा है। तब भी लगता था जब गांव के पास पहाड़ी पर यह चंचल चितचोर मुझ जैसे किशोरों का मन आह्लादित कर देता था और मां को व्याकुल। सावन का महीना पहाड़ की हर गृहिणी को अपने कामकाज को लेकर व्यथित कर देता है। इसलिए कई बार यह बादल उनके मन को नहीं भाता है। मां भी अपवाद नहीं थी। ऐसे में मेरी इच्छा हुई श्री नरेंद्र सिंह नेगी के उस गीत को सुनने की जो मुझे मेरे बचपन में लौटा देता है। जो मेरे कानों में मां के शब्दों की झंकार भी पैदा करता है। तब लगता था कि अगर मां के दो नहीं दस हाथ भी होते तो वह भी कम पड़ जाते। कपड़े, मोळ (गोबर), लकड़ियां, रजाई गद्दे, सूखने के लिये डाला गया अनाज सब को भीगने से बचाना है। बुबाजी (पिताजी), मैं, दीदी या भाई बाहर हैं तो उनकी भी चिंता होती और अगर वह स्वयं खेत में है तो खुद की नहीं घर की चिंता सताती। नेगी जी ने कितने सुंदर शब्दों में बारिश आने पर पहाड़ी जीवन की व्यथा को व्यक्त किया है और सबसे महत्वपूर्ण उसमें हास परिहास का भी पूरा पुट भरा है। आपने जरूर सुना होगा यह गीत .....
गरा रा रा ऐगे रे बरखा झुकि ऐगे,
गरा रा रा ऐगे रे बरखा झुकि ऐगे 
सरा रा रा डाण्यूं में कन कुयेड़ि छैगे 
गौं कि सतेड़ि कोदड़ि सार, गरा रा रा ऐ बरखा डाळ 
हौल छोड़ि भागि कका, काकि लुकि रे उड्यार
गरा रा रा घसैन्युं की छुलि रुझैगे .......

सावन में पहाड़ और वहां के गांव खिल उठते हैं। ऐसे में 'खुद' लगना स्वाभाविक है। फोटो सौजन्य : बिजेंद्र पंत 

       सावन में पहाड़ खिल उठते हैं। तब वे अपने पूरे यौवन पर होते हैं। गदेरों और झरनों के कोलाहल के बीच कोहरे की चादर। आखिर याद तो आएगी। 'खुद' तो लगेगी। इसलिए सावन को पहाड़ों में 'खुदेड़ महीना' कहा जाता है। विछोह की पीड़ा की व्याख्या करता है सावन यानि सौण। नेगी जी ने न सिर्फ सावन बल्कि बरसात के चारों महीनों की इस पीड़ा को अलग अलग अंदाज में पेश किया है। कभी वह ''गरा रा रा ऐगे रे बरखा झुकि ऐगे...'' वाले गीत में पूरी शरारत के साथ 'बोडी और ब्वाडा' की परेशानी के जरिये हम सबकी दुश्वारियों का वर्णन करते हैं तो दूसरी तरह उस विवाहिता के मन के अंदर झांकने के लिये विवश कर देते हैं जिसमें मायके के उसके उल्लास और उमंग से भरे दिन छिपे हैं। जिन्हें वह दर्द के जरिये इस तरह से बाहर निकालती है ... ''सौण का मैना ब्वे कनु  कै  रैणा, कुयेडी  लौंकाली, अंधेरी रात बरखा कु झमणाट, खुद तेरी लागालि''। यह दर्द का गीत है। ठंडे दर्द का गीत। सतत चलने वाले दर्द का गीत। इस गीत में ठिठुरन है। पहाड़ में अब भी कई महिलाएं इस दर्द को समझ रही होंगी लेकिन फिर भी उन्हें इसमें अपनत्व लग रहा होगा। आखिर यह उनके मन का गीत है। 
     क फिल्मी गीत है 'हाए हाए ये मजबूरी ये मौसम और ये दूरी तेरी दो टकिये की नौकरी मेरा लाखों का सावन जाए'। यह एक विरहिणी के मन की बात तो कहता है लेकिन चलताऊ अंदाज में। नेगी जी के गीतों में इसी वियोगिनी की दिल की आवाज कुछ इस तरह से निकलती है ..''हे बरखा चौमासी, बण घिरि कुयेड़ी, मन घिरि उदासी...। '' काम की मारामारी, तिस पर घना कोहरा और बारिश तथा साथ में अभावों की जिंदगी। इन सबके मिलन से पैदा होती है 'खुद'। कभी याद आती है मां की तो कभी अपने पिया की जो दूर परदेस में ड्यूटी पर तैनात है। जब 'खुद अपनी पराकाष्ठा' पर पहुंच जाती है तो फिर मन पिया के पास पहुंचने के लिये तड़प उठता है। मुझे लगता है कि पलायन के लिये हम पहाड़ियों की यह 'खुद' भी जिम्मेदार है। नेगी जी के कई गीतों में यह 'खुद' अपने अलग अलग रंग रूप में दिखायी देती है। सावन से पहले जब वह बारिश का आह्वान करते हुए गाते हैं, ''बरखा हे बरखा, तीस जिकुड़ि की बुझै जा, सुलगुदु बदन रूझै जा, झुणमुण झुणमुण कैकि ऐजा ...'' तो इसमें एक 'खुद' समायी हुई है जो अलग अंदाज में सामने आकर हमारी यादों के पिटारे को खोल देती है। 

नेगी जी का जन्म 12 अगस्त 1949 को पौड़ी गांव में हुआ था। जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं मेरे गढ़ रत्न, मेरे भारत रत्न, मेरे सुर सम्राट। आप अपनी गीत परंपरा का शतक पूरा करो। शुभकामनाएं।  फोटो सौजन्य : आफिसियल ग्रुप आफ नरेंद्र सिंह नेगी

        कहते हैं कि जहां न जाए रवि वहां जाए कवि और मैं कहता हूं कि हमारी सोच जहां पर खत्म हो जाती है नेगी जी के गीत हमें उससे आगे तक ले जाते हैं। वह प्रकृति के चितेरे हैं। वह सौंदर्य के पुजारी हैं। शब्द, शिल्प और भाषा में सूक्ष्म कल्पनाओं को पिरोकर उन्होंने हम पहाड़ियों की कोमल भावनाओं पर पंख लगाये हैं। वह मानवतावादी हैं, वह प्रगतिवादी हैं, वह हमारे सांस्कृतिक नायक हैं। वह पिछले 40 से भी अधिक वर्षों से गीत लिख रहे हैं और उन्हें अपनी आवाज दे रहे हैं। इन गीतों में पूरा एक युग समाया हुआ है। ये गीत हर उस व्यक्ति के गीत हैं जिसका पहाड़ से नाता रहा है। हमारी संस्कृति, हमारे समाज, हमारी परंपराओं, हमारी जीवन शैली का दूसरा रूप हैं नेगी जी के गीत। उनके अंतर्मन में पहाड़ बसा है और कंठ में कोयल। इसलिए आज अगर आज कोई एक व्यक्ति समग्र तौर पर पहाड़ का प्रतिनिधित्व करता है तो उस शख्स का नाम है नरेंद्र सिंह नेगी। आज नेगी जी का जन्मदिन है। उनका जन्म 12 अगस्त 1949 को पौड़ी गांव में हुआ था। जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं मेरे गढ़ रत्न, मेरे सुर सम्राट। आप अपनी गीत परंपरा का शतक पूरा करो। हम सब यही दुआएं करते हैं।
आपका धर्मेन्द्र पंत  

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शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

रिंगाल : कलम से लेकर कंडी तक

रिंगाल या रिंगलु
       रिंगाल या रिंगलु। उत्तराखंड के लगभग हर बच्चे से लेकर बड़े तक का रिंगाल से जरूर वास्ता पड़ता है। बचपन में रिंगाल की कलम से लिखना और घर में उससे बनी कई वस्तुओं का उपयोग जैसे सुपु, ड्वारा, कंडी, चटाई, डलिया आदि। बचपन में रिंगाल की कलम से लिखने का बहुत शौक था। हम मानते थे कि बांस से बनी कलम की तुलना में रिंगाल की कलम से अधिक अच्छी लिखावट बनती है। गांव में रिंगाल कम पाया जाता था लेकिन हम किसी भी तरह से रिंगाल ढूंढ ही लेते थे। जब बहुत छोटे थे तब पिताजी चाकू से छीलकर उसकी कलम बनाते थे। मैंने अपने गुरूजी (श्री पंचमदास जी) को भी कई बार स्कूल में बच्चों की कलम बनाते हुए देखा था। रिंगाल से मेरा पहला परिचय कलम ने ही करवाया था और कक्षा पांचवीं तक यह रिश्ता बना रहा। वैसे रिंगाल या बांस से बनी तमाम वस्तुएं हम हर रोज उपयोग करते थे। आज हम 'घसेरी' में इसी रिंगाल पर चर्चा करेंगे जो पहाड़ों में रोजगार का उत्तम साधन बन सकता है। 
          रिंगाल को बौना बांस भी कहा जाता है। बौना बांस मतलब बांस की छोटी प्रजाति। बांस के बारे में हम सभी जानते हैं कि यह बहुत लंबा होता है लेकिन #रिंगाल उसकी तुलना में काफी छोटा होता है। बांस जहां 25 से 30 मीटर तक लंबे होते हैं वहीं रिंगाल की लंबाई पांच से आठ मीटर तक होती है। बांस की तरह यह भी समूह में उगता है। यह मुख्य रूप से उन स्थानों पर उगता है जहां उसके लिये पानी और नमी की उचित व्यवस्था हो। यह विशेषकर 1000 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर उगता है। उत्तराखंड में कई स्थानों पर इसकी व्यावसायिक खेती भी होती है। उत्तराखंड में मुख्य रूप से पांच प्रकार के रिंगाल पाये जाते हैं। इनके पहाड़ी नाम हैं गोलू रिंगाल, देव रिंगाल, थाम, सरारू और भाटपुत्र। इनमें गोलू और देव रिंगाल सबसे अधिक मिलता है। गोलू रिंगाल का वानस्पतिक नाम DREPANOSTACHYUM FALCATUM जबकि देव रिंगाल का THAMNOCALAMUS PATHIFLORUS है। अमेरिका में ARUNDINERIA FALCATA प्रजाति का रिंगाल मिलता है जिसे उत्तराखंड में सरारू नाम से जाना जाता है। इनमें से गोलू रिंगाल अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर मिलता है जबकि देव रिंगाल निचले स्थानों यानि 1000 मीटर की ऊंचाई पर भी पाया जाता है। THAMNOCALAMUS JONSARENSIS यानि थाम भी अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर उगता है। इसे सभी रिंगाल में सबसे मजबूत और टिकाऊ माना जाता है। इसलिए इस रिंगाल की लाठियां बनायी जाती हैं।

बेहद उपयोगी होता है रिंगाल 


सुपु। अनाज से भूसे को अलग करने का उत्तम साधन। फोटो : रविकांत घिल्डियाल
    रिंगाल की कलम का पहले ही जिक्र किया जा चुका है। यह तो इस पौधे का छोटा सा उपयोग है। काश्तकार इससे कई अन्य उपयोगी वस्तुएं तैयार करते हैं। इनमें सुपा या सुपु (अनाज से भूसे को अलग करने के लिये), टोकरी, डोका या ड्वक (घास, चारा, कोदा, झंगोरा जैसे अनाज लाने के लिये), डलिया, बड़ी कंडी, हथकंडी, ड्वारा या नरेला (अनाज रखने के लिये), चटाई, फूलों को इकट्ठा करने के लिये बाल्टी, बक्सा, थाली, फूलदान, कलमदान, कूड़ादान, झाड़ू, ट्रे, पेस्टदान, टेबल लैंप, सोल्टा आदि प्रमुख हैं। घर में चावल साफ करने हैं या झंगोरा सुपु के बिना संभव नहीं हैं। जब चावल ओखली में कूटे जाते हैं तो सुपु की मदद से ही भूसे को अलग किया जाता है। घर में रोटी रखने के लिये अलग से टोकरी होती है जो मुख्य रूप से रिंगाल से ही तैयार की जाती हैं। कंडी से तो कई यादें जुड़ी हैं। खेतों में काम करने वाले के लिये कंडी में खाना रखकर ले जाया जाता है। गांव में 'पैणा' बांटने हैं तो वह भी कंडी में ही रखे जाते हैं। उत्तराखंड में 'दौण कंडी' का प्रचलन वर्षों से चला आ रहा है। कुमांऊ में डलिया को पवित्र माना जाता है। भिटौली त्योहार में मां डलिया में ही बेटी के लिये कपड़े और पकवान रखकर भेजती है। बेटी के घर बच्चा होने पर भी डलिया भेंट करने की परंपरा रही है। 
     कहने का मतलब है कि रिंगाल पहाड़ी लोगों के दैनिक जीवन का अहम अंग रहा है। रिंगाल की पत्तियां भी उपयोगी होती हैं। इनका उपयोग पशुओं के लिये चारे के रूप में किया जाता है। पशु इसकी पत्तियों को बड़े चाव से खाते हैं। खेतों में रिंगाल से बाड़ तैयार की जाती है और सूखने पर इसका उपयोग जलावन के लिये किया जाता है। यहां तक मिट्टी से बने घरों में छत बांस और रिंगाल के बिना तैयार नहीं की जा सकती है। रिंगाल बहुउपयोगी होने के बावजूद सरकारों से उसे शुरू से नजरअंदाज किया। इससे जुड़े कारीगरों को प्रोत्साहित करने की कोशिश नहीं की गयी जबकि यह रोजगार का अच्छा साधन हो सकता था। सरकार को स्थानीय लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये प्रयास करने चाहिए। रिंगाल उद्योग भी इनमें शामिल है। 
     बड़े भाई जितेंद्र मोहन पंत ने बहुत पहले एक कविता लिखी थी। उसमें एक पंक्ति थी 'फिर से तख्ती लिखने को करता है मन'। सच में ढेर सारी यादें जुड़ी हैं रिंगाल की कलम और इससे बनी वस्तुओं से। अभी तो मैं खुद को इन यादों के हवाले कर रहा हूं। आपका  धर्मेन्द्र पंत

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